Tuesday, 3 July 2018

प्रेम रोग पर चर्चा ( वयंग्य ) डॉ लोक सेतिया

         प्रेम रोग पर चर्चा ( वयंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

   छात्र सवाल पूछता है शिक्षक से , सर ये प्रेम रोग कैसी बिमारी होती है। शिक्षक बताता है आजकल ये रोग नहीं होता है इसका अंत कभी का हो चुका है। फिर भी तुम्हें मालूम होना चाहिए कि ये बेहद बुरा रोग हुआ करता था और इसकी कोई दवा भी नहीं मिलती थी। कहते थे मरीज़े इश्क़ पर लानत खुदा की , मर्ज़ बढ़ता ही गया ज्यों ज्यों दवा की। कब किसी को किस से इश्क़ का नामुराद रोग हो जाये कोई नहीं जानता था। बचाव के टोटके किये जाते थे तरह तरह के मगर रोग पर असर होता नहीं था। इस रोग में किसी का दिल किसी पर आ जाता था और दिल तो पागल है दीवाना है कहलाता था। बस उसी सूरत को हर  तरफ सामने पाता था , बिना देखे नहीं चैन आता था , मिलने पर भी दिल घबराता था। आदमी किसी काम का नहीं रह जाता था। खुद भी रोता रहता था महबूब को भी रुलाता था। आशिकों का मिलन कभी नहीं हो पाता था। लैला लैला गाता रहता और पत्थर खाता था। कोई पत्थर से न मारे मेरे दीवाने को लैला की बात किसी को समझ नहीं आई वो क्या कहना चाहती है , पत्थर से नहीं मारें तो फिर किस से मारना है। बचाना नहीं चाहती बस पत्थर की जगह जूते होते तो अच्छा होता शायद यही सोचती थी। बीसवीं सदी आते आते इश्क़ एक से नहीं अनेक से होने लगा ये रोग भयानक था एक साथ कितनों को अपने चपेट में लेने लगा था। मगर सच्चा प्यार उसी को माना जाता जो जब तक पहली वाली महबूबा की शादी किसी और से नहीं हो जाती तब तक दूसरी की तरफ आंख उठाकर भी आशिक़ नहीं देखता था। पारो नहीं मिली तभी चंद्रमुखी पास जाता था देवदास। आशिकों की दास्तान अधूरी रहती थी कभी पूरी नहीं होती थी।
              गुरूजी ये भी बताओ उस रोग का खात्मा कब और किस दवा  बचाव के टीके से हुआ। क्या पोलियो की तरह दो बूंद पिलाई जाती थी। नहीं बच्चा आज तक कोई दवा कोई इलाज नहीं मिला है इस का। पहले फोन का ज़माना आया तो पिया रंगून से फोन करता तुम्हारी याद आती है जिया में आग लगाती है। मोबाइल फोन आया तो बातें महंगी और आशिक सस्ते होने से एस एम एस ही से काम चलाते थे आशिक। लड़कियों को आशिक से फोन रिचार्ज के इलावा कुछ भी नहीं चाहिए था , मगर आशिकों को मलाल रहता था रिचार्ज वो करवाते हैं मगर बात माशूका औरों से अधिक करती है , आशिक की याद रिचार्ज खत्म होने पर ही आती थी। तभी स्मार्ट फोन किसी देवता की तरह आया और सब कुछ बदल गया। अब सभी को रोटी कपड़ा मकान के साथ इक कार और इक स्मार्ट फोन की चाहत होती थी। मोक्ष मिलना इसी को कहते हैं जब कुछ भी पाने को नहीं बचा हो। दुनिया में स्मार्ट फोन से बढ़कर कोई दूसरा सुख नहीं है।  नारद जी ने भगवान को जाकर आधुनिक ज्ञान की कथा सुनाई।
                                      भगवान अब किसी को किसी के लिए फुर्सत नहीं है सब अपने अपने स्मार्ट फोन पर व्यस्त हैं। भगवान आपको भी लोग स्मार्टली याद करते हैं हर सुबह अलग अलग संदेश मंडे तो संडे सातों दिन शुभ सौम मंगल बुध वीर शुक्र शनि रविवार। खुश अब आप भी। मनोरंजन बन गया है सब कुछ ज्ञान विज्ञान क्या धर्म कारोबार क्या , मिलना जुलना नहीं ज़रूरी बस ऑनलाइन दिखाई दिया तो सब कुशल मंगल है। शोकसभा की खबर भी व्हाट्सएप्प से मिलती है और त्यौहार की शुभकामना भी। रामबाण औषधि की तरह हर काम एक स्मार्ट फोन से। सरकार भी स्मार्ट हो गई है लोग भी बेकार के काम में सब कुछ भूल गए हैं। इक महिला , पुरुष भी हो सकता है , स्मार्ट फोन पर बिज़ी देख यमराज को आया देख भी घबराते नहीं।  रुको भाई चलते हैं ये सोशल मीडिया पर आखिरी स्टेटस तो लिखने दो प्लीज़। पता ही नहीं चलता समय अच्छा बुरा दोनों बीत जाते हैं। यमराज को समझाया ये कितने काम का है और यमराज भी मुफ्त उपहार लेने से इनकार नहीं कर सके। आत्मा के साथ कुछ भी जाता मगर यमराज भी मन गये स्मार्ट फोन साथ होगा तो सफर में सहूलियत होगी। गूगल से रास्ता तक मालूम हो जाता है , यमराज से भी गलती हो जाती थी किसी और को ऊपर उठाकर लाने के बाद बड़ी कठिनाई होती थी। झुक गया आसमान की बात अभी भूली नहीं है। आखिरी वक़्त जो भी दिल में होता है वही आत्मा को आगे मिलता है , आजकल आखिरी वक़्त भी किसी को स्मार्ट फोन को छोड़ कुछ भी याद नहीं रहता , भगवान को भी बगैर फोन याद कैसे करें। भगवान से भी हर आत्मा मुफ्त स्मार्टफोन और मुफ्त डाटा वाला सिमकार्ड मांगती है अपने अच्छे कर्मों के बदले में। इक भक्त ने अपनी कंपनी का अनुबंध ईश्वर से कर लिया है। भगवान ने पुराने आशिकों को भी यही सोचकर स्मार्ट फोन दे दिया ताकि वो चाहे जहां कहीं भी हों बात कर सकें। मगर ये क्या उनमें कोई भी पहले प्यार से बात करने को तैयार नहीं। कितना बदल गया इंसान , भगवान भी देख बड़ा हैरान। नारद जी ने समझाया कि ये रोग खत्म नहीं हुआ है बदल गया है। आधुनिक युग का इश्क़ फरवरी महीने में ज्वर की तरह चढ़ता है एक सप्ताह को। बाकी साल कितने और काम रहते हैं करने को।  

No comments: