Wednesday, 25 July 2018

मैं किसी का भगवान नहीं ( गॉड टोल्ड मी ) डॉ लोक सेतिया

    मैं किसी का भगवान नहीं ( गॉड टोल्ड मी ) डॉ लोक सेतिया 

   मैं जो कहने जा रहा उस पर यकीन नहीं करना , मुझे कोई बताता तो मैं हर्गिज़ नहीं मानता। आप इसे मनघड़ंत कहानी नहीं समझ सकते तो इक पागल का ख्वाब समझ लेना। मैं उसको नहीं पहचानता मगर उसने कहा वही है दुनिया बनाने वाला। तो मैं क्या करूं यही कहा था मैंने बिना सोचे ही। उसने कहा तुम इधर उधर मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे गिरजाघर किस की खातिर जाते हो , मेरी तलाश में ही तो जाते हो। कभी मिला वास्तव में जैसे आज सड़क किनारे खड़े बातें कर रहे हम दोनों।  तुम किसी को बताना नहीं नहीं तो लोग तुम्हें पागल समझ पागलखाने भेज देंगे या तुम्हें नास्तिक है कहकर किनारा कर लेंगें मुमकिन है कुछ ज़्यादा ही कट्ट्र हों तो तुम्हारे साथ गलत व्यवहार भी कर दें। मेरा कोई लेना देना नहीं है फिर भी मुफ्त में बदनाम मुझे ही करते हैं। भला मुझे किसी को सज़ा देनी होती तो क्या खुद ही नहीं दे सकता था ऐसे बदमाश रखता अपना शासन चलाने को। पढ़ा है कभी सुना है कभी खुदा ईश्वर अल्लाह ने किसी को परेशान किया हो इबादत करने के लिए या मुझ पर भरोसा करने को। जब तक लोग वास्तव में भगवान को मानते थे और भलाई की राह चलते थे मैं भी सुःख दुःख में सबके साथ रहता था। जब लोगों ने ये काम छोड़ सिर्फ दिखावा करना शुरू किया और शोर करने लगे मेरे नाम की आड़ में खुद को आस्तिक साबित करने का मुझे लोगों के साथ रहना कठिन हो गया। विवश होकर मैंने अपने को अपने पद से मुक्त कर सब को उनके हाल पर छोड़ दिया है। अब आजकल लोग जिसकी पूजा इबादत करते हैं वो मैं नहीं हूं , मुझे तो समझ ही नहीं आता किसकी आरती किसकी कथा किसका सतसंग किया जाता है। ये बड़े बड़े पत्थरों के धार्मिक स्थान और पत्थर के देवी देवता या किसी और तरह से किसी किताब को मेरा नाम देकर जो किया जाता है उसे क्या कहा जाना चाहिए मुझे ही नहीं समझ आता। सच तो ये है कि मुझे ये लोग पास भी फटकने नहीं देते , सब ने अपने खुदा घड़ लिए अपनी सुविधा से जो अच्छा और आसान लगता करते हैं। नासमझ हैं जो मुझे समझने की बात करते हैं खुद अपने आप को ही कभी नहीं समझते हैं। मैं जाता नहीं वहां जहां कहीं ये सब होता है सुबह से शाम तक। मगर आज चलता हूं और मुझे तुम ही बताना कि इन सब का मतलब है क्या।
                        इक सभा में कोई बोल रहा था माता पिता और बच्चों को लेकर हाल खराब है। बच्चे अपने माता पिता के नहीं हैं कोई किसी का नहीं है सब की झूठी प्रीत है। मुझे तो नहीं लगा ऐसा इसी सभा में अधिकांश लोग अच्छे हैं मगर ये जो सब को बुरा बता रहा है खुद कितना अच्छा है नहीं विचार करता। इसे उपदेश भी देना है तो कीमत लेकर देता है , इसकी बातों से असर कैसे होगा। ये जो लोग आपको अधिक का लोभ लालच नहीं करने का उपदेश देते हैं खुद समझते हैं उन्हें जो मिलता है का कम है। और जो लोग धार्मिक स्थलों को विशाल और तमाम सुविधाओं के सहित बनवाते हैं लोगों को थोड़े में खुश रहने को कहते हैं। इक छोटा सा घर बना हुआ था तब भी भगवान को कोई असुविधा नहीं थी , ऊंची इमारत कीमती साज़ो सामान किस भगवान को चाहिए। इंसान धूप गर्मी बरसात में बेबस हैं और इतने बड़े भवन में कोई नहीं रहता सब कुछ जमा किया हुआ है। हवा को पंखे की जगह ऐसी और सीसी टीवी कैमरे लगा क्या साबित करना है कि जो लोग आये हैं सब पर भरोसा किया ही नहीं जा सकता। मैंने कभी किसी पर ऐसी निगाह नहीं रखी , जो करता है फल मिलता है मुझे दखल देने की ज़रूरत ही नहीं है। आप कैसे उपदेश दे रहे हैं सबको पापी अधर्मी बता रहे हैं लताड़ते हैं बच्चों को खेलने को कुछ सीखने को नाचने को भेजते हैं साथ नहीं लाते मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे। भाई बच्चों को बचपन का आनंद लेने दो और संगीत या और किसी कला की शिक्षा लेने में बुराई क्या है। खुद जो भजन गाना जानते हैं बचपन से ही सीखा नहीं होता तो कब सीखते गाते। बच्चे भगवान का रूप हैं तो उनको किसलिए उनकी मर्ज़ी बिना कुछ करवाना दिखावे को। शायर की बात सच्ची है।  घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें , किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाये। मस्जिद इंसान ने बनाई है भगवान ने बच्चे को अपने हाथ से बनाया है तो महत्व किसका अधिक है। गीतकार भी समझाते हैं।  बच्चे मन के सच्चे , मगर आप उस सच्चाई पर अपने झूठ और दिखावे का लेबल क्यों लगाना चाहते हैं। खुद भगवान भी दुनिया में जन्म लेकर बचपन का आनंद लेते रहे ये भी खुद कथा सुनाते हैं।
           सब को लालच नहीं करने की बातें कहने वाले और अधिक भवन धन दौलत जमा करते जा रहे हैं , धर्म के नाम पर हज़ारों एकड़ ज़मीन किसी भी तरह हथिया ली है। गरीब को घर नहीं रोटी कपड़ा नहीं और धर्म के नाम पर अंबार लगा रखे हैं तो धर्म है क्या। धर्मशाला कोई नहीं मुसाफिर को रहने को ठिकाना नहीं , किसी भूखे को खाना नहीं मिलता किसी बेघर को रहने क्या भीतर नहीं आने देते। कहीं तो शुल्क लगा रखे हैं दर्शन बिकता है प्रसाद भी बेचते हैं। कौन सा भगवान है ये कैसा धर्म है। कोई आपकी बात से सहमत नहीं तो धर्म के नाम पर हिंसा किस धर्म की किताब में लिखा है। कोई अनुबंध किया हुआ है जो भगवान को मनवाने को ज़ोर ज़बरदस्ती करते हैं ये कैसी ठेकेदारी है। मत पूछो क्या क्या दिखाया समझाया मुझे उस ने जो खुद को वास्तविक भगवान बता रहा था मगर उसके पास कोई प्रमाण पत्र नहीं था। आधार कार्ड भी नहीं बना हुआ न कोई वोटर कार्ड तो राजनेताओं के किसी काम का नहीं वो भगवान। मुझे यही समझाया तुम कहीं मत जाओ मुझे ढूंढने को , मैं खुद चला आता हूं जो सच्चे दिल से पुकारता है उसके पास। बस उसी दिन से नहीं गया किसी धार्मिक जगह माथा टेकने , मुझे तो ध्यान ही नहीं आया कि भगवान सामने है तो सर झुकाता पांव छूता। शायद उसे भी ये नहीं पसंद था जो मेरे मन में ये ख्याल नहीं आया। मैंने तो उसको ये भी कह दिया ठीक किया जो अपने को अपने पद से मुक्त कर लिया जब किसी से कोई काम ठीक से नहीं होता हो तो हट जाना चाहिए। सही कहा आपने मैं भी मानता हूं ये दुनिया बनाकर कभी इक पल चैन से नहीं रह पाया। कोई सत्ता का भूखा नेता थोड़ा हूं जो कुर्सी को छोड़ते महसूस करता है जान निकलती है। नीरज जी मेरे पास आये हैं बहुत मधुर स्वर है और कितना सुंदर गीत लिखते हैं। मुझे समझते हैं बस ऐसे थोड़े से लोग।

उस से मिलना नामुमकिन है , जब तक खुद पर ध्यान रहेगा। 

जब तक हैं मंदिर और मस्जिद , आदमी परेशान रहेगा। 

तुम छोड़ दो ये सब करना जो तुम्हे जीना नहीं सिखाता और परेशानी देता है। भगवान की बात है माननी ही होगी मना करना उचित नहीं है। आपको यकीन नहीं हुआ मुझे जो मिला भगवान नहीं था आपका। आपका भी भगवान आएगा खुद आपके पास इंतज़ार करने में आपका जाता क्या है। कभी मिलने आये तो उस से भगवान होना का सबूत मत मांगना , बेचारा नहीं दे सकेगा।  कोई मुझे अपने धर्म की बात कर रहा था अपने गुरु की बात बता रहा था कैसे उसने गांव के गांव खरीद लिए अपने विस्तार के लिए। उनको अपने पास कोई और किसी और धर्म को मानने वाला नहीं चाहिए , उनके घर दुकान धार्मिक स्थल तक तोड़ अपने बनाये और उनके साथ कीमत देकर सौदा किया उनको किसी और जगह घर बनवा कर दिए और जिस जगह जो उनका धार्मिक स्थल तोड़ा  था उसके बदले और बना कर दिया मगर उसकी देखरेख अपने चेलों को ही सौंप दी। कोई चढ़ावा नहीं चढ़ा सकता बस सुबह शाम औपचारिकता निभाते हैं। बड़े महान हैं जो औरों को नसीहत देते हैं धन दौलत मत जमा करो और खुद अपने धर्म के नाम पर फैलते जाते हैं धंधा और अपनी दौलत ताकत और राजनीति में प्रभाव को उपयोग कर घरों को खेतों को ही नहीं गांवों को इंसानों को खरीदना उचित मानते हैं। ऐसे गुरु की शिक्षा कैसी होगी समझ सकते हो। मेरा भगवान तेरा भगवान उसका इसका किसका भगवान। मुझे ही बांट कर कहते हो मैं एक ही हूं , तुम लोग एक होने दोगे किसी को। भगवान ने किसी के नाम कोई वस्तु नहीं की थी , किसी को ज़मीन मकान पेड़ पौधे बटवारा नहीं किया था। सब की ज़रूरत को सभी कुछ था मगर किसी की हवस को पूरी करना तो भगवान के बस की भी बात नहीं है। भगवान को क्या समझते हैं , जमाखोर जो इतना सब खुद अपने नाम जोड़ता जा रहा है जबकि उसी के बनाये बंदे बेघर हैं भूखे हैं। आपके चढ़ावे से खुश होता होगा और अपने गुणगान से भी ख़ुशी हासिल करता होगा जो वो भगवान नहीं हो सकता। आपने भगवान को भी कारोबारी इंसान समझ लिया जो देता कम लेता ज़्यादा है , मुनाफाखोर है क्या भगवान। नहीं है तो सब धर्मों के पास दौलत बढ़ती क्यों जाती है , धर्म पर खर्च नहीं करते धर्म का विस्तार करने पर निवेश करते हैं। अब कोई उपाय नहीं है केवल एक ही तरीका है लोग इनकी वास्तविकता को समझ छोड़ दें मानना किसी भी धर्म को। भगवान को मानें चाहे नहीं मानें कोई फर्क नहीं पड़ता है , इन धर्मों को मानकर भगवान को मानना नहीं कहा जा सकता है। धर्म और भगवान एक ही नहीं हैं , धर्म आपको बंधन में रखता है जबकि भगवान ने आपको बंधनमुक्त किया हुआ है। सब बंधनों से मुक्त होना चाहते हैं तो पहले इन से मुक्ति पाओ जो आपको कुछ भी करने की क्या सोचने समझने की इजाज़त नहीं देते हैं। भगवान कोई बाहर से नहीं आये थे न आते हैं मुझे मेरे भीतर से मिले आपको आपके अंदर से मिल सकते हैं। 

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