Tuesday, 24 July 2018

सिंघासन पर अंधेरों का डेरा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     सिंघासन पर अंधेरों का डेरा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   उसने ठान ली है मेरे को ही चुनना होगा।  मेरे गले में वरमाला नहीं डालोगी तो ज़िंदा नहीं बचोगी। बहुत बहाने बनाये अभी वक़्त तो आने दो। पर उसको डर लग रहा है तुम मेरे साथ खुश नहीं हो लगता है तेरे चेहरे की उदासी से खुश्क लबों से जर्द हुए गालों के रंग से। जब तुम पर आशिक़ हुआ तो गुलाबी था चेहरा खिलखिलाती हंसी थी , वादा किया था लाऊंगा अच्छे दिन , तुम मानती क्यों नहीं यही तो होते हैं अच्छे दिन। मेरे सिवा कौन है जिसे तेरी चिंता है , बस मैं ही मैं हूं ध्यान से देखो। किसकी मज़ाल है तेरा सपना भी देखे। मेरा प्यार ऐसा ही है पुराने ढंग वाला मेरी गुलामी को अपना भाग्य समझोगी तभी जी सकोगी। गली में इक बच्चा खिलौने से खेल रहा था , मैंने कहा ये मुझे पसंद है मुझे दे दो मुझे चाहिए जो मुझे पसंद हो। जब उसने नहीं दिया तो छीन लेना चाहा और छीन नहीं पाया तो तोड़ डाला। मेरा नहीं तो उसके पास भी नहीं , किस मां के पास जाकर रोएगा। है किसी की मज़ाल जो मुझे रोके टोके। तुम समझ जाओ चाह कर भी कुछ भी कर पाओगी। पिंजरे को अपना स्वर्ग मान लो और मेरी कैद में ख़ुशी से रहो , चह चहाओ ताकि सब को लगे मेरे साथ रहकर तुम खुश हो बहुत। आज़ाद होने की बात भूल कर मन में नहीं लाना , पिंजरे से प्यार करोगी तो अच्छा लगेगा। सोने का बनाया है पिंजरा मैंने , देख लो कितने टीवी चैनल वाले मीडिया वाले खुश हैं और मेरी खिलाई हरी हरी मिर्च खाने के बाद दिन भर मेरा ही नाम जपते हैं। जो मुझको हो पसंद वही बात कहते हैं खुश रहते हैं। 
                                 मुंह पर पट्टी बंधी है बोल नहीं सकती सुन सकती है देख रही है। जिस को अपना घर बताता है उसी को आग लगाने की तैयारी चल रही है। सत्ता की देवी का आशिक़ है सरफिरा है , दिल आ गया है तो अपहरण कर कैद में जकड़ रखा है। प्यार से बहाने से बुला लाया था मगर अब वापस नहीं जाने देता। घुट घुट कर मरना होगा साफ कहता है मगर चुप भी रहना होगा , हर ज़ुल्म सहना होगा। लगता है इक्कीसवीं सदी नहीं उन्नीसवीं सदी वापस आ गई है। ताकत से जंग लड़कर अपहरण कर किसी को अपनी  दासी बना सकते हैं। महिलाओं को बराबरी के अधिकार क्या सुरक्षा भी हासिल नहीं और जो मर्ज़ी आरोप लगाकर सूली चढ़ा देते हैं। ये कैसे नियम बना लिए अपनी सुविधा से कोई और करता था तो लुटेरा अपराधी मगर खुद करें तो देश की सेवा। घनी अंधेरी रात को दिन घोषित कर रहे हो , किस किस पर झूठे आरोप धर रहे हो। इतिहास बनाने की चाहत अधूरी रही तो इतिहास को ही बदल रहे हो , अपनी मर्ज़ी की कहानियां घड़ रहे हो। वादा हर दिन हर सुबह करते हो हर शाम मुकर रहे हो। मदर इंडिया फिल्म को देख देख मचल रहे हो , नरगिस पर और मासूमों पर सितम पे सितम कर रहे हो। नया बनाना नहीं आता पुराने को भी बर्बाद कर रहे हो। नया ज़माना फिल्म का गीत सुनो फिर सोचो क्या होना चाहिए था तुम क्या कर रहे हो। 

कितने दिन आंखे तरसेंगी , कितने दिन यूं दिल तरसेंगे , इक दिन तो बदल बरसेंगे।
ऐ मेरे प्यासे दिल , आज नहीं तो कल महकेगी खुशियों की महफ़िल।
नया ज़माना आएगा , नया ज़माना आएगा।
ज़िंदगी पर सब का एक सा हक हो , सब तसलीम करेंगे , सारी खुशियां सारे दर्द बराबर हम तकसीम करंगे।
नया ज़माना आएगा , नया ज़माना आएगा।
सूने सूने से मुरझाये से हैं क्यों उमीदों के चेहरे , कांटों के सर पर ही बांधे जाएंगे फूलों के सेहरे।
नया ज़माना आएगा , नया ज़माना आएगा।

नया ज़माना फिल्म की कहानी :-

मुझे याद है आपको भूल गई तो दोबारा याद दिलवाना ज़रूरी है। उपन्यास लिखता है नायक जो इक गरीब है मगर धोखे से अपने नाम से छपवा कर गरीबों का दुःख दर्द समझने की शोहरत हासिल कर लेता है इक उद्योगपति धनवान। नायिका खुश हो जो गीत गाती नज़र आती है वास्तव में गरीब नायक के लिखे को उसके पिता ने अपने नाम से छपवा लिया है। धोखेबाज़ और चालाक चालबाज़ लोग यही किया करते हैं , भले और ईमानदार होने की नकाब लगाकर छल कपट धोखा सब करते हैं। फ़िल्मी कहानियों में आखिर में खलनायक नायिका को पाने को दंगा फसाद गोली चलाने से घर को आग के हवाले करने तक सब करता है मगर हार खलनायक की तय होती है। नायक सच की राह चलते हैं उनको हार का डर नहीं होता न जीत कर अहंकारी बनते हैं। बहुत फ़िल्में फिर से बनाई गई हैं , मदर इंडिया और नया ज़माना फिर से बनाये कोई। हां गुरुदत्त की प्यासा और कागज़ के फूल भी। क्योंकि सवाल बाकी हैं :-

जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां हैं ? कागज़ के फूल हैं इस ज़माने में। 

पाबंदी लगा देना फिर से , ये भी इतिहास है किसी गीत पर पाबंदी लगाई गई थी। कहां हैं जिनको नाज़ है हिन्द पर देखें क्या नाज़ करोगे इस पर जिस में अभी भी असमानता है भूख है अन्याय है अत्याचार है।

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