Monday, 2 July 2018

मोक्ष की चाह , या जीवन की राह ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   मोक्ष की चाह , या जीवन की राह ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

          " ख़ुदकुशी आज कर गया कोई , ज़िंदगी तुझसे डर गया कोई "

     जीते जी स्वर्ग नहीं मिलता , नर्क खुद हमने बना रखा है धरती पर और मोक्ष की बातें करते हैं। पूरे परिवार की मौत का रहस्य कोई नहीं जनता कयास लगा रहे हैं। यहां दुष्यंत का शेर भी नहीं कह सकते। कई फाके बिताकर मर गया जो उसके बारे में , वो सब लोग कहते हैं ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा। अकेला आदमी ख़ुदकुशी करता है तो दो सेकंड की खबर बनती है 11 लोग मौत की आगोश में चले गये तो दो दिन यही विषय है। ये भी याद तब तक जब तक कुछ और नहीं मिल जाता हम सभी को भी और खबर वालों को भी वक़्त बिताने को। यकीन माने कोई विचलित नहीं होता है किसी भी हादिसे से सब अपना ज्ञान बघारते हैं। ये संवेदना व्यक्त करने का बेहद असंवेदनशील तरीका है। ग़ालिब ने सच कहा था , मौत का एक दिन मुआयन है , नींद क्यों रात भर नहीं आती। अगर विचार करें तो इतने लोग एक साथ मिलकर ख़ुदकुशी करने को राज़ी नहीं हो सकते। आपको हैरानी होगी इक सर्वेक्षण बहुत पहले किया गया था , जिस में पता चला कि शायद ही कोई हो जिसने कभी न कभी मरने की चाह नहीं की हो। लेकिन हम में से आधे लोग कभी ख़ुदकुशी करने की असफल कोशिश कर चुके हैं। मोक्ष कोई वस्तु नहीं है और मौत को गले लगाना साहस का काम भी नहीं है। जो भगवान को मानते हैं उन्होंने अगर वास्तव में उसे सकझा है तो उसको पाना खुद को पाना है और तमाम संत महात्मा चिंतन से अध्यन से उसे पाना अर्थात समझने का जतन करते रहे हैं। कोई उसे निर्गुण निराकार बताता है कोई उसे इंसान की तरह समझता है। आमने सामने देखना शायद हमारी सोच की सीमा है महसूस करना चाहो तो हर किसी में है सभी जगह है। इक ग़ज़ल मेरी याद आई है :-
ढूंढते हैं मुझे , मैं जहां  नहीं हूं  ,
जानते हैं सभी , मैं कहां नहीं हूं ।
  
सर झुकाते सभी लोग जिस जगह हैं ,
और कोई वहां , मैं वहां नहीं हूं ।

मैं बसा था कभी , आपके ही दिल में ,
खुद निकाला मुझे , अब वहां नहीं हूं ।
 
दे रहा मैं सदा , हर घड़ी सभी को ,
दिल की आवाज़ हूं ,  मैं दहां  नहीं हूं ।

गर नहीं आपको , ऐतबार मुझ पर ,
तुम नहीं मानते , मैं भी हां  नहीं हूं ।

आज़माते मुझे आप लोग हैं क्यों ,
मैं कभी आपका इम्तिहां  नहीं हूं ।

लोग "तनहा" मुझे देख लें कभी भी ,
बस नज़र चाहिए मैं निहां  नहीं  हूं।
                                          शायद हमने अपने धर्म को कभी समझना भी नहीं चाहा , कोई भी धर्म नहीं बताता इस तरह मौत को गले लगाने से मोक्ष मिल सकता है। मौत बुरी चीज़ नहीं है मौत सभी को सब दर्द सब परेशानियों सब दुःखों से निजात दिला देती है , मगर वो मौत खुद आती है हमारे बुलाने से नहीं आती है। जो विधाता को मानते है वो अगर समझते हैं मर कर उस से मिलना है तो इंतज़ार करते हैं कब वो खुद बुलाएगा। बिना बुलाये भगवान के घर भी नहीं जाना चाहिए वर्ना बाहर खड़े रहोगे मुलाकात नहीं होगी। आप किसी छोटे से ओहदे वाले से मिलने समय लेकर जाते हैं और अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं तो जो सब से बड़ा है सब से शक्तिशाली है उसे मिलने को कितने लोग जाते होंगे। आपने अपनी बारी का इंतज़ार नहीं किया और चले गये। क्या समझा था कोई सिफारिश काम आएगी कोई रिश्वत कोई पूजा प्रार्थना आरती से खुश हो जाता होगा। इतना ही समझा तो मोक्ष के हकदार नहीं हो सकते हो। जब जन्म मरण उसके हाथ है तो आप कैसे भगवान के काम में दखल देने लगे। जितना समय टीवी वाले और हम सभी इस विषय पर चर्चा और बेकार की बहस में बर्बाद कर रहे हैं अच्छा हो उस समय का सार्थक उपयोग लोगों को ऐसे भटकाव से बचने की बातों में लगाकर कोई सार्थक पहल करते। अभी तक तो हमारी सर्वोच्च अदालत ये भी निर्णय नहीं कर पाई है कि ख़ुदकुशी करना जुर्म है या नहीं। सरकार कब से योजना बनाए इंतज़ार कर रही है ख़ुदकुशी करने वालों की सहायता करने को सेंटर खोलने को।  इसे मज़ाक नहीं समझना। ये राज़ की बात है।

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