Tuesday, 10 July 2018

जो जाना नहीं औरों को समझाते हैं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  जो जाना नहीं औरों को समझाते हैं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

 

    आग को हवा देना उसमें मिट्टी का तेल डालना किसी के ज़ख्मों पर नमक छिड़कना कोई भी कर सकता है। दूर से बैठे तमाशा देखने वालों की कमी नहीं है , आग लगी हो उसको बुझाने कोई नहीं जाता। सब अपना दामन बचाते हैं , किसी को नहीं मतलब कि आग बुझाई नहीं तो कभी अपना भी घर जला देगी। जो कभी खेत खलिहान नहीं गये धूप में हल नहीं चलाया सर्दी की बर्फीली रात को खेतों को पानी देने नहीं गये बरसात और तूफ़ान में खुले आसमान में अपनी फसलों को बचाने में अपनी जान का जोखिम उठाया नहीं। उनको अनाज की समर्थन मूल्य की कीमत कैसे समझ आएगी। लेकिन मुझे बात और करनी है देश की देश के सर की स्वाभिमान की। किसान की बात इसलिए की क्योंकि भले कभी मेरे पास खेती की ज़मीन थी मगर मैंने खुद कभी किसानी नहीं की , बहुत मेहनत का काम है। बस इसी तरह लोग देश की समस्याओं पर समझे बगैर बोलते हैं। आपने इश्क़ किया है कभी , नहीं किया तो आप क्या जानों ये क्या बला है। अभी भी आपको इश्क़ का मतलब आदमी औरत की मुहब्बत लगा हो तो हैरानी की बात नहीं है। इश्क़ मुहब्बत वतन से भी होता है और करने वाले खुदा से भी मुहब्बत करते हैं , मेरा जूनून है लिखना ये मेरा इश्क़ है। सच कहता हूं जब कोई बात विचलित करती है देश की समाज की तो नींद नहीं आती बेचैनी बढ़ती जाती है। आसान नहीं होता है किसी विषय पर लिखना , पहले सोचना समझना पड़ता है हर तरह से हर तरफ से। लोग पढ़ते हैं या नहीं मगर केवल शीर्षक देख कर अपनी राय बना लेते हैं। पायल के ग़मों का इल्म नहीं झंकार की बातें करते हैं। किसी ने अपने करीबी ने मुझे इक वीडियो भेजा जिस में बेहद खराब भाषा का उपयोग तो किया गया ही था साथ में महिलाओं को लेकर अपनी गंदी सोच को भी उजागर किया गया था। कश्मीर को इक बेवफा औरत बता रहे थे , और जो जो बोल रहे दोहराना भी अनुचित है। शायद इन्होंने ही कुछ समय पहले सेल्फी विद डॉटर की बात भी की हो जिसे आजकल शायद कम लोग करते हैं। उन्हें कुछ भी पता नहीं है , देश का बटवारा रियासतों का भारत पाकिस्तान में जिसे मर्ज़ी चुनना और कश्मीर के राजा का भारत में मिलने का निर्णय और उसके बाद बहुत कुछ जिसे इतनी आसानी से नहीं समझा जा सकता। उन्हें कुछ नहीं पता धारा 370 क्यों और कश्मीर को विशेष दर्जा देने का कारण क्या था। क्यों शेख अब्दुल्ला को सालों तक कैद रखा गया और किस ने उनसे समझौता किया ताकि कश्मीर के लोगों को भारत में शामिल होने को राज़ी किया जाये और उनके दिलों को जीत कर भरोसा दिलाया जाये उनकी कश्मीरियत को बचाये रखने का। ये जो लोग सवाल करते हैं कश्मीर से मिलता क्या है और उस पर खर्च कितना आता है , उन्होंने कभी विचार ही नहीं किया कि इस देश में जिस में भूख है गरीबी है एक राष्ट्रपति निवास जो 150 एकड़ में फैला हुआ है उसी के रखरखाव पर करोड़ रूपये तक हर दिन खर्च किये जाते हैं। देश में बहुत राज्य हैं जिनको अधिक सहायता की ज़रूरत होती है और खर्च  करने पड़ते हैं मगर ऐसा किसी का उपकार नहीं है संविधान सभी को बराबरी की बात करता है। इस तरह की बातें करने वाले शायद जानते ही नहीं कि देश की संसद ने संकल्प लिया था कोई। स्वाभिमान को सिक्कों से नहीं तोला जा सकता। कश्मीर सर के ताज की तरह है और आप कहते हैं उस पर मुकट की ज़रूरत क्या है। हम लोग शायद कभी नहीं समझना चाहते कि कुछ चीज़ें राजनीतिक फायदे नुकसान से ऊपर होती हैं , और जो लोग राम मंदिर समान नागरिक संहिता धारा 370 की बात करते हैं उनको सत्ता की चाहत थी उनका मकसद किसी समस्या का समाधान नहीं था। सत्ता मिली तो सत्ता को बनाये रखना ही ध्येय बन गया। आज वो किसी वादे की बात नहीं करते , अच्छे दिन कब आएंगे या आये तो किसके हिस्से में , या फिर यही जो आजकल हैं वही हैं अच्छे दिन। ऐसे सभी कठिन सवालों से बचने का ढंग है जनता को आपसी भेदभाव जाति धर्म क्षेत्रवाद के नाम पर बांटना। कश्मीर पर कितना धन खर्च होता है के साथ कभी पता करना दिल्ली पर कितना धन खर्च होता है , इससे भी आगे बाकी दिल्ली और लुटियन की दिल्ली में कितना अधिक अंतर है। हर बात पर बिना जाने समझे कुछ भी कहने से पहले समझना होगा वास्तविकता को। समझने को फुर्सत नहीं पढ़ने की आदत नहीं लिखने को वीडियो बनाने को स्मार्ट फोन है। तलवार हाथ में आना काफी नहीं है , तलवार सुरक्षा भी करती है और ज़ुल्म अत्याचार भी करती है। बोलने की आज़ादी दोधारी तलवार की तरह है। गांधी जी कहते हैं इंसान बोलना दो चार साल में सीख जाता है मगर जीवन गुज़र जाता है ये सीखने में बोलना क्या है और कैसे है। ग़ालिब का इक शेर है। इस विषय का अंत करना बेहद मुश्किल है।  सागर को गागर में भरना किसे आता है। ग़ालिब की बात को समझना ज़रूरी है :-

                      हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है ,

                      तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़ ए गुफ्तगू क्या है।

                     रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल ,

                     जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।

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