Saturday, 28 July 2018

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 7 डॉ लोक सेतिया

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 7 

                                     डॉ लोक सेतिया 

     पिछले दो दिन की दोनों कहानियों की बात से पहले कुछ और बात कहने की अनुमति चाहता हूं।  हमारे देश का आदर्श वाक्य है " सत्यमेव जयते " मगर हम अपने ही देश के बारे सच कहने को नापसंद करते हैं। सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा , कहते हैं गीत गाते भी दिल से हैं मगर जब भी कोई किसी बाहरी देश से होकर आता है तो अधिकतर यही बताता है कि रहने को वही जगह है। मगर वहां रहते तो समझ पाते कि जिस तरह इस देश में मनमर्ज़ी करते हैं शायद ही किसी और देश में कर सकते। मगर बात सच बोलने की है , कल की कहानी में जो बात सबसे महत्वपूर्ण थी वो यही कि सब अपने धर्म अपने परिवार अपने समाज की अच्छाई बढ़ा चढ़ा कर बताते हैं लेकिन उसकी कमियां या गलतियां छिपाते हैं। अमेरिका के बारे कहा जाता था उनको अपनी बखिया खुद उधेड़ना आता है। कल किसी सत्ताधारी दल के नेता का भरी सभा में बयान था कि जो बुद्धीजीवी देश की जनता के मानवाधिकारों की बात करते हैं या सेना पर सवाल उठाते हैं अगर मुझे होम मिनिस्टर बनाते तो उनको गोली से मरवा देता। शायद उनको नहीं पता खुद सेना के लोग भी अपने अधिकारियों और सरकार पर आरोप लगाते हैं , विरोध भी जताते हैं कि एक रैंक एक पेंशन नहीं लागू करते और झूठ बताते हैं। पुलिस वालों की खुद अत्याचार की कानून तोड़ने से लेकर अपराध करवाने की घटनाएं सामने आती हैं आये दिन। किसी बेगुनाह को फंसवाना , किसी को झूठे ढंग की मुठभेड़ में मार देना , और नशा मुक्ति केंद्र में खुद नशा करना और नशा उपलब्ध करवाना , सत्ता के हाथ में कठपुतली बनकर किसी नेता के जूते साफ करना जैसे काम देखे हैं। जब कोई सैनिक सोशल मीडिया पर अपनी कहानी बताता है तो हंगामा हो जाता है। जब कारगिल युद्ध का फौजी अपने बदन में दुश्मन की गोली लिए अपाहिज बनकर जीता है मगर उसे पेट्रोल पंप और ज़मीन देने का वादा नहीं निभाते सत्ताधारी लोग और विवश होकर उसे झूठे बर्तन लोगों के धोने पड़ते हैं अपनी दुकान खोलकर , तब ये नेता कारगिल के शहीदों की केवल बातें कर रहे होते हैं। इन्होंने खुद सभी नेताओं ने देश को दिया क्या है खुद पर देश का धन बर्बाद किया और सिर्फ भाषणों में देशसेवा की है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीश भी अगर देश की जनता के सामने न्यायपालिका की वास्तविकता रखते हैं तो सत्ताधारी लोग उसे अनुचित बताते हैं। सच को देखना कठिन होता है और सच बोलने में जोखिम भी होता है। ऐसा सदियों से होता आया है कि सच बोलने वालों को सूली चढ़ाया जाता रहा है।
        इक महिला पत्रकार को अपने और अपने पिता के परिवार के गुरु का स्टिंग ऑपरेशन करने को कहते हैं तो उसे लगता है मेरा भरोसा है जिस पर भगवान होने का भला उसकी जांच कैसे करूं शक कर। मगर असलियत सामने आती है तो सच कड़वा लगता है , मगर उस खुद को ब्रह्मचारी बताने वाले को जब किसी महिला के साथ देखते हैं तो वो बचाव में उस को अपनी पत्नी बताता है और अभी तक नहीं बताने का कारण समाज सेवा करना बताता है। बचकाना बात लगती है शादीशुदा होकर भी समाज सेवा की जा सकती थी। मुझे इक बात कभी समझ नहीं आती है कि माता पिता को जो बच्चे दुनिया के सब से अच्छे लगते हैं बड़े होने पर उन्हीं में हर बुराई दिखाई क्यों देती है। मैंने शायद ही किसी को माता पिता की बुराई करते देखा सुना है , बेहद कम कभी ऐसा होता है। मगर अधिकतर माता पिता खुद अपनी संतान की बुराई औरों से करते मिलते हैं। शायद उनके माता पिता भी ऐसा करते होंगे , होता ये है कि हम अपनी संतान को अपना गुलाम बनाकर रखना चाहते हैं और जब कोई बेटा बेटी अपना जीवन अपने ढंग से जीना चाहे तो लगता है हमारी सत्ता जा रही है। अपने बच्चों का पालन पोषण करें मगर बड़े होने पर उनको आज़ाद पंछी की तरह खुले आकाश में उड़ने से रोक कर अपने स्वार्थ के पिंजरे में बंद मत करें। पिंजरे में कैद पक्षी खुश नहीं रह सकता है।
        इक कहानी में जवान विधवा बहु नौकरी करती है और सास ससुर की देख रेख करती है जो अपने पोते को संभालते हैं और बहु के साथ रहते हैं , बेटी उनको बुलाती है मगर उसके पास नहीं जाते। उस महिला को दफ्तर में कोई विवाह का प्रस्ताव रखता है तो वो सास ससुर को साथ रखने की बात करती है जो विवाह करने वाला पुरुष समझाता है अजीब लगेगा कि पति के घर उसके माता पिता के साथ नहीं पहले पति के माता पिता को साथ रखे। फिर उसकी ननद तो चाहती थी साथ रखना इसलिए वो अपने बच्चे को लेकर इक खत लिखकर चली जाती है विवाह कर के ताकि बच्चे को अच्छा भविष्य मिल सके। बाद में जब वही पहले पति के माता पिता वृद्धआश्रम में मिलते हैं तब पता चलता है खुद उनकी बेटी ने घर से निकाल दिया क्योंकि उसे माता पिता नहीं काम करने को नौकर चाहिए थे। तब सास ससुर स्वार्थी बनकर उस बहु से उसके बच्चे को छीनना चाहते हैं क्योंकि पोते पर उनका अधिकार है। बच्चे का भविष्य नहीं खुद को सहारा चाहिए , विवश होकर बेटा सौंपती भी है मगर जब उस से विवाह करने वाला सवाल करता है कि क्या आपने अपनी बहु को बेटी समझा था। समझते तो खुद उसकी शादी करवाते , तब उनको समझ आता है कौन सही था कौन गलत। आखिर वही बहु और उसका पति उनको अपने घर साथ रखते हैं। अर्थात संतान हो या माता पिता अपनी जगह कोई भी सही या गलत हो भी सकता है और नहीं भी। पूरे समाज को एक ही ढंग से दिखाना अनुचित है कभी कोई भी गलत हो सकता है। हम सभी को आपसी तालमेल कायम करना सीखना चाहिए।
                 तीसरी कहानी भी पिता बेटे को लेकर है। बेटा छोटा है पत्नी की मौत के बाद भी दूसरा विवाह नहीं करता सौतेली मां की बात सोचकर। जबकि कि  कहानी में और जीवन में देखते हैं ऐसी महिलाएं अधिकतर अच्छी होती हैं और बिना कारण बदनाम हैं। मगर हैरानी होती है जब जवान बेटे से इक दिन साठ साल की आयु में पिता अनुमति चाहता है विवाह करने की किसी महिला से प्यार हो गया है। बेटे को ये बात बेहद आपत्तिजनक लगती है और वो जाकर जिस लड़की से शादी कर विदेश जाना चाहता है उसे बताता है। तब वो लड़की समझाती है कि ऐसा होने देना उचित है क्योंकि हम जब विदेश में जाकर रहेंगे तो कोई उनका साथी होगा ख्याल रखने को। हमें चिंता नहीं रहेगी। तब वो पिता से घर आकर कहता है मुझे मिलवाओ जिस से आप विवाह करना चाहते हैं। ये अक्सर कथाकार करते हैं दर्शक या पाठक को अचंभित करने को अचानक कुछ ऐसा सामने लाकर खड़ा करना जिसकी कल्पना नहीं की होती। नाटकीयता कहते हैं जबकि वास्तविक जीवन में उसकी ज़रूरत नहीं होती है। यही इस कहानी में होता है अगली सुबह जब पिता उस महिला को अपने बेटे से मिलवाने घर पर बुलवाता है और महिला आती है साथ अपनी बेटी को लेकर। मगर बेटा और उस महिला की बेटी नहीं जानते थे हमारे ही माता पिता हैं जो इक दूसरे को चाहते हैं और शादी करना चाहते हैं।  यहां समस्या उनके खुद के रिश्ते पर खड़ी हो जाती है मगर वो अपने पिता से अपनी माता से कह भी नहीं सकते अन्यथा ये भी तय था वो उनकी शादी करवाते अपनी नहीं।
                      तब लड़का लड़की मिलते हैं और जो लड़की कल खुद लड़के को राज़ी कर रही थी अपने पिता की शादी को स्वीकार कर लेने को , आज अपनी मां की शादी करने को अनुचित समझती है। उसे अब मेरी शादी की बात सोचनी चाहिए अपनी नहीं। लड़का उसको अगली सुबह मंदिर में आने को कहता है ताकि शादी कर सकें।  कथाकार फिर कहानी में नाटकीयता लेकर आचंभित करता है , जब लड़की मंदिर पहुंचती है तो पता चलता है उसे प्यार करने वाला अपने पिता की शादी उसकी मां से करवा रहा होता है। तब बताता है कि अगर पिता इतने साल तक विवाह नहीं करता बेटे को सौतेली मां नहीं मिले जो शायद प्यार नहीं करे इस विचार से तो बेटा क्यों अब पिता के लिए इस आयु में अच्छी जीवन संगिनी मिलने में अड़चन नहीं बनकर साथ दे सकता है। समस्या कुछ भी नहीं है इक बात समझने की है कि हम सभी जो नहीं मिलता किसी रिश्ते से उसकी शिकायत को मन में रखकर उसे गलत समझने की आदत बदल जितना मिला जिस से उसी से ख़ुशी अनुभव कर सकते हैं। इक गीत कुछ ऐसा ही है।

मन रे तू काहे न धीर धरे , वो निर्मोही मोह न जाने जिसका मोह करे। 

उतना ही उपकार समझ कोई जितना साथ निभा दे , ........ 

 

        

No comments: