Sunday, 13 August 2017

दोस्ती और फेसबुक फ्रेंडशिप ( दिल के एहसास ) डॉ लोक सेतिया

  दोस्ती और फेसबुक फ्रेंडशिप ( दिल के एहसास ) डॉ लोक सेतिया

          शायद खुद मुझे भी नहीं मालूम था पिछले रविवार अपनी दोस्ती की बातें लिखने के बाद इस रविवार इक और पक्ष फेसबुक फ्रेंडशिप को लेकर लिखूंगा। पिछले सप्ताह जिस शिद्द्त से मैंने दोस्तों से बात की और उनके फोटो भी मंगवाए उस से कई दोस्त भी थोड़ा अचंभित थे। कुछ दोस्तों से सम्पर्क नहीं किया जा सका मुझे इस बात की कमी खली भी। इक बहुत अच्छी बात हुई , इक दोस्त जो दुनिया में ही नहीं है 15 साल से उनकी फोटो जब उनके घर से लेने को गया तब उनकी बेटी मिली थी घर में क्योंकि दोस्त की पत्नी और उनकी बेटी की मां अपने मायके गई हुई थी राखी बांधने भाई को। वापस आकर जब उन्हें बेटी ने बताया तो उनका फोन आया बहुत भावुक होकर कहा आप उनसे कितना प्यार करते हैं जो इतने साल बाद भी इस कदर उनको याद करते हैं। मैंने उन्हें बताया मेरी कई कविता कई कहानी और ग़ज़ल उन्हीं की दोस्ती पर ही हैं। अगर मुन्नवर राणा जी की ग़ज़लें मां पर हो सकती हैं तो मेरी रचनाओं में दोस्ती क्यों नहीं हो सकती जब मेरा मज़हब मेरा जुनून मेरी तलाश हमेशा से एक ही रही है दोस्त की तलाश। 
     आज अपनी फेसबुक खोली और कई घंटे तक बारी बारी सभी दोस्तों की वाल पर देखा। फेसबुक पर इक ऑप्शन है योर फ्रेंडशिप। हर एक से देखा उस ऑप्शन पर , चार हज़ार पांच सौ दोस्त बन गए कुछ ही महीने में व्यंग्य साहित्य नाम से बनाई फेसबुक पर। मगर अधिकतर से पता चला कभी कोई बात ही नहीं हुई। मेरी आदत है मैं दोस्ती की बात पर किसी को दोष नहीं देता बल्कि सोचता हूं शायद उन को मुझ से वो नहीं मिला जो वो मेरे करीब नहीं हो सके। जो मुझे समझ आया वो ये कि लोगों ने फेसबुक पर इक अजीब चूहा दौड़ लगानी शुरू की हुई है संख्या बढ़ाने को। शायद पांच हज़ार की सीमा फेसबुक ने तय की हुई है। मैं शायद इस मामले में दुनिया से अलग हूं कि मैंने बहुत फेसबुक बनाई साहित्य समाज की बात ग़ज़ल की बात महिलाओं की बात से लेकर लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी और सत्येंद्र दुबे जी की याद को ज़िंदा रखने को। मगर दोस्ती की चाह रखने के बावजूद मैंने अपनी हर फेसबुक पर उन लोगों को सूचि से हटा दिया जो कुछ भी अनुचित या बेअदबी की बात करने लगे या जिनको मुझे लगा कि बस कहने को ही बनाते हैं दोस्त। और आज मैंने आधे दोस्तों को अलविदा कह दिया है। 
                    शायद आपको लगे ये कैसा पत्थर दिल है जो बिना कारण ही इतने दोस्तों को एक दिन में हटा रहा है। मगर एक एक को अनफ्रेंड करते मुझ पर क्या बीती नहीं शब्द बताने को। और जिनको हटाया उन्हें क्या फर्क पड़ेगा कुछ भी नहीं। इस तरह समझना उन सब की पॉकेट में दो तीन चार पांच हज़ार सिक्के थे , और इक सिक्का कहीं खो गया उन्हें पता ही नहीं चला होगा , मगर मेरी जेब में से आधे सिक्के ही लगा खोटे हैं और रखना फज़ूल है। मेरा तो खज़ाना ही आधा ही नहीं हुआ अभी बहुत और भी इसी अंजाम को पहुंचेंगे दो दिन में। आपको मेरी बात समझ नहीं आएगी क्योंकि मुझे किसी के भी नाम के साथ इक तमगा बनकर नहीं रहना पसंद। और मेरे इतने दोस्त हैं फेसबुक पर का मेरे लिए कोई महत्व नहीं रहा कभी भी। कल ही इक पोस्ट लिखी थी फेसबुक पर महिलाओं से दोस्ती और उनसे चैट करने को लेकर , शायद उसी के बाद ध्यान आया कि वास्तव में दोस्ती क्या है। फेसबुक का उद्देश्य तक बदल गया है। अब व्हाट्सएप्प और मेस्सेंजर पर व्यर्थ की वार्ता और मनोरंजन  लगता है जैसे लोगों का ध्येय ही समय बिताना हो गया है। जो बहुत कीमती नाता होता था अब इतना सस्ता हो गया है कि किसी को न दोस्ती करने की ख़ुशी महसूस होती है न खोने का कोई दर्द। मगर तब भी मेरी तलाश जारी रहेगी दोस्त को लेकर। मुझे दोस्त ही नहीं उनसे मिला दर्द भी अच्छा लगता है। मुझे ग़म भी उनका अज़ीज़ है कि उन्हीं की दी हुई चीज़ है।

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