Saturday, 12 August 2017

पुरुष पीछे महिला आगे ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      पुरुष पीछे महिला आगे ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

    आप शीर्षक से गलत अंदाज़ा नहीं लगाना , इस बात का किसी लड़के के किसी लड़की का आधी रात को पीछा करने से कोई सरोकार नहीं है। हैं इस में मनसिकता उसी तरह की ही है। आज भी वही हुआ फेसबुक पर भी जो सालों पहले अख़बार और पत्रिका वालों ने किया था। आपको लिखने वालों की लिखी कहानियां मिली होंगी पढ़ने को मगर उनकी खुद की असली जीवन की कहानी कभी नहीं मिली होगी पढ़ने को। जो भी खुद अपनी जीवनी लिखते हैं मीठा मीठा खुद और कड़वा बाकी को परोस देते हैं। दावा जो भी करते हों सच कहने का अपना सच बोलते होंट सी लेते हैं , नहीं बतानी जो बात उसको इस तरह कहते हैं कि सुनकर कोई समझ ही नहीं पाए मतलब क्या है। और इसी को गहराई की बात बताया जाता है। तो हुआ ऐसा कि इक लेखक को इक शरारत सूझी , उसको लगा कि अख़बार वाले उनकी अच्छी भली रचनाओं को खेद सहित वापस लौटा देते हैं जबकि कई महिला लिखने वाली लेखिकाओं की साधारण रचना भी छाप देते हैं। रचना छपने पर मानदेय भी खुद को ही मिले ये भी देखना ही था इसलिए अपनी वापस लौटाई रचनाओं को अपनी पत्नी के नाम से उन्हीं अख़बार पत्रिका को दोबारा भेजा। साथ में उसका फोटो भी बेहद सुंदर सा भेज दिया। हैरान हुए कई जगह वो रचनाएं बेहद जल्दी ही प्रमुखता से छपी भी। अब पत्नी को भी बताया कि तुम्हारे नाम पर मनी आर्डर या चेक आये हैं मगर रचना मेरी लिखी हैं। पति की हर चीज़ पर पत्नी का अधिकार होता ही है तो रचना और मानदेय पर भी होना ही चाहिए। धीरे धीरे पति की वापस लौटाई रचनाओं के पत्नी के नाम छपने की संख्या खुद उसके नाम से छपी रचनाओं से अधिक होने लगी। साहित्य अकादमी भी उनकी रचनाओं को महिला विशेषांक में आदर सहित छाप रही थी। पत्नी को लिखने का कुछ भी पता नहीं था फिर भी अपने नाम से छपी रचनाओं को देख फूली नहीं समाती और नगर में महिला लेखिकाओं की अध्यक्ष बन गई थी। ये बात राज़ ही रहती अगर इक दिन इक बहस  नहीं छिड़ी होती। इक नियमित कॉलम लिखने वाली ने बताया कि एक बार उसने अपने हस्बैंड को अपनी जगह कॉलम लिख भेजने को कहा तब उनको समझ आया लिखना कोई खाला जी का घर नहीं है। 
                          और झगड़ा इतना बढ़ा कि बात घर से बाहर जा निकली। लेखक ने अख़बार को इक नई व्यंग्य रचना भेजी जिस के अंत में साफ लिख दिया कि बहुत समय से मेरी रचनायें बीवी के नाम से छप रही हैं। संपादक जी ने अपनी गलती नहीं समझी बल्कि उस लेखक को दोषी ठहराया अपनी पुरानी रचनाओं को दोबारा भेजने और पत्नी के नाम से हस्ताक्षर कर मौलिक और अप्रकाशित बताने का। उनसे मिला मानदेय वापस करने और क्षमा मांगने को भी कहा गया अन्यथा जिस जिस जगह छपते उनको ये सुचना देने की बात भी की गई। आखिर में लेखक को स्वीकार करना पड़ा कि रचनाओं की वास्तविक लेखिका पत्नी ही हैं। इस तरह महिला होने से बहुत महत्व मिलता है सब जगह ही। राजनीति में तो सुंदर महिला होना अतिरिक्त गुण समझा जाता है। 
                          इधर फेसबुक की धूम है और हर लिखने वाले की फेसबुक और पेज है। महिला और अगर सुंदर लगती फोटो की प्रोफाइल भी है तो लाइक्स और कमैंट्स का अंबार लगा रहता है। मुझे शुरू शुरू में इक बात बड़ी अखरती थी जब मेरे ब्लॉग की शेयर की रचनाओं को एक मिंट में कोई दस बीस लाइक देता था। शायद बहुत लोग नहीं जानते कि ब्लॉग पर तो पता चलता ही है कितने लोगों ने पढ़ा पोस्ट को , फेसबुक भी दिखलाता है किस किस ने पढ़ा है और किस किस ने लाइक किया हुआ बिना पढ़े ही। आज की ही बात है इक जोड़ा लेखक लेखिका का देखना चाहता था फेसबुक पर कैसे लोग हैं और उन्होंने दो फेसबुक दोनों के नाम से शुरू की आज ही जिस पर दोनों की एक साथ की ही फोटो भी थी। बीस तीस पहचान वालों को दोस्त बना लिया दोनों ने ही और सुबह दोनों की सूचि समान थी। बिना कुछ भी पोस्ट लिखे ही दो तीन घंटे में जहां पति को एक भी रिक्वेस्ट नहीं मिली वहीं पत्नी के नाम वाली पर सौ लोगों की रिक्वेस्ट मिली। अभी अंजाम बाकी था , महिला ने साफ मना किया हुआ था चैट नहीं करने को , तब भी तमाम लोग तरह तरह से मैसेज भेजने लगे और मैसेज ब्लॉक करने पर कमैंट्स में कारण पूछने लगे। शाम तक दोनों ने फेसबुक से तौबा ही कर ली और डीएक्टिवेट ही कर दी फेसबुक। लेकिन कुछ ही देर में बहुत लोगों की असली सूरत दिखाई दे गई थी।

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