Wednesday, 9 August 2017

75 साल बाद की बात ( अंग्रेज़ो भारत छोडो ) डॉ लोक सेतिया

  75 साल बाद की बात ( अंग्रेज़ो भारत छोडो ) डॉ लोक सेतिया 

      कहने को संसद का सत्र बुलाया गया और खोखले भाषणों को दोहराया गया मगर वास्तविक चिंतन करने का साहस किसी में भी नहीं था। न कांग्रेस पहले सी रही न कोई विपक्षी उस तरह से बिना अपनी राजनीतिक उद्देश्य को सामने रख खुद को और सत्ताधारी लोगों को एक साथ कटघरे में खड़ा करने की हिम्मत दिखला पाया। सत्ताधारी दल को भी इसी में सुविधा थी क्योंकि बहुत कुछ इन दिनों सामने आने लगा है जो दिखलाता है कि सत्ता का नशा उनपर भी इतना चढ़ गया है कि अपराधी नेताओं या नेताओं की संतानों पर बेशर्मी से बचाव करते नज़र आने लगे जब  उनको साबित करना चाहिए था सुशासन क्या होता है। दुर्योधन को अंधे धृतराष्ट्र ही नहीं बचाते लगे अपितु भीष्म पितामह भी मूक दर्शक बने राज्य सभा को शतरंज की बिसात का मोहरा बना संविधान की मर्यादा से खेलते नज़र आये। अब ऐसे में 9 अगस्त 1942 की बात का सच कौन बोलता। कांग्रेस कैसे बताती कि  1935 से गाँधी जी उसके सदस्य ही नहीं थे। और आज की सत्ता संभाले लोग अपनी पुरानी विरासत को कैसे गलत ठहराते कि उन्होंने तब हिन्दू महा सभा के बैनर के नीचे न केवल भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया बल्कि उसे कुचलने का भी भरसक प्रयास किया। वामपंथी भी तब आंदोलन नहीं विदेशी सत्ता के साथ थे। जो लोग इतिहास से नज़रें चुराते हैं और इक अपराधबोध में चुप हैं मगर साफ नहीं कहना चाहते कि तब जिन नेताओं ने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया था हम उनकी बात से सहमत नहीं हैं। क्योंकि वाम और दक्षिण दोनों पंथी उन्हीं को अपनी विरासत की प्रतिमाएं मानते हैं। अब उनको महात्मा गांधी के विरोध करने वालों को गांधी जी की तरह महिमामंडित भी करना है और गांधी जी की राह पर चलने की झूठी बात  कहनी है।
          कौन आज बताता कि तब सभी नेताओं के जेल में बंद होने के बाद भी आम किसान मज़दूर और जनता ही आंदोलन को जारी रखे रही और दिन को किसान खेत में हल चलाते और रात को सरकारी प्रतिष्ठानों पर हमले भी करते थे। सब से ख़ास बात ये थी कि तब जनता केवल विदेशी शासकों का ही विरोध नहीं कर रही थी बल्कि स्वदेशी राजाओं और जागीरदारों का भी विरोध कर रही थी। आजकल के नेता कुछ हज़ार की भीड़ जमा करने को इतिहास रचना बताते हैं। अभी तीन साल में देश की दशा में कोई वास्तविक बदलाव नहीं किया गया तब भी ऐसा माहौल घड़ने का प्रयास किया जा रहा है जैसे सब कुछ अच्छा हो गया है। राष्ट्रवाद की बात ही नहीं केवल अपने दल और उसकी विचारधारा को किसी भी तरीके से थोपने का काम किया जा रहा है। कोई मूल्यों की चिंता नहीं बस सत्ता विस्तार की आकांक्षा है।
         आज भी नेता अपने चहेतों को लूट खसूट करने को सहयोग दे रहे हैं। जो हरियाणा में हुड्डा की सरकार करती रही , भजनलाल और चौटाला ने किया वही आज मनोहर लाल की सरकार के काल में भी सरकारी ज़मीन विभाग के प्लॉट्स और जगहों पर अवैध कब्ज़े खुद सत्ताधारी दल की नेता अपने भाई सम्पदा अधिकारी से करवाती हैं और उनको अवैध कब्ज़े हटवाने से रोकती हैं। मगर खुद को ईमानदरी का तमगा देने वाली सरकार खामोश है। कोई मंत्री किसी सभा में जाकर मनमानी करता है और अधिकारी को अपमानित करता है अपनी सीमा का उलंघन कर के। तानाशाही और सत्ता की गुंडागर्दी ही नहीं तथाकथित विकास कार्यों में भ्र्ष्टाचार भी साफ दिखाई देता है।  घटिया स्तर की सामिग्री से पार्क सड़क आधे अधूरे पड़े हुए हैं। हर नेता शासन को दुरूपयोग करता है मगर अपना कर्तव्य निभाने में असफल अधिकारी सम्मानित किये जाते हैं और हर दिन कोई आयोजन उन कार्यों की सफलता का जश्न मनाने को होता है जो हुए ही नहीं। मगर आज की जनता खामोश है और सच का साथ देने को बाहर नहीं निकलती। गांधी जी ने कहा था सच बोलने पर लोग खासकर वो लोग जो खुद सच का सामना नहीं कर सकते आपको सज़ा दे सकते हैं मगर आपको सच बोलने पर माफ़ी नहीं मांगनी है। भारत छोड़ो की बात भाषण देने को नहीं है , आज के शासकों को भी अपनी मानसिकता छोड़ने को कहना ज़रूरी है। क्योंकि आज भी अंग्रेज़ों की तरह और आपत्काल के समय की तरह जो सत्ता से सहमत नहीं उसे देश विरोधी बताकर लोकतंत्र की भावना की अवहेलना की जा रही है। समय आत्मावलोकन का है।
            बहुत कम लोग जानते हैं कि 1935 के नियम जो तब का संविधान था में केवल अमीर लोगों को ही वोट डालने की आज़ादी थी। गाँधी जी भी 1921 मैं जो थे 1942 मैं वैसे नहीं रहे क्योंको भारत छोड़ो का नारा बेशक उन्होंने दिया था 8 अगस्त के भाषण में मगर आंदोलन उनके हाथ में नहीं था न वो किसी भीड़ के आगे चल रहे थे। तब अहिंसा की भी बात नहीं थी और हिंसा का सहारा लिया जा रहा था। अंग्रेज़ों के सरकारी प्रतिष्ठान हमले आगजनी का शिकार हो रहे थे। बहुत कुछ बदला हुआ था। सब से खास बात जो गांधी जी को महात्मा बनाती है उनका अपनी बात को ईमानदारी से स्वीकार करना। वो इक लेख लिखते थे और अगली बार दूसरे लेख में अपनी गलती को मान कहते थे मेरी वो बात गलत थी आप आज जो लिखा उसे ही मेरा विचार समझना। विचार बदलते रहना स्वाभाविक है चिंतन से। मगर राजनेताओं ने विचार को व्यक्ति बना पत्थर बनाकर उपयोग किया है , ठीक उसी तरह जैसे ईश्वर इक विचार है हमने उसे मूर्तियां बनाकर पूजने तक इक आडंबर बना दिया है। धर्म की बात का पालन नहीं करते धार्मिक होने का दिखावा करते हैं। आज कोई नहीं चाहता गांधी लोहिया या जयप्रकाश नारायण जैसे विचार को लोग समझें , वो कोई सत्ता के लालची नहीं थे।  अंग्रेज़ों भारत छोड़ो कहने वाले नहीं चाहते थे खुद शासक बनना। आज के नेता खुलेआम कांग्रेस ही नहीं सभी दलों को हाशिये पर लाना चाहते हैं , उनका मकसद भ्र्ष्टाचार या बाकी अनुचित बातें नहीं केवल खुद का शासन चाहना है। सत्ता को ध्येय बनाने वाले देश और समाज को कभी कुछ नहीं दे सकते। 1960 में हिंदू महासभा ने जिन मंदिरों का अधिकार मंगा था उन में राम मंदिर नहीं शामिल था। जो लोग धर्म को या गांधीवाद लोहियावाद या जे पी की विचारधारा को अपने लिए सत्ता की सीढ़ी मानते हैं उनको अपने स्वार्थ पुरे करने हैं।
                  बड़े लोगों का कद बड़ा उनके आचरण से हुआ करता है। आजकल लोग जनता का धन बर्बाद कर विज्ञापनों से महान कहलाना चाहते हैं।  सोशल साइट्स और मीडिया में खुद को महिमामंडित करवाते हैं। मुझे ये लोग बचपन की याद दिलाते हैं जब सिगरेट का विज्ञापन करने वाले बांसों की टांगों को लगाए बहुत ऊंचे दिखाई देते थे। बच्चे उनके पीछे तालियां बजाते घूमते थे। आज भी कुछ लोग यही कर रहे हैं ठूंठ की ऊंचाई के सामने नतमस्तक हैं।

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