Wednesday, 1 January 2014

मरने भी नहीं देते ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

ख़ुदकुशी करना अगर जुर्म है तो जीना किसी सज़ा से कम नहीं। शायद यही अकेला जुर्म है जो कामयाबी से करने पर सब सज़ाओं से बचा लेता है मगर इस जुर्म करने में जिसे नाकामी हासिल हो उसे कई सज़ायें झेलनी पड़ती हैं। उस पर कुछ लोग जो मरने के नाम से ही थर थर कांपने लगते हैं , ये इल्ज़ाम लगाते हैं कि ख़ुदकुशी करना कायरता है। हम अच्छी तरह जानते हैं कि ये कितने साहस का काम है। हर कोई नहीं कर सकता ऐसा हौसला , यूं मरने की बातें सभी करते रहते हैं। मौत जब सामने आती है तो सब जीने की चाहत करते हैं। अब कानून का क्या है वो ख़ुदकुशी को सही माने चाहे गल्त। कानून क्या सभी को जीने के अधिकार की बात नहीं करता है , तो क्या सब को मिलता है जीने का अधिकार। क्या हम सब जी रहे हैं जिस तरह उसको ज़िंदगी कह सकते हैं। अदालतों ने कभी इस पर कुछ कहा है कभी कुछ और कह दिया। करते रहें बहस लोग कि ख़ुदकुशी करने का अधिकार देना उचित होगा या अनुचित जिसने मरने को ठान लिया उसे इस सब से क्या मतलब। कल अगर कानून ख़ुदकुशी करने की इजाज़त दे भी दे तो क्या हर कोई जो मर जाने की बात करता है सच में ख़ुदकुशी करने का सहस कर सकेगा। मांगने से मौत कब मिलती है किसी को।
              "मरने भी नहीं देते दुश्मन मेरी जां के" गीत मुझे शादी से पहले भी बेहद पसंद था लेकिन शादी के बाद तो मैं इसके सिवा दूसरा कोई गीत कभी गुनगुना ही नहीं सकी। मुझे आज भी याद है जब मैंने तय कर लिया था कि ख़ुदकुशी करके मरना है और हिम्मत करके नदी में कूद गई थी। मगर मेरी इस सहस पूर्वक की कोशिश को नाकाम करने ये जाने खां से चले आये थे और मुझे मरने नहीं दिया था। जब आंख खुली तो सामने भीड़ को देख जितना घबराई थी उतना तो सामने मौत को देख भी नहीं डरी थी। तब मेरी हालत को देख इन्होंने सब को जाने को कह दिया था और मुझे पकड़ कर कुछ दूर ले गये थे। जब इन्होंने मुझसे ख़ुदकुशी करने का कारण पूछा और पुलिस की बात की तो मैंने इनसे कह दिया प्लीज़ आप ये बात किसी को मत बताना। तब इनको वादा किया था फिर कभी ख़ुदकुशी नहीं करने का। जब ये मुझे मेरे घर छोड़ने आये तो इन्होंने ही बहाना बना दिया था कि मेरा पांव फिसल गया था और मैं नदी किनारे से नदी में गिर गई थी। और उसके बाद मेरे पांव ही नहीं मेरा दिल भी फिसल गया था और मैं इनके प्रेमजाल में फस गई थी। हमारी शादी हो गई थी लेकिन मैं इस बात से अनजान थी कि मुझे उम्र भर कीमत चुकानी है अपनी जान बचाने की। उसके बाद मैं कब कब कैसे कैसे मरती रही कोई नहीं जानता न मैं ही बता सकती हूं किसी को। लेकिन ये समझ आ गया था कि अब मरना भी उतना आसान नहीं रह गया है। अब तो मुझे पानी से भी डर लगने लगा है। कभी भूले से इनको कह बैठी कि ऐसा जीना भी कोई जीना है तो इनका जवाब होता है कि मैं तुम्हें बचाने की सज़ा ही तो काट रहा हूं। शादी को उम्र कैद बताते हैं , कहते हैं कि उनका एहसान है जो ज़िंदा हूं वरना कब की मर गई होती। कभी कहते हैं कि अगर मैं जीने से बेज़ार हो चुकी हूं तो वे खुद मुझे अपनी भूल को सुधार नदी में धक्का दे देते अगर कानून ऐसी अनुमति प्रदान करता। बहुत से देशों में मांग हो रही है मरने का हक देने की , कभी न कभी तो ये मांग हमारे देश में भी पूरी हो जायेगी। तब पूछूंगी इनसे क्यों मुझसे मेरा अधिकार छीना था , मुझ पर कोई उपकार नहीं किया था तुमने। ज़िंदा रह कर मुझे क्या कुछ नहीं झेलना पड़ा है , कितने दर्द कितनी मुश्किलें मुझे सहनी पड़ी हैं आपके कारण। मेरी जान बचाने के बदले इनको तो मैं मिल गई थी उम्र भर के लिये ईनाम सवरूप। मुझे क्या दे सकते अगर कल कानून बदल जाये और ऐसा समझे कि ये दोषी हैं मुझे बचाने के और इस कारण मुझे कितनी तकलीफें सहनी पड़ी हैं। इनके कारण मेरी हालत ऐसी हो गई है कि न जी सकती हूं न मर ही सकती हूं। कितने सालों से इनकी गल्ती की सज़ा मुझे मिल रही है न चाहते हुए भी इनके लिये जीने की। उस एक गल्ती को सुधारने का क्या कोई उपाय नहीं है। आपको समझ आये तो बताना मुझे या फिर आत्महत्या का कोई सरल उपाय ही सुझा दें , बढ़िया सा तरीका जिसे कोई असफल नहीं कर सके इस बार।

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