Monday, 29 April 2013

आखिरी तम्मना ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

आखिरी तम्मना ( नज़्म ) डॉ  लोक सेतिया

रात ख़्वाब में मुझसे खुदा ने कहा
तुम्हारे लिये है किसी ने मांगी दुआ
क्या चाहते हो मांगना सोचकर तुम
आज होगी पूरी हर इक इल्तजा।

मुझसे ताउम्र तुम्हें शिकायत रही
आप खुद से रहते हो हमेशा ही खफ़ा
इबादत सीखी न आया माला जपना
फिर भी कर लो जो भी आरज़ू करनी।

कहा मैंने पूछा है तो बस यही है कहना
ऐसी दुनिया में मुझे नहीं अब और रहना
जन्नत चाहिये न कोई दोज़ख ही मुझे
बात  है इक ज़रूरी पूरी उसको करना।

बाद मरने के मुझे इक ऐसा जहां मिले
छोटा और बड़ा नहीं कोई भी जहां  हो
है कहां ऐसी जगह मुझको वो दिखा दो 
कोई परस्तार हो , न जहां कोई खुदा हो।              ( परस्तार :::: उपासक )

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