Monday, 29 April 2013

आखिरी तम्मना ( नज़्म ) 9 1 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

आखिरी तम्मना ( नज़्म ) लोक सेतिया

रात ख़्वाब में मुझसे खुदा ने कहा ,
तुम्हारे लिये है किसी ने मांगी दुआ ,
क्या चाहते हो मांगना सोचकर तुम ,
आज होगी पूरी हर इक इल्तजा।

मुझसे ताउम्र तुम्हें शिकायत रही ,
आप खुद से रहते हो हमेशा ही खफ़ा ,
इबादत सीखी न आया माला जपना ,
फिर भी कर लो जो भी आरज़ू करनी।

कहा मैंने पूछा है तो बस यही है कहना ,
ऐसी दुनिया में मुझे नहीं अब और रहना ,
जन्नत चाहिये न कोई दोज़ख ही मुझे ,
बात  है इक ज़रूरी पूरी उसको करना।

बाद मरने के मुझे इक ऐसा जहां मिले ,
छोटा और बड़ा नहीं कोई भी जहां  हो ,
है कहां ऐसी जगह मुझको वो दिखा दो ,
कोई परस्तार हो , न जहां कोई खुदा हो।              ( परस्तार :::: उपासक )

Friday, 26 April 2013

ग़ज़ल 2 0 0 ( बड़ा ही मुख़्तसर उसका फ़साना है ) - लोक सेतिया "तनहा"

 बड़ा ही मुख़्तसर उसका फ़साना है - लोक सेतिया "तनहा"  

बड़ा ही मुख्तसर उसका फसाना है ,
बना सच का सदा दुश्मन ज़माना है।

इधर सब दर्द हैं ,उस पार सब खुशियां ,
चला जाये जिसे उस पार जाना है।

कंटीली राह पर चलना यहां पड़ता ,
यही सबको मुहब्बत ने बताना है।

गुज़ारी ज़िंदगी ,आया कहां जीना ,
नया क्या है ,वही किस्सा पुराना है।

जिसे जब जब परख देखा ,वही दुश्मन ,
नहीं अब दोस्तों को आज़माना है।

हमें सारी उम्र इक काम करना है ,
अंधेरों को उजालों से मिलाना है।

ये सारा शहर बदला लग रहा तनहा ,
अभी वैसा तुम्हारा आशियाना है।

Thursday, 25 April 2013

ग़ज़ल 1 9 9 ( नहीं मालूम जिसको खुद पता अपना )

नहीं मालूम जिसको खुद पता अपना - लोक सेतिया "तनहा"

नहीं मालूम जिसको खुद पता अपना ,
बना आये उसी को तुम खुदा अपना।

बड़ी बेदर्द दुनिया में हो आये तुम ,
बनाना खुद पड़ेगा रास्ता अपना।

न करना आरज़ू अपना बनाने की ,
यहां कोई किसी का कब हुआ अपना।

तड़पना उम्र भर होगा मुहब्बत में ,
बहुत प्यारा नसीबा लिख दिया अपना।

हमारा वक़्त कुछ अच्छा नहीं यारो ,
चले जाओ सभी दामन छुड़ा अपना।

नहीं आता किसी के वार से बचना ,
ज़माने को लिया दुश्मन बना अपना।

बतायें शर्त से होता है क्या तनहा ,
लगाई शर्त इक दिन सब बिका अपना।

Wednesday, 24 April 2013

ग़ज़ल 1 9 2 ( आज हर झूठ को हरा डाला ) - लोक सेतिया "तनहा"

आज हर झूठ को हरा डाला - लोक सेतिया "तनहा"

आज हर झूठ को हरा डाला ,
आईना सच का जब दिखा डाला।

बन गये कुछ , लगे उछलने हैं ,
आपने आस्मां बता डाला।

आपके सामने बसाया था ,
घर हमारा तभी जला डाला।

धर्म वालो कहो किया क्या है ,
हर किसी को ज़हर पिला डाला।

जिसपे दीवार को चुना इक दिन ,
आज पत्थर वही हटा डाला।

मुस्कुराये लगे हमें कहने ,
आपके प्यार ने मिटा डाला।

आज देखा उदास तनहा को ,
रुख से परदा तभी हटा डाला।

Monday, 22 April 2013

ग़ज़ल 1 9 8 ( मिल के आये अभी जिंदगी से ) - लोक सेतिया "तनहा"

 मिल के आये अभी ज़िंदगी से - लोक सेतिया "तनहा"

मिल के आये अभी ज़िंदगी से ,
की मुलाक़ात इक अजनबी से।

मांगते सब ख़ुशी की दुआएं ,
दूर जब हो गये हर ख़ुशी से।

काश होते सभी लोग ऐसे  ,
लुत्फ़ लेते वो आवारगी से।

बात हर इक छुपा कर रखो तुम ,
कह न देना नशे में किसी से।

खूबसूरत जहां  कह रहा था ,
देखना सब मुझे  दूर ही से।

दर्द कितना,मिले ज़ख्म कितने ,
मिल गई  दौलतें   दोस्ती से।

क़त्ल कर लें तुझे आज तनहा ,
पूछते थे यही खुद मुझी से।

Saturday, 20 April 2013

ग़ज़ल 1 9 7 ( सभी को हुस्न से होती मुहब्बत है ) - लोक सेतिया "तनहा"

सभी को हुस्न से होती मुहब्बत है - लोक सेतिया "तनहा"

सभी को , हुस्न से होती मुहब्बत है ,
हसीं कितनी हसीनों की शिकायत है।

भला दुनिया उन्हें कब याद रखती है ,
कहानी बन चुकी जिनकी हक़ीकत है।

है गुज़री इस तरह कुछ ज़िंदगी अपनी ,
हमें जीना भी लगता इक मुसीबत है।

उन्हें आया नहीं बस दोस्ती करना ,
किसी से भी नहीं बेशक अदावत है।

वो आकर खुद तुम्हारा हाल पूछें जब ,
सुनाना तुम तुम्हारी क्या हिकायत है।

हमें लगती है बेमतलब हमेशा से ,
नहीं सीखी कभी हमने सियासत है।

वहीं दावत ,जहां मातम यहां तनहा ,
हमारे शहर की अपनी रिवायत है।

Friday, 19 April 2013

ग़ज़ल 1 9 6 ( आबरू तार तार ख़बरों में ) - लोक सेतिया "तनहा"

आबरू तार तार खबरों में - लोक सेतिया "तनहा"

आबरू तार तार ख़बरों में ,
आदमी शर्मसार ख़बरों में।

शहर बिकने चला खरीदोगे ,
लो पढ़ो इश्तिहार ख़बरों में।

नींद क्या चैन तक गवा बैठे ,
लोग सब बेकरार ख़बरों में।

देख सरकार सो गई शायद ,
मच रही लूट मार ख़बरों में।

आमने सामने नहीं लड़ते ,
कर रहे आर पार ख़बरों में।

झूठ को सच बना दिया ऐसे ,
दोहरा बार बार ख़बरों में।

नासमझ कौन रह गया तनहा ,
सब लगें होशियार ख़बरों में।

Tuesday, 16 April 2013

ग़ज़ल 1 9 5 ( करें प्यार सब लोग खुद जिंदगी से ) - लोक सेतिया "तनहा"

करें प्यार सब लोग खुद ज़िंदगी से - लोक सेतिया "तनहा"

करें प्यार सब लोग खुद ज़िंदगी से ,
हुए आप अपने से क्यों अजनबी से।

कभी गुफ़्तगू आप अपने से करना ,
मिले एक दिन आदमी आदमी से।

खरीदो कि बेचो ,है बाज़ार दिल का ,
मगर सब से मिलना यहां, बेदिली से।

हमें और पीछे धकेले गये सब ,
शुरूआत फिर फिर हुई आखिरी से।

बताओ तुम्हें और क्या चाहिए अब ,
यही , लोग कहने लगे बेरुखी से।

कहीं और जाकर ठिकाना बना लो ,
यही , रौशनी ने कहा तीरगी से।

पड़े जाम खाली सभी आज तनहा ,
बुझाओ अभी प्यास को तशनगी से।

Saturday, 13 April 2013

नासमझ कौन है ( कविता ) 0 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

नासमझ कौन है ( कविता )

और कितना ,
और क्या क्या ,
और कौन कौन ,
और कब तक ,
मुझे समझाते रहेंगे ,
और कितने लोग।

क्यों आखिर क्यों ,
आप समझते हैं ,
समझता नहीं मैं कुछ भी ,
और सब कुछ समझते हैं ,
सिर्फ आप ,
हमेशा आप।

चलो माना ,
हां मान लिया मैंने ,
समझदार होंगे सभी लोग।

लेकिन क्या ,
आपको है अधिकार ,
किसी को
नासमझ कहने का।

खुद को समझदार कहने वालो ,
शायद पहले ,
समझ लो इक बात।

किसी और को ,
नासमझ समझना ,
समझदारी नहीं हो सकता। 

Wednesday, 10 April 2013

ग़ज़ल 1 9 4 ( फूल जैसे लोग इस जमाने में ) - लोक सेतिया "तनहा"

फूल जैसे लोग इस ज़माने में - लोक सेतिया "तनहा"

फूल जैसे लोग इस ज़माने में ,
सुन रखे होंगे किसी फ़साने में।

वक़्त लगता है उसे भुलाने में ,
दर्द बढ़ता दास्तां सुनाने में।

छेड़ कर बुझती हुई चिंगारी इक  ,
खुद लगा ली आग आशियाने में।

कोशिशें उसने हज़ार कर देखीं ,
लुत्फ़ आया और रूठ जाने में।

तोड़ डाली खेल खेल में दुनिया ,
फिर ज़माना लग गया बसाने में।

आप कितना दूर - दूर रहते हैं ,
मिट गये हम दूरियां मिटाने में।

छोड़नी दुनिया हमें पड़ी तनहा ,
अहमियत अपनी उन्हें बताने में। 


Monday, 8 April 2013

ग़ज़ल 1 9 3 ( सुन जमाने बात दिल की खुद बताना चाहता हूँ ) - लोक सेतिया "तनहा"

सुन ज़माने बात दिल की खुद बताना चाहता हूं - लोक सेतिया "तनहा"

सुन ज़माने बात दिल की खुद बताना चाहता हूं ,
पौंछकर आंसू सभी , अब मुस्कुराना चाहता हूं।

ज़िंदगी भर आपने समझा मुझे अपना नहीं पर ,
गैर होकर आपको अपना बनाना चाहता हूं।

दोस्तों की बेवफ़ाई भूल कर फिर आ गया हूं ,
बेरहम दुनिया को फिर से आज़माना चाहता हूं।

किस तरफ जाना तुझे ,अब रास्ते तक पूछते हैं ,
बस यही कहता हूं उनको इक ठिकाना चाहता हूं।

आप मत देना सहारा ,जब कभी गिरने लगूं मैं ,
टूट जाऊं ,बोझ खुद इतना उठाना चाहता हूं।

आपसे कैसा छिपाना ,जानता सारा ज़माना ,
सोचता हूं आज लेकिन क्यों दिखाना चाहता हूं।

नाचते सब लोग तनहा तान मेरी पर यहां हैं ,
आज कठपुतली बना तुमको नचाना चाहता हूं। 

Sunday, 7 April 2013

सभी का जिसका कोई नहीं था ( कविता ) 9 0 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

सभी का जिसका कोई नहीं था ( कविता )

पार्क में सैर करते करते ,
हुई थी उससे जान पहचान ,
मिल जाता था अक्सर सुबह शाम ,
उसके होटों पे खिली रहती थी ,
बहुत ही प्यारी सी इक मुस्कान।

बातें बहुत अच्छी सुनाता था हमेशा ,
अपने सभी हैं चाहते उसको ,
हमें बस यही था बताता हमेशा ,
साथ साथ चलते राह लगती थी प्यारी ,
रहता भी वो मुस्कुराता हमेशा।

घर का कभी कभी दोस्तों का ,
कभी ज़िक्र नातों रिश्तों का ,
जब भी करता बहुत खुश होता ,
मुहब्बत के भी था किस्से सुनाता ,
खूबसूरत दुनिया से वो था आता।

सुना जब नहीं अब रहा बीच अपने ,
करने थे पूरे उसे ख्वाब कितने ,
पूछ कर किसी से उसका ठिकाना ,
गए जब वहां तभी सबने जाना ,
नहीं कोई उसका सारी दुनिया में ,
बातें सब उसकी थी कुछ झूठे सपने।

हमें नज़र आएंगे जब जब भी मेले ,
नहीं साथ होगा कोई बस हम अकेले ,
हम भी उसकी बातें दोहराया करेंगे ,
कहानी उसी की सुनाया करेंगे।  
                      ( शीर्षक : : अनदेखे सुहाने स्वप्न  )

Thursday, 4 April 2013

ग़ज़ल ( मुस्कुराने से लोग जलते हैं ) - लोक सेतिया "तनहा"

मुस्कुराने से लोग जलते हैं - लोक सेतिया "तनहा"

मुस्कुराने से लोग जलते हैं ,
फूल- कलियां तभी मसलते हैं।

बंद कर सामने का दरवाज़ा ,
छिप के पीछे से खुद निकलते हैं।

दर्द  अपने नहीं , पराये हैं ,
दर्द औरों के दिल में पलते हैं।

दूर सब राजनीति से रहना ,
राह चिकनी, सभी फिसलते हैं।

वक़्त को जो नहीं समझ पाते ,
उम्र भर लोग हाथ मलते हैं।

एक दिन चढ़ पहाड़ पर देखा ,
वो भी नीचे की ओर ढलते हैं।

खोखले हो चुके बहुत "तनहा" ,
लोग सिक्कों से अब उछलते हैं। 

Monday, 1 April 2013

ग़ज़ल 1 9 1 ( लोग जब मुहब्बत पर ऐतबार कर लेते ) - लोक सेतिया "तनहा"

लोग जब मुहब्बत पर ऐतबार कर लेते - लोक सेतिया "तनहा"

लोग जब मुहब्बत पर ऐतबार कर लेते ,
साथ जीने मरने का तब करार कर लेते।

इश्क में किसी को अपना कभी बना लेते  ,
इस तरह खिज़ाओं को खुद बहार कर लेते।

नाख़ुदा नहीं होते हर किसी की किस्मत में ,
हौसला किया होता, आप पार कर लेते।

लौटकर भी आना है ,आपको यहां वापस ,
आप कह गए होते , इंतज़ार कर लेते।

प्यार के बिना लगती ज़िंदगी नहीं प्यारी ,
इश्क जब है हो जाता ,जां निसार लेते।

हम भला कहें कैसे ,हम हुए तेरे आशिक  ,
नाम मजनुओं में कैसे शुमार कर लेते।

एक बार ख़त लिखकर , इक जुर्म किया तनहा ,
गर जवाब मिल जाता , बार बार कर लेते।