Monday, 25 February 2013

जनाज़े पे मेरे तुम्हें भी है आना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

जनाज़े पे मेरे तुम्हें भी है आना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

जनाज़े पे मेरे तुम्हें भी है आना
नहीं भूल जाना ये वादा निभाना।

लगे प्यार करने यकीनन किसी को
कहां उनको आता था आंसू बहाना।

तुम्हें राज़ की बात कहने लगे हैं
कहीं सुन न ले आज ज़ालिम ज़माना।

बनाकर नई राह चलते रहे हैं
नहीं आबशारों का कोई ठिकाना।

हमें देखना गांव अपना वही था
यहां सब नया है, नहीं कुछ पुराना।

उन्हें घर बुलाते, थी हसरत हमारी
कसम दे गये, अब हमें मत बुलाना।

मिले ज़िंदगी गर किसी रोज़ "तनहा"
मनाकर के लाना , हमें भी मिलाना।

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