Saturday, 23 February 2013

नाम पर तहज़ीब के बेहूदगी है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

नाम पर तहज़ीब के बेहूदगी है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

नाम पर तहज़ीब के ,   बेहूदगी है 
रौशनी समझे जिसे सब , तीरगी है।

सांस लेना तक हुआ मुश्किल यहां पर
इस तरह जीना भी , कोई ज़िंदगी है।

सब कहीं आते नज़र हमको वही हैं 
आग उनके इश्क की ऐसी लगी है।

कह दिया कैसे नहीं कोई किसी का 
तोड़ दिल देती तुम्हारी दिल्लगी है।

पौंछते हैं हाथ से आंसू किसी के 
और हो जाती हमारी  बंदगी है।

सब हसीनों की अदाओं पर हैं मरते 
भा गई मुझको तुम्हारी सादगी है।

मयकदा सारा हमें "तनहा" पिला दो
आज फिर से प्यास पीने की जगी है। 

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