हमें जो ज़िंदगी ने ना सताया होता ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
हमें जो ज़िंदगी ने ना सताया होता
उसे हमने भी दुल्हन सा सजाया होता ।
मुस्कराना हमें भी आ गया होता , गर
गले हमको कभी अपने लगाया होता ।
किसी तस्वीर की तकदीर बनती हाथों
ब्रश जो हाथ में मेरे थमाया होता ।
मेरी आवाज़ से आवाज़ जो मिल जाती
सुरीला राग मिलकर साथ गाया होता ।
तुझी से हम शिकायत क्यों तुम्हारी करते
था जितना बोझ मिलकर जो उठाया होता ।
बिना मांगे मुहब्बत मिल ही जाती हमको
तुम्हारे सामने सर ना झुकाया होता ।
कभी ना मौत को आवाज़ ' तनहा ' देते
किसी का साथ उनको रास आया होता ।

1 टिप्पणी:
Wahh क्या बात👌👍
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