जून 05, 2021

साहित्य का बाज़ार बनाये लोग ( सिर्फ सच ) डॉ लोक सेतिया

   साहित्य का बाज़ार बनाये लोग ( सिर्फ सच ) डॉ लोक सेतिया 

कोई बीस साल पहले की बात है मैंने " लेखक का दर्द " शीर्षक से रचना लिखी थी और तमाम जगह भेजी थी। बस इक जगह छपी थी बाकी सभी ने रद्दी की टोकरी में फैंक दी थी छपना मेरा मकसद था भी नहीं आईना दिखलाने वालों को सच का आईना दिखाना था। ताकि सच ज़िंदा रहे जैसे स्लोगन की बड़ी बड़ी बातें करने वाले झूठ पर सच का लेबल लगाकर ऊंचे दाम बेच मालामाल होते हैं। इक अख़बार ने मेरी रचना को पुर्ज़े-पुर्ज़े कर फाड़कर वापस भेजा था तब मैंने उनको लिखा था जब किसी के यहां कोई मर जाता है तब उधर से फाड़कर चिट्ठी भेजी जाती है अपने सूचना भेजी आपके दफ्तर में लगता है ज़मीर नाम का कोई असमय मर गया है। संवेदना जताना ज़रूरी है उसके बाद मैंने ऐसे लोगों को लेकर बहुत लिखा है जो औरों को तस्वीर दिखलाते हैं अपने खुद को नहीं देखते हैं। इक ग़ज़ल इस पर बड़ी पुरानी बहुत बार छपी है पेश है। 
    
इक आईना उनको भी हम दे आये
हम लोगों की जो तस्वीर बनाते हैं।
 
बदकिस्मत होते हैं हकीकत में वो लोग
कहते हैं जो हम तकदीर बनाते हैं।

सबसे बड़े मुफलिस होते हैं लोग वही
ईमान बेच कर जो जागीर बनाते हैं।

देख तो लेते हैं लेकिन अंधों की तरह
इक तिनके को वो शमशीर बनाते हैं।

कातिल भी हो जाये बरी , वो इस खातिर
बढ़कर एक से एक नजीर बनाते हैं।
मुफ्त हुए बदनाम वो कैसो लैला भी
रांझे फिर हर मोड़ पे हीर बनाते हैं। 
 
तमाम लोग साहित्य को मुनाफे का कारोबार समझ इसका बाज़ार लगाकर कारोबार करते हैं मगर समझते हैं हम साहित्य की सेवा उसको बढ़ावा दे रहे हैं जबकि अख़बार पत्रिका में छपने वाली रचनाओं के लेखक को कुछ भी नहीं देते हैं। बहुत लोग भेजने का वादा करते हैं भेजते नहीं हैं इन सभी ने समझा है लेखक बंधक की तरह है ख़ामोशी से अपना धर्म निभाना उसकी मज़बूरी है। इस पर कुछ लिखेगा तो छापेगा कौन मतलब पानी में रहकर मगरमच्छ से पंगा कोई नहीं लेता। इक बात को उन्होंने हथियार बना लिया है। कोई भी धंधा घाटे में कब तक चल सकता है शुरुआत में लिखने वालों से सहयोग की विनती करना अनुचित नहीं मगर पचास साल तक नियमित अख़बार पत्रिका निकालना उस से तमाम तरह से नाम शोहरत पद ईनाम पुरुस्कार पाने के बाद खुद को अगली कतार में बैठ महानता का चोला पहन कर भी लिखने वालों का शोषण करते रहना किसी गुनाह से कम नहीं है। 
 
   कोई नेता अपने अनुचित कार्य को गलत नहीं समझता मज़बूरी नाम देता है अधिकारी और काला बाज़ारी भी धंधे में करना पड़ता है दुहाई देते हैं मिलवट से लेकर अपना सामान बेचने को इश्तिहार में झूठ बताने वाले सभी पैसे की खातिर ईमान बेचते हैं। ठीक इसी तरह साहित्य से कमाई कर घर दफ्तर शानो शौकत और सुख सुविधा हासिल करने वाले लोगों के पास लेखक को महनत का उचित मोल देना फज़ूल लगता है। उनका स्टाफ़ वेतन पाता है कागज़ की कीमत चुकानी पड़ती है छपाई करने वाले को भी पैसा देना होता है बिजली अदि सभी खर्चे भरते हैं क्योंकि उनको भुगतान नहीं किया तो दुकान बंद हो जाएगी। मगर लिखने वाले विवश हैं हाथ जोड़ उपकार समझते हैं छापने पर उनको रोटी की ज़रूरत नहीं होती है , शायद पब्लिशर समझते हैं लिखने वालों को खाली पेट रख कर दर्द की अनुभूति करवा वे साहित्य पर एहसान करते हैं क्योंकि बदहाली में लिखने वाला अच्छा लिख सकता है। 
 
बिल्कुल सरकार की तरह जनता की हालत खराब से और खराब होती जाती है और खाना- ख़राब ने गुलिस्तां किया बर्बाद सामने है। उनकी हर चाहत देशसेवा है ज़रूरी है आम नागरिक का ज़िंदा रहना जुर्म नहीं मज़बूरी है खासो-आम की बढ़ती जाती दूरी है। सच कहना मुसीबत को घर बुलाना है मगर मेरे लिए सच को सच कहना ज़रूरी है लिखना मेरा कारोबार नहीं है ज़रूरत है चुप रहना नहीं सीखा मज़बूरी है। साहित्य की बात करने वालों को सच में मिलावट कर बाज़ार में बेच अपने स्वार्थ पूरे नहीं करने चाहिएं सच की खातिर ईमानदार अधिकारी अपनी जान जोखिम में डाल शासक को जानकारी देते हैं और देश का पीएमओ उसकी शिकायत की जानकारी बेईमान भ्र्ष्ट लोगों को भेजते हैं सत्येंदर दुबे क़त्ल कर दिए जाते हैं। आप सच बोलने की कीमत नहीं चुकाते घबराते हैं। टीवी चैनल अख़बार पत्रिका वालों से बस इक बात कहनी है। 
 

                 बिका ज़मीर कितने में हिसाब क्यों नहीं देते ,

                 सवाल पूछने वाले जवाब क्यों नहीं देते।

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