Friday, 12 February 2021

अब नहीं रोयेंगे किसी के लिए ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

अब नहीं रोयेंगे किसी के लिए ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

 ऐसे वक़्त मां की याद आती है याद करते मां दौड़ी चली आती है। मां ने फोन किया बोली मेरा बच्चा रोता भी है तुझे तो सबको रुलाना है। जब से तुझे आंसू बहाते देखा परेशान हो गई हूं। बेटा बोला मुझे समझ नहीं आ रहा इस समस्या का समाधान कैसे हो सांप भी ज़िंदा रखना है जो लाठी लिए खड़े हैं उनसे लाठी भी छीननी है आंदोलन वाली। मां ने कहा उपाय तो सरल है बस उसको मना लो जिसको हर दर्द की दवा का पता होता है। ऐसा कौन है बताओ मां , बोली मां जाओ बहुरानी को मनाओ अपनी मन की उलझन उसी को बताओ कहो अपनी पत्नी से मेरी नैया डूबती है तुम बन पतवार कश्ती किनारे लगाओ। दुनिया की हर समस्या का समाधान पत्नियों के हाथ होता है। मैंने तरकीब बताई है चूहे बिल्ली की लड़ाई है झूठ बोलने की कसम तुमने जो उठाई है भीड़ में भी तुझे लगती तन्हाई है।

  ये सोच लो अब आखिरी साया है मोहब्बत , इस दर से उठोगे तो कोई दर न मिलेगा। 

समझदार को इशारा काफी होता है डूबने वाले को तिनके का सहारा काफी होता है। पत्नी को फोन लगाया मझधार में माझी नहीं कोई सच बताया। पत्नी ने कहा ज़रूरत पर कौन काम आता ये अब आपको समझ आया। नहीं आपने मुझसे कभी रिश्ता निभाया मगर मैंने नहीं सीखा होना अपनों से पराया। मुझ पर छोड़ दो ये परेशानी जो करना है बताउंगी तो होगी हैरानी याद करना पहली रात सुनाई थी जो कहानी वो लोग हैं शेर मगर मैं शेर की भी नानी। उलझन सुलझेगी नहीं मुश्किल कोई समझदारी ज़रूरी है ये बात आपस तक रखना करना मेहरबानी। सोशल मीडिया से बचकर रहना होगी आसानी। पत्नी ने मगर दिल ही दिल में कुछ और ही ठानी। लिखनी है फिर से हर पुरानी कहानी। समझ गई सासु मां ने समझाया है मतलब की खातिर लौट बुद्धू घर आया है। ये सुबह का भूला नहीं जो शाम ढले आया हो ये है जो न अपना हो न पराया हो।
 
पत्नी जी पहुंच गई आंदोलन करने वालों के बीच अचानक बिना बताये। किसान मकसद मगर समझ नहीं पाये। हाथ जोड़कर बोली मुझे अपनी बहन समझना राखी बंधवाना रिश्ता निभाना पहले मेरा साथ दो मुझे बिखरा घर है बसाना जिस रोज़ मुझे मिल गया दिल्ली में ठिकाना उस रोज़ मेरे घर आना फिर चूल्हे में तीनों कानून खुद मुझको है जलाना। देखो मुझे रोना नहीं है अब बदला है उसका  चुकाना उसने मुझे रुलाया है बहुत मेरी बारी आई है मिलकर हमने उसे दिखलाना बदला ज़माना। ये सच है मुझे खुद उसने बताया है ऊंठ पहाड़ के नीचे आया है मगर चाल उसकी नहीं चलेगी दाल उसकी नहीं गलेगी। मिलकर सबने पैग़ाम है भेजा कोई छुपी बात नहीं सरेआम है भेजा। पहले अपनी पत्नी को घर में बसाओ साथ माता जी को दिल्ली बुलाओ समझौता अपना करो तब चर्चा हम से मिकर चलाओ। ये जाल नहीं चाल नहीं मिसाल हमने बनाई है ये बहना है हर किसान इसका भाई है। 
 
पढ़कर पैगाम जनाब हैरान हैं पत्नी क्या होती है नहीं जानते नादान हैं। भूली हुई दास्तां याद आई है बिल्ली शेर ने घर बुलाई है उसने पढ़ाई आधी पढ़ाई है। पत्नी का नहीं साथ जीतना मुश्किल है टूटी हुई कश्ती का पत्नी होती साहिल है। बिस्मिल समझा नहीं उसने मुझे घायल नहीं समझा मैंने भी छनकती है कैसे पायल नहीं समझा। मैसेज किया मुझे समझ नहीं आया खुलकर बताओ कहीं अकेले जाओ फोन लगाओ मुझे बचाओ मत डराओ मैंने सताया तुम तो न सताओ। सच बोलना कसम अपनी जान की खाओ। कॉल किया पत्नी ने कहा आप हैं झूठे सच्ची हूं मैं सच्ची बात पर थे आप मुझसे रूठे बंधन तभी तो थे अपने टूटे। शेर खुद को समझते हैं पति बनकर मगर सामने खड़ी थी इस युग की पत्नी तनकर। भाग गए थे बहाना बनाकर सर्कस वाले शेर होते हैं बहुत और कुछ कागज़ वाले भी असली नहीं होते। बस आपका भरोसा बार बार नहीं करना है मुझे भी किसान भाईयों की तरह बेमौत नहीं मरना है। अब बिल्ली शेर की चाल समझती है अपना मतलब निकलते खाओगे मुझे सरकार समझती है। जो शेर हैं जंगल के कभी घास नहीं खाते हैं सर्कस की तरह परोसा हुआ मांस नहीं खाते हैं। विदुर ने कहा था लाक्षाघर मत बनाना लगाई खुद आग जिसने उसे जल जाना बचना है अगर बिल कोई बनाना तीन बिलों का तो है बहाना आपको आता नहीं अच्छों से निभाना। सब जानते जिनसे आपका है बड़ा याराना , उनकी दोस्ती को कभी आज़माना बन जाएगी ज़िंदगी इक दिन अफ़साना। 
 

       न ख़ुदा ही मिला न विसाल ए सनम , न इधर के हुए  न उधर के हुए । 

       रहे दिल में हमारे ये रंज-ओ-अलम , न इधर के हुए न उधर के हुए। 


 

No comments: