Wednesday, 14 April 2021

अथ: कोरोना कथा - सुनसान हैं सारे तीरथ नदियां सारी ( दिलकश नज़ारा ) डॉ लोक सेतिया

सुनसान हैं सारे तीरथ नदियां सारी ( दिलकश नज़ारा ) डॉ लोक सेतिया 

दुनिया भरके तमाम लोग जीवन भर घूमते रहे जिसकी मिलन की दर्शन की आस लिए नदियां पर्वत तीरथ कभी उसको कभी इसको विधाता समझ कर उसको छोड़ और जाने क्या क्या देखा। प्यास बढ़ती गई इक बूंद पीने को नहीं मिली उस प्यार के अथाह सागर से। ज़िंदगी कब गुज़री मौत सामने खड़ी दिखाई दी तब समझे व्यर्थ भटकते रहे हासिल क्या हुआ। पाप धुले नहीं दर्द मिटे नहीं राहत का कोई एहसास हुआ नहीं। जो खुद हमारे भीतर रहता है कस्तूरी मृग की तरह हम भागते रहे दुनिया भर में उसके पीछे और पाया नहीं अंदर झांका नहीं कभी। आसान था मुश्किल बना दिया मन आत्मा परमात्मा का संबंध बनाना। अंतिम घड़ी तक बाहरी शोर तमाशे को समझते रहे सच है और सच अपने अंदर मरता रहा कभी पहचाना नहीं सत्य ईश्वर को। बोध किया नहीं बुद्ध को पढ़ते रहे दुनिया को जाना खुद को जानना भूल गए।  
 
पावन नदी तालाब और बड़े बड़े आलीशान भवन जिन में तमाम धर्म के ईश्वर देवी देवता खुदा अल्लाह वाहेगुरु जीसस का नाम लिखा है सुनसान नज़र आते हैं। ऊपर किसी आसमान पर बैठा भगवान सोच रहा है कैसे ये करिश्मा हो गया है। शायद लोगों ने पाप करना छोड़ दिया है तभी पाप धोने को पावन नदी में नहाने की ज़रूरत नहीं रही और खुदा से ईश्वर से जीसस वाहेगुरु से हाथ जोड़ मांगने की आदत छोड़ दी खुद कोशिश महनत से काबलियत से जितना हासिल कर सकते हैं उसको पाकर संतुष्ट रहने लगे हैं। इंसान को अपनी ताकत और समझ पर यकीन हो गया है किसी भी भगवान की कोई ज़रूरत ही नहीं रही है। सभी ईश्वर खुदा भगवान अल्लाह यीशु एक ही हैं और अपने बनाये इंसान को अपने खुद बनाये धर्म के जाल से मुक्त हुआ देख कर सभी चिंताओं से मुक्त होकर चैन महसूस करते हैं। 
 
दुनिया बनाने वाले ने इंसान बनाया था और सब कुछ दिया था जीवन बिताने रहने को। बस यही एक दुनिया बनाई थी मगर आदमी को जाने किसलिए क्या क्या हासिल करने की तलाश करने की चाह ने भटकाया इधर उधर और सपनों को सच करने को जो मिला था उसकी कीमत नहीं समझ कर उसको दांव पर लगा दिया। विकास और आधुनिकता के जुआघर में जीतने की धुन में हार का जश्न मनाते सदियां बिता दी इंसान इंसानियत को गंवाकर शराफ़त ईमानदारी छोड़कर ज़मीन पर रहना त्याग ऊपर चांद सूरज आकाश को पाने का लोभ लालच करते करते विनाश की तरफ बढ़ता गया। बेबस होकर झूठे सहारे ढूंढने लगा और नदी तालाब धर्म स्थल जा जाकर वास्तविक उजाले की जगह घने अंधकार और काल्पनिक स्वर्ग-नर्क अंधविश्वास में फंसकर खुद अपने साये से ख़ौफ़ खाने लगा। 

शिक्षा विज्ञान और तर्क शक्ति पर कायरता आडंबर अंधविश्वास अधिक भारी पड़े और समझदारी छोड़ मूर्खताओं की तरफ बढ़ता गया। आखिर इक ऐसा रोग फैला जिस ने दुनिया को विवश कर दिया ये समझने को कि कुदरत से खिलवाड़ कर विकास का आधुनिक ढंग कितना खतरनाक है। और जब सामने इक छोटा सा कीटाणु दैत्याकार खड़ा अट्हास करने लगा और कोई धर्म कोई ईश्वर कोई स्नान कोई दर्शन कोई धार्मिक आडंबर किसी काम नहीं आया करोड़ों लोग उपसना आरती ईबादत करते करते थक गए मगर समस्या मिटाने ये तथाकथित शक्तिमान उपयोगी साबित नहीं हुए तब जाकर इंसान की अक़्ल ठिकाने आई और उसको खुद अपने भरोसे जीने और अपनी दुनिया को वास्तव में अच्छी और रहने के काबिल बनाने को निर्णय करना पड़ा कि जो भगवान जो ख़ुदा अल्लाह जीसस देवी देवता इंसान की रक्षा करने उसको बचाने नहीं आया उसको कब तक मनाते रहें। जो सामने खड़ा है उसी दैत्य को मनाना उसकी मिन्नत करना शायद कारगर हो इस लिए सभी दिन रात उसी के नाम उसके गुणगान करने में लगे हैं। भगवान का बुलावा कभी भी आ सकता है ये बात झूठी साबित हुई है बस इक वायरस का साया हर जगह दिखाई देता है उसी से उस से बचाव की तरकीब पूछते हैं। 
 

                          अथ: कोरोना कथा

 


Monday, 12 April 2021

( इस पोस्ट को अवश्य पढ़ना ) उलझन सुलझती नहीं उलझाने से ( भगवान से इंसान तक ) डॉ लोक सेतिया

     उलझन सुलझती नहीं उलझाने से ( भगवान से इंसान तक ) 

                                    डॉ लोक सेतिया 

        कौन बड़ा है भगवान या मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे।  हमने ईश्वर को सत्य में नहीं आडंबर में खोजा और बिना समझे बिना पाये ही पत्थर को किताब को इमारत को भगवान कहने लगे। किसी ने कहा तुमको ईश्वर से मिलवा सकता हूं और आप उसको ईश्वर से बड़ा समझने लगे और लोग भगवान को सामान बनाकर बेचने लगे। भगवान को इंसान क्या दे सकता है और भगवान को पैसा या कोई उपहार कुछ खाने को कपड़े गहने आरती पूजा ईबादत की अपने गुणगान की क्या ज़रूरत है क्या मिलता है ईश्वर को अपनी आराधना से ख़ुशी महसूस होती है नहीं उपासना करने से बुरा लगता है फिर वो भगवान कदापि नहीं हो सकता है। भगवान के इंसान के बनाये घरों में जाकर माथा टेकने उपसना आरती इबादत करने के बाद इंसान से झूठ छल कपट धोखा और स्वार्थ की खातिर तमाम अनुचित कार्य करते हैं और मानते हैं भगवान के भक्त उपासक हैं। इतना ही नहीं हम ईश्वर से हिसाब किताब रखते हैं लिया दिया बदले में क्या क्या। भगवान को बाज़ार समझ बैठे हैं। 
 
   संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहते हैं जिस में वो लोग बैठे हैं जिनको सत्ता के अधिकार और खुद अपने लिए तमाम साधन सुविधा चाहिएं जनसेवा के नाम पर चोरी ठगी लूट की जगह बना दिया। न्याय करने वाले न्याय का आदर नहीं अपने अनादर की चिंता करते हैं। न्यायालय में न्याय की हालत बदहाल है। कुछ नेताओं अधिकारी बने लोग कर्मचारी पुलिस सुरक्षा के लोग दफ़्तर में बैठ जनता को हड़काने वाले अपनी जेबें भरते लोग , कुछ धनवान बने लोगों और बाबा गुरु बनकर पैसा कमाने वाले लोगों ने इंसानियत को ताक पर रखकर कर्तव्य निभाने की जगह अनैतिक आमनवीय आचरण किया है। खुद नहीं जानते मगर आपको समझाते हैं ठग हैं साधु संत महात्मा बने हुए हैं।
 
स्कूल कॉलेज शिक्षक राह भटक कर शिक्षा का कारोबार कर अज्ञानता को बढ़ा रहे हैं। समाजसेवा कह कर अपने स्वार्थ सिद्ध करते हैं चालाक और मक्कार लोग और हम पापी अधर्मी अनुचित कार्य करने वालों को सर झुकाकर सलाम करते हैं और सच बोलने वालों को अपमानित करते हैं। कोरोना क्या है हम नहीं जानते उसका उपाय और रोकथाम को टीका बन गया फिर भी रोग नहीं होगा कोई  नहीं बताता बस यही भगवान सरकार धर्म उपदेशक सभी हैं कहने को भरोसा किसी का नहीं ज़रूरत और वक़्त पर सब बेकार साबित हुए हैं। हमारी नासमझी और मूर्खता कि हमने ऐसे पण्डित पादरी उपदेशक कथावाचक लोगों को ईश्वर से अधिक महत्व देना शुरू कर दिया और उनको धर्म भगवान के नाम पर उचित अनुचित जो मर्ज़ी करते रत्ती भर संकोच नहीं होता है। भगवान ये समझते हैं उनका बंधक बन गया है जिसको ये जैसे मर्ज़ी उपयोग कर सकते हैं। भगवान ने सबको बनाया है बताते हैं लेकिन समझते हैं ईश्वर को उन्होंने बनाया है उसको इनका आभारी होना चाहिए। 
 

 

Saturday, 3 April 2021

लिख कर ख़त ये तमाम रखे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

  लिख कर ख़त ये तमाम रखे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"   

लिख कर ख़त ये तमाम रखे हैं 
पढ़ ले जो उसके नाम रखे हैं। 
 
आंचल में इनको भर लेना 
जो अनमोल इनाम रखे हैं।
 
हम अब पीना छोड़ चुके हैं
उनकी खातिर जाम रखे हैं। 

जिनको खरीद सका न ज़माना
अब खुद ही बेदाम रखे हैं।

पत्थर चलने की खातिर भी
शीशे वाले मुकाम रखे हैं।

खुद ही अपनी रुसवाई के
हमने चरचे आम रखे हैं।

जिन पर बातें दिल की लिखीं हैं
ख़त वो सभी बेनाम रखे हैं।
 
जुर्म नहीं बस की जो मुहब्बत
सर पे कई  इल्ज़ाम रखे हैं।
 
उनपे नहीं अब "तनहा" परदा 
राज़ वो सब खुले-आम रखे हैं।

दिखाने को पर्दा करते हैं ( कव्वाली ) डॉ लोक सेतिया

      दिखाने को पर्दा करते हैं ( कव्वाली ) डॉ लोक सेतिया 

हुस्न वाले जलवा अपना , 
दिखाने को पर्दा करते हैं 
 
समझना मत वो चेहरा 
छुपाने को पर्दा करते हैं। 
 
बस देख इक झलक कोई 
हो जाये आशिक़ दीवाना 
 
नज़रों से नज़र चुपके से 
मिलाने को पर्दा करते हैं। 
 
बनते हैं बेखबर तोड़कर 
दिल आशिकों का कितने 
 
बेवफ़ा अपनी बेवफ़ाई 
छिपाने को पर्दा करते हैं। 
 
दिल ही दिल खुश होते 
हुस्न की तारीफ सुनकर 
 
बुरा मानते शर्म हया को 
दिखाने को पर्दा करते है। 
 
जब बेपर्दा बाहर आये तो 
देखा न किसी ने उस दिन  
 
पर्दानशीं क्या बात उनकी 
समझाने को पर्दा करते हैं।  
 
शोलों को और भड़काने 
आता है मज़ा सताने में  
 
दिलजलों की दिल्लगी 
बढ़ाने को पर्दा करते हैं। 
 
कौन कहता है हुस्न को 
छुपाने को पर्दा करते हैं 
 
चिलमन खुद उठाकर के 
गिराने को पर्दा करते हैं।
 

Friday, 2 April 2021

हम जो चाहत में आह भरते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हम जो चाहत में आह भरते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

हम जो चाहत में आह भरते हैं 
जैसे कोई गुनाह करते हैं। 
 
मार कर पत्थरों से अहले-जहां 
पेड़ से फल की चाह करते हैं। 
 
याद करके अतीत हम अपना 
अपनी रातें सियाह करते हैं। 
 
हमको उनसे नहीं गिला कोई 
दिल को हम खुद तबाह करते हैं। 
 
एक सहरा में हम- से दीवाने 
ख़्वाब में सैरगाह करते हैं।  
 
सब मुसाफिर नये नई मंज़िल 
इक नई रोज़ राह करते हैं। 
 
कौन सुनता तुम्हें यहां "तनहा"
बस वो सुनकर के वाह करते हैं।
 
 

Thursday, 1 April 2021

सच की तिजारत करने वाले झूठ के पैरोकार लोग ( सोशल मीडिया ) डॉ लोक सेतिया

   छिपा है गंदगी का ढेर चमक- दमक के पीछे ( डरावना सच ) 

      सच की तिजारत करने वाले झूठ के पैरोकार लोग (  सोशल मीडिया ) डॉ लोक सेतिया

             पहले अपनी इक ग़ज़ल उसके बाद बात सच बेचने वालों की :-     
             
                     ग़ज़ल-   डॉ लोक सेतिया "तनहा"

वो जो कहते थे हमको कि सच बोलिये 
झूठ के साथ वो लोग खुद हो लिये। 
 
देखा कुछ ऐसा आगाज़ जो इश्क़ का 
सोच कर उसका अंजाम हम रो लिये। 
 
हम तो डर ही गये , मर गये सब के सब 
आप ज़िंदा तो हैं , अपने लब खोलिये। 
 
घर से बेघर हुए आप क्यों इस तरह 
राज़ आखिर है क्या ? क्या हुआ बोलिये। 
 
जुर्म उनके कभी भी न साबित हुए 
दाग़ जितने लगे इस तरह धो लिये। 
 
धर्म का नाम बदनाम होने लगा
हर जगह इस कदर ज़हर मत घोलिये।
 
महफ़िलें आप की , और "तनहा" हैं हम 
यूं न पलड़े में हल्का हमें तोलिये।
 
 बताने की ज़रूरत नहीं कि सबसे अधिक गंदगी उन्हीं के घरों में छिपी हुई है जो शानदार लिबास पहने चमकती रौशनी वाले महलों में बैठे मख़मली कालीन पर पांव रख कर चलते हैं। बड़ी बेशर्मी से ऊंची आवाज़ में सवाल करते हैं खुद जवाब नहीं देते कि उनका ज़मीर कितने में किस किस को कितनी बार बेचा है। ज़िंदा मुर्दा की ये मिसाल अलग है वो नहीं जिसको अस्पताल में डॉक्टर ने मरा घोषित किया था और वो बोल रहा था मुझ में जान बाकी है। ये वो नहीं हैं जिनमें थोड़ा ईमान बाकी है। ऊपर जाने की हसरत में कितना नीचे गिर गये ये टीवी चैनल अख़बार मीडिया वाले फिर भी इनका और भी उंचाई का अरमान बाकी है उन्होंने ज़मीन से नाता तोड़ लिया है और झूठ वाला आसमान बाकी है। कुछ लोग औरों की तकलीफ़ देखते हैं और रोमांच का आनंद का अनुभव करते हैं। जिस की हालत खराब हो उसकी तकलीफ़ नहीं समझते बल्कि सवालात करते हैं आपको कैसा महसूस हो रहा है। खबरची बनते मानवीय संवेदना छूट जाती है और इंसान मशीन बनकर बोलता चलता है टीवी वालों को आपराधिक कहानियां मनोरंजन के नाम पर परोसना अच्छा लगता है जानकारी देने को नहीं गुमराह करने के लिए। सवाल समाज का नहीं पैसे टीआरपी का है।
 
चलिये समझते हैं इनकी असलियत कोई पहेली नहीं है। बेईमानी झूठ लूट घोटाला अपराध से लेकर समाज में नग्नता और अश्लीलता के साथ नैतिकता के पतन को बढ़ावा देने के बाद खुद को सबसे महान आदर्शवादी घोषित करने का काम करते हैं। सरकारी विज्ञापन की लूट देश का ऐसा सबसे बड़ा घोटाला है जिस में देश का खज़ाना जनता की कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च होने की जगह इन मुट्ठी भर लोगों की तिजोरियां भरने में बर्बाद होता है और ऐसा 73 साल से नियमित होता रहा है जिसकी धनराशि बढ़ती बढ़ती दैत्याकार रूप ले चुकी है। ये लुटेरे मसीहाई की बात करते हैं चोर अधिकारी नेताओं से मिलकर डाका डालते सबसे बड़ा हिस्सा पाते हैं। 

इनके सीरियल से रियलटी शो और चर्चा तक नैतिकता की धज्जियां उड़ाते हैं हिंसा और अराजकता से लेकर जुआ अंधविश्वास और धार्मिक बैरभाव फैलाने का काम करते हैं। सच को छिपाते नहीं दफ्नाते हैं और झूठ को सच साबित करने को मनघडंत किस्से कहानी बनाकर दर्शक को उलझाते हैं। सच  का लेबल लगाकर झूठ को मनचाहे दाम बेचते हैं फिर भी सच के रखवाले कहलाते हैं। हर घटिया चीज़ को असली खरी और बढ़िया बताकर बिकवाते हैं ठगों चोरों से भाईचारा निभाते हैं। ये कमाल करते हैं उल्टी गंगा बहाते हैं और सत्ता की गंदगी के गंदे नाले को पाक साफ़ समझ उसमें डुबकी लगाते हैं। पाप और अधर्म की कमाई से गुलछर्रे उड़ाते हैं अपनी करनी पर कभी नहीं लजाते हैं हराम की खाकर शान से इतराते हैं। सदी के महानायक जिनको बनाते हैं वो पैसे को अपना भगवान समझते हैं मोह माया में फंसकर ज़हर को दवा कहकर धन दौलत बनाते हैं झूठ का इश्तिहार बन जाते हैं। खिलाड़ी नाम खेल से पाकर जुआ खेलने का रास्ता समझाते हैं। कलाकार खिलाड़ी बाबा बनकर लोग टीवी अखबार में धंधा बढ़ाते मालामाल हो जाते हैं। छोटे काम करते बड़े समझे जाते हैं। खबर ख़ास लोगों की सौ बार दोहराई जाती है उनकी सच्चाई नहीं सामने लाई जाती है। आवारगी उन लोगों की सच्ची मुहब्बत बताई जाती है। कितने कितने आशिक़ों से प्यार की पींगें झूलने वाली नायिका मल्लिका ए इश्क़ कहलाती है। शराफत खुद को गुनहगार समझती मगर गुनाह देख इनके ताली बजाती है।

हर गुनहगार से इनका मधुर नाता है आतंकवादी अपराधी क़ातिल हर कोई इनसे रिश्ता निभाता है। पास इनके सभी का बही खाता है बस इनका दाग़दार चेहरा कभी नहीं सामने नज़र आता है। मेकअप उनको सबसे खूबसूरत दिखलाता है। जो भी  टीवी चैनल अख़बार सोशल मीडिया का कारोबार चलाता है हर किसी को खराब बताकर खुद को सच्चा बतलाता है पर्दे पर नायक बनकर किरदार निभाता है। पीछे से सभी को अपनी उंगलियों पर नचाता  है। ये बंदर की तरह जनता का रक्षक बनकर उस्तरा उसी की गर्दन पर चलाता है। जनता की रोटी बिल्लियों में बांटने को ये सोशल मीडिया वाला बंदर तराज़ू बनकर खुद खाता जाता है। चौकीदार हुआ करता था पहले आजकल यारी चोरों से खूब निभाता है। सबसे बड़ा चोर यही है चोर - चोर का शोर भी मचाता है।

 

वो जो कहते थे हमको कि सच बोलिये ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

         वो जो कहते थे हमको कि सच बोलिये ( ग़ज़ल ) 

                           डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

वो जो कहते थे हमको कि सच बोलिये 
झूठ के साथ वो लोग खुद हो लिये। 
 
देखा कुछ ऐसा आगाज़ जो इश्क़ का 
सोच कर उसका अंजाम हम रो लिये। 
 
हम तो डर ही गये , मर गये सब के सब 
आप ज़िंदा तो हैं , अपने लब खोलिये। 
 
घर से बेघर हुए आप क्यों इस तरह 
राज़ आखिर है क्या ? क्या हुआ बोलिये। 
 
जुर्म उनके कभी भी न साबित हुए 
दाग़ जितने लगे इस तरह धो लिये। 
 
धर्म का नाम बदनाम होने लगा 
हर जगह इस कदर ज़हर मत घोलिये।
 
महफ़िलें आप की , और "तनहा" हैं हम 
यूं न पलड़े में हल्का हमें तोलिये।

ये कैसे समझदार होने लगे सब ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ये कैसे समझदार होने लगे सब ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ये कैसे समझदार  होने लगे सब
दिया छोड़ हंसना  हैं  रोने लगे सब।

तिजारत समझ कर मुहब्बत हैं करते 
जो था पास उसको भी खोने लगे सब।

किसी को किसी का भरोसा कहां है
यहां नाख़ुदा बन डुबोने लगे सब।

सुनानी थी जिनको भी हमने कहानी 
शुरुआत होते ही सोने लगे सब।

खुले आस्मां के चमकते सितारे 
नई दुल्हनों के बिछौने लगे सब।

जिन्होंने हमेशा किए ज़ुल्म सब पर
मिला दर्द पलकें भिगोने लगे सब।

ज़माने से "तनहा" शिकायत नहीं है
थे अपने मगर गैर होने लगे सब।

Tuesday, 30 March 2021

अजनबी लोगों में मुझको मेहरबां की तलाश है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

       अजनबी लोगों में मुझको मेहरबां की तलाश है ( ग़ज़ल ) 

                            डॉ लोक सेतिया " तनहा " 

अजनबी लोगों में मुझको मेहरबां की तलाश है 
प्यार की दौलत हो जिस में उस जहां की तलाश है। 
 
छोड़ गलियां गांव की जो आ गया शहर भूल से 
खो गया है भीड़ में उस बदगुमां की तलाश है। 
 
दोस्तों को नाम लेकर कब बुलाते हैं दोस्त भी 
आईने जैसे किसी इक हमज़ुबां की तलाश है। 
 
कुछ मुसाफ़िर हैं जिन्हें खुद मंज़िलें ढूंढती रहीं 
और ऐसे लोग भी जिनको मकां की तलाश है। 
 
मौसमों से मिट गए हैं काफ़िलों के निशान तक 
पर सभी को आज तक उस कारवां की तलाश है। 
 
पूछती सब से सड़क की लाश बस ये सवाल है 
क़त्ल होना था हुआ क्योंकर निशां की तलाश है। 
 
गुफ़्तगू आवाम से करनी है "तनहा" निज़ाम ने 
दाद दे  हर बात पर उस बेज़ुबां की तलाश है।
 
 
 
 
 

Saturday, 27 March 2021

मुझे चलना पसंद है ठहरना नहीं ( मेरा परिचय ) डॉ लोक सेतिया

  मुझे चलना पसंद है ठहरना नहीं ( मेरा परिचय ) डॉ लोक सेतिया 

   कभी कभी खुद से अपने बारे चर्चा करता हूं। आत्मचिंतन कह सकते हैं। मुझमें रत्ती भर भी नफरत नहीं है किसी के लिए भी , उनके लिए भी प्यार हमदर्दी है जिनकी आलोचना करना पड़ती है सच कहने को। कोई व्यक्तिगत भावना दोस्ती की न विरोध की मन में रहती है। कुछ अधिक नहीं पढ़ा है मैंने जीवन को जाना समझा है और उसी से सीखा है। किताबों से जितना मिला समझने की कोशिश की है विवेचना की है। बहुत थोड़ा पढ़ा है शायद लिखा उस से बढ़कर है विवेकशीलता का दामन कभी छोड़ा नहीं है और खुद को कभी मुकम्मल नहीं समझा है। क्यों है नहीं जानता पर इक प्यार का इंसानियत का भाईचारे का संवेदना का कोई सागर मेरे भीतर भरा हुआ है। बचपन में जिन दो लोगों से समझा जीवन का अर्थ मुमकिन है उन्हीं से मिला ये प्यार का अमृत कलश। मां और दादाजी से पाया है थोड़ा बहुत उन में भरा हुआ था कितना प्यार अपनापन और सदभावना का अथाह समंदर। दुनिया ने मुझे हर रोज़ ज़हर दिया पीने को और पीकर भी मुझ पर विष का कोई असर हुआ नहीं मेरे भीतर के अमृत से ज़हर भी अमृत होता गया। और जिनको मैंने प्यार का मधुर अमृत कलश भर कर दिया उनके भीतर जाने पर उनके अंदर के विष से वो भी अपना असर खो बैठा। 

  मेरी कोई मंज़िल नहीं है कुछ हासिल नहीं करना है मुझे लगता है मेरे जीवन का मकसद यही है बिना किसी से दोस्ती दुश्मनी समाज और देश की वास्तविकता को सामने रखना। समाज का आईना बनकर जीना। भौतिक वस्तुओं की चाहत नहीं रही अधिक बस जीवन यापन को ज़रूरी पास हो इतना बहुत है। सुःख दुःख ज़िंदगी के हिस्सा हैं कितने रंग हैं बेरंग ज़िंदगी की चाह करना या सब गुलाबी फूल खुशबू और सदाबहार मौसम किसी को मिले भी तो उसकी कीमत नहीं समझ आएगी। हंसना रोना खोना पाना ये कुदरत का सिलसिला है चलता रहता है। लोग मिलते हैं बिछुड़ते हैं राह बदलती हैं कारवां बनते बिगड़ते हैं हमको आगे बढ़ना होता है कोई भी पल जाता है फिर लौटकर वापस नहीं आता है ये स्वीकार करना होता है। जो कल बीता उनको लेकर चिंता करने से क्या होगा और भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है नहीं मालूम फिर जो पल आज है अभी है उसी को अपनाना है जीना है सार्थक जीवन बनाने को। कितने वर्ष की ज़िंदगी का कोई हासिल नहीं है जितनी मिली उसको कितना जीया ये ज़रूरी है। 

    लोगों से अच्छे खराब होने का प्रमाणपत्र नहीं चाहता हूं खुद अपनी नज़र में अपने को आंखे मिलाकर देख पाऊं तो बड़ी बात है। मगर यही कठिन है। मैली चादर है चुनरी में दाग़ है और अपना मन जानता है क्या हूं क्या होने का दम भरता हूं। वास्तविक उलझन भगवान से जाकर सामना करने की नहीं हैं अपने आप से मन से अंतरात्मा से नज़र मिलाने की बात महत्वपूर्ण है। और अब यही कर रहा हूं। मैंने खुद को कभी भी बड़ा नहीं समझा है बल्कि बचपन से जवानी तक कुछ हद तक हीनभावना का शिकार रहा हूं। कारण कभी मुझे समझ नहीं आया क्यों हर किसी ने मुझे छोटा होने अपने बड़ा होने और नीचा दिखाने की कोशिश की है। बहुत कम लोग मिले हैं जिन्होंने मेरे साथ आदर प्यार का व्यवहार किया है। जाने कैसे मैंने अपना साहस खोया नहीं और भीतर से टूटने से बचाये रखा खुद को। मुझे कभी किसी ने बढ़ावा देने साहस बढ़ाने को शायद इक शब्द भी नहीं कहा होगा हां मुझे नाकाबिल बताने वाले तमाम लोग थे। मुझे किसी को नीचा दिखाना किसी का तिरस्कार करना नहीं आया और नफरत मेरे अंदर कभी किसी के लिए नहीं रही है। ऐसा दोस्त कोई नहीं मिला जो मुझे अपना समझता मुझे जानता पहचानता और साथ देता। अकेला चलना कठिन था मगर चलता रहा रुका नहीं कभी भी।

    जब भी मुझे निराशा और परेशानी ने घेरा तब मुझे इस से बाहर निकलने को संगीत और लेखन ने ही बचाया और मज़बूत होना सिखाया है। अपनी सभी समस्याओं परेशानियों का समाधान मुझे ग़ज़ल गीत किताब पढ़ने से हासिल हुआ है। इंसान हूं दुःख दर्द से घबराता भी रहा मगर जाने क्यों अपने ग़म भी मुझे अच्छे लगते रहे हैं ग़म से भागना नहीं चाहा ग़म से भी रिश्ता निभाया है। ग़म को मैंने दौलत समझ कर अपने पास छिपाकर रखा है हर किसी अपने ग़म बताये नहीं। इक कमज़ोरी है आंसू छलक आते हैं ज़रा सी बात पर हर जगह मुस्कुराना क्या ज़रूरी है कभी ऐसा हुआ कि हंसने की कोशिश में पलकें भीग जाती हैं। अपने आप को पहचानता हूं और अब तन्हाई अकेलापन मुझे अच्छा लगता है उन महफिलों से जिन में हर कोई अपने चेहरे पर सच्चाई भलेमानस की नकाब लगाए इस ताक में रहता है कि कब अवसर मिले और अपनी असलियत दिखला दे। ये दुनिया और उसकी रौनक मुझे अपनी नहीं लगती हैं।

खुद को आईने में देखना ( आत्म-अवलोकन ) डॉ लोक सेतिया

     खुद को आईने में देखना ( आत्म-अवलोकन ) डॉ लोक सेतिया 

  लोग अपनी पुस्तक के पहले पन्ने पर अपने बारे में लेखन और किताब की बात कहते हैं। मुझे लिखते हुए चालीस साल और अख़बार मैगज़ीन में रचनाएं छपते तीस साल से अधिक समय हो चुका है। ब्लॉग पर ये 1390 वीं पोस्ट है दस साल से नियमित लिख रहा हूं और 199600 संख्या आज तक सभी पोस्ट की पढ़ने वालों की है। किताब छपवाने की हसरत है और काफी रचनाओं का चयन ग़ज़ल , कविता-नज़्म , व्यंग्य , कहानी , हास-परिहास की रचनाओं पांच हिस्सों में किया गया है जो इसी ब्लॉग पर लेबल से समझ सकते हैं। डायरी पर रचनाओं की फ़ाइल में दो पन्नों पर अपने लेखन को लेकर लिखा हुआ है जिसे किसी लेखक दोस्त की कैसे होते हैं साहित्यकार नाम की किताब में और कुछ अन्य साहित्य संबंधी मैगज़ीन में भी छापा गया है। शायद समय है कि ब्लॉग के पाठक वर्ग को भी अपना परिचय लेखक के बारे दिया जाना उचित है। 
 
     मेरा जन्म ऐसे परिवार में हुआ जिस में साहित्य या शिक्षा का कोई महत्व नहीं था। गांव के थोड़े पढ़े लिखे और किसान खेतीबाड़ी ठेकेदारी करने वाले बड़े बज़ुर्ग धार्मिक माहौल माता जी सादगी की मिसाल और भजन गाने में रूचि का तथा दादाजी का भगवद कथा अदि सुनने का असर शायद मुझे इस तरफ लाने की शुरुआत थी। पढ़ाई विज्ञान की फिर डॉक्टर बनने की शिक्षा का साहित्य से कोई तालमेल नहीं था। सच कहना है तो मुझे संगीत और गाने का बहुत चाव था जिसे परिवार में खासकर पिता जी पसंद नहीं करते थे उनको ये गाना बजाना मिरासी लोगों की बात लगती थी। 
 
   लिखना डायरी से शुरू किया अपने मन की बात किसी से कहना नहीं आता था खुद अपनी बात अपने साथ करना आदत बन गया। जैसे कोई डरकर चोरी छुपे इक अपराध करता है मैंने अपना लेखन इसी ढंग से किया है मुझे हतोत्साहित करने वाले तमाम लोग थे बढ़ावा देने पीठ थपथपाने वाला कोई भी नहीं। इसलिए मुझे सभी पढ़ने वालों से ये कहना ज़रूरी लगता है कि पढ़ते हुए इस अंतर को अवश्य ध्यान रखना। आपको शायद ये फर्क इस तरह समझ आ सकता है। जैसे कोई इक पौधा किसी रेगिस्तान में उग जाता है जिसे राह चलते कदम कुचलते रहते हैं आंधी तूफान झेलता है कोई जानवर उखाड़ता है खाता है मिटाता है मगर फिर बार बार वो पौधा पनपने लगता है। कुछ लोग जिनको साहित्यिक माहौल और मार्गदर्शन मिलता है बढ़ावा देते हैं जिनको उनके आस पास के लोग , वे ऐसे पौधे होते हैं जिनको कोई माली सींचता है खाद पानी देता है उसकी सुरक्षा को बाड़ लगाता है ऊंचा फलदार पेड़ बन जाते हैं। मेरा बौनापन और उनका ऊंचा कद दोनों को मिले माहौल से है इसलिए मेरी तुलना उनसे नहीं करना। 
 
    मैंने साहित्य पढ़ा भी बहुत कम है कुछ किताबें गिनती की और नियमित कई साल तक हिंदी के अख़बार के संपादकीय पन्ने और कुछ मैगज़ीन पढ़ने से समझा है अधिकांश खुद ज़िंदगी की किताब से पढ़ा समझा है। केवल ग़ज़ल के बारे खतोकिताबत से इसलाह मिली है कोई दो साल तक आर पी महरिष जी से। ग़ज़ल से इश्क़ है व्यंग्य सामाजिक विसंगतियों और आडंबर की बातों से चिंतन मनन के कारण लिखने पड़े हैं। कहानियां ज़िंदगी की सच्चाई है और कविताएं मन की गहराई की भावना को अभिव्यक्त करने का माध्यम। लिखना मेरे लिए ज़िंदा रहने को सांस लेने जैसा है बिना लिखे जीना संभव ही नहीं है। लिखना मेरा जूनून है मेरी ज़रूरत भी है और मैंने इसको ईबादत की तरह समझा है।

Monday, 8 March 2021

संबंध लाल-कालीन का कंटीली राह से ( आईन की बात ) डॉ लोक सेतिया

    संबंध लाल-कालीन का कंटीली राह से ( आईन की बात ) 

                                डॉ लोक सेतिया 

संविधान को कहते हैं आईन जिसे घोषित किया गया है कि हम भारत के लोग इसको अपनाते हैं स्वीकार करते हैं मंज़ूर है। शायद सभी ने पढ़ा तक नहीं बिना पढ़े पढ़े लिखे लोगों ने हस्ताक्षर कर दिए अनपढ़ लोग अंगूठा लगाने को तैयार थे फिर भी मुमकिन नहीं कि इस में ऐसा समझाया गया होगा कि सरकार और जनता का रिश्ता लाल-कालीन का कंटीली राह से संबंध जैसा होगा। भला इस से बढ़कर चिंताजनक दशा क्या हो सकती है कि चुनकर सत्ता पर बिठाने वाले भूखे नंगे बदहाल हैं और जनता की सेवा का वादा करने वाले राजसी शान से ऐशो आराम का मज़ा लूटते राजा बनकर अय्याशी भरा जीवन जीते हैं। विडंबना की बात है संसद विधानसभाओं राजभवन सचिवालय से न्यायलय तक हर कोई देश के गरीबों के खून पसीने की कमाई पर मौज मनाते हुए समझता है ये आज़ादी है उनको मिला अधिकार है। जबकि वास्तव में ये सभी अपना अपना कर्तव्य ईमानदारी से निभाने में असफल ही नहीं हुए और नाकाबिल ही साबित नहीं हुए बल्कि इनका ज़मीर मर चुका है अन्यथा इन सभी को शर्म आती बिना कर्तव्य निभाए मनमर्ज़ी का वेतन सुविधाएं हासिल करने नहीं छीनने के लिए। देशभक्ति जनता की सेवा जनकल्याण की भावना जैसे शब्द इनके लिए कोई अर्थ नहीं रखते हैं इन्होने ऐसे शब्दों को अपने अपकर्म और कर्तव्यविमुख होने को ढकने का आवरण या मुखौटा बना रखा है। जिस देश की आधी आबादी को बुनियादी सुविधाएं जीने की उपलब्ध नहीं उस का शासन चलाने वालों का देश के ख़ज़ाने को अनावश्यक फज़ूल खर्चों पर बर्बाद करना अनुचित अमानवीय और अपराध ही नहीं सबसे बढ़कर अधर्म एवं पाप है। शपथ उठाने का कोई मतलब नहीं रह जाता है जब उठाने वाले की भावना ईमानदारी पूर्वक उस पर खरे उतरने की नहीं होकर केवल औपचरिकता हो पद और सत्ता पर काबिज़ होने को तोते की तरह कही बात को दोहराना। 
 
    आज़ादी के 73 साल बाद बहुत कुछ किया जाना संभव था जो किया नहीं किया बल्कि जो नहीं किया जाना चाहिए था वही निर्लज्जता पूर्वक डंके की चोट पर किया गया विकास के नाम पर सिर्फ ख़ास वर्ग को सभी कुछ उपलब्ध करवाने को। और अधिकांश सामान्य वर्ग को कुछ भी नहीं खोखले वायदे झूठे आंकड़े और उनको ऐसे जाल में फंसाना जिस में लोग गुलामी को भी सत्ता और सरकार की अनुकंपा समझने लगें। आज महिला दिवस है और हम महिलाओं को समानता के अधिकार और आदर मिलने की पैरवी करते हैं लेकिन क्या शासक वर्ग धनवान लोग और देश के एक चौथाई अमीर वो लोग जिनके पास पैसा दौलत का 75 फीसदी से अधिक है उनका बाकी जनता से बड़ा अंतर सबको सब बराबर नहीं मिलने का वास्तविक कारण सरकार की भेदभाव पूर्ण व्यवस्था नहीं है जो गरीब का शोषण और अमीर को और अमीर बनाने की नीतियों पर चल रही है। गांधी जी की सोच और समाजवाद की अवधारणा को दरकिनार कर पूंजीवादी व्यवस्था का नतीजा देश कंगाली के कगार पर खड़ा है। जिनको देश और समाज की समस्याओं का समाधान निकालना चाहिए था वही खुद सबसे विकराल समस्या बनकर सामने खड़े हैं और उन्होंने चालाकी और छलपूर्वक जनता को उस भंवर में ला दिया है जब कोई विकल्प सामने नहीं दिखाई देता है। जो कश्ती को खेवनहार बनकर पतवार थामकर पार लगाने की बात कहकर चले थे हमको डुबोने का काम कर रहे हैं खुद अपने लिए सुरक्षित बचने के उपाय पहले किए हैं। 
 
  अब हमारे पास बस एक ही रास्ता है ऐसे माझी पर भरोसा करना छोड़ खुद अपने साहस से इन मौजों से टकराना और तैर का पार करना हौंसलों के दम पर। इतिहास गवाह है मखमली बिस्तर पर चैन से सोने वाले ऊंचे महलों में फूलों पर चलने वाले कंटीली राह पर चलने वालों झौंपड़ी में रहने वालों पर कभी रहम नहीं किया करते हैं। उनको मसीहा समझना सबसे बड़ी भूल होती है जिनको सत्ता की हवस होती है बेरहम बन जाते हैं। मगरमच्छ के आंसू गिरगिट की तरह रंग बदलना उनकी फितरत है उनका भरोसा नहीं किया जा सकता है। जिन के शासन में कहा जाता है कि उनके राज में सूर्य कभी अस्त नहीं होता उनको उनकी हैसियत समझा सकते हैं तो ये मुट्ठी भर लोग जो बिना शासकीय अधिकार किसी काम के नहीं देश की जनता के बहुमत के सामने कब तक टिक सकेंगे। अब तलक संविधान को राजनेताओं ने अपने अनुसार स्वार्थ सिद्ध करने को परिभाषित किया और दुरूपयोग किया है अब समय आ गया है उनको संविधान की भावना समझाने और उनकी वास्तविक जगह शासक नहीं जनसेवक है दिखलाने का। 
 
आज हमारे देश और समाज में नैतिकता सच्चाई ईमानदारी खोखले शब्द बन कर रह गए हैं वास्तव में इनका कोई महत्व कोई मूल्य रह नहीं गया है। डॉक्टर शिक्षक स्कूल अस्पताल क्या धर्म उपदेशक तक अपने वास्तविक कर्म से अधिक ध्यान अपने स्वार्थ और धन दौलत हासिल करने पर देते हैं। ऊंचे पद पर बैठ कर मापदंड निम्न स्तर के दिखाई देते हैं। सरकारी कर्मचारी अच्छा वेतन पाकर भी ईमानदारी से कर्तव्य नहीं निभाते हैं। पुलिस अपराध मिटाने पर नहीं अपराध को बढ़ाने पर ध्यान देती है हर कोई अपने मतलब की खातिर दूसरे को धोखा देने को अनुचित नहीं समझता है। जो जिस व्यौपार धंधे कारोबार में है मुनाफा कमाने को सब कुछ करता है। मिलावट ही नहीं ज़हर तक बेचते हैं पैसे की खातिर आसानी से धनवान बनने को लोग। भगवान से कोई भी डरता नहीं है शायद सभी समझते हैं उनके अपकर्मों का हिसाब कोई नहीं करने वाला है। सोचा समझा जाये तो हम मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे गिरिजाघर जाते हैं दिखावे को आडंबर करने को क्योंकि वास्तविक जीवन में हमने धर्म की राह चलना छोड़ दिया है। शायद हमने ईश्वर और धर्म को भी लेन देन का कारोबार समझ लिया है और समझते हैं वहां भी रिश्वत चाटुकारिता चढ़ावे गुणगान आरती से बात बन जाएगी। अर्थात हमने भगवान को भी अपने जैसा मान लिया है जो खुश हो जाएगा उपहार पाकर या स्तुति सुनकर मतलब ये कि हमने भगवान ईश्वर को भी समझा तक नहीं है।  


Monday, 1 March 2021

संवाद विवाह से पहले शादी के बाद ( वार्तालाप ) डॉ लोक सेतिया

 संवाद विवाह से पहले शादी के बाद ( वार्तालाप ) डॉ लोक सेतिया 

      बात घर घर की है जानते हम भी हैं समझते आप भी हैं मानते नहीं ज़माने से छिपाते हैं। पत्नी समझ नहीं पाई बड़ी हैरान है पति किस बात को लेकर परेशान है। बोली अपने नेता जी आपको क्यों भला खराब लगते हैं हमको बड़े लाजवाब लगते हैं उनके रंग ढंग सज धज देखते हैं सभी सच कहो वही असली नवाब लगते हैं। पति कहने लगे कितने झूठे हैं क्या क्या वादे किये थे नहीं निभाए हैं। पत्नी ने समझाया आप समझ नहीं पाये हैं अच्छे दिन उनके खूब आये हैं। वादे क्या आपने मुझसे  निभाए हैं चांद तारे तोड़ कर लाये हैं आपसे अच्छे हैं जो पत्नी को अकेली छोड़ आये हैं खुद कमाती है चैन से रहती है अपनी असलियत समझा आये हैं। नाज़ नखरे नहीं उठाये हैं इतनी सी बात है सितम जीवन भर नहीं ढाये हैं। कहा हमने आत्मनिर्भरता की किताब खुद नहीं पढ़ते जो लोग सबको सबक समझाते हैं। उनकी पढ़ाई में महनतकश लोग परजीवी कहलाते हैं। ये कैसे लोग हैं जो जिनके कांधे पर चढ़कर ऊपर पहुंचे उन्हीं को किनारे लगाते हैं। एहसानों का बदला क्या इसी तरह चुकाते हैं। पत्नी को बहस में कोई नहीं हरा सकता है बोली कोई सच सच बता सकता है , आप सभी पति खुद को गुलाम कहते रहते हैं ज़िंदगी भर शिकवा करते हैं छोड़ते हैं न पत्नी को छोड़ने देते हैं। आपको ज़माने की खबर नहीं है शान उनकी है जिन पर किसी बात का होता असर नहीं है। मुझे अध्यापिका जी ने कहानी सुनाई थी शादी की बात समझाई थी मैं सुनकर शर्माई थी हो चुकी अपनी सगाई थी पीछे कुंवां था सामने खाई थी। मत पूछो राम दुहाई थी जब मिलती मुझे बधाई थी मुसीबत सर पर खड़ी थी बजने लगी शहनाई थी। 
 
    शादी इक झमेला है असल में हर कोई अकेला है दुनिया क्या है इक मेला है मेले में खेल तमाशा होता है खेल जिसने खेला है बस वही अलबेला है। खेलने वाले होते खिलाड़ी हैं हम सभी तमाशाई हैं अनाड़ी हैं। तमाशे में खेल घड़ी भर होता है खेल ख़त्म पैसा हज़्म ये मनोरंजन कहलाता है , उनसे खूबसूरत खेल तमाशे रोज़ नहीं कोई दूसरा दिखलाता है। समझदार वही कहलाता है जो कुछ भी नहीं करता मौज मनाता है यार दोस्तों से यारी निभाता है उसका कोई नहीं बही खाता है। बस वो सभी का हिसाब बताता है अपना हिसाब कभी नहीं बताता है। उल्लू बनाना हुनर नहीं सभी को आता है। कोई बच्चा मिट्टी के खिलौने बनाता है कोई बाज़ार से खिलौने खरीद लाता है जो बच्चा दोनों से खिलौने छीन कर खेलने के बाद दिल भर जाए तोड़ डालता है दबंग कहलाता है। भविष्य में बड़ा होकर नेता बनकर राज चलाता है। ज़िंदगी का असली मज़ा वही उठाता है जो मैं चाहे ये करूं मैं चाहे वो करूं मेरी मर्ज़ी गाकर सबको चिढ़ाता है। नानी ने मुझे समझाया था नारी और पुरुष का अंतर बताया था। महिला पत्नी बनकर सुई से भी घर बना सकती है जिसको पति पुरुष होकर भी कस्सी से भी गिरा नहीं सकता है। मगर अविवाहित जो मिल जाये उसी से काम चलाता है वो किसी बात से नहीं घबराता है। लेकिन जो विवाहित होकर अकेला रहता है कुंवारा नहीं न शादीशुदा कहलाता है बीच में लटका मझधार में नैया लाकर डुबाता है उसको बर्बाद करने का बड़ा मज़ा आता है। शादी वाला लड्डू खाने वाला भी और बिना खाये भी हर शख़्स पछताता है बस कोई कोई इस हाथ लड्डू उस हाथ रस्सगुल्ला लेकर बहती गंगा में डुबकी लगाता है। चार दिन में विवाहित होने का अर्थ समझ कर भाग जाता है। जिसको गुलाम बनाना आता है आज़ाद पंछी पिंजरा छोड़ जाता है। 
 
 सभी विवाहित महिला पुरुष बंद पिंजरे के वासी हैं दिल चाहता है तोड़ कर पिंजरा उड़ने को मगर हिम्मत नहीं जुटाते हैं। पिंजरे से प्यार करने लग जाते हैं बाहर निकलने से डरते हैं घबराते हैं नसीब वालों को सोने का पिंजरा मिलता है मिट्ठू मिंयां समझाते हैं। पति पत्नी लड़ते हैं झगड़ते हैं फिर मिल जाते हैं जिसको सबसे खराब समझते हैं प्यार उसी पर लुटाते हैं। प्यार मुहब्बत इसी को कहते हैं रूठते हैं मनाते हैं मान जाते हैं रिश्ता निभाना है निभाते हैं। साथ साथ रहकर दोस्ती और दुश्मनी दोनों निभाते हैं। आपसे अच्छा कोई दुनिया में नहीं बहुत खराब हैं आप दुविधा को इस तरह बढ़ाते हैं। उनको भूला हुआ नहीं कहते हैं जो सुबह घर से जाते शाम ढले लौट आते हैं। चलो इक गीत सुनते हैं वार्तालाप को विराम लगाते हैं। 
 

 
 
     

Thursday, 18 February 2021

उनकी दी सज़ा है प्यार का मज़ा है ( हास्य-व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 उनकी दी सज़ा है प्यार का मज़ा है ( हास्य-व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

ये आशिक़ी है प्यार है वफ़ा है उनके हर सितम को करम समझना कभी नहीं थमता ये वो सिलसिला है। चलो इक ग़ज़ल से शुरुआत करते हैं। 
 

                              ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

 
हमको जीने की दुआ देने लगे
आप ये कैसी सज़ा देने लगे।

दर्द दुनिया को दिखाये थे कभी
दर्द बढ़ने की दवा देने लगे।

लोग आये थे बुझाने को मगर
आग को फिर हैं हवा देने लगे।

अब नहीं उनसे रहा कोई गिला
अब सितम उनके मज़ा देने लगे।

साथ रहते थे मगर देखा नहीं
दूर से अब हैं सदा देने लगे।

प्यार का कोई सबक आता नहीं
बेवफा को हैं वफ़ा देने लगे।

कल तलक मुझ से सभी अनजान थे
अब मुझे मेरा पता देने लगे।

मांगता था मौत "तनहा" रात दिन
जब लगा जीने , कज़ा देने लगे।  
 
समझ गये ये उन्हीं की बात है जो कहते हैं तुम नासमझ हो नादान हो नहीं जानती तुम्हारी भलाई इसी में है। धर्म कहता है पति के आदेश का पालन पत्नी का धर्म होता है शासक की बात मानना जनता का कर्तव्य होता है। सवालात नहीं कर सकते भरोसा रखते हैं उन्होंने बुरा भला कहा लाठी डंडे से पिटाई की तो उनका अधिकार है जैसा उनको पसंद है वही करने को विवश करना अगर नहीं मानते तो मनवाना अपने तरीके से। यही सबक हमने फ़िल्मी नायक से समझा है जिस पर आशिक़ होते हैं उसके साथ छेड़खानी करने से लेकर उसको परेशान करने तक मनमानी करते हैं उसको सताते हैं। बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं , आखिर जान छुड़ाने को नायिका कहती है मज़बूर हो कर कहना पड़ता है। होगा होगा होगा। हमारे समाज के युवाओं ने यही सबक सीखा समझा है अपनी हवस को मुहब्बत का नाम देकर शारीरिक संबंध को प्यार कहकर बदनाम किया है। सत्ता मिलते ही राजनेता खुद को देश की जनता का स्वामी समझने लगते हैं और जब कोई उनकी जीहज़ूरी छोड़ सवाल जवाब करने लगता है तब अहंकारी पति की तरह पत्नी को ठीक करने को कमीनी हरामज़ादी जैसे आभूषणों से नवाज़ते हैं। जनता और पत्नी का कोई आदर सम्मान नहीं होता है बस जब उनकी ज़रूरत पड़ती है दो मीठे बोल बोलते हैं खुश करने को उपहार देने की बात कहकर मना लेते हैं। 
 
आप बिना कारण छोटी छोटी बात का बुरा मान जाती हो समझती नहीं पति की मार में भी प्यार है। इधर महिलाएं भी अपना प्यार दिखाने को बहुत कुछ करने लगी हैं ये होना था मगर ऐसा होने पर समाज को अखरने लगी हैं। ज़माना बदल गया है तराना बदला गया है पति पत्नी का अफ़साना बदल गया है। आजकल पति गुलाम पत्नी महारानी हो गई है औरत तेरी यही कहानी आंचल में है दूध आंखों में पानी , पुरानी हो गई है। लेकिन सरकार पहले से भी स्यानी हो गई है बिल्ली थी जो कभी शेर की नानी हो गई है। सारी महफ़िल जिन अदाओं की दीवानी हो गई है उनकी हर इक अदा क़ातिलानी हो गई है। ज़ख़्म जनता के बदन पर उनकी मोहब्बत की मोहर है टैटू गोदना निशानी है सबूत है लिख दिया नाम जिसका उसको भगवान बना दिया है लिख कर नाम अपना रेत पर उसने मिटा दिया उसका खेल था खाक़ में हमको मिला दिया। सरकार बनकर नेताओं ने यही सिला दिया है वादा निभाना जब नहीं वादा भुला दिया है। आली जनाब हिसाब सबसे मांगते हैं हम उनसे वो किताब मांगते हैं उनसे उनका हिसाब मांगते हैं। जो कल तक गरीब भिखारी थे कैसे इतने अमीर बन गए हैं राजा कैसे फ़क़ीर बन गए हैं। 
 
सत्ता के दरबार की असली कहानी और होती है ये वो दुल्हन है जो हंसती भी नहीं न कभी रोती है। नाचती है खुद किसी के इशारे पर नचाती है किसी को अपने इशारे पर। ये पतवार नहीं तलवार है मंझधार से निकल जाओ फिर भी डुबोती है किनारे पर। पति पत्नी जैसा संबंध रखते हैं लेकिन इक ऐसा अनुबंध रखते हैं ऊंची दीवारें होती हैं रास्ते छोटे और तंग रखते हैं। जब तक मतलब होता है प्यार का साथ अपना संग रखते हैं। कुर्सी का प्यार क्या होता है जो कभी अच्छा नहीं होता ऐसा बीमार होता है। राजनीति और जिस्मफ़रोशी दुनिया के सबसे पुराने धंधे हैं दोनों में समानताएं बहुत हैं हुस्न रहने तक ख़रीदार होते हैं कुर्सी पर रहते सभी इख्तिहार होते हैं। बिकना चाहते हैं कीमत कम लगती है कभी नहीं शर्मसार होते हैं। वैश्या की वफ़ा रात भर की होती है नेताओं की वफ़ा झूठी दिखावे की चुनाव तक रहती है। आखिर में सुनोगे इक ग़ज़ल जो कहती है। 
 
 

                            ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

चंद धाराओं के इशारों पर
डूबी हैं कश्तियाँ किनारों पर।

अपनी मंज़िल पे हम पहुँच जाते
जो न करते यकीं सहारों पर।

खा के ठोकर वो गिर गये हैं लोग
जिनकी नज़रें रहीं नज़ारों पर।

डोलियाँ राह में लूटीं अक्सर
अब भरोसा नहीं कहारों पर।

वो अंधेरों ही में रहे हर दम
जिन को उम्मीद थी सितारों पर।

ये भी अंदाज़ हैं इबादत के
फूल रख आये हम मज़ारों पर।

उनकी महफ़िल से जो उठाये गये
हंस लो तुम उन वफ़ा के मारों पर। 
 
  

Monday, 15 February 2021

वैक्सीन पे ऐतबार किया ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      वैक्सीन पे ऐतबार किया ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

पहले इंतज़ार किया , नहीं खुद को बेकरार किया सोचा समझा विचार किया , फिर उनसे करार किया। इधर जाएं उधर जाएं , जाएं तो हम किधर जाएं मौत का इंतज़ार करें या मौत आने से पहले डर कर जीते जी मर जाएं। मर्ज़ी थी हमारी कुछ तो अलग कर जाएं रोग से नहीं दवा ईलाज से भी नहीं मौत आखिर आनी है इक दिन ग़ालिब कह गए चैन की नींद आएगी अभी ठहर जाएं। इतना तो तय है लोग कोरोना से क्या किसी रोग से नहीं मरना चाहते। ये फ़लसफ़ा है राजेश रेड्डी जी कहते हैं , अजब ये ज़िंदगी की कैद है दुनिया का हर इंसां , रिहाई मांगता है और रिहा होने से डरता है। यहां हर शख्स हर दिन हादिसा होने से डरता है , खिलौना है जो मिट्टी का फ़ना होने से डरता है। 
 
चलो बताते हैं आखिर हमने वैक्सीन लगवाई तो क्या समझ कर। समझदारी वास्तव में हमने कभी की नहीं पागलपन करते रहे हैं हमेशा। दुनिया साल भर से जिसका इंतज़ार कर रही थी हमें लगता था उसे तब आना है जब उसका आना नहीं आना बराबर हो , देर से आते हैं जिनकी अहमियत होती है। खैर जैसा भी हो तमाशा अभी ख़त्म हुआ नहीं हसीना आई तो सही। कौन आशिक़ नहीं होगा जिस शोख़ अदा से नाज़ुकी से उसने नकाब हटाई और दीदार करवाया। मिलेगी उन्हीं को पहले जिनसे जन्म जन्म का नाता निभाना है उन चारगरों ने बाकी को उस से मिलवाना है डॉक्टर अस्पताल नर्सिंग-होम क्लिनिक उसका ठिकाना है। 
 
इतना तो पता है अमर कोई नहीं है बारी बारी जाना सभी को है कोई भी जल्दी नहीं जाना चाहता जबकि हर काम में सभी सबसे पहले होना चाहते हैं। मौत के लिए लखनवी अंदाज़ याद आता है , नहीं जनाब पहले आप। मुश्किल सामने खड़ी थी फैसले की घड़ी थी टीका लगवाते तो कहते आखिर कोरोना से घबरा गए नहीं लगवाते तो ये कहते टीका लगवाने से भय खा गए। दुनिया का क्या है किसी तरह छोड़ती नहीं है। समझदार लोग कहने लगे कितने नासमझ हो लोग तरसते हैं आपको मिल रही है तब नखरे दिखलाते हैं। ताया जी के बेटे बड़े भाई कहते थे इक बात दोहराते हैं। जो भी सरकारी चीज़ मुफ्त मिलती हो ज़रूर ले आते हैं चाहे काम नहीं आये छोड़ते नहीं वर्ना पीछे पछताते हैं। 
 
चलो विषय को अपनी तरह समझाते हैं। बहुत कुछ बहुत सोचकर बनाते हैं। केवल रोग की बात नहीं है दवाएं उपचार जाने क्या क्या आधुनिक उपकरण बनते जाते हैं। लोग स्वास्थ्य नहीं और बीमार होते जाते हैं। बाबा जी की क्या बात है योग बेचते हैं योग से निरोग बनाते हैं , मगर हर मर्ज़ की दवा वही बेचते मुनाफा कमाते हैं। कोरोना की भी इक दवा बताई थी उनकी कितनी हुई जगहंसाई थी फिर भी अपनी मनमानी चलाई थी खिलाई अपनी दवाई की कमाई थी। पुलिस थाने गली गली बढ़ते जाते हैं चोर लुटेरे अपराधी क़त्ल करते हैं नहीं पकड़ में आते हैं। संविधान की शपथ नेता हमेशा उठाते हैं मगर उसको पांव तले कुचलते रहते हैं बढ़ते जाते हैं। न्यायपलिका को छोड़ो न्याय मिलते नहीं खरीदे बेचे गवाह सबूत जाते हैं तारीख पर तारीख़ फ़िल्मी डायलॉग है सच बताते हैं। सरकार और अधिकारी समस्या को हल नहीं करते कभी रोज़ नई समस्या खड़ी करते हैं बस इसी की कमाई खाते हैं। खुद नहीं होते जनता को बतलाते हैं सही रास्ते अंधी गली से निकलते हैं खाई में गिराते हैं घर बैठे लोग बच जाते हैं। लोग हर मोड़ पे रुक रुक के संभलते क्यों हैं , इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं। शायर राहत इंदौरी जी कहते हैं। सच तो ये है कि आजकल ऐतबार शब्द का कोई अर्थ ही नहीं रहा मगर ज़िंदगी का भरोसा नहीं है फिर भी ज़िंदा रहते हैं। उम्मीद पर दुनिया कायम है हमने वैक्सीन पे भरोसा किया है अब उसकी मर्ज़ी निभाती है वादा वफ़ा का कब तलक। क्यों डरें कल न जाने क्या होगा नहीं कुछ भी होगा तो तजुर्बा होगा। 
 
बनाने वालों ने जो भी बनाया है अपना शाहकार बनाने वाले को भाया है। सरकारी कानून कितने अच्छे हैं मान जाओ अच्छे बच्चे हैं जो कंपनी दवा कोई बनाती है इसी तरह सबको समझाती है। शराब को सब खराब कहते थे काम आई वही तब लाजवाब कहते हैं हाथ अल्कोहल से लोग धोने लगे हैं। आपको सबक ये भी पढ़ाना है झूठ कहता रहा ज़माना है उनको भला और क्या चाहिए जिनको शराब मिलती मिलता मयख़ाना है। दुनिया की निगाहों में भला क्या है बुरा क्या , ये बोझ अगर दिल से उतर जाये तो अच्छा। शराब सरकार को कितनी अच्छी लगती है जब ख़ज़ाना भरती है नशा शराब में नहीं सत्ता और पैसे दौलत में भी होता है मगर अच्छा लगता है जिनके नसीब में होता है। अकबर इलाहाबादी कहते हैं , नातजुर्बाकारी से वाइज की ये बातें हैं , इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है।
 

 

Friday, 12 February 2021

अब नहीं रोयेंगे किसी के लिए ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

अब नहीं रोयेंगे किसी के लिए ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

 ऐसे वक़्त मां की याद आती है याद करते मां दौड़ी चली आती है। मां ने फोन किया बोली मेरा बच्चा रोता भी है तुझे तो सबको रुलाना है। जब से तुझे आंसू बहाते देखा परेशान हो गई हूं। बेटा बोला मुझे समझ नहीं आ रहा इस समस्या का समाधान कैसे हो सांप भी ज़िंदा रखना है जो लाठी लिए खड़े हैं उनसे लाठी भी छीननी है आंदोलन वाली। मां ने कहा उपाय तो सरल है बस उसको मना लो जिसको हर दर्द की दवा का पता होता है। ऐसा कौन है बताओ मां , बोली मां जाओ बहुरानी को मनाओ अपनी मन की उलझन उसी को बताओ कहो अपनी पत्नी से मेरी नैया डूबती है तुम बन पतवार कश्ती किनारे लगाओ। दुनिया की हर समस्या का समाधान पत्नियों के हाथ होता है। मैंने तरकीब बताई है चूहे बिल्ली की लड़ाई है झूठ बोलने की कसम तुमने जो उठाई है भीड़ में भी तुझे लगती तन्हाई है।

  ये सोच लो अब आखिरी साया है मोहब्बत , इस दर से उठोगे तो कोई दर न मिलेगा। 

समझदार को इशारा काफी होता है डूबने वाले को तिनके का सहारा काफी होता है। पत्नी को फोन लगाया मझधार में माझी नहीं कोई सच बताया। पत्नी ने कहा ज़रूरत पर कौन काम आता ये अब आपको समझ आया। नहीं आपने मुझसे कभी रिश्ता निभाया मगर मैंने नहीं सीखा होना अपनों से पराया। मुझ पर छोड़ दो ये परेशानी जो करना है बताउंगी तो होगी हैरानी याद करना पहली रात सुनाई थी जो कहानी वो लोग हैं शेर मगर मैं शेर की भी नानी। उलझन सुलझेगी नहीं मुश्किल कोई समझदारी ज़रूरी है ये बात आपस तक रखना करना मेहरबानी। सोशल मीडिया से बचकर रहना होगी आसानी। पत्नी ने मगर दिल ही दिल में कुछ और ही ठानी। लिखनी है फिर से हर पुरानी कहानी। समझ गई सासु मां ने समझाया है मतलब की खातिर लौट बुद्धू घर आया है। ये सुबह का भूला नहीं जो शाम ढले आया हो ये है जो न अपना हो न पराया हो।
 
पत्नी जी पहुंच गई आंदोलन करने वालों के बीच अचानक बिना बताये। किसान मकसद मगर समझ नहीं पाये। हाथ जोड़कर बोली मुझे अपनी बहन समझना राखी बंधवाना रिश्ता निभाना पहले मेरा साथ दो मुझे बिखरा घर है बसाना जिस रोज़ मुझे मिल गया दिल्ली में ठिकाना उस रोज़ मेरे घर आना फिर चूल्हे में तीनों कानून खुद मुझको है जलाना। देखो मुझे रोना नहीं है अब बदला है उसका  चुकाना उसने मुझे रुलाया है बहुत मेरी बारी आई है मिलकर हमने उसे दिखलाना बदला ज़माना। ये सच है मुझे खुद उसने बताया है ऊंठ पहाड़ के नीचे आया है मगर चाल उसकी नहीं चलेगी दाल उसकी नहीं गलेगी। मिलकर सबने पैग़ाम है भेजा कोई छुपी बात नहीं सरेआम है भेजा। पहले अपनी पत्नी को घर में बसाओ साथ माता जी को दिल्ली बुलाओ समझौता अपना करो तब चर्चा हम से मिकर चलाओ। ये जाल नहीं चाल नहीं मिसाल हमने बनाई है ये बहना है हर किसान इसका भाई है। 
 
पढ़कर पैगाम जनाब हैरान हैं पत्नी क्या होती है नहीं जानते नादान हैं। भूली हुई दास्तां याद आई है बिल्ली शेर ने घर बुलाई है उसने पढ़ाई आधी पढ़ाई है। पत्नी का नहीं साथ जीतना मुश्किल है टूटी हुई कश्ती का पत्नी होती साहिल है। बिस्मिल समझा नहीं उसने मुझे घायल नहीं समझा मैंने भी छनकती है कैसे पायल नहीं समझा। मैसेज किया मुझे समझ नहीं आया खुलकर बताओ कहीं अकेले जाओ फोन लगाओ मुझे बचाओ मत डराओ मैंने सताया तुम तो न सताओ। सच बोलना कसम अपनी जान की खाओ। कॉल किया पत्नी ने कहा आप हैं झूठे सच्ची हूं मैं सच्ची बात पर थे आप मुझसे रूठे बंधन तभी तो थे अपने टूटे। शेर खुद को समझते हैं पति बनकर मगर सामने खड़ी थी इस युग की पत्नी तनकर। भाग गए थे बहाना बनाकर सर्कस वाले शेर होते हैं बहुत और कुछ कागज़ वाले भी असली नहीं होते। बस आपका भरोसा बार बार नहीं करना है मुझे भी किसान भाईयों की तरह बेमौत नहीं मरना है। अब बिल्ली शेर की चाल समझती है अपना मतलब निकलते खाओगे मुझे सरकार समझती है। जो शेर हैं जंगल के कभी घास नहीं खाते हैं सर्कस की तरह परोसा हुआ मांस नहीं खाते हैं। विदुर ने कहा था लाक्षाघर मत बनाना लगाई खुद आग जिसने उसे जल जाना बचना है अगर बिल कोई बनाना तीन बिलों का तो है बहाना आपको आता नहीं अच्छों से निभाना। सब जानते जिनसे आपका है बड़ा याराना , उनकी दोस्ती को कभी आज़माना बन जाएगी ज़िंदगी इक दिन अफ़साना। 
 

       न ख़ुदा ही मिला न विसाल ए सनम , न इधर के हुए  न उधर के हुए । 

       रहे दिल में हमारे ये रंज-ओ-अलम , न इधर के हुए न उधर के हुए। 


 

अनकही छोड़ जाएंगे हम कहानी अपनी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

       अनकही छोड़ जाएंगे हम कहानी अपनी ( ग़ज़ल ) 

                               डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

अनकही छोड़ जाएंगे हम कहानी अपनी 
ढूंढने पर नहीं मिलेगी निशानी अपनी। 
 
प्यार हमने किया उसे दिल ही दिल में लेकिन 
पर कभी कह सके नहीं हम ज़ुबानी अपनी। 
 
हमको तालाब मत समझना हैं बहते दरिया 
रोकने से नहीं रुकेगी रवानी अपनी। 
 
झूठ कहते नहीं खरा सच हमेशा कहते 
हम बदलते नहीं वो आदत पुरानी अपनी।
 
एक दिन उनसे जब मुलाक़ात होगी "तनहा" 
पूछना मत कि आएगी याद नानी अपनी। 



Wednesday, 10 February 2021

अपशब्द बोलकर लीद मत खाओ ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  अपशब्द बोलकर लीद मत खाओ ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

चलो सबसे पहले उनकी कही बात को उनके तराज़ू के पलड़े पर रखते हैं तोलते हैं बाट भी वही रखना ज़रूरी है। तो कहा है इक जमात है जो जिस किसी का आंदोलन हो वहीं मिलते हैं। बड़ी देर कर दी मेहरबां बताते बताते हम नहीं समझते सोचते रह जाते। ये राजनेता कौन हैं जो हर गली हैं जाते हर सभा में ये नासमझ पढ़े लिखों को सबक पढ़ाते। छुपाते हैं अपने सारे बही खाते शर्म इनको नहीं आती झूठ को सच बताते। धर्म की बात धर्म वालों पर छोड़ो सत्ता मिली है राजधर्म समझो निभाओ नहीं जोड़ सकते देश को मगर इस तरह मत तोड़ो मरोड़ो। सच की बात समझो मन की बात करना छोड़ो मन की बात मतलब की बात होती है मन आत्मा ज़मीर कुछ और होते हैं खुद से खुद मुलाकात होती है। कुर्सी मिल गई तो खुद को सर्वज्ञानी समझने लगते हैं हर विषय पर भाषण देने को किसी से लिखवाने लगते हैं अन्यथा तथ्य गलत बतलाने लगते हैं। ये राजनेता कौन हैं जो कभी किसी कभी दल जाने लगते हैं जो दुश्मन थे दोस्त बनकर शासन चलाने लगते हैं। अर्थव्यवस्था का सबक जो समझाने लगते हैं उनको हिसाब अपना समझने में बड़े ज़माने लगते हैं। इतिहास बदलकर गलत को सही सही को गलत समझते हैं अपनी नासमझी पर हंसकर रुलाने लगते हैं। जिस विषय पर कुछ नहीं जानते हर उस विषय पर टीवी पर सभा में भाषण चर्चा कर गंगा को जमुना बताने लगते हैं। होश इनके चुनाव हार कर ठिकाने लगते हैं। माहमारी की बात से बचाव से उपचार तक कौन है जो सब को समझाता है नहीं जिसको क ख ग तक इस का आता है जनाब हर किसी के अंगने में आपका क्या काम है। जो है नाम वाला वही तो बदनाम है। परजीवी कितने हैं कौन हैं कैसे कैसे हैं सबकी तलाशी ज़रूरी है। जिनका गुज़ारा बिना सत्ता के नहीं होता है सफ़ेद हाथी देश पर बोझ हैं उनकी पहचान अवश्य की जाए देशसेवा के नाम पर लूट बंद की ही जाये।  
 
चलो आज धर्म वालों की तर्ज़ पर सच झूठ और अर्धसत्य की परख करने को दो पुरानी धार्मिक कथा और बोध कथा नीति कथा की चर्चा करते हैं। कथा से पहले इक लोक कहावत जैसी बात करते हैं किसी चमड़े के धंधे वाले को इक दिन राजा बनाया तो उसने चमड़े के सिक्के जारी कर दिए। इक और बात कहते हैं इक भिखारिन को राजा ने रानी बनाया तो उसको तब तक चैन नहीं आता था जब तक भीख नहीं मांगे इसलिए वो रानी बनकर भी महल की दीवारों से भीख मांगती थी। भीख मांगने की आदत खराब होती है। अब धार्मिक कथा शुरू करते हैं। इक साधु राजा के पास भिक्षा मांगने आया तब राजा ने कहा अभी मेरे पास घोड़ों की लीद है वही उसके बर्तन में डाल दी। भगवान आपको कई गुणा फल दे आशीर्वाद दिया और चला गया। भीतर जाकर अपनी पत्नी को बताया तो उसने समझाया ये आपने क्या कर दिया है। जानते हैं आपको अगले जन्म में वही लीद कितना बड़ा ढेर खाना पड़ेगा। राजा की पत्नी साथ रहती थी और हर पत्नी पति की गलती बतलाती है चाहे राजा हो या भिखारी। जिनकी पत्नी साथ नहीं रहती उनको कौन गलती समझा सकता है। खैर राजा उस साधु की कुटिया पर गया क्षमा मांगने तो देखा वहां लीद का अंबार लगा हुआ था। साधु ने बताया दान की वस्तु इसी तरह बढ़ती है और अभी कुछ पल हुए हैं आपके जीवन काल तक इसका पहाड़ बन जाएगा। 
 
राजा ने विनती की कोई उपाय बता सकते हैं। साधु ने कहा मुझे पिछले जन्म का फल मिला है तब मैंने आपसे भीख मांगी थी आपने कुछ नहीं दिया और मैंने आपको अपशब्द बोले थे। अपशब्द का बदला मुझे लीद खानी पड़ेगी। फिर भी आप आएं हैं तो आपको उपाय बताता हूं। आपको कुछ ऐसा करना होगा जिस से शहर भर के लोग आपको गाली अपशब्द बोलकर आपकी ये लीद खुद खा लें। तब राजा ने इक रथ पर किसी नर्तकी के साथ हाथ में शराब की बोतल लेकर सवारी निकाली जिस के आगे आगे उनके कर्मचारी घोषणा करते जाते कि राजा जी आ रहे हैं उनका अभिवादन करें। और हर नगरवासी बाहर निकलता राजा के पाप कर्म को देखता और उसे गाली अपशब्द कहता। मगर इक दार्शनिक को देखा राजा को नमस्कार किया अपशब्द नहीं बोले। राजा ने उसको दरबार आने को संदेश भिजवाया। आपने मुझे अधर्म करते देखा कुछ नहीं कहा क्यों क्या डरते हैं। नहीं दार्शनिक बोले मुझे आपके बदले लीद नहीं खानी है उतनी बची होगी आपको खुद खानी होगी। आपके सभी नागरिक नहीं समझे और आपकी बात दोहराते रहे मुझे नहीं किसी की अनुचित बात का समर्थन करना मगर उसके फल का भागीदार भी नहीं बनना है। 
 
उनकी पत्नी साथ रहती तो अवश्य समझाती आपको जीवन भर भीख मांगनी पड़ी क्योंकि आप ने पिछले जन्म कुछ ऐसा किया होगा मगर अब इस जन्म अपशब्द बोलकर फिर से लीद खाने का काम मत करो जाकर अपनी गलती की क्षमा मांग लो ये लोग माफ़ कर देते हैं।  

Tuesday, 9 February 2021

अश्क़ बहाने पर मेरा शोध ( जीवन अनुभव ) डॉ लोक सेतिया

    अश्क़ बहाने पर मेरा शोध ( जीवन अनुभव ) डॉ लोक सेतिया 

  ( कुछ दोस्तों और दुश्मनों की मेहरबानी के आभार सहित फ़िल्मी गीतों ग़ज़लों का आभारी हूं )

ये सार्वजनिक करना उचित है अथवा नहीं कहना कठिन है विशेषकर तब जब मैंने अपनी ग़ज़ल में साफ़ कर दिया था बहुत पहले कि हमने आंसू बहाना छोड़ दिया। ग़ज़ल से शुरुआत करते हैं। 
 
ग़म से दामन बचाना छोड़ दिया
हमने आंसू बहाना छोड़ दिया।

अब बहारो खिज़ा से क्या डरना
हमने अब हर बहाना छोड़ दिया।

जब निभाना हुआ नामुमकिन तब
रूठ जाना ,  मनाना छोड़ दिया।

हो गये हैं जो कब से बेगाने
उनको अपना बनाना छोड़ दिया।

कब कहाँ किसने कैसे ज़ख्म दिये
हर किसी को बताना छोड़ दिया।

उनको कोई ये जा के बतलाये
हमने रोना रुलाना छोड़ दिया।

मिल गया अब हमारे दिल को सुकून
जब से दिल को लगाना छोड़ दिया।

ख्याल आया हमारे दिल में यही
हमने क्यों मुस्कुराना छोड़ दिया।

हमने फुरकत में "तनहा" शामो-सहर
ग़म के नगमें सुनाना छोड़ दिया।  
 
ये ग़ज़ल 2012 में ब्लॉग पर पोस्ट पब्लिश की हुई है। अश्क़ बहाना कोई खराब आदत भी नहीं होती है और मैंने अकेले में सबके सामने भी बहुत बहाये हैं अश्क़ मगर जब आपके आंसुओं की कीमत कोई नहीं समझे तब अनमोल खज़ाने को व्यर्थ गंवाना नहीं चाहिए। ये भूमिका आपको अपने अश्क़ दिखाने को नहीं लिखी ये समझाना चाहता हूं कि मेरा शोध कोई चोरी किया हुआ नहीं है। 

आप क्यों रोये जो हमने दास्तां अपनी सुनाई 

 

आपने देखा होगा टीवी शो पर कोई अपनी दर्द भरी कहानी सुनाता है या कभी ऐ मेरे वतन के लोगो ज़रा आंख में भर लो पानी गीत सुनते हैं तब बस पल भर को हम संवेदनशील हो जाते हैं। बाद में कहीं कुछ भी सामने दिखाई देता रहे हमको मतलब नहीं होता। ये अश्क़ वास्तविक होकर भी हमेशा को नहीं रहती भावना वाले दिखाने को बाहरी होते हैं भीतर अंतर्मन में भावनाओं में नहीं बहने की बात होती है। शोध किया तब पता चला कि जब किसी के दुःख को सुनकर देख कर हमको रोना आता है तब हम औरों के लिए नहीं कहीं अपनी किसी दर्द भरी याद के ताज़ा होने पर भावुक होकर सहानुभूति जताते हैं। 

कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया ,
बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया। 
कौन रोता है किसी और की खातिर ए दोस्त ,
सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया। 
 

मुस्कुराने लगे थे मगर रो पड़े

 

किसी की शोक सभा में किसी की मौत पर संवेदना व्यक्त करने जाने पर अपने आप पर संयम रखना होता है। मुस्कुराहट को छिपाना होता है चेहरे पर उदासी लानी पड़ती है भले आपको कोई एहसास नहीं हो अफ़सोस जतलाने को शब्द ढूंढते हैं। थोड़ा अलग होते ही दुनिया कारोबार जाने क्या क्या ज़रूरी होता है। अभिनय करना सभी जानते हैं कोई शायर कहता है " हर मोड़ पे मिल जाते हैं हमदर्द हज़ारों , लगता है मेरे शहर में अदाकार बहुत हैं। " मगर इक नायिका गाती है आज दिल पर कोई ज़ोर चलता नहीं मुस्कुराने लगे थे मगर रो पड़े। मुस्कुराने की तो कोई कीमत नहीं आंसुओं से हुई है हमारी कदर। 
 

टुकड़े हैं मेरे दिल के ए यार तेरे आंसू 

 

महबूबा के आंसू आग बुझाते नहीं और बढ़ जाती है लगी आग। बहने नहीं दूंगा मैं दिलदार तेरे आंसू। तबाही तो हमारे दिल पे आई आप क्यों रोये। हमारा दर्दो ग़म है ये इसे क्यों आप सहते हैं।ये क्यों आंसू हमारे आपकी पलकों से बहते हैं।  न ये आंसू रुके तो देखिये फिर हम भी रो देंगे ,
हम अपने आंसुओं में चांद तारों को डुबो देंगे। फ़ना हो जाएगी सारी ख़ुदाई आप क्यों रोये। मगर समझने की बात और है। ऐ मेरे दिल ए नादां तू ग़म से न घबराना , इक दिन तो समझ लेगी दुनिया तेरा अफ़साना। फ़रियाद से क्या हासिल रोने से नतीजा क्या , बेकार हैं ये बातें इन बातों से होगा क्या। इक ग़ज़ल है जिस में कहा है " घर की तामीर चाहे जैसी हो , उस में रोने की कुछ जगह रखना। 

बड़े लोगों के आंसुओं का समंदर 

 

राजनेताओं फ़िल्मी कलाकारों के आंसू सितम ढाते हैं। उनके आंसू देख कर लोग होश खो देते हैं। हारी बाज़ी जीत जाते हैं आंधी फ़िल्म की तरह तब और अब मामला इतना खतरनाक सीमा तक बढ़ गया है कि आंधी फ़िल्म नहीं बवंडर चक्रवात तूफ़ानी आंधी की पटकथा लिखने को कमलेश्वर जैसा मिलना मुश्किल है। बिग बॉस के घर से निकलने वाले को गले लगाकर आंसू बहाते हैं बाकी औपचारिकता निभाते हैं खुद बच गया खैर मनाते हैं। संसद में नेता आते हैं निर्धारित अवधि बाद चले जाते हैं क्यों इसका शोक मनाते हैं वास्तव में बाकी सदस्य यही सोच कर घबराते हैं उनके दिन भी घटते जाते हैं। ये विदाई के आंसू औपचरिकता भर नहीं हैं सच तो ये है बिना कुर्सी सत्ता उनको लगता है जीवन बेकार है अश्क़ निकल आते हैं। चलो आज इनका वास्तविक सच बताते हैं। पढ़ना इक रचना सुनाते हैं। इक नज़्म हाज़िर है। 
 

बड़े लोग ( नज़्म ) डॉ  लोक सेतिया

बड़े लोग बड़े छोटे होते हैं
कहते हैं कुछ
समझ आता है और

आ मत जाना
इनकी बातों में
मतलब इनके बड़े खोटे होते हैं।

इन्हें पहचान लो
ठीक से आज
कल तुम्हें ये
नहीं पहचानेंगे

किधर जाएं ये
खबर क्या है
बिन पैंदे के ये लोटे होते हैं।

दुश्मनी से
बुरी दोस्ती इनकी 
आ गए हैं
तो खुदा खैर करे

ये वो हैं जो
क़त्ल करने के बाद
कब्र पे आ के रोते होते हैं।  

ग़ालिब से लेकर आज तक लिखने वालों के आंसू 

 

चचा ग़ालिब कह गए रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल , जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है। जनाब हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है , तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़ ए गुफ़्तगू क्या है। ये कमाल की बात है हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद जो नहीं जानते वफ़ा क्या है। अब उनको शिकवा है लिखने वाले कविता कहानी लिखा करें देश समाज की वास्तविकता पर खामोश रहना अच्छा है अन्यथा बुद्धीजीवी को परजीवी घोषित किया जा सकता है उन्हीं द्वारा जो खुद परजीवी हैं देश जनता की कमाई पर जीते हैं राजनीति उनका मकसद नहीं कारोबार बन गया है। छाज तो बोले सो बोले छलनी भी बोले जिस में हज़ार छेद। इनको महनत की कमाई से गुज़ारा करना पड़ा तो बेमौत मर जाएंगे शासक अधिकारी सभी। हमारे दोस्त रामनिवास मानव जी के शब्द हैं आंसुओं को लेकर। 
 

बार बार लिख कर थकी , थक कर हुई उदास

कब लिख पाई लेखनी , आंसू का इतिहास। 

हम लिखने वाले अपनी कलम से अश्क़ों की स्याही से लिखा करते हैं। दरबारी लोग सोने चांदी के कलम उपहार में पाते हैं जिन में स्याही की जगह गरीबों का लहू भरा होता है सत्ता वालों की मर्ज़ी का इतिहास लिखने को। आखिर में किसी शायर के दो शेर पेश हैं। 

न मिले ज़ख़्म न निशान मिले , पर परिंदे लहू-लुहान मिले। 

यही संघर्ष है ज़मीं से मेरा , मेरे हिस्से का आसमान मिले।


Monday, 8 February 2021

एक के बदले सौ मिलेंगे ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया ( व्यंग्य भी साथ चार ग़ज़ल भी )

   एक के बदले सौ मिलेंगे ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

                   ( व्यंग्य भी साथ चार ग़ज़ल भी )

ये भी नोटबंदी की तरह ही है मगर क्योंकि योजना ख़ास वर्ग तक सिमित है इसलिए इसकी घोषणा नहीं की जा सकती थी। करंसी नहीं सच की बदलने की बात है क्योंकि उनको पक्का यकीन हो गया था सच बहुत पुराने युग में उपयोगी था और आजकल झूठ उसकी जगह स्थापित हो चुका था अतः सच की कीमत कुछ भी नहीं रही इसलिए बदलना लाज़मी था। बस जो जो भी सच का धंधा करते थे उनको समझा दिया था जितना बचा हुआ सच आपके तहखाने में है उसको हम से बदल सकते हैं। सिर्फ इतना नहीं आपको गले सड़े बेकार सच के बदले में खनकदार चमकीला झूठ मिलेगा सस्ते दाम पर एक देकर सौ वापस पाओ समय रहते फायदा उठाओ। योजना मिल बांट कर खाओ पहले खुद को बेचो उसके बाद झूठ बेचने का धंधा चलाओ जितना चाहो लेते जाओ रोज़ आओ रोज़ पाओ खूब खाओ खिलाओ। सच की दुकानदारी करने वालों ने सच बेच कर झूठ सौ गुणा पाया और शॉपिंग मॉल में शोरूम बनाकर भाव और भी बढ़ाकर मुनाफा कमाया। किसी को भी ये समझ नहीं आया सच जिस ने खरीदा उसने क्या कमाया। झूठ बेचने वाला खामोश रहा अपना खोटा सिक्का चलाया उल्लू सबको खूब बनाया सच का नामो-निशान मिटाकर खुद सच बनकर सामने आया। आखिर इक दिन हमको सारा खेल दिखाया सच और झूठ दोनों से मिलवाया। 
 
खरा सच खालिस दूध सबसे लिया अपनी मशीन में डालकर मख्खन चिकनाई अलग कर उसका शुद्ध देसी घी बनाया खुद पिया अपने लोगों को बेचकर बदले में समर्थन या मनचाहा काम लिया। बचा हुआ था सफेद पानी उसमें मिलवट कर गाड़ा किया सौ गुणा कर वापस उन्हीं को दिया। सच वाले झूठ बेचने लगे हैं तलवे चाटने लगे हैं हाथ जोड़ने लगे हैं। सच नज़र आये उसको क़त्ल करते हैं नहीं ज़िंदा सच कोई छोड़ने लगे हैं। । उनके पास झूठे वादों का भंडार जमा था तमाम अच्छे दिन रोज़गार काला धन विदेश से लाने और खैरात बांटने से विकास और सस्ता पेट्रोल डीज़ल जो मांगो मिलने वाले। सब से बचाने को खुद चौकीदार बन भाई बंधुओं को भी चौकीदार बनकर रखवाली करने के नाम पर हरियाली पाने के रंग ढंग निराले बनाये हैं। एक एक सच को दफ़नाया हज़ार झूठ उगाये हैं झूठ के बाग़ लगाए है लोग सारे रुलाये हैं अच्छे दिन खुद अपने बनाये हैं। नया ज़माना लाये हैं राहों पर कांटें बिछाए हैं कुछ लोग खिलखिलाए हैं जिनको अंदाज़ भाए हैं बाकी सभी बहुत पछताए हैं। 
 

 सच लिखना अपराध है बोलना मना है सच को ग़ज़ल बनाकर सुनाया जा सकता है सामने दिखलाया भी जा सकता है और झूठ से छिपकर बचाया भी जा सकता है।  जाँनिसार अख़्तर जी की लाजवाब ग़ज़ल पहले उसके बाद इस नाचीज़ की भी तीन ग़ज़ल सच को लेकर हाज़िर हैं। 

ग़ज़ल - जाँनिसार अख़्तर जी की 

जब लगे ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाए 
है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाए। 
 
दिल का वो हाल हुआ है गमें दौरां के तले 
जैसे इक लाश चटानों में दबा दी जाए। 
 
हमने इंसानों के दुःख दर्द का हल ढूंढ लिया 
क्या बुरा है जो ये अफ़वाह उड़ा दी जाए। 
 
हम को गुज़री हुई सदियां तो न पहचानेंगी 
आने वाले किसी लम्हे को सदा दी जाए। 
 
हम से पूछो कि ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फ़न क्या 
चंद लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाए। 
 
कम नहीं नशे में जाड़ों की गुलाबी रातें 
और अगर तेरी जवानी भी मिला दी जाए।
 
 

इस ज़माने में जीना दुश्वार सच का ( ग़ज़ल ) 

        डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इस ज़माने में जीना दुश्वार सच का
अब तो होने लगा कारोबार सच का।

हर गली हर शहर में देखा है हमने ,
सब कहीं पर सजा है बाज़ार सच का।

ढूंढते हम रहे उसको हर जगह , पर
मिल न पाया कहीं भी दिलदार सच का।

झूठ बिकता रहा ऊंचे दाम लेकर
बिन बिका रह गया था अंबार सच का।

अब निकाला जनाज़ा सच का उन्होंने
खुद को कहते थे जो पैरोकार सच का।

कर लिया कैद सच , तहखाने में अपने
और खुद बन गया पहरेदार सच का।

सच को ज़िन्दा रखेंगे कहते थे सबको
कर रहे क़त्ल लेकिन हर बार सच का।

हो गया मौत का जब फरमान जारी
मिल गया तब हमें भी उपहार सच का।

छोड़ जाओ शहर को चुपचाप "तनहा"
छोड़ना गर नहीं तुमने प्यार सच का।  
 
 

इक आईना उनको भी हम दे आये ( ग़ज़ल ) 

डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इक आईना उनको भी हम दे आये
हम लोगों की जो तस्वीर बनाते हैं।
 
बदकिस्मत होते हैं हकीकत में वो लोग
कहते हैं जो हम तकदीर बनाते हैं।

सबसे बड़े मुफलिस होते हैं लोग वही
ईमान बेच कर जो जागीर बनाते हैं।

देख तो लेते हैं लेकिन अंधों की तरह
इक तिनके को वो शमशीर बनाते हैं।

कातिल भी हो जाये बरी , वो इस खातिर
बढ़कर एक से एक नजीर बनाते हैं।
मुफ्त हुए बदनाम वो कैसो लैला भी
रांझे फिर हर मोड़ पे हीर बनाते हैं। 
 
 

पथ पर सच के चला हूं मैं ( ग़ज़ल )

 डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

पथ पर सच के चला हूं मैं
जैसा अच्छा - बुरा हूं मैं। 

ज़ंजीरें , पांव में बांधे 
हर दम चलता रहा हूं मैं।

कोई मीठी सुना लोरी
रातों रातों जगा हूं मैं। 

दरवाज़ा बंद था जब जब
जिसके घर भी गया हूं मैं। 

मैंने ताबीर देखी है
इन ख्वाबों से डरा हूं मैं। 

आना वापस नहीं अब तो
कह कर सबसे चला हूं मैं। 

खुद मैं हैरान हूं "तनहा"
मर कर कैसे जिया हूं मैं।
 
 
 
 

Sunday, 7 February 2021

मौका मिला है राज चलाओ ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      मौका मिला है राज चलाओ ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

ये समझो और समझाओ मौका मिल जाये तो मत शर्माओ जो चाहो करते जाओ अपनी भूख प्यास मिटाओ पाछे नहीं पछताओ। युग बदलता है पिता की विरासत बच्चों को मिलती है पूरी होती है बाप की दौलत से क्या क्या हसरत दिल में पलती रही अधूरी होती है। बहू जब भी सास बनती है छलनी बदलती है चाल चलती है बहू क्या नहीं पैतरें बदलती है बस ये चलन है सुबह होती है शाम ढलती है। जब से हमने सरकार बनाई है अपना मख़्खन दूध मलाई है छाछ सभी को बंटवाई है। लोग पुराने थे पुरानी सोच रखते थे नींद में भी जो होश रखते थे हम तो चैन की नींद सोते हैं खुल कर जीते हैं मौज मनाते हैं हम कभी नहीं रोते रुलाते हैं और रुलाकर हंसते है उनकी किस्मत में रोना है रोते हैं। कितने मूर्ख होते थे दौलत को संभालते बढ़ाते थे खुद सादा जीवन बिताते थे खर्च कम करते अधिक बचाते थे। हमने बदले दस्तूर पुराने हैं अपने याराने याराने हैं सब खज़ाने हमको लुटाने हैं दोस्त दुनिया भर से खरीद लाने हैं सबको इस राज़ का पता भी है सबसे आसान ये रास्ता भी है। साथ कोई कुछ नहीं लाया है और कुछ साथ लेकर नहीं जाना है किसलिए बचाना है खाना ख़ज़ाना खाकर जाना है। बाद वालों को सबक सिखाना है अपने दम पर जहां बनाना है हम नहीं कायल उनके जो ढंड से खुद मर जाते हैं और रज़ाई अपनी बच्चों के नाम छोड़ जाते हैं। उनको जीने का हुनर नहीं मालूम था जीना क्या होता है चलो आज हम बताते हैं। अपनी कथा कहानी खुद लिखते हैं खुद सुनते हैं सुनाते हैं हम मियांमिठ्ठू बनकर अपने को सबसे अच्छा बताते हैं। झूठ नहीं है सच वही है जो हम मानते ही नहीं मनवाते हैं। 
 

   ( कथा काल्पनिक है पहले बताते हैं। चलो खुद से खुद भी मिलते हैं आपको मिलवाते हैं। )

अध्याय पहला। कभी किसी की मत सुनो अपने सपने खुद चुनो बुनकर ख़्वाब अपनी धुन पर नाचो झूमों गाओ लोग क्या कहते हैं घर परिवार सबको छोड़ो इक दोहा याद आया है सुनते जाओ। अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम , दास मलूका कह गए सबका दाता राम। काम करना ज़रूरी नहीं है आराम करना ज़रूरी है आराम बड़ी चीज़ है। आपको धंधा करना है तो सोच समझ कर चयन करना उचित है। भीख मांगना खराब नहीं है भिखारी से बढ़कर कोई नवाब नहीं है। भीख सभी लोग चाहते हैं वेतन काम का जितना भी हो रिश्वत बिना गुज़ारा नहीं होता है पैसे बगैर कोई हमारा सहारा नहीं होता है। कभी बख़्शीश कहा जाता था काम के बाद अधिकारी क्लर्क बिना मांगे पाकर सर झुकाता है मगर रिश्वत का अपना आधार है ये नहीं सिर्फ उपहार है ये लेन देन का खुला बाज़ार है आपको हाज़िर जो भी दरकार है इक यही बिन छपा इश्तिहार है। पैसे वालों की रही हमेशा अपनी सरकार है। भीख मांगने में शर्म की बात नहीं बस इसी झगड़े पर सुहागरात बन पाई सुहागरात नहीं। दोनों मिलकर भीख मांगेंगे उनको बात सच्ची भाई नहीं बस मानते हम नहीं अपनी लुगाई नहीं सब कुछ पाना है हमने कोई हरजाई नहीं। बात उसने भी आगे बढ़ाई नहीं। हमारी हजामत करे मिला नाई नहीं दाढ़ी बढ़ती गई बढ़ाई नहीं सच समझते मेरे भाई नहीं। 
 
अध्याय दूसरा। भीख मांगने वाले साधु महात्मा संत बनकर विकास की डगर चलते रहते हैं। भीख देने वाले वहीं रह गए भिखारी हलवा पूरी खाकर संतोष की व्याख्या समझाते रहे दान देने से दौलत बढ़ती है इसका मतलब दिखाते रहे भीख वाले दौलत जमाते रहे। धर्म का काम महनत की कमाई से किया जाता नहीं चोर डाकू धर्म करते हैं पूजा पाठ दान सभी कुछ भगवान के पास सब भक्त समान हैं एक नंबर दो नंबर का कोई खाता नहीं जो सर झुकाता नहीं कुछ बिन मांगे पाता नहीं। ये हिसाब सबको समझ आता नहीं।  
 
अध्याय तीसरा। स्वर्ग नर्क की दास्तां हैं अपने लिए सब कुछ यही जहां है ज़िंदगी मौत के दरमियां कौन जाने क्या इम्तिहां है। जान है तो जहान है अपनी शान अपनी पहचान है घर किसी और का है दुनिया में हर कोई चार दिन का महमान है। गरीबी अभिशाप है अमीरी वरदान है ये राजनीति जो नहीं समझता है नासमझ बड़ा नादान है। हमने तीन रास्ते बनाये हैं फ़रिश्ते ढूंढ कर हम लाये हैं जाल ऐसे बिछाए हैं लोग नाहक घबराये हैं। मौत का क्या भरोसा है ज़िंदगी ने यही परोसा है जन्नत मिलती है मरने के बाद मौत से डरकर जी नहीं सकते। ज़हर पीते हैं झूठा शहद लगता है अमृत सच का पी नहीं सकते। स्वर्ग नर्क मोक्ष की चाह ने ज़माने को उलझाया है जिसने खोजा है उसने पाया है लोग डरते हैं जिससे खुद उन्हीं का साया है। आपने टीका लगवाना है नहीं कोई चलेगा बहाना है रोग भागे नहीं भागे नहीं जानता कोई मगर कहा मैंने सभी ने माना है। टीका लगवाने से क्या क्या होगा कुछ नहीं होगा तो तजुर्बा होगा। मौत से बढ़कर कुछ हो नहीं सकता रोना यही है खोने वाला खोकर रो नहीं सकता। हमने बड़ी महनत से इनको बनाया है समझ लो उपरवाले की यही माया है दर्द दवा का यही रिश्ता है। रोग से मरने से अच्छा है ईलाज से मर जाना। सोचो अगर पैसे से दवा से उपचार से लोग मौत से बच सकते तो कोई धनवान कभी नहीं मरता दुनिया में गरीबी कब की खत्म हो गई होती। 
 

  ( ये शुरुआत है कथा कभी ख़त्म नहीं होती है। पढ़ सुन कर चिंतन करते हैं। )

यहां भगवान बन जाते वहां शैतान बन जाते ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

यहां भगवान बन जाते वहां शैतान बन जाते ( ग़ज़ल ) 

डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

यहां भगवान बन जाते वहां शैतान बन जाते
हमेशा के लिए तुम क्यों नहीं इंसान बन जाते। 
 
ज़रूरत पर हमेशा ही झुकाए सर चले आये 
तुम्हारे पास आएं लोग तब अनजान बन जाते। 
 
तुम्हारे वास्ते दर खोलना महंगा पड़ा सबको 
निकाले से नहीं निकले जो वो महमान बन जाते। 
 
अदावत की सियासत से कभी कुछ भी नहीं मिलता 
न जो अभिशाप बनते काश इक वरदान बन जाते। 
 
बहुत करते रहे तुम सब अमीरों पर मेहरबानी 
गरीबों के लिए अच्छे सियासतदान बन जाते।
 
 

Saturday, 6 February 2021

शक़्ल नहीं तस्वीर है आईने में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      शक़्ल नहीं तस्वीर है आईने में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

बड़ा नाम सुना था बाज़ार है सच वाले आईने हैं हर शोरूम दुकान फुटपाथ से चलते फिरते जाने कैसे कैसे। पहली ही दुकान अपनी पहचान वाले की थी उनसे साफ़ शक़्ल देखने वाला दर्पण मांगा तो उन्होंने लकड़ी के फ्रेम में इक तस्वीर सामने कर दी और बोले देख लो ये आप ही हैं। हमने कहा क्या बता रहे हैं आप मुझे जैसा समझते हैं वैसा दिखला रहे हैं मैं कोई नादान बच्चा नहीं किसको ऐसे बहला रहे हैं। हंस कर बोले हम धंधा चला रहे हैं कभी हंसने वाले को रुला रहे हैं कभी रोते बच्चे को खिलौना थमा रहे हैं कुछ भी समझ लो हम पैसा बना रहे हैं। हम बिकते हैं बेचते भी हैं लोग हमारी कीमत बढ़ा रहे हैं हम रामधुन बजा रहे हैं रावण को ऊंचा उठा रहे हैं उसके गुणगान के मतलब सबको समझा रहे हैं। सीता और गीता राम और श्याम दोनों किरदार अकेले निभा रहे हैं दर्शक ताली बजा रहे हैं क्यों आप झल्ला रहे हैं देखो हम जश्न मना रहे हैं झूठ को मंच पर बिठाकर फूलमाला दीपक मां सरस्वती को अर्पित करवा रहे हैं। सुनते हैं लोग बहरे हैं बेशक मिलकर सभी गूंगे मधुर गीत गा रहे हैं। 
 
सुबह से शाम तक बाजार सारा छान मारा मगर मिला नहीं कश्ती को कहीं किनारा। हर किसी ने यही कहा बाबूजी समझो ज़रा इशारा क्या हाल हुआ तुम्हारा क्या हाल है हमारा। फेसबुक व्हाट्सएप्प का बदला है सब नज़ारा जिसे मौत ने बचाया उसे ज़िंदगी ने मारा। हमको तो मिल गया है सरकार का सहारा कागज़ की कश्ती दरिया का वो किनारा सागर का खारा पानी हमको नहीं लगता खारा। शीशे में देखो हमने क्या क्या नहीं उतारा सच झूठ दोनों भाई क्या भलाई क्या बुराई अपना हर किसी से नाता है जब तक काम आता है रिश्ता निभता जाता है। हर खरीदार को हम आईना दिखलाता है शक़्ल जैसी भी हो हम तस्वीर बनाकर फ्रेम में लगाता है। आपको उधर से उजाला इधर से अंधेरा नज़र आएगा मगर हमारी कलाकारी से खुद को सबकी नज़र से खूबसूरत दिखलाएगा। सेल्फ़ी लगाओगे या डीपी बनाओगे सोशल मीडिया पर छाओगे गज़ब ढ़ाओगे। 
 

संक्षेप में समझाया है गागर में सागर भरने की बात है आखिर में आर पी महरिष की ग़ज़ल। 

आईने में देखना अच्छा लगा 
अपना अपना चौखटा अच्छा लगा। 
 
आत्मश्लाघा में खुद अपनी पीठ को 
थपथपाना ठोंकना अच्छा लगा। 
 
आज विश्वामित्र के बहरूप को 
मेनका ने फिर छला अच्छा लगा। 
 
आधुनिक बनने की अंधी दौड़ में 
उनको चस्का जाम का अच्छा लगा। 
 
एक ख़लनायक की कटु मुस्कान पर 
हो गए दर्शक फ़िदा अच्छा लगा। 
 
बाद उत्सव के निमंत्रण पत्र वो 
खूबसूरत सा मिला अच्छा लगा। 
 
हम तो रुकने ही को थे "महरिष" मगर 
उसने रोका रास्ता अच्छा लगा।