Thursday, 14 January 2021

झूठ की आत्मकथा सच की कलम से ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 झूठ की आत्मकथा सच की कलम से ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

दरबार में बुलावा तमाम लोगों को नसीब की बात लगता होगा मुझे समझ ही नहीं आया चिंता होने लगी शामत आई कि कयामत आने वाली है। सबने कितनी बार हिदायत दी थी सच कहना लिखना इस युग में ठीक नहीं है पर मुझसे झूठ की महिमा गाई नहीं जाती सर कटाना मंज़ूर झुकाना नहीं सत्ता की चौखट पर। दिल्ली का हो या कहीं और शहर राज्य की राजधानी का खुला दरबार चाहे बंद दरवाज़े की महफ़िल नहीं गये बुलावा भी नहीं मिला कभी। कहा गया बेहद महत्वपूर्ण लेखकीय कार्य की खातिर आपकी सेवा की ज़रूरत है अवश्य पधारें। जो भी होगा देखा जाएगा सोच कर हाज़िर हुए मगर आदत है सर नहीं झुकाया नमस्कार कह कर सामने बैठ गए। चाय पिलाने को पूछा उनकी चाय का कहते हैं जवाब नहीं जिसने इक प्याली पीकर देखी याद रही और चाय की चाहत उनके पास ले जाती रहती है। मैंने कहा नहीं मुझे इच्छा नहीं है चाय ठंडा की औपचारिकता छोड़ बताएं मुझसे क्या बात लिखानी है। उन्होंने सोने चांदी के कलम सामने रख कर समझाया ऐसी कलमों से नवाज़ा जाएगा आपको हमारी आत्मकथा लिखनी है। मैंने बताया ये काम कथाकार इतिहासकार का है मैं तो व्यंग्यकार हूं तीखी बात लिखना आदत है। और उन लिखने वालों में से हर्गिज़ नहीं जो सरकारी ईनामात की चाहत में सत्ता की कीमती कलमों से जो गरीबों के लहू से भरी होती हैं शासकों का गुणगान करने वाला इतिहास लिखते हैं और शोहरत की बुलंदी को छू लेते हैं। मेरे पास इक आईना है जिस में हर किसी की असली सूरत दिखाई देती है। दर्पण झूठ न बोले हंस ले चाहे रो ले। 
 
 जाने क्या सोचकर सरकार ने मुझे अति गोपनीय निजी कक्ष में चलने को कहा और बोले लेखक जी चिंता मत करो जैसे निडरता पूर्वक बात कही है उसी तरह मुझे अपना आईना दिखलाओ अकेले में। कहने लगे मैंने कैमरों का कमाल बहुत देखा है शौक़ीन निजाज़ लोग रंगीन शानदार महंगे लिबास पहन कर तस्वीर बनवाते हैं हसीन महिलाओं की तरह अपनी सुंदरता पर लट्टू हो जाते हैं। सभी को लगता है ऊपरवाले ने मुझसे बढ़कर खूबसूरत कोई दुनिया में नहीं बनाया है। मगर सच का आईना सुनते रहे हैं असलियत दर्शाता है अपने आप को कोई देख नहीं सकता और बाज़ार में आजकल वही आईने मिलते हैं जो बिकते हैं और खरीदार को बड़ा खूबसूरत बतलाते हैं सोशल मीडिया टीवी अख़बार जैसे झूठे दर्पण मैंने भी खरीद कर अपनी महिमा का गुणगान करवाया है शोहरत हासिल की है मगर जाने क्यों कभी कभी अपने को नींद में देखकर पसीने पसीने हो जाता डरावना ख़्वाब जब नींद छीन लेता है। पहली बार उन्होंने शपथ खाई सच को सुनकर संयम नहीं खोने का वादा किया। 
 
मैंने सच दिखाना शुरू किया , सत्ता पर तमाम तरह के लोग होते रहे हैं। गंभीर स्वभाव वाले दर्द की बात सोचने वाले निराशा को आशा में बदलने के जीवट वाले और शाही ढंग से राजा बनकर बंसी बजाने वाले भले देश आग की लपटों में घिरा हो। लेकिन जैसे आजकल लोग मनोरंजन और समय बिताने को ऐसे टीवी शो सीरियल और फ़िल्में देखना पसंद करते हैं जिन में कोई ज़िंदगी और समाज की गंभीर चिंतन की बात नहीं हो बस हंसने ठहाके लगाने की बात हो। बेशक घटिया बेहूदा चुटकले हों या गंदी अश्लील हरकतों को देख कर मज़ाक़ के नाम पर नग्नता को बढ़ावा देना। ऐसे में आप मिले जो दिल खुश करने वाली अच्छी अच्छी बातें कहने का हुनर जानते हैं। हास्य कलाकार की सफलता इसी में होती है कि लोग उसकी झूठी बेबुनियाद कही बात को भी सच समझते हैं। बच्चे स्कूल नहीं जाना चाहते तभी पेट दर्द होने लगता है लगता है मेरे भाई की तरह आपकी आदत होगी बचपन में अगर पढ़ाई की हो तो। हास्य विनोद जीवन में ज़रूरी है मगर आपने हर चीज़ को मज़ाक बनाकर ठीक नहीं किया है। चार्ली चैपलिन की उलटी सीधी हरकतें दर्शक को हंसाती थीं मगर आपने हर कीमती चीज़ से लेकर संसाधन संस्थाओं संगठन तक को तहस नहस किया है और समझते हैं कितना मज़ा आया है ये उपहास की नहीं समाज की चिंता की बात है। 
 
खोटे सिक्के की कहानी है जिसे पिता ने संभाल कर तिजोरी में इक थैली में रख छोड़ा था। किसी को ठगना नहीं धोखा नहीं देना और शर्मिंदा नहीं होना किसी को देकर उस से धोखेबाज़ कपटी नहीं कहलाना पसंद नहीं था। मोह छोड़ नहीं सकते थे बेटा बेटा होता है चाहे खोटा सिक्का ही हो। कितने खोटे सिक्के शादी के बाज़ार में मुंह मांगे दाम पर बिकते हैं। बेटी देने वाले पछताते हैं मगर दामाद और बेटी की ससुराल का समंध निभाने को खामोश रहना पड़ता है। चुनाव में गलती जनता से हो जाती है नेता पहले सेवक बनने की बात कहते हैं जीत कर शासक समझने लगते हैं। जनता भरोसा करती है नेता कपट करते हैं बात से मुकर जाते हैं। आत्मकथा लिखना आसान नहीं है  खुद को सच्चाई के आईने में देख कर लोग सोचते हैं ये मैं नहीं कोई और है। मगर शायद आपकी आत्मकथा का शीर्षक मैं सुझा सकता हूं। विश्व के सबसे बड़े बहरूपिये का शासन। हमने इकरार नहीं किया उन्होंने भी इसरार नहीं किया , उन्होंने कोई चमत्कार नहीं किया अलविदा करते समय नमस्कार नहीं किया ये अत्याचार नहीं किया। फिर मिलने की कोई तारीख नहीं तय की फिर भी शायद बात आधी अधूरी है इक और मुलाक़ात ज़रूरी है।  
 

Wednesday, 13 January 2021

अब लगे बोलने पामाल लोग ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

अब लगे बोलने पामाल लोग ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

अब लगे बोलने पामाल लोग 
देख हैरान सब वाचाल लोग।
 
कौन कैसे करे इस पर यकीन 
पा रहे मुफ़्त रोटी दाल लोग।

ज़ुल्म सहते रहे अब तक गरीब 
पांव उनके थे हम फुटबाल लोग।

मुश्किलों में फंसी सरकार अब है
जब समझने लगे हर चाल लोग।

कब अधिकार मिलते मांगने से
छीन लेंगे मगर बदहाल लोग।

मछलियां तो नहीं इंसान हम हैं  
रोज़ फिर हैं बिछाते जाल लोग। 

कुछ हैं बाहर मगर भीतर हैं और
रूह "तनहा" नहीं बस खाल लोग। 
 
पामाल =  दबे कुचले  
वाचाल = बड़बोले

Tuesday, 12 January 2021

सूरज के आसन पर घने अंधेरे बैठे हैं ( मातम की बात ) डॉ लोक सेतिया

सूरज के आसन पर घने अंधेरे बैठे हैं ( मातम की बात ) डॉ लोक सेतिया 

कैफ़ी आज़मी की ग़ज़ल पढ़ते हैं। अफ़सोसजनक हालत ये नहीं कि आदमी नहीं रोना तो इस बात का है कि इंसान ही नहीं मिलते इंसानियत की क्या बात की जाये। 
 

मैं ढूंढता हूं जिसे वो जहां नहीं मिलता , नई ज़मीन नया आस्मां नहीं मिलता। 

नई ज़मीन नया आस्मां भी मिल जाये , नये बशर का कहीं कुछ निशां नहीं मिलता। 

वो तेग़ मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मेरा , किसी के हाथ का उस पर निशां नहीं मिलता। 

वो मेरा गांव है वो मेरे गांव के चूल्हे , कि जिन में शोले तो शोले धुआं नहीं मिलता। 

खड़ा हूं कब से मैं चेहरों के एक जंगल में , तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहां नहीं मिलता।

जो इक खुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूं , यहां तो कोई मेरा हमज़बां नहीं मिलता। 

 इस दर्द की गहराई को फिर से महसूस किया कल देश की सर्वोच्च अदालत की वास्तविकता को जानकर। जाने क्यों रात भर दिमाग़ को बेचैनी रही अफ़सोस हुआ ये दोहा याद आया बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर , पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर। किसान क्या समझ रहे थे मालूम नहीं मगर हम समझ रहे थे अंधेरी कोठड़ी में कोई रोशनदान है शायद। जिनसे उजाले की उम्मीद कर रहे थे अंधियारे के पुजारी निकले। अदालत को उनके दुःख दर्द की चिंता नहीं है चिंता है कहीं दिल्ली की नींद में खलल नहीं पड़ जाये कहीं उनका सालाना जश्न का मज़ा किरकिरा नहीं हो जाए राजपथ पर झूठी शान ताकत का दिलकश नज़ारा फ़ीका नहीं पड़ जाये। नहीं न्यायपालिका को न्याय की चिंता नहीं इंसाफ़ की परवाह नहीं अपने दामन पर बेगुनाहों के क़त्ल के खून का धब्बे लगने का डर है। ये बज़ुर्ग महिलाएं बच्चे राजधानी में खुले आसमान तले जान हथेली पर रख कर जीने का अधिकार नहीं मांगें घर वापस जाकर गांव में बेशक मरते रहें ख़ुदकुशी करते रहें। ये शब्द उनकी बेरहमी से बढ़कर कठोर नहीं हैं। ये जले पर नमक छिड़कने वाले संवेदना रहित उच्च वर्ग के लोग हैं जिनके पास सब कुछ है मगर जिनके पास कुछ भी नहीं उनके लिए दिल में हमदर्दी तो क्या इंसानियत की भावना तक नहीं है। 
 
सरकार से उम्मीद की जाती है देशवासियों की समानता और उनके लिए न्यायपूर्ण आचरण की मगर उनका सत्ता का अहंकार और जो मर्ज़ी करने की तानाशाही सोच उनको गलत दिशा से कदम पीछे हटाने नहीं देती है। ये कविता याद आई तो लगा सामयिक है। ये पढ़े लिखे जानकर लोग बताएं।
 " समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ है, समय लिखेगा उनके भी अपराध" रामधारी सिंह दिनकर की इन पँक्तियों को आप आज के सन्दर्भ में कैसे परिभाषित करेंगे ? 
 
सदालत को नहीं समझ आया था सरकार समस्या है या समाधान चाहने वाली है। खुद अदालत ने उपाय ढूंढ लिया है ज़हरीला नाग भी ज़िंदा रहे उसको अपनी हिफ़ाज़त में अपने पिटारे में बंद रखा है और जिनके हाथ लाठी है उनको लाठी की ज़रूरत नहीं समझाया है। सांप मर जाये लाठी भी नहीं टूटे की कहावत बदल गई है नाग देवता उनकी बीन पर नाच कर तमाशा दिखलाएंगे। लाठी छोड़ लोग ताली बजाएंगे। 26 जनवरी को सब देश्बक्ति वाले गीत गाकर देशभक्त कहलाएंगे। देश में जो भी होता रहे उस वास्तविकता से नज़रें चुराएंगे जश्न मनाकर लड्डू खाएंगे। दर्द को और बढ़ाकर सरकार जनाब मुस्कुराएंगे।




Monday, 11 January 2021

इस फटकार में दुलार है ( सीधी बात ) डॉ लोक सेतिया

      इस फटकार में दुलार है ( सीधी बात ) डॉ लोक सेतिया 

 सरपंच साहब की सरपंची कब की नाम की है बिगड़ी औलाद ने सब चौपट कर दिया है। अब खुले आम सरपंच जी कहते हैं बेटा जी मान भी जाओ खुद ही आवारगी छोड़ दो अच्छा है नहीं तो मुझे कुछ करना पड़ सकता है।  रोने वालों को रोने दो। सरपंच जानते हैं उनको सरपंच बनाया उसी ने है अपने इशारों पर नचाने को। एक दूसरे के कारनामे दोनों जानते हैं दिल से दिल मिलने की बात है। जब लगा कहीं सरपंच की सरपंची खतरे में नहीं पड़ जाए तब इंसाफ और शराफत की चादर ओढ़नी ज़रूरी है। पंचायत में फटकार देकर घर में पुचकारना दुलारना पड़ता है। सरपंच को इंसाफ की चिंता नहीं है चिंता है बेटे से संभलता नहीं कुछ भी उसकी नादानी नाकामी बन जाये उस से पहले कोई बचाव का ढंग निकालना है। मन से अपनों के हैं दिखावा करना है गैरों के साथ हमदर्दी जतलाना चाहते हैं। इस देश में अजब ढंग है अदालत निर्णय नहीं करती फैसले करती है समझौता करवाती है दोनों पक्षों में जुर्म की सज़ा नहीं मुआवज़ा देने का काम करवाना पुलिस वाले पंचायत किया करते थे अब सबसे बड़ी अदालत चाहती है सांप भी ज़िंदा रहे और लाठी भी सलामत रहे। आस्तीन में सांप पालने का चलन है।
 
     ये राजनीति नहीं है आजकल नीतिविहीन लोग सत्ता को भगवान समझते हैं गधे को बाप बनाना क्या है बाप को गधा समझते हैं। ये बेटा जब से सब कुछ हाथ लगा है तोड़ने फोड़ने बर्बाद करने का ही काम किया है। खुद को बाप दादा से बड़ा और समझदार होने का अहंकार रखता है जब तक उसकी मनमानी चलती रही बाप कानून की देवी बनकर आंखों पर पट्टी बांध गंधारी का कर्तव्य निभाती रही। सामने महाभारत खड़ा है और अधर्म के अंत को सामने देख कर बाप बेटे को रोकता नहीं बचाव करता है सबके सामने प्यार भरी चपेड़ लगाता है नटखट कहीं का ये शरारत करना बंद करता है कि नहीं। सरकार कहती है अभी कुछ दिन आपको खामोश रहकर तमाशाई बन रहना है। बाप को लगता है उसके और सभी शासक वर्ग के दामन पर किसी का लहू नहीं लग जाए। अभी तक जैसे गरीबों का लहू नहीं पानी बहता रहा है। जनाब ये खून के धब्बे हैं कोई राजनेताओं पर लगे घोटाले के दाग़ नहीं जिनको आपने धोकर बेदाग़ ही नहीं चमकदार सफेदी घोषित किया है। इन पर पिछले साल के दंगों के दाग़ ही नहीं बीस साल पहले के दंगों के दाग़ के निशान बाकी हैं। बात नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली है। पापों की गठड़ी बांधी है किस किस जुर्म पर चुप्पी साधे रहे बस चिंता हुई तो जब किसी ने आपकी असलियत बिना झिझके सभी के सामने खोल दी। आपका अपमान किया और माफ़ी भी नहीं मांगी तब खुद एक रुपया कीमत लगाई जुर्माना किया तो फज़ीयत करवा ली। हौंसला सच के साथ खड़े होने से मिलता है झूठ का गुणगान करने से ताकत नहीं कमज़ोरी बेबसी का पता चलता है। 
 
नाम बड़े और दर्शन छोटे जैसा हाल है। बाप कहलाने से क्या फायदा जब बाप को ठोकर पर रखता है वही जो जानता है बाप का बाप होना उसी की बदौलत है। हमारे इक चाचा जी कहते थे किसी मां ने अपने बेटे को कहा मैंने तुझे जन्म दिया पाला पोसा खिलाया पिलाया तुझे मेरा उपकार समझना चाहिए। बेटा बोला मां जब तुम जन्म दे रही थी तब दो पल भी मैं तेरी कोख से बाहर नहीं निकलता तो तेरी जान पर बन आती , मेरा एहसान है जो आराम से आसानी से जन्म लेकर तेरी जान बचाई थी। कम से कम देश की राजनीति में यही विचारधारा दिखाई देने लगी है सत्ता पाकर जिन्होंने कुर्सी पर बिठाया उन्हीं को औकात बताने लगते हैं। अच्छा है बूढ़े बाप की तरह सरपंच जी खामोश रहते जो करने का हौसला नहीं उसकी बात की धमकी देकर खुद को बेनकाब नहीं करते। जिनके घर शीशे के होते हैं वो औरों पर पत्थर नहीं फैंका करते। महाभारत में दोषी कितने लोग थे जिन्होंने अपनी निष्ठा देश के लिए नहीं सत्ता और सिंघासन के लिए बंधक रख छोड़ी थी। चलो कुछ समझते हैं इक ग़ज़ल को पढ़ते हैं।
 
 

बहती इंसाफ की हर ओर यहां गंगा है ( ग़ज़ल ) 

                               डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बहती इंसाफ की हर ओर यहां गंगा है
जो नहाये न कभी इसमें वही चंगा है।

वह अगर लाठियां बरसायें तो कानून है ये
हाथ अगर उसका छुएं आप तो वो दंगा है।

महकमा आप कोई जा के  कभी तो देखें
जो भी है शख्स उस हम्माम में वो नंगा है।

ये स्याही के हैं धब्बे जो लगे उस पर
दामन इंसाफ का या खून से यूँ रंगा है।

आईना उनको दिखाना तो है उनकी तौहीन
और सच बोलें तो हो जाता वहां पंगा है।

उसमें आईन नहीं फिर भी सुरक्षित शायद
उस इमारत पे हमारा है वो जो झंडा है।

उसको सच बोलने की कोई सज़ा हो तजवीज़
"लोक" राजा को वो कहता है निपट नंगा है।  
 
 कवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता है :-
 

                  समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध 

                  जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध


Sunday, 10 January 2021

हम क्या हैं क्या से क्या बन गए ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

     हम क्या हैं क्या से क्या बन गए ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

इक कल था जो बीत गया इक कल है जो आना है , मगर जो आज है वही तय करेगा हमने खोना है या पाना है भविष्य खुद अपना और देश ही नहीं दुनिया का अच्छा या बुरा हम सभी ने बनाना है। शिक्षा की बात होती बहुत है मगर वास्तव में हमको पढ़ना समझना छोड़ दिया है शिक्षा सिर्फ किताबी जानकारी तक सिमित है और मकसद उस से आजीविका पाना रह गया है। चिंतन मनन और विचारशीलता या तर्कसंगत ढंग से आंकलन की बात नहीं रही है। सच से घबराते हैं झूठ को गले लगाते हैं अपनी सुविधा को देख कर बात कहते हैं मुकर भी जाते हैं। खुद को जानकर और हौंसलों वाले बतलाते हैं मगर कायर हैं ज़रा सा कठिनाई का दौर हो डर जाते हैं शोर मचाते हैं। ज़िंदगी के तूफानों से कभी नहीं टकराते हैं झूठी कहानियां बनाते हैं किसको सुनाते हैं हम सूखे पत्ते हैं ज़रा हवा चलती है बिखर जाते हैं। धर्म क्या है ईमान क्या है हमने जाना ही नहीं धर्म और ईश्वर पहने हुए मुखौटे हैं जिनके पीछे असली चेहरे छिपाते हैं पाप अधर्म की कमाई खाते हैं मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे जाते हैं सबक पढ़ते हैं भूलते नहीं भुलाते हैं। खुद अपने आप को धोखा देते हैं अच्छे बनते नहीं बस कहलाते हैं। हम सच के तराने गाते हैं सच कहते हैं बार बार दोहराते हैं झूठी कसमें खुदा ईश्वर गीता कुरान की खाते हुए नहीं घबराते हैं। आज़ाद होने की बातों का मतलब क्या है जाने किस किस के गुलाम हो जाते हैं इंसान भी नहीं जो लोग उनको भगवान बताते हैं। 

टीवी पर किसी बहस किसी शो में जिन बातों को अच्छा बताया जाता है मनोरंजन के नाम पर क्या क्या दिखाया जाता है। बेहूदा बातों घटिया चुटकलों से हंसाया जाता है जैसे भी हो पैसा कमाया जाता है दर्शक को ऐसे भटकाया जाता है जो किसी मंज़िल को नहीं जाता वही रास्ता दिखाया जाता है। बिग्ग बॉस करोड़पति जैसे खेल को लाजवाब जो बताते हैं कैसे नायक समझे जाते हैं पैसे की खातिर बेचते हैं जाने क्या क्या शोहरत की बुलंदी पर खड़े बड़े कहलाते छोटे नज़र आते हैं। देश समाज को देते नहीं कुछ भी नाम का फायदा उठाते हैं। उनका अभिनय शानदार दिखाई देता है किरदार फिल्मों में जो निभाते हैं असली ज़िंदगी में कौन क्या जाने आंख मिलाते हैं सच्चाई से या नज़रें चुराते हैं। देशभक्ति वाले गीत सभी लोग गाते हैं जो तिरंगा ऊंचा फहराते हैं देश सेवा की कसम भी खाते हैं लोग जो उनको चुनते हैं सरकार बनाते हैं उनके दुःख दर्द समझ भी आते हैं। जहां करोड़ों लोग भूखे नंगे बेघर हैं सत्ता वाले मौज मनाते हैं। अपनी महिमा के गीत गाते हैं रोज़ इश्तिहार भी छपवाते हैं। कौन उनको खरा सच कहता है देशसेवा नहीं अय्याशी है सफ़ेद हाथी की तरह बोझ बनकर क्या मसीहा होने का दावा गुनाह होता है। वास्तव में ये खुद को बड़ा महान समझने वाले अंतर्मन से खोखले होते हैं उनका मकसद सभी को खुद से छोटा साबित कर अपने भीतर के झूठे अहम को संतुष्ट करना है। ऐसी ख़ुशी जो किसी को परेशान कर हासिल होती है स्कूल कॉलेज के बच्चों की मानसिक बिमारी होती है जिसको माता पिता शिक्षक अनदेखा कर वहशी समाज का निर्माण करते हैं। अपने दल के नेता की मनमानी या सत्ता का गलत उपयोग देख कर खामोश रहने वाले देश समाज के दुश्मन ही होते हैं। 
 
ख़ुशी की तलाश करते करते ग़म को साथी बना रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य संस्थाएं हमारे देश को नाखुश लोगों की कतार में देखते हैं। क्योंकि हमने वास्तविक ख़ुशी को छोड़कर बाहरी भौतिक चीज़ों को हासिल करने की चूहा दौड़ को अपना लिया है। मानसिक तनाव हीन भावना और बाकी लोगों से तेज़ बढ़ना चाहते हैं दोस्तों और अच्छे लोगों से अधिक अकेले सोशल मीडिया पर मनचाही बात लिखते कहते हैं वास्तविकता से विपरीत। ये पागलपन है जो बन नहीं पाते होने का दम भरते हैं। रचनात्मकता और सार्थक समाज हितकारी कार्य हमारी पहल नहीं है। कभी कभी सोचते हैं हमने आधुनिकता की चाहत में अपना बहुत कुछ जो बेहद महत्वपूर्ण और मूलयवान था खोया है। ख़ुशी बेचकर दर्द खरीदने का कारोबार किया है। समझना होगा हम क्या हैं क्या से क्या बन गए।

Saturday, 9 January 2021

बेहयाई हुनर हो गई है ( भली लगे या लगे बुरी ) डॉ लोक सेतिया

  बेहयाई हुनर हो गई है ( भली लगे या लगे बुरी ) डॉ लोक सेतिया 

 अब सभी को खबर हो गई है , बेहयाई हुनर हो गई है। ये है तो मेरी ग़ज़ल का मतला अर्थात पहला शेर जो कहा था जाने किन हालात पर मगर आज व्यंग्य रचना का शीर्षक बन गया है जैसे कुछ साल पहले जो काम घोटाले करना मानते थे आजकल कितने भले भले नामों से शान पूर्वक आदर से गर्व से संबोधित करते हैं। जैसे कुछ शब्दों के अर्थ अलग अलग समझाए जाते हैं कभी किसी शब्द की परिभाषा तक बदल देते हैं अब सत्ता ने सब बदलना चाहा तो शब्दकोश को ही बदल डाला है कुछ नहीं बदला तो उनका इरादा। चाल चलन चेहरा सभी बदले हुए हैं लोकलाज को छोड़ बाज़ार लगाए हुए हैं ये सभी लोग दोषमुक्त हैं सत्ता की गंगा नहाये हुए हैं।

  अधिक विस्तार में नहीं जाकर फिर से बताना है 2002 में लिखा लेख कादम्बिनी  के फरवरी अंक में छपा था , आज तक का सबसे बड़ा घोटाला। सरकारी विज्ञापन की ही बात थी और आंकड़े देकर बताया था कि पिछले पचास साल से तब तक जितना धन इस तरह से खर्च नहीं बर्बाद कहने से भी आगे बढ़कर कह सकते हैं टीवी अख़बार वालों को खुश करने अपने प्रभाव में रखने को सभी घोटालों की धनराशि से अधिक कुछ मुट्ठी भर लोगों को फायदा पहुंचाने को किया जाता रहा सभी सत्ताधारी लोगों द्वारा। मुझे याद है जो आज सत्ता पर काबिज़ हैं तब उनको मेरी बात सौ फीसदी सही लगी थी , मगर शायद उन्हीं की सरकार ने पिछली सभी सरकारों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। पहले बात अपने आलोचना से बचना भर था जो आज उस से बहुत खतरनाक बढ़ कर चुनावी जीत का साधन बना लिया गया है। आज सत्ताधारी दल के नेता मानते ही नहीं दावा करते हैं कि चुनाव सोशल मीडिया के दम पर उसका सहारा लेकर लड़ना है और जीतना है। आपको इस का अर्थ समझना होगा। बीस साल में राजनीति बदलते बदलते बदकार हो गई है उनकी जीत जनता की हार हो गई है काठ की हांडी बार बार चढ़ती है चमत्कार होते होते झूठ वाला इश्तिहार हो गई है। सरकार आदत से लाचार हो गई है नीयत खराब है बदन भला चंगा है बाहर से भीतर से मगर खोखला है जिस्म खूबसूरत सजा है सोच बीमार हो गई है। फूलों ( मूर्ख अंधभक्तों ) को क्या खबर है दुल्हन की डोली जिसे समझ रहे हैं किसी बदनसीब की लाश है ज़िंदा है फिर भी अर्थी तैयार हो गई है। 

   रैना बीती जाये शाम न आये , निंदिया न आये। गीत गा रही है नायिका जिसको हमदर्दी जतला कर कोठे पर लाया है कोई भलाई की आड़ में कमाई करने वाला। तभी शराबी नायक घर से परेशान भटकता सुरीली आवाज़ सुनकर कोठे की सीढ़ियां चढ़ ऊपर चला आता है। छलिया धोखेबाज़ खुश होकर स्वागत करता हुए कहता है अरे आनंद बाबू आप और इस मंदिर में। कहानी बदली हुई है बिकना बेबस जनता को है बाज़ार सत्ता का है खरीदार बड़े बड़े धनवान लोग हैं। मुजरा राजनीति की वैश्या कर रही है। सरकार ने अपना सभी कुछ जुए की चौसर बिछा दांव पर लगा दिया है। खुद सरकार ने बुलाया है अपने बंधुओं को शकुनि की चालों के साथ जीतने को। ये अंधे राजा की सभा है जिस में कितने अंधे सभी को रास्ता दिखला रहे हैं। जुआ खेलने के फायदे बता रहे हैं टीवी पर शहंशाह करोड़पति बना रहे हैं। जिधर जाना मना है उधर ले जा रहे हैं क़ातिल को चाटुकार मसीहा बता रहे हैं। 

ये चारागर समझदार है सौदागर भी है मतलब निकलते पत्नी बदल ली मगर गुड़ गोबर हो गया। आधुनिक नई पत्नी का बनाया गुड़ बाज़ार में बिकता नहीं मगर अब पछताए क्या होय जब चिड़िया चुग गई खेत। जो बीमार थे उनका ईलाज नहीं किया और जो भले चंगे थे उनको भूखा रखकर मरने की हालत तक पहुंचा कर कहते हैं उनकी भलाई कोठे का धंधा करने वाले हमदर्द चालबाज़ धोखेबाज़ के हवाले करने में है। ज़हर पिलाता तो क़ातिल कहलाता इसलिए उसने दवाएं नहीं देकर उनपर उपकार किया है। दस्तक फिल्म की कहानी साथ जुड़ती है भोले भाले पति पत्नी बदनाम बाज़ार में घर किराये पर ले लेते हैं। रोज़ कोई खरीदार दस्तक देता है कोठा समझ कर। क्या खूबसूरत ग़ज़ल है मजरूह जी की लिखी हुई। हम हैं मता ए  कूचा ओ बाज़ार की तरह , उठती है हर निगाह खरीदार की तरह। मजरूह लिख रहे हैं वो अहल ए वफ़ा का नाम , हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह। अच्छे दिन दिखाने की बात थी और जनाब ने जिस्मफ़रोशी का बाज़ार खोल दिया है। पुरानी फिल्मों को दोबारा बनाने लगे हैं जहांपनाह समझाने लगे हैं खेतों को कोठे बनाने लगे हैं बिगड़े रईसों को जन्नत दिखाने लगे हैं। तरीके नये आज़माने लगे हैं हर किसी के होश अब ठिकाने लगे हैं। घर घर खरीदार बुलाने लगे हैं जो बिकते नहीं उनको मनाने लगे हैं अनुबंध की बात सिखाने लगे हैं गुलामी को बरकत बताने लगे हैं। रईस उनको इतना भाने लगे हैं कि दुनिया उन्हीं पर लुटाने लगे हैं। ज़मीर बेचकर बहुत कुछ पाने लगे हैं चाल चलकर क्या नहीं हथियाने लगे हैं।  
 


 

Friday, 8 January 2021

अब नहीं तो कब समझोगे ( सियासत की हक़ीक़त ) डॉ लोक सेतिया

 अब नहीं तो कब समझोगे ( सियासत की हक़ीक़त ) डॉ लोक सेतिया 

अमेरिका में जो हुआ उसको खराब बताना ही काफ़ी नहीं है सीख सको तो इक सबक वहीं से सीखा जा सकता है। जो लोग देश से पहले किसी नेता व्यक्ति अथवा नायक के लिए वफ़ादारी रखते हैं कभी भी देश की व्यवस्था को चौपट कर उसकी प्रतिष्ठा को शर्मसार कर सकते हैं। खुद को विश्व का सबसे पुराना लोकतंत्र बताने वाला देश को कलंकित करता है खुद ही जब न केवल जनमत को स्वीकार नहीं करते सत्ताधारी शासक बल्कि देश के सबसे बड़े पद पर खड़ा नायक ख़लनायक बनकर खुद ही अराजकता की बात करता है। सोचो जिसको कितने लोगों ने सर पर बिठाया उसकी वास्तविकता क्या सामने आई है कुर्सी छोड़ना जिसको जान जाती है लगता है ऐसे लोग देश समाज की भलाई कभी नहीं समझते हैं। हमारे देश में भी ऐसा ख़तरनाक वातावरण है बहुत लोग किसी नेता को देश से पहले समझने का अक्षम्य अपराध करते हैं। हम अंधे नहीं हैं हमने भी ये सब चुपचाप देखा है देश संविधान संस्थाओं संसद से सर्वोच्च न्यायलय तक को तहस नहस बर्बाद कर सब कुछ किसी एक नेता का हथियाना और हम मूर्ख बनकर नारे लगाते रहे किसी नाम की जय जयकार करते हुए। कितनी हास्यसपद बात है अमेरिका में जो गलत समझ आता है खुद अपने देश में समझना नहीं चाहते हैं। चलो अमेरिका अन्य देशों को छोड़ खुद अपने देश की बात करते हैं। तिरंगा फहराने और सारे जहां से अच्छा गाने से कोई फायदा नहीं अगर हिन्दुस्तान को वास्तव में दुनिया से बेहतर और अच्छा बनाना ज़रूरी नहीं लगता है। 

सरकार किसी नेता किसी राजनैतिक विचारधारा वाली रही हो जो बात नहीं बदलती कभी वो उनका तौर तरीका और शासन का ढंग। सत्ता के पास हमेशा दोहरे मापदंड रहते हैं कभी किसी ने खुद नियमों का पालन किया नहीं है। जब भी चाहा नियम कानून खुद ही बदलते रहते हैं कोई उनको रोक नहीं सकता है। आप देश के नागरिक अपने घर मकान दुकान को अपनी ज़रूरत को देख कर बदलाव करना चाहें तो उनका डंडा उनके नियम जुर्माना लगाने से आपको अपराधी घोषित करने का काम किया जा सकता है। जबकि खुद सरकारों ने कभी भी अपने ही बनाये नियमों कानून का पालन नहीं किया है। और ये अंधेरनगरी चौपट राजा की मिसाल आपको हर जगह अपने गांव नगर शहर में साफ दिखाई देती है। ये सबसे बड़ी लूट है जब जिनको फायदा पहुंचना किसी ज़मीन का उपयोग बदल कर आवासीय से वाणिज्यक या उद्योग से लेकर धर्मस्थल धर्मशाला की आड़ में बाज़ार बनते जाते हैं जबकि ये नियम है कोई धर्मशाला या स्कूल या अस्पताल के नाम पर सरकारी ज़मीन लेता है तब उसका व्यवसायिक उपयोग या मनमानी लूट नहीं कर सकता है। हमने कभी सोचा जाना ही नहीं कि किसी विभाग को भी अपनी दफ़्तर की जगह बदलाव करने का कोई अधिकार नहीं है उसको निर्माण करने वाले विभाग की अनुमति से कुछ बदलाव  करने का नियम भी है। 
 
शायद सरकारी फाइलों और बंद दरवाज़ों के पीछे सत्ता की मनमानी का खेल हर कोई जानता है। आपने भी शायद कभी सरकारी ज़मीन पार्क निजी उपयोग के लिए आबंटित करवाना चाहा हो सस्ते दाम पर। वास्तव में देश को लूटना और बर्बाद करना है जो कोई भीड़ बनकर संस्था संघठन बनाकर लोग करते हैं। शासन करने वालों की सुविधा या ज़रूरत अथवा सुरक्षा का नाम लेकर सब नियम कायदे ताक पर रखे जाते हैं उनकी मनचाही बात करने को। जनता के सर पर तलवार लटकती रहती है खुद अपनी ज़मीन घर दुकान जब कोई ज़रूरत हो बदलाव करना संभव नहीं होता है। जो विभाग सभी पर नियम लागू करता है खुद उसी ने अपने नियम ही नहीं स्वीकृत प्लान को कितनी बार बदला है। जैसे सरकार विभाग समय के साथ बदलाव करते हैं अपनी जगह को लेकर ठीक उसी तरह आम नागरिक को उचित ढंग से बदलाव करने की छूट होनी चाहिए। लेकिन उनको इस के लिए लालफीताशाही और रिश्वतखोरी का शिकार होना पड़ता है जीने का अधिकार आसानी से नहीं मिलता है। 
 
समस्या रोज़ सरकार द्वारा नियम कानून बनाते जाना और जब मर्ज़ी बदलते रहना है। अधिकांश नियम कानून अनावश्यक और अतार्किक हैं। आपने घोषित किया और पार्क से कुछ और बन गया इतना ही नहीं सामुदायिक उपयोग की जगह सरकार नागरिक की अनुमति की ज़रूरत नहीं हथिया लेती है। ये उल्टी गंगा बहाना है जिन्होंने सरककर बनाई उन्हीं को जंज़ीरों में जकड़ना और खुद खुला सांड बनकर विचरते रहना खेत को चरना ही नहीं सांडों की लड़ाई में फसल बर्बाद होती है। उनके इक दिन किसी जगह आने जाने पर कायदे कानून की अर्थी निकलती है बड़ी शान से। यकीन मानिए इनकी असलियत की ये छोटी सी मिसाल है अन्यथा सत्ता ने किया समाज देश कानून का बहुत बुरा हाल है। कहते हैं जिसको पर्वत वास्तव में पाताल है। ये सिलसिला लंबा है कहां तक ढोल की पोल खोली जाए। लेकिन आपको बताना ज़रूरी है कि अमेरिका मेंशासक को संविधान में ये भी अधिकार है कि वो अपने किये गए तो क्या भविष्य में उसके खिलाफ दर्ज होने वाले अपराध भी खुद माफ़ कर सकता है।  सरकारों सत्ताधारी नेताओं बड़े ओहदेदारों से न्यायपालिका तक सभी अपने गुनाहों को अपराध नहीं अधिकार मानते हैं। आप धर्म वालों और टीवी अख़बार मीडिया वालों को भी धनवान पैसे वालों के साथ ऐसी सुचि में जोड़कर देश की तस्वीर समझ सकते हैं।  वास्तव में यहां कानून जनता की भलाई के लिए नहीं सत्ता की मनमानी और दहशत कायम रखने को बनाये जाते हैं। जो नियम कानून नागरिक को आसानी और सुरक्षा की नहीं भयभीत करने को बने हैं उनका कोई औचित्य नहीं है। सबसे पहले शासक को नैतिकता ईमानदारी और सभी से न्यायपूर्वक समान व्यवहार स्थपित करने वाले कायदे खुद पालन करने की ज़रूरत है। बस बहुत हुआ कदाचार आखिर हासिल हों जन जन को मौलिक जीने के अधिकार।

अब किसी को हमारी ज़रूरत नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

अब किसी को हमारी ज़रूरत नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

अब किसी को हमारी ज़रूरत नहीं 
और जीने की हमको भी चाहत नहीं। 
 
सुन रहा कौन आवाज़ अपनी मगर 
चुप रहें पर हमारी ये आदत नहीं। 
 
ढूंढते हम मुहब्बत मिलीं नफ़रतें 
हम करें क्या है सीखी अदावत नहीं। 
 
झूठ को सच बताना न आया हमें 
मुल्क़ में सच की कोई भी कीमत नहीं। 
 
राजनेता मसीहा भला कब हुए 
ये बताना तो होती बग़ावत नहीं। 
 
आप मसरूफ़ हैं हम भी मायूस हैं 
बात करने की दोनों को फुर्सत नहीं। 
 
ज़ुल्म कितने सहें लोग "तनहा" अभी 
हमको मंज़ूर उनकी सियासत नहीं।  

Wednesday, 6 January 2021

नाम शोहरत काम नहीं अंजाम नहीं ( विवेचना ) डॉ लोक सेतिया

   नाम शोहरत काम नहीं अंजाम नहीं ( विवेचना ) डॉ लोक सेतिया

सबसे पहले इस आलेख को किसी व्यक्ति के पक्ष विपक्ष से जोड़कर नहीं निरपेक्ष भावना और निष्पक्षता से विचार करें। पिता जी ने साहस पूर्वक महान आदर्श स्थापित किया उसकी बात का आदर करना अच्छा है लेकिन उसके परिवार के सदस्यों से साक्षत्कार लेना परिवारवाद को बढ़ावा देना कितना सही है। और उनका  ऐसा जतलाना जैसे दादा जी की सोच विचारधारा उनकी विरासत है और उनको लगता है जो सरकार कर रही है वो महान कार्य है और जो उसका विरोध करते हैं उनको कुछ भी समझ नहीं है ये कितना अनुचित है खासकर तब जब उन लोगों ने अपने पिता दादा की तरह देश समाज की समस्याओं पर कुछ भी किया नहीं बस उनके नाम को भुनाया है और वर्षों उनकी शोहरत का लाभ उठाया और सत्ता के पक्षकार बनकर अपने उन महान पूर्वजों की छवि को धूमिल कर रहे हैं जिन्होंने बिना किसी विरासत अच्छे कीर्तिमान स्थपित किये अपनी काबलियत से और ऐसा करना कोई उपकार नहीं बल्कि अपना कर्तव्य समझा था। यकीनन उनकी आत्मा घायल होगी जब उनके वारिस कहलाने वाले उनके किये देश समाज के भलाई के कार्य की कीमत हासिल करने की बात करते हैं। ये बेहद खेदजनक विषय है कि ऐसे ऊंचे कद वाले महान व्यक्ति के वारिस इतने बौने होते हैं। 
 
दौलत ताकत शोहरत सत्ता मिलना ही सब कुछ नहीं होता है। महत्वपूर्ण ये होता है कि ऐसा मिलने पर किस ने क्या उपयोग किया कैसे उसका सार्थक इस्तेमाल किया अथवा निरर्थक ढंग से उपयोग कर साबित किया कि कुछ पाकर भी खुद को सही हकदार नहीं बना पाए। शायद सभी कभी न कभी सोचते हैं कि अगर उनको अवसर मिले तो दुनिया समाज को बदल कर बेहतर बना सकते हैं। लेकिन वास्तव में जब किसी को कर दिखाने को अवसर मिलता है तब अपनी सोची बात को भूलकर कुछ भी अच्छा करने की जगह और ही करने लगते हैं। उद्दारहण के लिए किसी को शासन पैसा ताकत विरासत में मिली मगर जब उसने समाज में बदहाली गरीबी भूख देखी तब अपने अधिकारों का मनमाना उपयोग अपने ऐशो आराम से करने को अनुचित मानकर देश समाज को अपना जीवन समर्पित किया। ऐसे लोग शोहरत नहीं चाहते महान कहलाने की चाहत नहीं रखते केवल उनकी मानवीय संवेदना उनको कर्तव्य निभाने को सही दिशा दिखलाती है। 
 
अब इक दूसरा उद्दाहरण समझते हैं किसी को  विरासत में नहीं मिला सत्ता और शासन के अधिकार , साधनहीन लोगों ने उस पर भरोसा किया कि वो व्यवस्था को बदलेगा और ख़ास और आम गरीब और अमीर की बढ़ती खाई को मिटाएगा। क्योंकि उसने गरीबी और बदहाली को करीब रहते देखा है उसको वंचित वर्ग का दर्द महसूस होगा। लेकिन बड़े पद पर पहुंचते ही उसका ध्यान अपनी इच्छाओं और मनसूबों को हासिल करने और तमाम ऐशो आराम और सुख सुविधाओं का लुत्फ़ उठाने तथा अपना गुणगान करवाने को महत्व देता है अर्थात उसकी मानवीय संवेदना मर जाती है। तब ऐसे लोग मौज मस्ती में पागल होकर लोगों के भरोसे यकीन को ध्वस्त कर खुद को विश्वास के काबिल नहीं होने का सबूत देते हैं। हमारी बदनसीबी ये भी है कि हम हीरे और पत्थर का अंतर समझने में असफल रहते हैं। हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती है। हमने पीतल को सोना समझा ये हमारी भूल थी। पीतल पर सोने की पॉलिश करने वाले आजकल जोहरी बने बैठे हैं।  

Tuesday, 5 January 2021

गिरते हैं समुंदर में बड़े शौक से दरिया , लेकिन किसी दरिया में समुंदर नहीं गिरता - क़तील शिफ़ाई

 कितने प्यासे खारे पानी के समुंदर ( सच पूरा सच ) डॉ लोक सेतिया 

ये सभी खारे पानी वाले समंदर जैसे हैं जिनमें कितनी नदियां  मीठा जल लिए जाकर मिलती हैं खत्म हो जाती हैं फिर भी समुंदर की प्यास और खारापन मिटता नहीं कभी। सरकार और धनवान लोग जितना लेते हैं लौटाते कभी नहीं उतना , उनका आकार विस्तार दैत्य जैसा विशाल होता है आपने कथा कहनियों में राक्षस की बात सुनकर उसकी छवि मन में बनाई होगी या सिनेमा टीवी सीरियल में देखा होगा। रावण की सोने की लंका इक सपना है सत्ता वालों का उनको जनता को हरना है और अपनी कैद में रखना है। समुंदर में खज़ाना ही नहीं कितने राज़ कितनी लाशें दफ़्न रहती हैं मगरमच्छ देखभाल भरते हैं। सागर कभी सूखते नहीं फिर भी शासक ने ख़ज़ाने की तलाश में सारा पानी पीकर देखा मछलियां मरती रही मगरमच्छ ज़िंदा रहे सागर की मेहरबानी से। छुपा खज़ाना चोरों का मिला नहीं या चुपके से हज़म किया उसी ने। सरकार के पास भले कितना भी पैसा संसाधन और संगठन संसथान हों उसकी चादर पांव को ढकने को सफल कभी नहीं होती। और सरकारी क़र्ज़ चुकाना पड़ता है जनता को। जनता की अग्निपरीक्षा होती रहती है फिर भी उसको अपनी निष्ठा शासन के लिए साबित करनी होती है देश राज्य से बढ़कर सत्ताधारी शासक खुद को महान समझते हैं। देश बदहाल है अर्थव्यवस्था रसातल में पहुंचाने के बाद सत्ता का नशा कम नहीं हुआ सरकार को अपनी राजधानी को सुंदर से लाजवाब शानदार बनाना है। क़र्ज़ लेकर घी पियो कर दिखाना है। गरीबों का क्या है फुटपाथ उनका आशियाना है वहीं जीना और मर जाना है।
 
पर्वत और सागर में फर्क यही है पर्वत हाथ नहीं फैलाता कभी अपनी संपदा पानी नदिया बनकर धरती को जीवन देता है। सागर से सूरज की धूप और हवाओं से खारे पानी से बने बादल को टकराने से बारिश करवा फिर मधुर शीतल जल बना देता है। समुंदर की गहराई में मोती कुछ ख़ास लोगों के लिए आरक्षित हैं जो शासन का अंग हैं या शासक की अनुकंपा जिन पर रहती है। मगर सामान्य नागरिक को समुंदर से फ़ासला रखकर नज़ारा देखने की चेतावनी है क्योंकि कितने तूफ़ान सत्ता की दलगत राजनीती उठाती रहती है। समुंदर की मौजों का कोई ऐतबार नहीं सत्ताधारी नेताओं की नीयत की तरह कब बदल जाती हैं। चुनाव में किनारे खड़े व्यक्ति के कदम चूमने के बाद सत्ता की तेज़  हवाओं से मिलकर डुबो भी देती हैं। 
 
सरकार ने समुंदर से सब हासिल कर लिया है। बंदरबांट का वक़्त है हीरे मोती खाने का सब सत्ता और सत्ता के दलालों को मिलेगा और जनता को कंकर पत्थर सीपियां लेकर खुश रहना होगा। कोई नहीं समझता कि समुंदर की हक़ीक़त क्या है कितनी नदियों ने बड़े शौक से अपना अस्तित्व मिटाकर समुंदर को विशाल बनाया था मगर कभी नदिया में कभी समुंदर नहीं गिरता है। बड़े लोगों को लेना आता है देना जानते नहीं लौटाते हैं कभी तो तबाही लाने को तेज़ तूफ़ान की तरह। ये अनोखी रात है अंधेरी तूफानी रात में सत्ता के जंगल की डरावनी आवाज़ में सुनसान हवेली में लोग इकट्ठे होते हैं और किसी अबला का सौदा उसके बेबस पिता को मज़बूर कर धनवान अपनी दुल्हन बना लेता है। कितनी कहानियां इक रात के अंधेरे में बंद हवेली में शुरू होती हैं खत्म हो जाती हैं। शायद जिस सुबह का इंतज़ार है हम सभी को वो अभी बहुत दूर है ये दिन तो अंधकार भरी भयानक काली रात जैसा है। आपत्काल तो नहीं लौट आया , श्मशान की ख़ामोशी कहती है , है लाश वही सिर्फ कफ़न बदला है।   
 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Monday, 4 January 2021

मुफ़्त किया बदनाम ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     मुफ़्त किया बदनाम ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

हम कोई आतंकवादी सड़कछाप गुंडे हैं जो जुर्म करने की योजना बनाते पुलिस पकड़ने का काम करे। धंधा करने वाले लोग हैं धंधे बदलते रहते हैं जिस भी चीज़ को बेचने खरीदने में मुनाफा हो करना पड़ता है। कितनी मुश्किल से समझ आया था ये देश खेती किसानी वाला है अब अगर हमने अपनी कठपुतली सरकार से अपना गणित साधने की बात की तो क्या गुनाह किया। इतना हंगामा क्यों क्या किसी ने पहले नहीं किया ऐसा। अमिताभ बच्चन करे तो सब जायज़ सदी का तथाकथित महानायक कहलाता है उनकी धर्मपत्नी जी संसद में थाली में छेद करने की बात कहती हैं। खुद क्या नहीं किया मुंह खुलवाना चाहते हैं तो बताओ। मुलायम आवाज़ में समाजवादी और बेचारे अमर सिंह कुछ भी नहीं बोले भाई भाभी को सोचना चाहिए। लोनावला में ज़मीन कोई तभी खरीद सकता था जब किसान होने का सबूत पेश करे। तब उत्तरप्रदेश सरकार ने इक गांव की पंचायती ज़मीन जालसाज़ी से उनके नाम करवाई और बच्चन साहब ने किसान होने का सबूत पेश किया ज़मीन खरीदी थी। और किस किस ने क्या क्या नहीं किया अपनी दौलत शोहरत का फायदा उठाकर जुर्म किया लज़्ज़त लेकर। 
 
हमारा गुनाह जुर्म बेलज़्ज़त है खाया पिया कुछ नहीं योजना बनाई तैयारी कर रहे थे पकड़े गए। गब्बर सिंह जी कहते बड़ी बेइंसाफी है हम चार यार बिना हथियार लोग करने लगे वार पर वार बचाओ मेरी सरकार कहीं जीत नहीं बन जाए हार। कानून को समझो दिलदार पहले होने तो देते अत्याचार तब मचाते हाहाकार अदालत के फैसले का करते ज़िंदगी भर इंतज़ार। इतने साल चलता रहता अपना धंधा बढ़ता कारोबार। बड़े बेज़ार हैं ज़मींदार सरदार मिल बैठे कितने हक़दार। देश की अदालत कितनी है होशियार होने देती है कानूनी लूटमार क्यों करते हैं हम बेचारों को शर्मसार। होती रही सांसदों विधायकों की खरीदारी सत्ता की बढ़ती गई मनमानी की बिमारी मिटता रहा सब कुछ बारी बारी कौन नहीं है आजकल दरबारी। मीडिया वालों ने कितना खाया बेचा ज़मीर भाव हर बार बढ़ाया हमने मौका नहीं गंवाया क्यों हमें धरती पर ढाया ये दंगल हमको नहीं भाया। 
 
  गोपालदास नीरज का जन्म दिन है। ये हमारी बात कदापि नहीं फिर भी जाने क्यों किसी महफ़िल में उनके गीत की पंक्तियां सुन कुछ शब्द चुभे जैसे हमारी दुर्दशा पर कोई खिलखिला रहा हो। स्वप्न झरे फूल से मीत चुभे शूल से , लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बबूल से। चाह तो निकल सकी न पर उम्र निकल गई। और हम लुटे लुटे वक़्त से पिटे पिटे , और हम डरे डरे नीर नैन में भरे। ओढ़ कर कफ़न पड़े मज़ार देखते रहे। पर तभी ज़हर भरी गाज़ एक वो गिरी , और हम अंजान से दूर के मकान से , पालकी लिए हुए कहार देखते रहे। हमने अपनी महारानियों को कैसे कैसे फूलों के खिले गुलशन उपहार में देने की योजना बनाई थी बहुमंज़िला महल और हवाई जहाज़ से बहुमूल्य ज़मीन और जितनी ज़मीन उतना आसमान अधिकार पूर्वक अपने स्वामित्व में होने का इरादा था। किसी की बुरी नज़र लग गई है राज़ क्या ऐसे फ़ाश होते हैं। शबनमी आंखों की नमी कौन समझेगा।  
 
     मगरमच्छ क्या करें उनके आंसू भी कोई समझता नहीं है सरकार की संवेदना की तरह झूठे लगते हैं। उनकी भूख़ खत्म नहीं होती तो इस में उनका क्या कसूर है उपरवाले की मर्ज़ी है अमीरों की तिजोरी सरकारी खज़ाने की तरह भरती नहीं कभी भी। अमीर होना कौन नहीं चाहता है गरीब लोग अमीरों से जलते हैं खुद अमीर बन जाएं तो उसी राह पर चलते हैं। हम दुआ करते हैं गरीब और गरीब होते जाएं गरीब नहीं हमारे लिए और अमीर होने की दुआ करते हैं। देख कर हमको ठंडी ठंडी आह भरते हैं। दार्शनिक कहते हैं गरीब हंसते हैं अमीर रो रो कर मरते हैं गरीब होने से कितना डरते हैं।
 
आखिर में जनाब अर्श मलसियानी जी का शेर है। 

चमन में कौन है पुरसाने-हाल शबनम का 

गरीब रोई तो गुंचों को भी हंसी आई। 


 

बदनसीबी अमीर लोगों की ( तीर-ए-नज़र ) डॉ लोक सेतिया

    बदनसीबी अमीर लोगों की ( तीर-ए-नज़र ) डॉ लोक सेतिया 

बात सच्ची है कुछ साल पहले की बात है हम लेखक साहित्य की महफ़िल सजाया करते थे हर महीने। कभी किसी दानवीर या सरकारी लोगों की मदद नहीं मांगते थे खुश थे मिल जुलकर सब चलता रहता था। इक दिन इक शख़्स चला आया और खुद अपनी बढ़ाई करने लगा बताने लगा मैं बड़ा धनवान हूं और सरकारी पद से सेवानिवृत होकर अब चाहता हूं ऐसे लोगों की सहायता करना जिनको ज़रूरत है। बस वो पहली बार आया और आखिरी बार भी वही आना हुआ क्योंकि उसको हमारी बस्ती में कोई भिखारी नहीं मिला और अपना झोला लेकर वो लौट गया किसी ऐसी बस्ती की तलाश में जहां सभी भिखारी रहते हों। ये सच है उसने साहित्य की गली से निकल कर राजनीती की महानगरी में घर बना लिया था। ये लघुकथा फिर कभी आज अमीर लोगों की बदनसीबी की बात पर चर्चा करते हैं। आपने पुरानी कहानी सुनी होगी इक भिखारी किसी राजा के पास गया राजा ने कहा बताओ कितना चाहिए उसने अपना भीख मांगने वाला कटोरा जैसा सामने कर कहा बस इसको भर दो इतना ही चाहता हूं। राजा ने ख़ज़ाने से बहुत सारा धन सोना हीरे जवाहरात जो भी था डालता जाता मगर उस भिखारी का कटोरा खाली रहता भरता ही नहीं। आखिर राजा ने सवाल किया ये भीख लेने वाला कटोरा किस चीज़ का बना है। भिखारी ने बताया ये उस इंसान की खोपड़ी है जिसने सारी दुनिया पर राज किया था और आखिर उसकी खोपड़ी को सभी ने ठोकर लगा लगा कर बीच राह फैंक दिया था मैंने उसको उठाया और भिक्षा लेने का कटोरा बना लिया जो कभी भरता ही नहीं है। 
  
जिनके पास सभी कुछ हो मगर फिर भी उनको और और अधिक पाने की हवस हो धर्म बताते हैं वही सबसे गरीब होते हैं। गरीबों की गरीबी अभिशाप होती है लेकिन ऐसे रईसों की अमीरी अभिशाप से भी बढ़कर खराब होती है। दौलत बढ़ती जाती है और उनका पागलपन उस से भी अधिक होता जाता है। ऐसे तमाम लोगों का भगवान पैसा होता है पैसे की खातिर इंसानियत शराफत क्या ईमान तक छोड़ सकते हैं। आजकल राजनीति धर्म का कारोबार अमीर बनने का तरीका बन गया है खिलाड़ी अभिनेता फ़िल्मकार टीवी अख़बार वाले सभी अपना अस्तित्व मिटाने को अपने स्वाभिमान को ताक पर रखकर शाहों की चौख़ट पर माथा टेकने को उत्सुक रहते हैं। उनको मंज़िल का पता नहीं आसान रास्ते की तलाश रहती है लोग जिनको लेकर समझते हैं उनके सितारे बुलंद हैं उनकी कोई मंज़िल कोई मकसद नहीं है। खुद को बेचकर ऊंचे दाम वसूलना उनका पहला कार्य बन गया है , जो बिक जाते हैं खुशनसीब समझते हैं खुद को वास्तव में यही सबसे बड़ी बदनसीबी है। टीवी के रियल्टी शो की तरह राजनीति के बाहर जगमगाहट और भीतर घना अंधकार छाया हुआ है। आधुनिक युग के नेता अभिनेता वास्तव में बड़े विशाल ऊंचे दिखाई देते रावण के पुतले की तरह अंदर से खोखले होते हैं पल भर में सब जलकर मिट्टी राख हो जाता है। नेताओं की शानो शौकत सत्ता जाते ही दो कोड़ी की रह जाती है और उन पर निर्भर धनपशुओं और टीवी चैनल अख़बार वालों की हालत बेबस बिना  बैसाखी एक कदम नहीं चल पाने वाले अपाहिज की तरह हो जाती है पांव सलामत फिर भी चलना मुश्किल लगता है तलवे चाटने और रेंगने की आदत ने क्या से क्या बना दिया है। 
 
सरकार गरीबी से परेशान है गरीबों को भगवान पर भरोसा है उनको मंदिर वाले भगवान भरोसे छोड़ा जा सकता है लेकिन चुनाव में चंदा देने वाले धनवानों उद्योगपतियों को दो चार क्या हज़ार गुना पाकर भी शिकायत रहती है थोड़ा है ज़्यादा की ज़रूरत है। नेता अधिकारी का ईश्वर और चुनावी चंदा देने वाले राजनेताओं के भाग्य विधाता हैं। उनको देश के अन्नदाता किसान की गुलामी की चाहत है तो सरकार को इनकार करने का साहस संभव ही नहीं , जो हुक्म मेरे आका चिराग का जिन अपने मालिक की हर बात सर झुका स्वीकार करने को बाध्य है। अध्यादेश जारी किया गया है गरीबी शब्द का बदला अर्थ है दस बीस फीसदी अमीरों की दौलत की चाहत कभी खत्म नहीं होना वास्तविक गरीबी है जिसको मिटाना असंभव है नामुमकिन नहीं। और ये ऐसे राजनेता की सरकार है जिसके लिए सब कुछ मुमकिन है। देश को भूखे नंगे करोड़ों गरीबों की नहीं खूब भरपेट खाने वाले आलीशान महलों में रहने वाले गरीबों की ज़रूरत है जिनका साथ सरकार का मधुर संबंध है। कठिनाई यही है उनके पास उसी भिखारी की तरह किसी शहंशाह की खोपड़ी वाला कटोरा है जिस में सरकारी संस्थान जाने कितना कुछ डाला है सत्ताधारी दल की सरकार ने फिर भी खाली का खाली है। रहम की भीख मांगने से कोई दैत्य किसी की जान बख़्शते हैं , सरकार को करनी घुड़सवारी है। घास खेत में उगती है खेत खलियान उजड़ने की बारी है। घोड़ा घास से दोस्ती निभाएगा तो खुद भूखा मर जाएगा। मिली अमीरों को खुली छूट है।  लूट खसूट नहीं कुर्बानी है चोर थोड़े हैं समझाती सबको सरकार बनकर चोरों की नानी है।

Saturday, 2 January 2021

ज़िंदगी पर सबका एक सा हक़ हो ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  ज़िंदगी पर सबका एक सा हक़ हो ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

 

     साल नया है नया ज़माना अभी तक आया नहीं है। लोग भूल गए ऐसी कहानियों पर फिल्म बनाया करते थे फ़िल्मकार। फिल्म का उद्देश्य कहानी के शुरू होने से पहले पर्दे पर लिखा दिखाई देता था। " ज़िंदगी पर सब का एक सा हक़ है सब तस्लीम करेंगे , सारी खुशियां सारे दर्द बराबर हम तक़्सीम करेंगे। " फिर से सुनना गीत नया ज़माना आएगा , नया ज़माना आएगा। कितनी बार देखी है कल फिर से देखी तो लगा ये तब केवल कहानी रही होगी आज की हक़ीक़त यही है। ख़लनायक गरीबी मिटाने और गरीबों से प्यार करने से नशाबंदी तक पर धारदार भाषण देकर नायक बन जाता है किसी गरीब लेखक अख़बार वाले से ऊंचे आदर्श की अच्छी बातों का भाषण लिखवाकर जनता से तालियां बजवाता है। वास्तविक ज़िंदगी में उसका आचरण बिल्कुल उलट होता है। खलनायक की बहन लेखक से उसकी पांडुलिपि ले आती है उपन्यास लिखा हुआ छपवा नहीं पाया और धनवान खलनायक उस से पांडुलिपि लेता है छपवाने को मगर लेखक की रचना चुराकर अपने नाम से छपवा लेता है। धनवान भाषण देता है तथाकथित रईस लोगों की सभा में गरीबों से नफरत नहीं करने की बात कहते हुए पर इक गरीब भूखा बच्चा जब धनवान सभी को भोजन कक्ष में चलने को कहता है तब भूख मिटाने उन अमीरों के बीच चला आता है और अपमानित किया जाता है। नायक उसको बचाता है और ये सुनकर कि उसकी गरीबी भूख हमारे कारण नहीं है नायक बताता है जब कोई भूखा रहता है तब उसका कारण किसी और का उसके हिस्से का भी खा जाना ही होता है। अफ़सोस है ऐसी बातों को पहले तो हम सुनते ही नहीं सुनाई दे भी तो विचलित नहीं होते क्योंकि हम समझते ही नहीं हैं। 
 
आपको लगता है आपने नानक कबीर गांधी को जान लिया है लेकिन शायद नाम तस्वीर से जान पहचान हुई है उनकी सोच से नहीं। गांधी जी कहते थे दुनिया में सबकी ज़रूरत को तो काफी कुछ उपलब्ध है मगर किसी की लालच हवस की भूख को मिटाने को नहीं है। जो गांधी किसी को बिना कपड़े पहने देख जीवन भर इक धोती पहनता है और अंतिम व्यक्ति के आंसू पौंछने का मकसद समझता है उसकी समाधि पर वो लोग जाकर बड़ी बड़ी बातें करते हैं जो खुद अपने रहन सहन और शानो शौकत दिखावे आडंबर और अपने गुणगान पर सैर सपाटे पर धन पानी की तरह बर्बाद करते हैं जबकि समय पानी को भी व्यर्थ खर्च नहीं करने का है। नानक को समझना और भी कठिन है मगर समझना चाहो तो ज़रा सोचना आज से पांच सौ साल पहले बीस रूपये में कोई कितना सामान खरीद कर पिता के कहने पर कारोबार कर सकता था मगर उसको रास्ते पर भूखे लोग मिले और उसने सोचा उनकी भूख मिटाने से बढ़कर अच्छा कारोबार कोई नहीं हो सकता है। आप जो लंगर की सोच देखते हैं आज भी वहीं से शुरू हुई थी। धर्म कोई भी हो सच की बात इंसानियत के दुःख दर्द मिटाने और प्यार से मिलकर रहने महनत की कमाई करने की सीख देता है। धर्म स्थल उपदेश देने को नहीं बनाए गए थे और वहां संचय करना तो हर धर्म के खिलाफ है। संत महात्मा साधु सन्यासी भिक्षा मांगते थे बस दिन भर पेट भर भोजन और दो जोड़ी कपड़े पहनने को। भटके हुए अथवा कपटी लोग हैं जिनको उपदेश देने गीता रामायण पाठ करने से लाखों पाने की चाहत है उनको खुद नहीं समझ आया जो औरों को बताते हैं। 
 
आपने रहीम का भी नाम सुना है मुमकिन है उनके दोहे भी पढ़ते हों। समझा भी है उनका संदेश और ये भी कि कथनी और करनी एक समान होनी चाहिए। रहीम इक नवाब थे और कवि भी वे अपने पास आने वालों की सहायता किया करते थे। उनकी सभा में कवि गंगभाट बैठे थे उन्होंने देखा कि नवाब साहब जब किसी को कुछ राशि देते उनकी नज़रें झुकी रहती थी। गंगभाट को ये कुछ अजीब लगा और उन्होंने इक दोहा पढ़कर सवाल पूछा रहीम से। ये क्या सलीका क्या ढंग है जब कोई आपके सामने हाथ बढ़ाता है उसकी सहायता करते समय आप उसकी तरफ नज़र नहीं उठाकर देखते झुकी रहती हैं आपकी आंखें। रहीम जी ने उनके दोहे का जवाब दोहा पढ़कर ऐसे दिया था। देवनहार कोई और है जो मुझे रात दिन देता रहता है मैं तो जो उस से मिलता है आगे औरों को दे देता हूं वास्तविक देने वाला वो ईश्वर है , मगर लोग समझते हैं कि मैं दे रहा हूं। बस इसी से मेरी नज़र उठती नहीं झुकी रहती हैं। अब ज़रा इन शासकों को देखो ये कुछ भी निजी आय से नहीं जनता का दिया धन उनकी किसी तरह से कल्याण की योजना पर खर्च करते हैं और दावा करते हैं इश्तिहार छपवाते हैं अपना नाम जोड़ते हैं अहंकार रखते हैं कि हमने किया है। सच तो ये है उन्होंने देश को देशवासियों को कुछ भी नहीं दिया बल्कि देश के खज़ाने से खुद अपने पर धन बर्बाद किया है। काश ये सादगी से निस्वार्थ ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाते तो आज़ादी के 73 साल बाद भूख और बुनियादी सुविधाओं की कमी नहीं रहती। ये लोग सफेद हाथी की तरह हैं जो खुद बोझ हैं इनसे कोई भलाई नहीं हो सकती साफ शब्दों में इनको देश की समस्याओं भूख गरीबी शिक्षा स्वास्थ्य सेवाओं को सुलझाना नहीं है उसका उपयोग करना है सत्ता हासिल करने को और अपने लोगों और उच्च वर्ग की महत्वांकांक्षाओं को पूरा करने को। 
 
आपने अर्थव्यवस्था का शोर सुना तो ज़रूर है क्या समझा भी है। कुछ के पास अधिक तभी होता है जब बाकी अधिकांश को उनका उचित हिस्सा अधिकार मिलता नहीं उन्हीं से। ऐसे लोग अमीर हैं अपनी महनत से नहीं तमाम औरों को उनकी महनत का मूल्य नहीं देकर। अमृतय सेन को विदेश जाकर नोबल पुरूस्कार मिलता है मगर उनका सम्मान करते हैं सत्ताधारी संसद में लेकिन उनकी सुझाई अर्थव्यवस्था को नहीं अपनाते और विश्व बैंक आईएमएफ जैसी संस्थाओं की जनहित विरोधी नीतियों को अपनाकर बदहाली और बेबसी की हालत में पहुंच कर आत्मनिर्भरता की बात कहते हैं छलते हैं विदेशी शासकों की तरह कुछ निजी कंपनियों के बुने जाल को बढ़ावा देकर।  
 
सिर्फ कहने को गर्व की बात नहीं है हमारी भारतीय संस्कृति और विचारधारा जिस में सभी के कल्याण की बात है और नीतिकथाओं और उच्च नैतिक मूल्यों की बात है उस में समझाया गया है कि शासक और सामान्य नागरिक की आमदनी का फर्क सीमा से अधिक नहीं होना चाहिए और जब सामान्य नागरिक को जितना मिलता है बड़े से बड़े पद पर नियुक्त व्यक्ति को उस से हज़ार गुना से अधिक पाना राज्य की व्यवस्था पर अभिशाप है कलंक है शासक पर। बात शुरू की थी फिल्म नया ज़माना का खलनायक अपने पुस्तकालय में सभी महान विचारकों की लेखकों की किताबें जमा की होती हैं पढ़ने को नहीं आडंबर करने को और किसी से लिखवाकर शानदार भाषण देता है समझता ही नहीं उनका पालन करना तो चाहता भी नहीं।  

Friday, 1 January 2021

आपके बादशाह का महल ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया

     आपके बादशाह का महल ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया 

सरकार को बेपनाह मुहब्बत हो गई है उसने किसी एक गांव नगर में नहीं देश भर में अपने ख़्वाबों का इक महल बनवाया है। महल की ऊंची ऊंची दीवारें हैं अनारकली को जिस में रहना है और बादशाह के दरबार में उनके लिए नाचना है उनके ख़ास दरबारी दोस्तों का भी दिल बहलाना है। आशिक़ हैं अपनी महबूबा को समझा रहे हैं मान जाओ तुम्हारी ख़ुशी इसी में है। ये कानून की बेड़ियां तुम्हारे लिए गहने हैं सजने संवरने को और बंदीघर की दीवारों और अंधेरे कमरों की खिड़कियों की सलाखों को अपना नसीब समझ कर इनसे दिल लगाना है। अब तुझे नहीं कुछ बेचने को किसी मंडी में जाना है खरीदार को खुद आकर तुझसे सौदागर की तरह अच्छा भाव लगाना है। जिस के हाथ बिक जाओ उसको खुदा समझना मनाना है जो वादा किया वो निभाना है। ख़ुदकुशी नहीं करनी है घुट घुट कर जीना मर जाना है। ये सच्चा प्यार है भले हमारा कारोबार है हमारा जिनसे पुराना दोस्ताना है उन्हें देवार जी बुलाना है भाभी का रिश्ता सुहाना है खुलकर हंसना हंसाना है। दर्द में मुस्कुराना है नहीं चलता कोई बहाना है हमको सब खाना तुझको खिलाना है बचा हुआ खाकर शुक्र मनाना है। 
 
कांटेदार तारों से घिरा हर गरीब मज़दूर का ठिकाना है फुटपाथ जैसा खुले आसमान में खेत खलियान में जो आशियाना है। दूर दूर तलक नवाबज़ादों का दौलतखाना है जिनका हर पल मौसम आशिक़ाना हैं। नवाबी शान जश्न हर दिन मनाना है झूमना नाचना मस्ती का माहौल बनाकर दिखाना है कौन जाने कब तक दुनिया में आबो-दाना है। चार दिन की है ज़िंदगी फिर कहां कोई ठिकाना है दो गज़ ज़मीन भी कुए यार में मिले न मिले ज़फ़र ये किसने जाना है। आपको बादशाह का महल दिखाते हैं पहले दस्तावेज़ अपने होने का बनवाते हैं दरबान को कुछ समझते कुछ समझाते हैं हाथ जोड़ नाम कोई लेते हैं किवाड़ खुलवाते हैं। किले की कितनी ऊंची मज़बूत दीवारें हैं और हर मोड़ पर बनी मीनारें हैं। फिर इक खौलता पानी का दरिया है बस गुज़रने का छोटा सा पुल ही ज़रिया है। ये लगती भूल भुलैया है चक्की पीसती पत्थर की मूरत सबकी धरती मईया है। 
 
    तीन फेरों का अजब बंधन बनाना है खुद क़ातिल को मसीहा बताना है। जाल सय्याद का बुलाता है पंछियों को दाना डालकर फंसाता है। पिंजरे में क्या परिंदा चहचहाता है पर कट गए तब पछताता है कौन मुफ़्त में कुछ खिलाता है। कितने अलग अलग नाम के दुकानदार हैं बाज़ार अपना सजाये बैठे हैं। चेहरा कोई समझ नहीं आता है सभी मुखौटा लगाए बैठे हैं डरता है हर कोई ये नज़ारा है कमान पर तीर चढ़ाये बैठे हैं हम शिकार होने आये हैं वो निशाना लगाए बैठे हैं। कह रहे हैं देर से आप आये कब से पलकें बिछाये बैठे हैं। तीर हाज़िर है तलवार भी है ज़हर पीना नहीं इकरार भी है ज़ख्म खाकर उफ़ नहीं करते इतनी जल्दी कभी नहीं मरते। बादशाह मरहम लगाते हैं पर ज़ख्म को नासूर बनाने के बाद कुछ घाव भरा नहीं करते सभी ऐसे मरा नहीं करते। उनको हर जगह बनाना है कब्रिस्तान उनका होगा वही निशान। ताजमहल चीज़ क्या है बादशाह दिखलाएगा है उसका अपना जहान।