Thursday, 3 December 2020

राज़ की बातें छुपा कर रखना ( महिलाएं मत पढ़ना ) डॉ लोक सेतिया

 राज़ की बातें छुपा कर रखना ( महिलाएं मत पढ़ना ) डॉ लोक सेतिया

महिलाओं को मना किया है क्योंकि कहते हैं उनको बताई बात राज़ नहीं रहती है। पहली राज़ की बात उन्हीं को लेकर है जो सौ फीसदी सच है कि उनके दिल में खुद अपने न जाने कितने राज़ दबे रहते हैं जिनकी भनक भी नहीं लगती उनके सबसे करीब वालों तक को। अनजान बनकर मासूमियत से पूछती हैं कभी उस की कहीं चर्चा हो तब सच्ची क्या ऐसा भी होता है। उनकी यही मासूमियत उनका भोलापन उनकी सबसे अचूक तीर है जिस से घायल होने वाला उनकी अदा पर मर मिटता है। महिला बहुत कुछ खुद अपने आप से भी छुपा कर रखती है ये कमाल उसी का है भगवान भी सामने खड़ी महिला की बात पर यकीन करते हैं अपने बही खाते में दर्ज बात को समझते हैं भूल से लिखा गया होगा। भला बेचारी अबला नारी कैसे किसी को घायल कर सकती है कोई शीशा ए दिल टूटा है तो उसने जानकर ऐसा नहीं किया होगा अचानक घबरा गई होगी किसी आहट को सुनकर और डर गई होगी ज़माना क्या कहेगा तब उसके नाज़ुक हाथ से कोई शीशे का खिलौने जैसा दिल ए नादान फिसल कर गिरा और चकनाचूर हुआ होगा। 
 
पुरुष  बुरे भी होते हैं तो अच्छे भी फिर भी बदनाम हैं कि पुरुष कभी कहीं टिककर रहते ही नहीं एक से अलग हुए तो और ढूंढ लेते हैं। औरत को लेकर धारणा है कि बिना कारण तोहमत लगाई जाती है उसको बुरा कहना सबसे बुरी बात है महिलाओं को महान बताने का काम पुरुष ही किया करते हैं आपने कितने पुरुष लेखकों की रचनाएं औरत की महानता को ब्यान करती पढ़ी हैं कभी किसी महिला ने पुरुष की बढ़ाई करने को कुछ लिखा है पढ़ा है तो बताना। मन चंचल होता है सभी का मगर पुरुष की मन की बात महिला नज़र मिलाते समझ लेती है लेकिन महिला के मन में क्या है पुरुष लाख कोशिश कर भी जान नहीं सकता है। पुरुष जागते हुए भी सोता रहता है जिस समय साथ कोई महिला सोते होने के बावजूद भी नींद और ख़्वाब का आनंद लेती हुई भी पूरी तरह से होशो हवास खोती नहीं है। 
 
बहुत और बातें हैं आम औरत पुरुष को लेकर मगर पहले आपको इक लेखक कवि और इक लेखिका कहानीकार की वास्तविकता को बतलाते हैं। साहिर लुधियानवी अमृता प्रीतम दोनों से कौन परिचित नहीं है। महिला ने अपनी चाहत को छुपाया नहीं कभी सुखी विवाहित जीवन होने के बावजूद दिल आया पिता के साथ काम करने वाले शायर पर उसकी नज़्म पढ़कर दिलो जान से फ़िदा हो गई लेकिन उन दोनों में कभी बात नहीं हुई थी और शायद सालों तक पुरुष अनजान था किसी की अफ़लातूनी प्यार की भावना से। नज़्म का नाम है ताजमहल मगर शायर ने कभी आगरा के ताजमहल को देखा नहीं था मगर जो उन्होंने कहा अपनी नज़्म में ताजमहल को किसी ने उस निगाह से ताज को देखा नहीं होगा पहले शायद। अपनी महबूबा से कहता है शायर मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से। ताज तुम्हारे लिए मुहब्बत का प्रतीक है बेशक लेकिन तुमने उन राहों पर शहंशाह के आतंक के निशानों को तो देखा होता , भला शहंशाह के दरबार में गरीबों की चाहत कभी जगह हासिल कर सकती है। ऐसे शाहों के मक़्बरों को छोड़कर अपने अंधेरे मकानों को तो देखा होता कितने गरीब लोगों ने मुहब्बत की है उनके जज़्बात शहंशाह से कम हर्गिज़ नहीं थे। मगर उनके पास अपनी मुहब्बत को मशहूर करने को साधन नहीं थे इश्तिहार नहीं बनाया अपनी मुहब्बत की कहानी को। कुछ दोस्तों ने सालों बाद साहिर से कहा उनको अमृता की चाहत पर कुछ तो कहना चाहिए तब उन्होंने कभी कभी नज़्म लिखी जो अपने फिल्म में जैसी देखी सुनी समझी उस से बिल्कुल अलग है। उस में शायर कहता है कभी कभी सोचता हूं कि मैं तेरी हसीन ज़ुल्फ़ों की छांव में खुश होकर जी भी सकता था। अपनी ज़िंदगी के अंधेरे तेरी आंखों की चमक से रौशन भी कर सकता था। मुमकिन था मैं ज़माने भर के दुःख दर्द परेशानियां जब मुझे पुकारती तब मैं तुम्हारे लबों से मिठास के घूंट पी लेता और ज़िंदगी नंगे सर चीखती फिरती और मैं तेरी ज़ुल्फ़ों के साये में जी लेता। लेकिन मुझसे ये नहीं हुआ और मैंने दुनिया भर के दुःख दर्द रंजिशों चिंताओं को गले से लगाया है और ऐसी दिशा को बढ़ रहा हूं जिस पर ये डरावने मंज़र मेरी तरफ साये की तरह आते जाते हैं। अब न तो कोई मंज़िल की तरफ जाने का रास्ता है न कोई रौशनी है बस इक ख़ालीपन में भटकना है और खो जाना है इन्हीं में कभी। मुझे ये मालूम है मगर फिर भी कभी कभी मेरे दिल में ये ख़्याल आता है। किसी ने किसी खूबसूरत हसीना की मुहब्बत से बढ़कर ज़माने समाज के दुःख दर्द को अपनाया ही नहीं औरत को उनसे बेहतर किसी ने शायद ही समझा। नज़्म औरत ने जन्म दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया। और अमृता को फिर भी कोई इमरोज़ मिल ही गया।  
 
चलो विषय पर लौटते हैं। विवाह का बंधन दो अनजाने लोगों को जोड़ता है एक साथ रहने को पति-पत्नी बनकर। बहुत कुछ बदल गया है आधुनिक युग में फिर भी कुछ चीज़ें हैं जो महिलाएं या पुरुष बदलने को तैयार नहीं हैं अपनी मर्ज़ी का बदलाव चाहते हैं दूसरे की मर्ज़ी का बदलाव मंज़ूर नहीं करते हैं। नये ढंग से खुलकर जीना पसंद है बराबरी का अधिकार भी चाहिए लेकिन जब बात कर्तव्य और ज़िम्मेदारी की हो तब पत्नी चाहती है पति को सब उपलब्ध करवाने की बात पूरी करनी चाहिए तो कुछ पति भी कामकाजी महिला से नौकरी से कारोबार से कमाई करने के साथ घर बच्चों की देखभाल की उम्मीद रखते हैं। वास्तविक साथ देने का अर्थ सुख दुःख परेशानी समस्या और ज़रूरतों में संग संग निभाना आसान कठिन दोनों राहों पर की भावना होनी चाहिए न कि विवशता को दूसरे पर एहसान समझ कर। महिलाओं को अपनी जमापूंजी निजि लगती है जिसे पति को नहीं बताना उनकी सोच से उचित है लेकिन जब कोई पति अपनी कमाई से कुछ भी पत्नी को बिना बताये खर्च करता है तब मापदंड बदल जाते हैं पत्नी को अधिकार है अपने पति की आमदनी की पाई पाई का हिसाब जानने का। दोनों एक हैं तो दोनों का सब कुछ एक होना चाहिए या फिर जो जिसका है उसी का कोई दूसरे की आमदनी जमापूंजी या विरासत का मालिक नहीं समझता हो अपने को। बेशक शादी करने से जीवन भर साथ हर हाल में रहना है तो दोनों को अपना जो भी है दूसरे का भी हक बराबर है समझना ज़रूरी है पर ऐसा एकतरफ़ा संभव नहीं है। अपने साथी से चाहते हैं कुछ नहीं छिपाए तो आपको भी कोई बात छिपानी नहीं चाहिए। मुश्किल यही है कभी कोई पति भरोसा नहीं करता अपनी पत्नी की समझदारी पर तो कभी कोई पत्नी मानती है उसका पति नासमझ और विश्वास के काबिल नहीं है। 
 
सबसे कमाल की हैरानी की बात ये भी है कि सदियों से मान्यता चली आई है कि महिलाओं को या महिलाएं समझती हैं पुरुषों को हर बात बताना उचित नहीं है। इक कहावत है कि जो हर बात अपनी पत्नी को बताता है वो कुछ भी नहीं जानता है और इक कहावत ये भी है कि महिलाओं के पेट में कोई बात पचती नहीं है। हमराज़ बनकर राज़ की बात बताते नहीं हमसफ़र बनकर हर राह साथ चलते नहीं हमख़्याल हमदर्द हमराही होना क्या है ये बात समझाते हैं समझते नहीं। हम हमेशा छोटी बड़ी तमाम ज़रूरी बातों पर चर्चा करते हैं उसकी ज़रूरत अहमियत और फायदे नुकसान का हिसाब समझने के बाद निर्णय करते हैं लेकिन विवाह जैसे जीवन भर के संबंध को लेकर हम शायद ही भविष्य के तमाम पहलुओं पर विमर्श करते हैं। इतना महत्वपूर्ण फैसला अक्सर बिना पूरी तरह सोच विचार किये लेते हैं जिसका नतीजा अधिकांश लोग विवशता से अनचाहा रिश्ता निभाने को मज़बूर होते हैं इधर कुंवां उधर खाई जैसी हालत बन जाती है।