Friday, 18 December 2020

ऐसे विदा कर रहे हो बेआबरू करकर 2020 को आप 2021 कहीं बन जाये मेरा बाप

         हमें भूल जाना अगर हो सके ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया 

  कितने जश्न मनाकर जिसे बुलाया था अब जब उसने जाना ही है तो विदा भी ढंग से करते। जाते जाते उसकी पलकें भीगी हुई हैं भला ऐसा भी कोई करता है। वक़्त कभी टिकता नहीं आदमी भी कब कहीं टिककर रहते हैं वक़्त को वक़्त पर चलते रहना होता है उसकी रफ़्तार बदलती नहीं है। लोग वक़्त को ख़राब बताते हैं फिर बाद में पछताते हैं इस से तो वही अच्छा था पुरानी यादों को याद करते हैं सुनते सुनाते हैं दिल को समझाते हैं। अच्छे दिन लौट कर कब वापस आते हैं जाने वाले को भूलना चाहोगे सोच लो याद करोगे दिल से भुला पाओगे। आखिर कब तक अंधेरों को उजाले बतलाओगे भोर होने पर दिन में चिराग़ जलाओगे। दीवार से कैलेंडर बदलने से तकदीर नहीं बदलती है आईना सच कहता है चेहरे बदलते हैं तस्वीर नहीं बदलती है। साल गिनती है ज़िंदगी का ख़्वाब हो जैसे क्या किताबों हिसाबों से मिलता सब को कितना कैसे। जाते जाते जाने वाले का दिल तोड़ दिया अपने आखिर तक आकर दामन उसका छोड़ दिया। अगले आने वाले साल से कुछ पूछा है क्या लाया है क्या भरोसा है आदमी का जब नहीं कोई ऐतबार है वक़्त किस जुर्म का मुजरिम है क्यों गुनहगार है। कितने बेदिल बेहरम बेतमीज़ हैं लोग महफ़िल से जाने वाले को देखते हैं कैसी निगाहों से जब आया था किये थे सलाम बिछाए फूल राहों पे गले लगाया था अदाओं से। अदब की विदाई भी नहीं मिली बेहयाओं से। बाज़ आये सभी खुदाओं से नाख़ुदाओं से मुझसे रूठे हैं रूठें मेरी बलाओं से। 
 
जाने वाला ये साल कहता है नेता नहीं हूं मैं कोई किसलिए करूं मैं आपकी दिलजोई मैंने चुराया नहीं किसी का पल भर भी मुझसे मिला जो नहीं दिया मैंने जिसने खोया किसी का नहीं लिया मैंने। मुझको घटाओगे कैसे बात फिर आगे बढ़ाओगे कैसे। मुझे भुलाओगे किसे याद करोगे गुज़रा ज़माना फिर नहीं आता है लाओगे किसको जिसको चाहोगे पकड़ पाओगे। कह रही चलती हुई हर घड़ी है ज़िंदगी क्या है सांसों की जुड़ती लड़ी है जीने वालों ने हर इक लम्हे से मुहब्बत की है चांद तारों अभी आंख अपनी लड़ी है। दुनिया ने नाहक मुझे बदनाम किया है जाने किस किस के गुनाहों को मेरे नाम किया है। भला क्यों किसी को बेगुनाही की सफाई देता इस दौर में कौन सलीके से है अब विदाई देता। मुझको अनचाही बेटी बनाया क्यों है जैसे अर्थी हो दुल्हन का डोला सजाया क्यों है। आपको अच्छी लगती नहीं बेटी साल बीस बीस की बेघर बेबस को बिना बात रुलाया क्यों है। 
 
साल आते रहे हैं जाते रहे हैं हर हाल में साथ निभाते रहे हैं हम संग संग हंसते रोते रूठते मनाते रहे हैं। पर हाथ ऐसे कभी छोड़ा नहीं करते अलविदा कहते हैं ऊपर उठा हाथ मरोड़ा नहीं करते। नहीं कोई कसूर मेरा शिकवा है न गिला है हर साल नया होता है पहले फिर पुराना भी चलता सिलसिला है। कांटों का नहीं फूलों का भी वजूद है गुलशन। मुझे मुहब्बत नहीं करते तो हिक़ारत से तो देखो मिले जब कभी फुर्सत ज़रा सोचो। मैंने देखा है आपको याद करते बीता ज़माना गुज़रा जो नहीं आएगा वापस चाहो भी बुलाना। नफरत कहां से सीखी कभी बताना खुद आपने खोया है था जो खुशिओं का ख़ज़ाना। तुम मुमकिन हो मेरी कहानी भूल जाना कोशिश करना फिर सोई मुहब्बत को जगाना। इंसान हो इंसान की इंसानियत समझना इंसानियत के दुश्मन को मत घर पर बुलाना दुनिया को सबक भाईचारे का सिखाना। ढाई अक्षर पढ़ना पढ़ाना। ये शेर किसी शायर का है बहुत पुराना। समझ सको अगर समझना समझाना वक़्त ठहरता नहीं खुद को ठहराना। 
 

                   वक़्त ने इक बार मेरे दर पे भी दी थी सदा ,  

                  अख़्तर इसके बाद सारी उम्र सन्नाटा रहा। 

 


 

 

 

 

 

 

 


1 comment:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (20-12-2020) को   "जीवन का अनमोल उपहार"  (चर्चा अंक- 3921)    पर भी होगी। 
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
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सादर...! 
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
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