Sunday, 1 November 2020

किया है बर्बाद मसीहा बनकर ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

       किया है बर्बाद मसीहा बनकर ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

    जनता इक बेबस महिला है जिसको तलाश थी ऐसे देवता की जो उसको आदर पूर्वक सम्मान के साथ बराबरी के अधिकार पाने को भरोसा दे सकता हो। ये जिसको खुद उसने चुना था अपने वादे निभाना भूलकर छिपे इरादे पूरे करने को लोकलाज को त्यागकर सत्ता के मद में चूर खुद को सेवक नहीं मालिक समझ बैठा है। रखवाली करने की जगह जो पहले पुरखों ने छोड़ा था उसको मौज मस्ती में गुलछर्रे उड़ाने अंधे की तरह रेवड़ियां बांटने अपनों को देने में लगा है। घरबार छोड़ चुका है लगता है उसका मत है अवसर मिला है शान पूर्वक जी भरकर उड़ाओ खूब तमाशे लगाओ महफ़िल लगाओ अपनी वाह वाह करवाओ और ऐसा करने वालों को खज़ाने की चाबी का मालिक बनाओ। जनता नासमझ है उसको उल्लू बनाओ और खुद अंधे होकर रास्ता सबको दिखाओ। क़र्ज़ लो घी पिए जाओ कहावत पुरानी तुम दोहराओ , संतान अच्छी तो धन संचय क्यों खूब खाओ खिलाओ और संतान खराब तो धन संचय क्यों वो उड़ाएगी तुम भी उड़ाओ। जनता से कह दो जहनुम में जाओ।
 
 जनतारानी लिखने बैठी है अपनी बदनसीबी की सच्ची कहानी। तुम नादान हो भोली हो हर किसी ने तुमको लूटा है मुझसे तुम्हारा दर्द तुहारी पीड़ा देखी नहीं जाती। बस अब चिंता छोड़ दो दुःख भरे दिन बीते अब अच्छे दिन आने वाले हैं मुझे वरमाला पहना दो अपने को मेरे हवाले कर सुनहरे रंगीन सपने सजाओ। मैं जो भी कहूं हर बात पर ताली बजाओ राम नाम को छोड़कर मेरे नाम की धुन पर नाचो झूमो गाओ। सबको समझा तुमने मालिक मुझे सेवक अपना बनाओ मुझे भी आज़माओ मनवांछित फल पाना है मेरे गीत गाओ। चाय बनाकर पिलाऊंगा पकोड़े सबसे तलवाऊंगा सबको भूखा रखना है मौज अकेला खुद मनाऊंगा। कोई कैसे तुझको लूटेगा जब पास नहीं कुछ छूटेगा मैं सबकी लुटिया डुबाऊँगा बर्बाद चमन कर जाऊंगा। नफरत की आग लगानी है मेरी यही मेहरबानी है। इक भूल की मिली सज़ाएं हज़ार जनता नहीं देख पाई झूठ का नकली किरदार जो नहीं था अपनी पत्नी का भी वफ़ादार उसको मान लिया कैसे समझदार होशियार। खबरदार खबरदार चौकीदार समझा निकला बटमार। क्या राजनीति कैसी सरकार चौपट सब का कारोबार जीना मरना दोनों दुश्वार कर दिया सब को बदहाल बीमार। समझा था है जीत सभी की लेकिन बैठी जनता अपना सब कुछ हार। कुर्सी पर बैठा है दुनिया भर को ठगता है दोस्त नहीं किसी का रखता है दुनिया से बैर कौन कबीर किसको बतलाए मांगे कौन सबकी खैर। मौज मनाई खेला खेल भी खेल खेल में सब कुछ तोड़ा कुछ भी साबित कहीं न छोड़ा। उसका हाथी उसका घोड़ा लंगड़ा सबसे तेज़ भी दौड़ा सबकी टांगें बांधी सबकी राह में डाला रोड़ा खुद धरती पर कदम नहीं रखता उड़ता हवा में उसका सपनों का घोड़ा। उसका कुटंभ बढ़ता जाता जोड़ा साथ अपने सब से तोड़ा सब उसी के पास है फिर भी लगता है उसको है अभी थोड़ा। 
 
    याद करो बात पुरानी उसने हरदम की मनमानी सबको याद आई थी नानी जब उसने बिन समझे सब पर लादी जो भी ठानी। पैसा लत्ता सोना चांदी पहना हुआ जिस ने जो गहना सब कुछ जनता से लेकर बोला था तुमको होगा ये सब सहना। भरी तिजोरी खाली कर दी जाने क्या खोया क्या पाया कितने देशों की सैर की लेकिन लेकर कुछ भी नहीं आया। बर्बादी करता रहा और बर्बादी का जश्न मनाया जिस पर शर्मिंदा होना था उन बातों पर था इतराया। महल बनाने के सपने थे जो घर था बेचा बिकवाया सुबह उजाला भरी दुपहरी अंधियारा छाया। फिर से कहनी वही कहानी झूठ की ज़ुबानी सच की कहानी , झूठ और सच नदी में नहाने गये झूठ बाहर पहले ही आया सच के कपड़े पहन चल दिया और झूठ ने अपना नाम सच बताया। सच नहाकर बाहर आया देख कर उसका सर चकराया झूठ का लिबास पड़ा था नदी किनारे सच के कपड़े झूठ पहन गया था सच नंगा है घबराया। झूठ के कपड़े सच कैसे पहनता सच पर कैसा संकट आया। झूठ सिंहासन पर बैठा है सच का क़त्ल करने वाला यूं सच का पैरोकार कहलाया। पंजाबी का गीत याद है आया है :-
 
                          " सच्चे फांसी चढ़दे वेखे झूठा मौज मनाये , 
                           लोकी कहंदे रब दी माया मैं कहंदा अन्याय। 
                          ओ की मैं झूठ बोलिया की मैं कुफ़र तोलिया "। 
 
इक कहानी राजा नंगा है की थी जिस में ठग राजा को ठगने का काम कर गए बेचारा छोटा बच्चा सच बोलकर सज़ा का हकदार बन गया। अभी पढ़ा कोई पढ़ा लिखा विदेश से भारत लौटा शख़्स खूब धन देकर किसी से अलादीन का चिराग़ खरीद कर ठगी का शिकार बन गया। ठगने वाले पकड़े गए हैं पुलिस ने धर लिया है। जब मामला अदालत जाएगा तब समझ आएगा कौन सच्चा कौन झूठा सामने आएगा। पढ़ लिख कर लोग जब हर किसी की चिकनी चुपड़ी बातों में फंस जाते हैं तब मसीहा बनकर राजनेता से अभिनेता और खिलाड़ी से लेकर मदारी तक योग से रोग तक का धंधा करने वाले अनहोनी को होनी होनी को अनहोनी कर दिखाते हैं। अमर अकबर एंथनी मिलकर गाते हैं। हम हाथ मलते रह जाते हैं पहले मसीहा बनाते हैं फिर बनाकर पछताते हैं।
 

                            

 

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (04-11-2020) को   "चाँद ! तुम सो रहे हो ? "  (चर्चा अंक- 3875)   पर भी होगी। 
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
-- सुहागिनों के पर्व करवाचौथ की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
सादर...! 
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
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Sanjaytanha said...

Bdhiya vayango se bhrpoor