Tuesday, 25 August 2020

शासक की परेशानी और है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     शासक की परेशानी और है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

  आपको नहीं समझ आएगी उसकी चिंता उसकी परेशानी। जनता ने उसको बनाया था अपने दुःख दर्द मिटाने को मगर उसने सत्ता हासिल की थी अपनी चाहत अपनी ख़ुशी पाने को सबसे ऊंचाई पर खुद को खड़ा देखने का शौक जहां से नीचे लोग कीड़े मकोड़े लगते हैं। शासक बनकर कोई दुःख दर्द नहीं रहता न किसी के दर्द तकलीफ़ की बात अच्छी लगती है अच्छी लगती है खुद अपने मन की बात अपना गुणगान करना खुद अपने मुंह से और करवाना सभी से। चाटुकार बताते हैं लोग बड़े खुश हैं आपके शासन में सब अच्छा ही अच्छा है सावन के अंधे हैं हरियाली ही हरियाली चहुं ओर है। मगर उसको मालूम है उसके आने से कुछ भी अच्छा हुआ नहीं है लोग पहले की तरह बदहाल हैं उनकी बदहाली बढ़ती जा रही है। शासक जानता है लोग सोचते हैं उम्मीद रखते हैं सत्ता सरकार उनकी दशा को देखे समझे महसूस करे। महल में रहकर कोई फुटपाथ झौंपड़ी की व्यथा को जानना चाहता है भला शासक महल में रंगरलियां मनाते हैं कोई राजा बनकर कैसे नाखुश रह सकता है। दुःख दर्द चिंता परेशानी जनता की गरीबों की होती है सत्ता की सरकार की धनवान की चिंता परेशानी एक ही होती है जो है उस से हाथ नहीं धोना पड़े इसलिए उसको जकड़े रखना ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण काम होता है। 

    जनता को दिखाने को नकली आंसू मगरमच्छ के बहाने पड़ते हैं दिल में कुछ ज़ुबान से कुछ और कहना पड़ता है मुखौटे बदल बदल कर रहना पड़ता है। सत्ता सिंहासन के पास वस्तविक सच्ची संवेनशीलता होती ही नहीं है झूठी संवेदना जताने का आडंबर कितनी बार दोहराना पड़ता है। कभी जश्न कभी मातम मनाना पड़ता है झूठ को सच बनाना पड़ता है। मन मयूर झूमता है फिर भी खामोश उदास होकर दिखाना पड़ता है कभी सजना कभी संवरना कभी रोकर दिखाना कभी रोने की बात हो मुस्कुराना पड़ता है। दोस्त को दुश्मन दुश्मन को दोस्त बताना पड़ता है बहती गंगा में डुबकी लगाना पड़ता है ठंड लगती है और ठंडे पानी से नहाना पड़ता है उसके बाद गंदे पानी को स्वच्छ जल बतलाना पड़ता है। रोज़ को खेल तमाशा लगाना पड़ता है झूमना पड़ता है गाना पड़ता है गले पड़ा ढोल बजाना पड़ता है।

     सब कुछ हासिल कर लिया फिर भी कुछ भी नहीं मिला है अपनी तकदीर से शिकायत है दुनिया से भी गिला है। थमता नहीं है ये पुराना सिलसिला है जनता आम है कुछ पिलपिला है काटने की आरज़ू है चूसने को मिला है। दिल भरता नहीं आम खाने से उदास फिर हो जाते हैं मौसम बदल जाने से उनको आम खाने की चाहत अभी बाकी है। जनता बचा लो जान राहत अभी बाक़ी है आपको लगता है कयामत है यही उनकी मत पूछो जो हसरत अभी बाक़ी है। कयामत के बाद इक और क़यामत अभी बाक़ी है। सियासत कहती है बग़ावत अभी बाक़ी है सत्ता की आज़ादी से अदावत अभी बाक़ी है। ज़ुल्म वालों की सितम की हद नहीं होती है हर हद से गुज़रने की नुमाईश अभी बाक़ी है। ये दास्तां स्याही से नहीं लहू से लिखी है मैंने बहता है अश्क बनकर जो लहू अभी बाक़ी है। अभी बाकी है अभी बाक़ी है बहुत कुछ अभी बाक़ी है।

1 comment:

Sanjaytanha said...

बहुत बढ़िया लेखहै