Monday, 1 June 2020

बड़ी लाचार ऐप्स की सरकार ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   बड़ी लाचार ऐप्स की सरकार ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

अगर सॉफ्टवेयर मशीन से बात बनती तो सांसद विधायक आईएएस आईपीएस अधिकारी किसी की भी कोई ज़रूरत नहीं होती। हर समस्या का डेटा सॉफ्टवेयर में अपलोड करते और समाधान हो जाता। मगर ऐसा मुमकिन नहीं है जिनको लगता है कि इक इंसान है तो सब मुमकिन है उनको शायद ध्यान हो करने को भगवान भी सब कुछ कर सकता है मगर होता नहीं सब। हमने भगवान भरोसे देश को चलने दिया तभी देश अभी भी आडंबर अंधविश्वास और गुलामी की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया है। लेकिन लगता है किसी को विश्वास है कुछ भी खुद करने की ज़रूरत नहीं है हर दिन कोई नई ऐप्प बना देते हैं। आपको कुछ भी चाहिए ऐप्प है अगर यही है तो आपकी ज़रूरत क्या है ऐप्प बनाने वाले लोग बहुत हैं उनको ही सत्ता सौंप देते हम लोग। बेबस और लाचार भगवान पर छोड़ते हैं साहसी लोग खुद करने में विश्वास रखते हैं। खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले , खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है। अल्लामा इक़बाल जी का शेर है। आत्मनिर्भरता स्मार्ट फोन ट्विटर सोशल मीडिया से नहीं हासिल की जा सकती है भले किसी की सरकार इन्हीं के सहारे बन गई हो काठ की हांडी कितनी बार चढ़ेगी आखिर समझ गए लोग जो कुछ नहीं करना जानते हैं उनको औरों का किया सब बर्बाद करना ही आता है। इंसान को निठल्ला बना दिया है ऐसी चीज़ों ने जिनका भरोसा नहीं किस पल धोखा दे जाएं कोई वायरस आकर सब चौपट कर दे। कोरोना वायरस ने दुनिया की सरकारों को सबक सिखलाया है आपके पास बचने का कोई एंटी वायरस नहीं है। अब लोग चाईना की ऐप्स को अनइंस्टाल करने की ऐप्प पर भरोसा करने लगे हैं। 

     अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे , मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे। ज़ौक़।

बात बहुत पुरानी है तब धर्म भगवान को लेकर खुलकर बात करना आसान नहीं होता था। मगर हमारे गांव के इक बड़े ज़मीदार ऐसी बातें कह देते थे। इक बार कोई इक पंडित को साथ लेकर उनके घर आया और बताया कि ये शहर से बाहर बने इक मंदिर के पुजारी हैं इनका गुज़र नहीं चलता है क्योंकि उस मंदिर में कभी कभी ही कोई आता है चढ़ावा नहीं चढ़ता जिस से पंडित जी का परिवार बसर कर सके। उनको उम्मीद थी कि ज़मीदार साहब कुछ सौ पचास महीना देने की बात कहेंगे मगर उनको जवाब मिला आप उस मंदिर को बंद ही कर दो जिस में कोई आता जाता नहीं। खैर उनकी अपनी सोच या मत की बात थी। ओ देने वाले तू ने तो कोई कमी न की , अब किसको क्या मिला ये मुकदर की बात है । लेकिन हमने जाने कितने आधुनिक भगवान खुद बना लिए हैं जिनसे कुछ भी हासिल नहीं होता है जो आपको किसी पत्थर की मूरत की तरह आशिर्वाद देते नज़र आते हैं उनकी ऐप्स से कुछ भी संभव नहीं हो सकता है स्वच्छ भारत से लेकर आरोग्य-सेतु ऐप्प तक इक झूठी तसल्ली के सिवा कुछ भी नहीं है। जाने कब तक हमको सरकारें नेता अधिकारी ऐसे ही झुनझने पकड़ा कर बहलाने में सफल होते रहेंगे। सरकार की साइट्स पर कितनों को क्या क्या भेजा बता सकते हैं मगर वास्तव में किस किस को क्या मिला कोई नहीं जानता है। कितनी हसीन आज सितारों की रात है , इक चांद आस्मां पे है इक मेरे साथ है। आपके साथ नहीं आपके हाथ इक स्मार्ट फोन है जिस में चांदनी नहीं है चंदा की तस्वीर है आपको उन ऐप्स से दिल बहलाना है। सच समझना है तो इन ऐप्स के चंगुल से निकलो और वास्तविकता को समझो।

अकबर बीरबल की इक कहानी है। इक रात को इक सीधे साधे शरीफ इंसान को , भोली भाली जनता की तरह , सपने में इक सेठ जी ने ढेर सा धन उधार दे दिया। सुबह हुई उसको लगा शायद ख्वाब सच होगा और उसने सेठ जी को जाकर बताया मुझे बड़ी ज़रूरत है रात सपने में देखा आपने मुझे बहुत धन दिया है उधार। सेठ बड़ा चालाक था उसने उधार देने की जगह बल्कि उस को जो सपने में लिया वो लौटने को कहा। और बात बढ़ते बढ़ते राजा के दरबार तक जा पहुंची , सेठ ने कहा इसने मुझसे खुद कहा सपने में मुझसे उधार लिया अब वापस नहीं लौटा रहा। अकबर ने ये उलझन सुलझाने को बीरबल को कहा , बीरबल ने सेठ को बुलाया और पूछा सपने में आपसे उधार लिए आपने मान लिया क्या आपकी तिजोरी से घटे थे नहीं गिनती की। फिर भी आपको सपने में कोई वापस कर जाये तो आप उसका दिया धन जमा कर लोगे ऐसे तो कोई भी आपको बताएगा उसने आपको सपने में पैसे दिए आपको मंज़ूर है। फिर भी उसने खुद आपको कहा है तो उसी तरह लौटाएगा भी मगर यहां और आपको लिख कर देना होगा मिल गए। बीरबल ने उस इंसान को पैसों से भरी थैली लाकर दरबार में रखने को कहा , फिर उस थैली को इक आईने के सामने रखा और कहा देखो आईने में जो थैली है आप उसे उठा लो आपके हैं वो पैसे लौटा रहा है ये। भला आईने में जो दिखाई देता है उसे कोई कैसे ले सकता है सेठ बोला। बीरबल बोले फिर सपने में जो मिला आपने कैसे मान लिया दिया था।  ये सरकार भी ऐसे ही आपको देश को सपने दिखालाती है और कहती है कितने खूबसूरत ख्वाब हैं अब खुश हो जाओ। अच्छे दिन वाले सपने चलते चलते बीस लाख करोड़ वाले सुनहरे ख्वाब तक पहुंच गए हैं। ताली बजाओ थाली बजाओ और साल दर साल जश्न मनाओ अपने को मूर्ख बनने का अन्यथा अपनी सरकारी ऐप्स को हटा दो ये झूठे आईने हैं टीवी चैनल की तरह खबर नहीं बताते जो हुआ नहीं उसको खबर बनाते हैं।


1 comment:

Pammi singh'tripti' said...


आपकी लिखी रचना आज "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 3 जून 2020 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!