Saturday, 11 May 2019

दूर के ढोल सुहावने लगते ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   दूर के ढोल सुहावने लगते ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

       पांच साल तक हम भी सुनते रहे विदेशों में उनकी धूम मची हुई है। भारत से बाहर रहने वाले भारतीय सुना है अभी भी कायल हैं नेता जी ने कमाल किया है। बस उनका कमाल देशवासियों को ही नज़र नहीं आता। काश हम भी विदेशी चश्मा खरीद लेते और जो नहीं हुआ उसको देख सकते। हुस्न कहते हैं देखने वाले की नज़र में होता है। विदेश में किसी शानदार होटल में शराब और डिनर का लुत्फ़ लेते  वाह वाह करना उनको भी आता है जो इधर से आये शायर की शायरी सुनते हैं कभी कभी। पैसे का खेल कमाल का खेल है। सोचा इस बार बाहर रहने वाले देश वापस आकर रहना शुरू करने वाले हैं और चुनाव पर मतदान करने ज़रूर आएंगे देशभक्ति आखिर देशभक्ति है। मगर पता चला वहीं से सोशल मीडिया पर मतदान की रस्म निभा रहे हैं चुनाव आयोग को उनकी भी गिनती जोड़नी चाहिए। इस देश में उनकी सांस घुटती है सुरक्षा का कोई भरोसा नहीं भले उनको सरकारी सुरक्षा मिली हुई है और खुद भी अपने बाऊंसर रखे हुए हैं।

         नेता हैं क्योंकि पिताजी भी नेता थे। अभी अभी उनका संदेश वीडियो से मिला है। शुरआत करते हैं मेरे बच्चे विदेश में रहते हैं मैंने उनसे पूछा कौन देश का प्रधानमंत्री होना चाहिए। सबने एक साथ जवाब दिया उनको और किसको , नाम नहीं लिया मैंने क्योंकि बात किसी नेता का समर्थन या विरोध की नहीं है। नेता जी हमारे राज्य के ही नहीं यहीं के ही हैं और जिस दल का समर्थन करते हैं अपने बच्चों को वोट डालने को ज़रूर बुलवा सकते हैं कोई धन दौलत की कमी नहीं है। मगर पिता जी को जो कहा या नहीं कहा वही जानते हैं लेकिन भारत में रहने वाले दोस्तों को समझाते हैं क्या रखा है उस देश में। कौन जाना चाहता है वापस वतन को क्या है उस जगह। कहते हैं उनको राजनीति करनी है मगर सांसद विधायक बनने से अधिक महत्व कारोबारी विस्तार पर ध्यान देना ज़रूरी है। जौहरी हैं हीरों का कारोबार करते हैं और असली नकली की परख भी करना जानते हैं। बच्चों को समझ आ गया है अब भरोसा नहीं किसी का भी और जिनको समर्थन दे रहे हैं मतलब और डर के साथ बहुत कुछ लेकर उनका क्या पता कल नहीं जीत पाये तो किसी और के पास जाना भी आसान नहीं होगा। इक बहुत पुरानी बात राजनीति की याद आई है। पिता राजनेता थे और बच्चे को भी राजनीति में लाना चाहते थे। बच्चे को ऊपर छत पर खड़ा किया और खुद नीचे आकर कहा बच्चे छलांग लगा दो , बच्चा कहने लगा मुझे चोट लग सकती है। पिता जी बोले घबराओ मत मैं खड़ा हूं तुम गिरोगे तो मैं पकड़ लूंगा गिरने नहीं दूंगा। बच्चे ने विश्वास किया और कूद गया मगर नेता पिता ने पकड़ा ही नहीं। जब बच्चा रोने लगा तो नेताजी ने ने समझाया यही राजनीति का पहला सबक है , कभी किसी पर ऐतबार मत करना अपने बाप पर भी नहीं।

          बात हास्यास्पद है जो विदेश जाकर रहते हैं वो बताएंगे कौन अच्छा है। मगर ऐसे अकेले वही नहीं है बहुत सारे लोग जो महानगर में उच्च वर्गीय जीवन जीते हैं उनको नहीं मालूम गांव छोटे शहर और किसान मज़दूर गरीबी की रेखा से नीचे बदतर जीवन जीने वाले कैसे रहते हैं। महानगर की चकाचौंध रौशनी में दिखाई नहीं देता कोई गंदी बस्ती या फुटपाथ पर भी रहने को मज़बूर है। आपको आरो मिनरल वाटर मिलता है खरीद सकते हैं उनको पीने को साफ पानी भी नसीब नहीं है। विदेश में बैठ कर आई लव माय इंडिया कहना देशभक्ति नहीं है। और वो लोग जो देश में रहते हैं मगर चाहते हैं अमेरिका इंग्लैंड यूरोप जाकर रहना उनसे देश को बेहतर बनाने को बातें सुन सकते हैं कोई कोशिश नहीं करने की उम्मीद रख सकते हैं।

       बाहर विदेश रहकर देश को समझ नहीं सकते आप। अगर किसी नेता को विदेशी शोहरत पसंद है तो उसके बारे कुछ भी कहना फज़ूल है। देश में रहते हैं चाहे विदेश में पहला सवाल यही है आप खुद देश को अच्छा बनाने में क्या योगदान देते हैं। केवल अपने लिए घर बनाना परिवार का पालन पोषण करना हर कोई करता है अशिक्षित गरीब भी , आप अगर पढ़े लिखे हैं और साधन संपन्न हैं तो देश और समाज को आपको कुछ योगदान किसी भी तरह से बिना कोई स्वार्थ देना चाहिए। अगर वास्तव में ऐसा होता तो शायद नहीं यकीनन देश की हालत जैसी आज है कभी नहीं होती। बहुत सुधार हो सकता था। सबसे कमाल की बात ये है हर कोई जिस नेता को लेकर मानता है उसकी किसी बात का कोई भरोसा नहीं उसी को फिर से बनाने को मज़बूरी समझते हैं। जबकि लोकतंत्र का अर्थ ही है भरोसा होना अगर किसी पर लोग भरोसा ही नहीं करते तो उसका किसी पद पर होना ही अनुचित है। शायद इसी को कमाल करना कहते हैं जिसका भरोसा नहीं उसी पर विश्वास कर छत से छलांग लगाने का इरादा है। शोर दूर से अच्छा लगता है पास आने पर कुछ भी सुनाई नहीं देता , इतनी दूर से सच दिखाई नहीं देता।

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