Friday, 3 May 2019

बादल हवा घुटन बारिश ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      बादल हवा घुटन बारिश ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

    कोई बता रहा था किसी की हवा चल रही है। हमने तो आंधी भी चलती देखी है किसी की कभी। ये भी देखा कि जिनकी आंधी चलती थी वही तेज़ हवा चली तो तिनके की तरह उड़ गए। अंधेरों ने सूरज से दोस्ती क्या की रौशनी धूप दोनों उनकी कैद में बंद हो गए हैं। मौसम पल पल बदलता रहता है बादल आकाश पर छाते हैं बिना बरसे गुज़र जाते हैं। बारिश का कोई इंतज़ार करता है तो किसी को विरह की मारी गाती है कजरे बदरवा रे , मर्ज़ी तेरी है क्या ज़लिमा। ऐसे ना बरस ज़ुल्मी कह ना दूं किसी को मैं बालमा। क्या ज़माना था महबूबा को कितनी फुर्सत रहती थी पिया मिलन के मधुर गीत गुनगुनाती थी घने बादल देखते ही। आजकल पिया परदेस में सजनी किसी और देस में दोनों फेसबुक व्हाट्सएप्प पर मिल लेते हैं कभी सोशल मीडिया का युग बीत गया तो जीना कठिन हो जाएगा। क्षमा चाहता हूं बात मौसम से राजनीति पर होकर इश्क़ मुहब्बत की तरफ चली आई है।

              जाने उसकी कैसी हवा चल रही है जो दम घुटने लगा है हर किसी का। लोग कहते हैं हवा बंद है कोई शायर कहता है सब हवाएं ले गया मेरे समंदर की कोई , और मुझको एक कश्ती बादबानी दे गया। जिसे बादबानी शब्द नहीं मालूम उसको बताना चाहता हूं अपने देखी होगी किसी फिल्म या कोई पेंटिंग में इक कश्ती जिस पर ऊंचे ऊंचे परदे लगाए होते हैं और वो हवा के रुख के हिसाब से चलती है। कोई राजनेता देश की जनता को कुछ ऐसी सौगात देता है हवा अपने पास बंद कर ली है और बादबानी कश्ती की तरह कोई खैरात सभी को देता है। सब कुछ मिलता है उसकी ऐप्स पर इसी तरह से मगर ठीक असली की जगह लकड़ी या मिट्टी के खिलौने की तरह से। जिनकी परवाह है उनको एएसी की ठंडी हवा नसीब है बाकी लोग घुटन महसूस करते हैं। दिलासा देते हैं ये बारिश से पहले की थोड़ी दिक्क्त है मगर पांच साल से अच्छे दिन की बारिश होने का नाम ही नहीं ले रही। लोग आह भरते हैं तो शक होता है विरोध करते हैं। हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम , वो कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता। शायर समझते हैं तभी कहते हैं। आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक , कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक। हमको मालूम है तगाफुल न करोगे लेकिन , ख़ाक हो जाएंगे हम तुमको खबर होने तक। खबर वाले अब बेखबर को खबर कहते हैं उनको खुद अपनी खबर नहीं है कि क्या थे कब क्या से क्या हो गये हैं। शर्म शर्म कहते कहते बेहया हो गये हैं।

      मौसम कोई वक़्त था बेईमान भी होता था आने वाला कोई तूफान भी होता था। मौसम आशिकाना हुआ करता था क्या ज़माना हुआ करता था। बारिश होती थी बच्चे भीगने का लुत्फ़ उठाते थे हम भी पागल बनकर पानी में चलते जाते थे झूमते थे गाते थे कोई सर्दी ज़ुकाम का डर नहीं था बदन टूटता था अगली सुबह नहीं घबराते थे। बारिश में चाय पीते थे पकोड़े समोसे खाते थे पांच रूपये खर्च करने कितनी कितनी दूर जाते थे। खुशनसीब थे जो बारिश के पानी में कागज़ की कश्ती बनाकर चलाते थे। जगजीत सिंह क्या खूब ग़ज़ल गाते थे बचपन याद दिलाते थे। अब कुछ भी सुहाना नहीं है कोई मुहब्बत का तराना नहीं है पूरा क्या अधूरा सा भी फ़साना नहीं है , मिलने जुलने का कोई बहाना नहीं है किसी का घर किसी के आना जाना नहीं है।

     गर्म हवा तपती लू चलती है बदन नहीं लगता रूह जलती है। इक प्यास है हर किसी की ज़िंदगी उदास है। बाकी रही नहीं कल की भी आस है , जाने कैसी आज़ादी आई है जनता झेल रही बनवास है। आम आदमी की कीमत कुछ भी नहीं है आम को चूसता है वही जो सबसे ख़ास है। कांटों के केक्टस महलों में खिलते हैं , आम जो बोते हैं उस को बबूल के कांटे बस मिलते हैं। बाड़ बनकर खेत खा रहे हैं सुनते हैं अपने नगर आ रहे हैं। उनकी खातिर झौंपडियां हटवा रहे हैं पेड़ बाग़ बगीचे कटवा रहे हैं गमलों के फूलों से मंच सजा रहे हैं। अब ये मत पूछो क्या करते हैं क्या दिखला रहे हैं। तुम्हें ताली बजाने को सभी नेता बुलाते हैं , भले कैसा लगे तुमको तमाशा खूब था कहना। बारिश क्या ऐसी भी होती है अश्कों की बरसात हर किसी की पलकों को भिगोती है , गरीब की जोरू है इस देश की जनता , उनके कहने पे हंसती है अपनी किस्मत पे रोती है।

                                         मेरी इक ग़ज़ल भी पेश है।

ज़माना झूठ कहता है , ज़माने का है क्या कहना ,
तुम्हें खुद तय ये करना है , किसे क्यों कर खुदा कहना।

जहां सूरज न उगता हो , जहां चंदा न उगता हो ,
वहां करता उजाला जो , उसे जलता दिया कहना।

नहीं कोई भी हक देंगे , तुम्हें खैरात बस देंगे ,
वो देने भीख आयें जब , हमें सब मिल गया कहना।

तुम्हें ताली बजाने को , सभी नेता बुलाते हैं ,
भले कैसा लगे तुमको , तमाशा खूब था कहना।

नहीं जीना तुम्हारे बिन , कहा उसने हमें इक दिन ,
उसे चाहा नहीं लेकिन , मुहब्बत है पड़ा कहना।

हमें इल्ज़ाम हर मंज़ूर होगा , आपका लेकिन ,
मेरी मज़बूरियां समझो अगर , मत बेवफ़ा कहना।

हमेशा बस यही मांगा , तुम्हें खुशियां मिलें "तनहा" ,
हुई पूरी तुम्हारे साथ मांगी ,  हर दुआ कहना। 

  


No comments: