Saturday, 25 May 2019

दोबारा शहंशाह बनकर पहला संबोधन ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  दोबारा शहंशाह बनकर पहला संबोधन ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

   कभी  कभी किसी लिखने वाले की सोई किस्मत जागती है तब छप्पर फाड़ कर धनवर्षा होने लगती है। किसी को साहित्य अकादमी का निदेशक बनाती है सरकार किसी को कोई रुतबा कोई सदस्य्ता मिल जाती है। मगर ऐसा नसीब से अवसर बेहद मुश्किल से किसी को मिलता है बड़े नेता का विशेष अवसर पर संबोधन को लिखने का दायित्व मिलना। इस नाचीज़ को यही काम करने को दोबारा शहंशाह बनने वाले नेता जी ने सौंपा है। ये वास्तव में गौरव की बात है और इसको लिखते हुए इसकी ऐतिहासिकता को ध्यान में रखना बेहद ज़रूरी है। अभी पांडुलिपि जमा करने जैसी बात है स्वीकार होने पर छपने से पहले खुद शहंशाह अपनी ज़ुबान से मधुर वाणी में पढ़ कर सत्ता की कमान संभालने का कार्य करेंगे। जो लिखा इस तरह से है। 

    अपने सोच समझ कर मुझे सत्ता पर सिंघासन पर सुशोभित किया है। कोई छुपी हुई भावना नहीं रही इस बार बड़े साफ शब्दों में मेरे नाम की सरकार बनाने की बात कही थी। राजा की सरकार राजा के नाम से हुआ करती है। जनता की सरकार बनाने का काम आज तक सफल नहीं हो पाया है। भारत सरकार हमेशा किसी एक नेता या दल अथवा गठबंधन की सरकार कहलाई है , पिछली बार मेरे सत्ताधारी शासक होते हुए भी दल की ही साकार कहलाती रही है बेशक दल का कोई महत्व नहीं बचा था। जब नाचन लागी तो घूंघट काहे यही विचार कर पासा फैंका था अपने नाम की सरकार वाला। शतरंज में राजा बचना चाहिए प्यादे कुर्बान होने को ही रखते हैं। अभी शंका की बात कोई नहीं है दल वाले घठबंधन वाले विपक्ष वाले सबको खबर है इस सरकार का मतलब ही मैं हूं मैं ही मैं और केवल मैं ही मैं ही हूं। अपने देखा होगा चुनाव के बाद भगवान के दरवाज़े पर भी मैं गया तो राजा की तरह की पोशाक और शानो शौकत के साथ। भगवान के भक्तों की भक्ति और संख्या अब मुझसे बढ़कर नहीं रही है। स्वर्ग के आसन की लड़ाई देवता लड़ते रहे होंगे इस भारत देश की धरती किसी स्वर्ग से कदापि कम नहीं है और मेरी विजय निर्विवाद सत्य की तरह है। 

        मैंने इस अवसर पर जो पोशाक पहनी है विशेष तौर से सिलवाई गई है जिसकी विशेषता है कि सिर्फ मेरे सच्चे भक्त ही इसकी चमक को देख सकते हैं और देखकर मेरी शोभायात्रा निलकते समय जय हो का उद्घोष कर सकते हैं। जिनको इसकी सुंदरता इसकी बेमिसाल चमक दिखाई नहीं देगी और वो जय हो शहंशाह जी की नहीं बोलेंगे उनको मुजरिम करार दिया जा सकता है मगर मैं जनता हूं सब जय हो का उद्घोष कर एकता और अखंडता की मिसाल कायम करेंगे और इतनी ऊंची आवाज़ सुनाई देगी जो ऊपर आसमान पर मुझसे पहले के शासकों को भी सुनाई देगी। आज से देश मेरा है आपका राजा मैं संविधान लोकतंत्र कानून सब मैं ही हूं। सबको  इस वास्तविकता को स्वीकार करना ही होगा कि मुझसे पहले कोई अच्छा और सच्चा ईमानदार शासक भारत ही नहीं दुनिया भर में कहीं भी हुआ नहीं है और न ही कोई कभी भविष्य में हो ही सकता है। मुझे लगता है कि अब जैसे पुराने समय में राजा का नाम उसकी तस्वीर सिक्कों पर अंकित हुआ करती थी अब देश में असली नोटों की पहचान मुझसे की जानी चाहिए। घबराना नहीं इस बार कोई नोटबंदी नहीं की जाएगी लोग चाहेंगे तो पिछले हज़ार पांच सौ वाले नोट फिर से मेरे नाम की मोहर से जारी किये जाने का भी विचार हो सकता है। लक्ष्मी काली सफेद नहीं होती है सुनहरी आभा की हर रंग की होती है। मुझे  फ़कीर समझ कर आपने मेरी झोली भर दी है बस इक चाहत अभी सीने में दबी हुई है मेरी मूर्ति बनवाने लगे तो उसकी ऊंचाई किसी की मूर्ति से कम नहीं होनी चाहिए। सरकारी विज्ञापनों की तरह अब घर घर दफ्तर दफ्तर दुकान दुकान हर रेहड़ी खोखे के धंधे की जगह मेरी तस्वीर लगाई जानी ज़रूरी होगी और सुबह शाम धूपबत्ती करने से सबकी गरीबी दुःख दर्द मिट जाएंगे की आरती गाई जाया करेगी। 

    मुझे भरोसा है शहंशाह की दिल की हर चाहत को इस लेख में शामिल किया गया है और इसको पसंद कर पढ़ने के बाद मुझे भारत रत्न की उपाधि मिल जाये तो कोई हैरानी नहीं होगी। माया की बात क्या देने वाला जब भी देता देता छप्पर फाड़ के ये हेरा फेरी फिल्म का गीत सच साबित हो भी सकता है।

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