Tuesday, 21 May 2019

राह से भटके को मंज़िल नहीं मिलती ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  राह से भटके को मंज़िल नहीं मिलती ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

  बात सभी की है देश के सभी वर्गों की और बाकी सभी से पहले खुद अपनी भी। मंज़िल तो कुछ और ही थी जिसको पाना था मगर हम राह किसी और पर चलते रहे। राजनेताओं आम जनता से पहले हम जो तथाकथित शिक्षित लोग आईना दिखाने की बात करते हैं सच बोलने का हौंसला ही नहीं और आधा सच आधा झूठ मिलाकर चटनी की तरह परोसते हैं ताकि सबको स्वाद पसंद आये और भाई वाह कहे हर कोई। पहला सवाल आज देश में लोकसभा चुनाव का है राजनीति का है और चिंतन का है कि क्या सब ठीक है क्या यही लोकतंत्र है जिसकी बात हम करते हैं। अभी इक विषय पर अटके खड़े हैं ईवीएम मशीन को लेकर भरोसा नहीं है मगर भरोसा बचा कहां है कोई भी तो भरोसे के काबिल नहीं है जब हमें विश्वास स्थापित करना चाहिए हम शक की बात करते हैं और शक करने वाले पर शक कर इक कंचों का खेल खेलते हैं जीत हार की नहीं हिसाब की बात पर बहस है। जिनको समझ है वो विचार कर सकते हैं कि केवल मशीन बदल कर चुनाव नहीं जीता जा सकता है इतना बड़ा देश है इतनी मशीनें और उनको रखने के ढंग और सुरक्षा के तरीके के साथ हर मशीन पर जो चुनाव लड़ रहे उनके नुमायदों के हस्ताक्षर इतना सब आसानी से बड़े स्तर पर धांधली होने नहीं देता। इस पर विचार किया जा सकता है और निष्पक्ष चुनाव होना ज़रूरी है कैसे हो मंथन की ज़रूरत है विषय आसानी का भी नहीं विषय देश की व्यवस्था का है पांच साल और हर बार का है तो रास्ता कठिन हो कोई बात नहीं मगर दिशा हीनता नहीं होनी चाहिए। अभी हम दिशाहीन भटकते लग रहे हैं। असली उद्देश्य संविधान लोकतंत्र और देश की जनता की अपनी चुनी सरकार होने का है। मुद्दे से भटके नहीं भटका दिए गए हैं वास्तविक मुद्दे हैं ही नहीं और अनावश्यक चर्चा टीवी अख़बार और राजनेता करने में व्यस्त हैं। 

       क्या चुनाव ईमानदारी से लड़े जा रहे हैं कोई नहीं बात करता। हम्माम में सभी नंगे हैं शुरुआत ही गलत है कितना खर्च नियमानुसार किया जाना है परवाह ही नहीं है। कोई भी दल उम्मीदवार खड़े करते हुए अच्छे सच्चे को नहीं देखता और जीतने को जातीय समीकरण से धनबल और बाहुबल हर सही गलत ढंग अपनाया जाता है। बात विचारधारा की होनी चाहिए  मगर होता ये है कि उसकी कमीज़ मैली है मेरी चादर उजली है क्या ये मानसिक दिवालियापन नहीं है। बड़े बड़े राजनेताओं के भाषण का स्तर गिरकर इतना नीचे आ गया है कि बोलने वाले नहीं सुनने वालों को शर्म आती है क्या यही नेता हैं इनको सुनने आये थे हम। जिस देश में तीस फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं उस में हज़ारों करोड़ चुनाव पर बर्बाद करना अपराध ही है। और किसी को गरीबी भूख पीने का पानी बदहाल शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बात महत्वपूर्ण नहीं लगती है। क्या सत्ता पाने को सब उचित है और अगर है तो आपकी देशभक्ति और जनता की सेवा की बातें सब से बड़ा धोखा हैं। खेद की बात है कभी हमने एक मंच से आमने सामने दोनों पक्षों को बहस करते हुए देखा है शालीनता से बात की जाती थी। संसद में असहमत होते हुए भी विपक्षी की बात बड़े ध्यान से सुनते थे और गहराई से विचार भी करते थे। अपने ऐसे वास्तविक अच्छे नेताओं की परंपरा को छोड़ हम कीचड़ की होली खेलने लगे हैं गंदगी उछालते हैं। ऐसा कर अपने आप को ऊंचा नहीं उठा रहे गिर रहे हैं। 

       चुनाव कोई समय था त्यौहार से लगते थे दुश्मनी नहीं कोई जंग नहीं लगते थे। आपस की मर्यादा का उलंघन कोई नहीं करता था हमने सीखा हुआ था कमर से नीचे वार नहीं करना है। अब तो लगता है मुकाबला ही खुद को नीचे लाने का है उसने अमर्यादित भाषा उपयोग की हम गाली की भाषा से भी नीचे की बात करेंगे। मां बहन बाप दादा तक सभी को लेकर घटिया तरह की बातें क्या शोभा देती हैं देश की संसद का चुनाव किसी बस्ती की लड़ाई जैसा बन गया है। मगर इस सब में खोया क्या है ये विचार ही नहीं करते हैं। इक मंज़िल की तलाश थी ऐसा वातावरण बनाना था जिस में हर कोई भागीदार भी हो और अपने कर्तव्य निभाकर अधिकार भी हासिल कर सके। इक शायर 43 साल पहले दुनिया से रुक्सत हो चुका मगर उसका दर्द अभी भी सालता है। उनकी ग़ज़ल की किताब का शीर्षक ही समझने को काफी है। चलो साये में धूप , की बात करते हैं। पहली ग़ज़ल से शुरुआत करते हैं। 

कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हरेक घर के लिए ,
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए।
यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है ,
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए।
न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे ,
ये लोग कितने मुनासिब हैं , इस सफ़र के लिए।
खुदा नहीं न सही आदमी का ख्वाब सही ,
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए।
वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता ,
मैँ बेकरार हूं आवाज़ में असर के लिए।
तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर को ,
ये अहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए।
जिएँ तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले ,
मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।


( काश हम सब इसी एक ग़ज़ल को समझ लें , और हर दिन याद रखें अपने पूर्वजों के सपनों को )
अब कुछ और शेर दुष्यंत की ग़ज़लों से :::::::


अब तो इस तालाब का पानी बदल दो ,
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।
कई फाके बिताकर मर गया जो उसके बारे में ,
वो सब कहते हैं अब , ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा।
कैसी मशालें लेके चले तीरगी में आप ,
जो रौशनी थी वो भी सलामत नहीं रही।
( क्या ये उनके लिए भी नहीं जो उजाला करने की बातें करने को आये थे और जो उम्मीद थी वो भी खत्म की )


ये रौशनी है हक़ीकत में एक छल लोगो ,
कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगो।
किसी भी कौम की तारीख के उजाले में ,
तुम्हारे दिन हैं किसी रात की नकल लोगो।
वे कह रहे हैं गज़लगो नहीं रहे शायर ,
मैं सुन रहा हूँ हरेक सिम्त से ग़ज़ल लोगो।
( दुष्यंत के ये शेर जो अब सुनाने लगा बेहद ज़रूरी हैं याद रखना ::::: : )


हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए ,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार परदों की तरह हिलने लगी।
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर , हर गली में , हर नगर हर गाँव में ,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं ,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही ,
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।


( मित्रो इस आग को अब अपने अपने सीनों में जलाना ज़रूरी है )


खामोश रह के तुमने हमारे सवाल पर ,
कर दी है शहर भर में मनादी तो लीजिए।
फिरता है कैसे कैसे सवालों के साथ वो ,
उस आदमी की जामातलाशी तो लीजिए।


हाथ में अंगारों को लिये सोच रहा था ,
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए।
रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया ,
इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो।
कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता ,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।
कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए ,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है।
मुझमें रहते करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ ,
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है।
वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है ,
माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है।
सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर ,
झोले में उसके पास कोई संविधान है।
उस सिरफिरे को यों नहीं बहला सकेंगे आप ,
वो आदमी नया है मगर सावधान है।
वो आदमी मिला था मुझे उसकी बात से ,
ऐसा लगा कि वो भी बहुत बेज़ुबान है।


( चलो अब और आगे चलते हैं इस ग़ज़ल को पढ़ते हैं )


होने लगी है जिस्म में जुंबिश तो देखिए ,
इस परकटे परिन्द की कोशिश तो देखिए।
गूँगे निकल पड़े हैं ज़ुबाँ की तलाश में ,
सरकार के खिलाफ ये साज़िश तो देखिए।
उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें ,
चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिए।


( साये में धूप की आखिरी दो ग़ज़लें पूरी पढ़नी ज़रूरी हैं )


अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार ,
घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार।
आप बचकर चल सकें ऐसी कोई सूरत नहीं ,
रहगुज़र घेरे हुए मुरदे खड़े हैं बेशुमार।
रोज़ अख़बारों में पढ़कर ये ख्याल आया हमें ,
इस तरफ आती तो हम भी देखते फ़स्ले-बहार।
मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूं पर कहता नहीं ,
बोलना भी है मना , सच बोलना तो दरकिनार।
इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं ,
आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार।
हालते इनसान पर बरहम न हों अहले वतन ,
वो कहीं से ज़िंदगी भी माँग लाएँगे उधार।
रौनके जन्नत ज़रा भी मुझको रास आई नहीं ,
मैं जहन्नुम में बहुत खुश था मेरे परवरदिगार।
दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर ,
हर हथेली खून से तर और ज़्यादा बेकरार।


( चलिये इस अंतिम ग़ज़ल को भी पढ़ लें )


तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं ,
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं।
मैं बेपनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ ,
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं।
तेरी ज़ुबान हैं झूठी जम्हूरियत की तरह ,
तू एक ज़लील सी गाली से बेहतरीन नहीं।
तुम्हीं से प्यार जताएं तुम्हीं को खा जायें ,
अदीब यों तो सियासी हैं पर कमीन नहीं।
तुझे कसम है खुदी को बहुत हलाक न कर ,
तू इस मशीन का पुर्ज़ा है , तू मशीन नहीं।
बहुत मशहूर है आयें ज़रूर आप यहाँ ,
ये मुल्क देखने के लायक तो है हसीन नहीं।
ज़रा-सा तौर-तरीकों में हेर फेर करो।
तुम्हारे हाथ में कालर हो आस्तीन नहीं।


( साये में धूप से साभार )


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