Saturday, 18 May 2019

संकुचित स्वार्थ और झूठ फरेब की राजनीती ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

      संकुचित स्वार्थ और झूठ फरेब की राजनीती ( आलेख ) 

                                        डॉ लोक सेतिया

       आज जब देश में संसद का चुनाव आखिरी दौर तक पहुंचा चुका है तब ये हैरान करने वाली जानकारी सामने आई है कि मोदी जी ने सत्ता मिलने के कुछ ही महीने बाद चुपके से ख़ामोशी से चुनाव आयोग का नियम ही बदलवा लिया था। आजकल के आधुनिक सोशल मीडिया और व्हाट्सअप्प की पढ़ाई से ज्ञान पाने वालों को जिनको कोई खेल की जीत हार या कोई दौड़ अथवा तिरंगा लहराना आई लव माय इंडिया कहना ही देशभक्ति लगती है और जिनको देश की गरीबी से लेकर वैचारिक शून्यता तक से कोई मतलब नहीं है उनको बीते इतिहास की बात पढ़ना क्या सुनने की फुर्सत नहीं न ही ज़रूरत लगती है। जब कोई दल गांधी जी के कातिल को देशभक्त बताने वाले आतंकवादी घटना के आरोपी को दल का उम्मीदवार बनाता है और देशभक्ति की अपनी परिभाषा बनाना चाहता है जिस में धर्मं के नाम पर हिंसा की जा सकती है और वोटों की गंदी राजनीति लोगों को विभाजित करने का काम कर देश को बांटती है तब खामोश रहना देश के लिए कर्तव्य को भुलाना है। आज आपको इतिहास की कुछ घटनाओं को याद करवाते हैं।

                   12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायलय ने तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित कर रद्द करने के साथ उनको अगले छह साल तक चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया था। कारण था चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग करना जब खुद पद पर रहते वो किसी सरकारी कर्मचारी की ही तरह वेतन पाती थी। किसी को इसकी उम्मीद नहीं थी और ये इक मील का पत्थर है न्यायपालिका की निष्पक्षता साबित करता हुआ साहसपूर्वक निर्णय था। जो व्यक्ति  काला धन भ्र्ष्टाचार और सत्ता का दुरूपयोग की बात करते हुए ईमानदारी का दावा करते हुए सत्ता पाता है वो अगर सत्ता मिलते ही चुनाव आयोग का नियम कानून ही इक नोट भेजकर चंद घंटों में बदलवा लेता है और नया नियम उसके चुनावी दौरों के खर्च को उसके दल का खर्च नहीं मानता और इसका बोझ जनता पर पड़ता है उसको कोई भी उचित नहीं कह सकता है। अर्थात पिछले चार साल तक मोदी जी अपने दल के चुनाव पर सभाओं पर बेतहाशा धन देश के खज़ाने से लुटवाते रहे हैं। चोरी रोकना नहीं इसको डाका डालने का अधिकार खुद ही हासिल करना समझना होगा। और ये खबर कोई आपको इतने समय तक नहीं देता  है। जब खबर देने वाले सत्ता का गुणगान करने और अपना घर भरने में लगे हों तब सच की चिंता कौन करता है। जबकि  ये नियम गलत है और भेदभावपूर्ण ही नहीं जनता के धन और सरकारी खज़ाने की लूट है जैसा लगता है तो ऐसे करने वाले को देश की भलाई करने वाला नहीं कहा जा सकता है। उस निर्णय के अनुसार पिछले जितने चुनाव हुए जिन में ये मनमानी की गई उनकी वैधता निष्पक्षता शक के दायरे में आती है। सत्ता पाने को कुछ भी करना देशभक्ति कदापि नहीं कहला सकता है।  काला धन की बात छूट गई है और चुनाव पर करोड़ों रूपये बर्बाद ही नहीं किये जा रहे बल्कि सत्ता धनबल का खेल बन गई है। सबसे मालामाल दल किस तरह से ईमानदारी की बात कर सकता है क्या उनके ऊपर धन की सोने चांदी की बरसात यूं ही होने लगी है।

     बात निकली तो पता चला है कि चुनाव आयोग भी बंटा हुआ है और सत्ताधारी नेताओं के अनुचित आचरण पर ऐतराज़ करने वाले की बात असहमति को दर्ज नहीं किया जाता है। किस बात की पर्दादारी है और जिस तरह मोदी जी ने वंशवाद परिवारवाद की आलोचना की उस से भी अधिक खतरनाक हर पद पर अपने पसंद के लोगों को नियुक्त करते जाना रहा है जो आज व्यक्तिवाद तक पहुंच गया है जो देश के संविधान और लोकतंत्र को निरर्थक बना सकता है। शायद ऐसे में आज इक जाने माने इतिहासकार रामचंद्र गुहा जी का इक अख़बार में छपा लेख बहुत सामयिक है उसके कुछ अंश पढ़ कर समझते हैं पहले प्रधानमंत्री नेहरू और आज के प्रधानमंत्री मोदी में ज़मीन आसमान का अंतर है। आपको कौन अच्छा लगता है ये आपके विवेक पर है। अमर उजाला के लेख से अंश इस तरह हैं।

                                      नहरू का पहला चुनाव अभियान

जन उन्हें पता चला कि उनके बाद समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण पंजाब का दौरा करने वाले हैं , तो उन्होंने श्रोताओं से कहा , मैं आपको सलाह दूंगा कि आप जाकर उन्हें सुने। कई चीज़ों में मैं शायद उनसे सहमत न हूंगा। लेकिन वह एक शानदार व्यक्ति हैं। 

    आज ये सुनकर कोई यकीन नहीं करेगा कि इस देश में ऐसे लोग थे जो अपने विपक्षी धुर विरोधी का भी आदर करते थे। और ऐसी घटनाएं बहुत हैं , आज खुद को महान साबित करने को आपके पर असंसदीय भाषा है बाकी सबको खराब बताने से अपशब्द कहने की क्या इनको अच्छे संस्कार और महानता की निशानी कहते हैं। ज़रा उस भाषण की बात को भी याद करते हैं। उन्होंने सभा में मौजूद लोगों को " भयावह सांप्रदायिक तत्वों " के प्रति आगाह करते हुए कहा कि वे देश में बर्बादी और मौत ला सकते हैं। उन्होंने आग्रह किया कि दिमाग की खिड़कियां खोलें और दुनिया के हर कोने से ताज़ी हवा आने दें। एक और भाषण में उन्होंने कहा था कि जो व्यक्ति सांप्रदायिक सोच वाला होता है वह छोटा व्यक्ति होता है जो कि कोई बड़ा काम नहीं कर सकता है ऐसे तुच्छ सिंद्धांतों पर आधारित देश भी छोटे हो जाते हैं। सांप्रदायिक संगठन बीमार भावनाएं फैला कर भारी नुकसान कर रहे हैं। नेहरू ने अपने भाषण में कहा कि मैं अन्य दलों का ज़िक्र करता हूं लेकिन सिर्फ सिद्धांतों के सवाल पर। मैं उन्हें व्यक्तित्व के दृष्टिकोण से नहीं देखता। वह वैसा ही कुछ कहना चाहते थे जैसा कि अब्राहम लिंकन ने एक बार नैतिक रूप से मज़बूत और साकारात्मक दृष्टिकोण वाला समाज बनाने की बात कही थी। लेखक अंत में लिखते हैं पाठक चाहें तो नेहरू के भाषणों के स्वर और विषयवस्तु की तुलना आधुनिक नेताओं के भाषण से कर सकते हैं। लेखक लिखते हैं कि मैं तो केवल अनुमान लगा सकता हूं कि आज से पचास साठ साल बाद कोई भी इतिहासकार यह दर्ज नहीं करेगा कि 2019 के चुनाव में किस किस नेता ने क्या कहा था।

           हैरानी हुई कुछ लोग चुनाव आयोग या अन्य संस्थाओं की गिरती साख और उनको अनुचित ढंग से इस्तेमाल करने के सवाल पर कहते हैं विपक्ष हार को देख कर ये कह रहा है। ये कमाल है अभी वोट मशीनों में बंद हैं और आपको नतीजा भी मालूम है क्योंकि ये पहले से समझते हैं बेशक कोई लाख झूठा साबित हो उसके दावे खोखले साबित हों तब भी देश को उन्हीं को चुनना होगा मज़बूरी है। ये किस मानसिकता के लोग हैं जिनको देश संविधान से बड़ा कोई नेता लगता है। जो लोग कोंग्रेस में नेहरू को प्रधानमंत्री बनाने की बात पर ऐतराज़ जताते हैं और पटेल या और कितने नाम लेते हैं उनको अपने दल में कोई दूसरा क्यों नज़र नहीं आता है और अब तो दल की नहीं इक व्यक्ति की सरकार की बात करते हैं। ये दोहरे मापदंड वाले लोग कभी अपने भीतर झांक कर नहीं देखते हैं। औरों पर पत्थर फेंकने वालों को अपने शीशे के घरों की चिंता करनी चाहिए। सबको नसीहत खुद मियां फ़ज़ीहत जैसी बात लगती है।

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