Friday, 31 August 2018

शोध महिअलों द्वारा पुरुषों की उन्नति पर ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 शोध महिअलों द्वारा पुरुषों की उन्नति पर ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

( ये इक काल्पनिक व्यथा कथा है और इसका किसी व्यक्ति से कोई संबंध केवल इत्तेफाक हो सकता है )

        अधिकतर टीवी सीरियल में ये शब्द इतने बारीक लिखे होते हैं कि कोई पढ़ नहीं सकता है। और आजकल के टीवी सीरियल और फ़िल्में वास्तविकता से मीलों दूर होते भी हैं। मगर यहां सच और कल्पना का मेल टूथपेस्ट के विज्ञापन की तरह बेस्ट है। महिला को ये बताने को पीएचडी नहीं करनी पड़ी , कह दिया तो कह दिया , मुफ्त में नहीं पैसे लेकर कहा है। पैसे का महत्व समझना हो तो उस तथाकथित महानायक से पूछना जो बताता है स्वाद सबकी मां के बने खाने का एक ही है और पांव लागूं मांजी कहता है मसाले की डिब्बी को। इसी को कहते हैं जिसकी खाओ बाजरी उसकी लगाओ हाज़िरी। जो भी पैसा से उसी के गुण गाओ। आजकल बादाम बेच रहे हैं , बादाम खाओ करोड़पति बन जाओ। जनाब जो बादाम आपने खाये सब नहीं खा सकते , चिंता हो भी तो आपके हाथ से मालिश नहीं करा सकते। आपको लगता है शोध की बात तो भूल ही गई , भला इसका उससे क्या संबंध हो सकता है। ये जो हैं वो नहीं होते अगर इक महिला ने इनको कई फिल्मों में असफल होने के बाद वापस नहीं जाने देने को नायिका की भूमिका नहीं की होती। उस भलाई का बदला चुकाने को उनसे विवाह किया था बाद में उसकी कहानी फिर सही। आज महिलाओं की सभा में विषय यही है कौन कौन पुरुष किस किस महिला की वजह से कहां पहुंचा है। इक मीना कुमारी अदाकारा भी थी जिस को इस्तेमाल कर कितने लोग नायक बन गए और फिर छोड़ दिया। रेखा की भी कहानी सब जानते हैं , मगर समस्या बीच वालों की है , मध्यमवर्ग की महिला को बोलने तक की मनाही है। 
            इक आधुनिक नारी कह रही है कि जो राजनेता आज सत्ता के शिखर पर है उस में भी एक महिला का हाथ है। जब उसे विवाह करके छोड़ गया था और कोई कारण भी नहीं बताया था न तलाक ही दिया था , तब उस महिला को अपने अधिकार की लड़ाई लड़नी चाहिए थी। मेरा दावा है अगर आजकल की तरह वो या उसके परिवार वाले पुलिस थाने शिकायत दर्ज कराते तो झक मार कर वो घर वापस आया होता। मगर क्योंकि उस महिला को वो बात समझ आ गई थी जो बाकी महिलाओं को आधी ज़िंदगी बिताने के बाद समझ आती है कि इससे शादी कर मिला क्या। झूठे सपने अच्छे दिन वाले जो कब आएंगे खुद भी नहीं जानते। अब अगर खुद नौकरी कर अपने पैरों पर खड़े होकर कमाना है तो ऐसे आदमी का साथ काहे रखना जो विवाह करता है और छोड़ देता है। आज उस महिला ने नहीं इन्होंने खुद स्वीकार किया है कि वो मेरी पत्नी है , महिला को मालूम है ऐसे आदमी को अपना पति बताना कोई ज़रूरी नहीं है। ये किसी को कुछ नहीं दे सकता है झूठे वादों को छोड़कर। अब कोई पुरुष सीना ठोककर ये तो नहीं कह सकता कि मुझे मेरी बीवी से बचाओ। लड़ती है झगड़ती है ये करना तो हमारा युगों से चला आ रहा अधिकार है। बीवी के बेलन से डरकर भागने वाले को क्या कहते हैं। चाहे जो भी हो आज वो जो भी है अपनी पत्नी की मेहरबानी से ही तो है। उसको घर से भागना रास आया तो इधर उधर मौज मस्ती करने के बाद राजनीती में चला आया और इतना बड़ा नेता बन गया है। अभी भी पत्नी दुनिया की नज़र में छोड़ी हुई औरत है। घर से निकालने में और छोड़ने में भी अंतर होता है। घर से निकालता कोई तो लोग उस पति को बुरा भला कहते हैं , खुद भाग जाता पति घर से तो ससुराल वालों से दुनिया वालों तक तोहमत महिला पर लगाते हैं। क्या हर बात पर अदालत जाने वाले महिला आयोग मानवाधिकार आयोग या महिलाओं के संगठन को ये सब दिखाई नहीं देता है। समरथ को नहीं दोष गुसाईं , मध्यम वर्ग को ही सब सहना पड़ता है। गरीब महिला को पति कुछ कहे तो गली में बवाल कर देती है। अमीर महिला आधी जायदाद छीन लेती है और दूसरी शादी कर लेती है। कितनी फ़िल्मी अदाकारा कितनी शादी कर चुकी कोई नहीं जनता। किसी किसी ने तो शादीशुदा पुरुष से भी शादी कर ली मगर समाज की जुबां पर ताला लगा रहा दौलत का। खुद तुलसीदास घर से बीवी के ताने से तंग आकर भागे तो रामायण रच डाली। रॉयल्टी बीवी को मिलती तो ठीक था। इक शब्द नहीं लिखा कि मुझे प्रेरणा मिली अपनी पत्नी से।
                        इक दूसरी महिला ने कहा कि अभी भी महिला को इक मिसाल कायम करनी चाहिए और अदालत में गुज़ारे भत्ते की मांग करनी चाहिए। अगर सही समय पर मुकदमा दर्ज करवाती तो कब की उस आदमी की समझ काम करने लगती। पुलिस अदालत के फेरे सात फेरों से कहीं ज़्यादा कठिन होते हैं। हो सकता है उस महिला को यही लगा हो ऐसे पति की पत्नी बनकर रहने से अच्छा है अपने दम पर रहना। मगर ऐसे से ही पुरुषों को मनमानी की आदत पड़ जाती है और जब चाहा छोड़ जाते हैं सभी को। हम हैरान हैं एक महिला के अधिकारों की रक्षा सुरक्षा नहीं करने वाले को महिलाएं ही वोट कैसे दे सकती हैं। महिला विरोधी से महिला आरक्षण की उम्मीद नहीं की जा सकती है। अपनी पत्नी को जो अच्छे दिन नहीं दिखला सका उससे देश को अच्छे दिन लाने की बात सुन भरोसा करना बहुत भारी भूल है। कोई भी अगर किसी महिला से शादी करने के बाद छोड़ता है बिना कारण और तलाक दिये बगैर तो उसको ऐसा करने की सज़ा मिलनी ही चाहिए। औरत अगर किसी की उन्नति का कारण बन सकती है तो किसी को उसकी असलियत भी बता सकती है। ऐसी महिलाएं सारे महिला समाज का अहित करती हैं एक अपना ही नुकसान नहीं करवाती हैं। ये बात क्या तीन तलाक से कम खराब है। हम महिलाओं को उस छोड़ दी गई औरत को अधिकार दिलवाने ही चाहिएं। सभी महिला संगठन साथ मिलकर मांग करें कि हमारी उस बहन को इतने सालों बाद ही सही इंसाफ मिलना चाहिए और हमारी मांग नहीं मांगी जाती और आदर सहित अपनी पत्नी को लाकर अपने साथ सिंघासन पर नहीं बिठाया गया तो एक भी महिला उस दल को वोट देकर महिला जगत से धोखा नहीं करेगी। अगले चुनाव का मुद्दा हम ने ही तय करना है। अब एक तिहाई आरक्षण महिलाओं को मिले न मिले बराबरी का अधिकार मिलना चाहिए। उनकी सहानुभूति मुस्लिम महिलाओं के साथ है तो क्या हम महिला नहीं हैं। फैसला उनका है घर बसाना है चुनाव जीतना है या फिर तलाक ही सही। जंग आर पार की है। 

No comments: