Sunday, 19 August 2018

घोड़े की कहानी घास की ज़ुबानी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    घोड़े की कहानी घास की ज़ुबानी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

     हम दोनों का साथ जन्म जन्म का है। मैं जनता की तरह हूं और तुम नेता की तरह। तुम मुझे चरते भी हो और पांव तले कुचलते भी हो मगर मैं खामोश रहती हूं। चनावी मौसम के आने से पहले नेता खाली बादलों जैसे गरजने लगते हैं जनता को अपने होने का एहसास दिलवाने को और बारिश लाएंगे वादों की समझाने को। घोड़े की तरह अपने दल को मालिक समझ अपने पीठ पर बिठा सत्ता की मंज़िल तक पहुंचाने को तैयार रहते हैं और उसी के हाथ पकड़ी लगाम से दिशा और गति बदलते हैं। नेताओं के जनता मौसमी घास की तरह है भूख लगी तभी खाने को काम आती है मौसम गुज़रते ही घास की तरफ देखते ही नहीं घर बैठे पेट भरने को जो चाहते हैं मिल जाता है। नेता खुद भरोसे के काबिल नहीं होते मगर हर समय यही सोचते हैं ये जनता है इसका कोई भरोसा नहीं कब किसे पटक दे किसे सर पर बिठा ले। भगवान कृष्ण भी इस बारे उपदेश देने से बचते हैं। घास की मज़बूरी है घोड़ा किसी दल के रंग का हो लगाम किसी के भी हाथ हो चुनना पड़ता है , कुछ घोड़े घोड़े नहीं गधे होते हैं जो बेकार शोर करते हैं और कब किसी को दुल्लती मार दें कोई नहीं जानता। इनकी गति धोबी के गधे की तरह की होती है घर के रहते हैं न ही घाट के। गधों की परेशानी है कि कुम्हार की बीवी गधे से गिरती है तो लड़ती कुम्हार के साथ है। हारने के बाद अपनी हार का ठीकरा किसी और पर डालना इसी को कहते हैं। घोड़ा घास खाते खाते घास से अपनी कहानी सुन रहा है। 
              जनता बेचारी जानती ही कैसे परखना है किस रंग के घोड़े पर दांव लगाना है। घोड़ों की दौड़ में जुए पर देश की गरीब जनता दांव पर लगी होती है। जो भी जीते चीरहरण करना ही है। बेबस है कोई चारा नहीं है नागनाथ सांपनाथ दोनों एक से हैं। कुंवारी कन्या की तरह ख़ुशी से पहले वरमाला डालती है उसके बाद पछताती है किसे क्या समझ कर चुना और वो क्या निकला। पांच साल की बात है उसके बाद शायद कोई मसीहा आज़ाद करवाने आएगा सोचती है। मसीहा कभी नहीं आता है अपनी रस्सी अपनी जंजीर खुद तोड़नी पड़ती है खुद को घायल कर आज़ाद होने को। सब को अपनी सेज सजानी है और उसका उपयोग करना है अपनी मनमर्ज़ी से हर तरह की कामना पूरी करने को। जनता का सब कुछ लूट कर भी उनकी हवस मिटती नहीं है पांच साल में और तब फिर से छलने को नया जाल बुनते हैं मछली पकड़ने की तरह या पंछी को पिंजरे में कैद करने को दाना डालते हैं। सियासत चोले बदलती है और हर बार रूप बदलकर लुभाती है। घास सूखे में मर जाती है और वादों की बारिश आते ही लहलहाती है। ये जो तेरा सवार है वो भी गुनहगार है घास समझाती है मगर पेट भरा हो सच्ची बात कब समझ आती है। कौन सा वादा किया पूरा गिनवाती है। घोड़े की अक्ल भी घास चरने जाती है उसकी गिनती भी दस तक की ही आती है। 
             क्या यही मधुमास है , खाली सफेद कैनवास है। न कोई घोड़ा है न कहीं  हरी हरी घास है।  ये आज़ादी है या कभी खत्म नहीं होने वाला बनवास है। फिर भी लगाए हुए आस है , चाहे कितनी हताश है। सूखा मचा रही ये कैसी बरसात है। नेता की हर बार शह और जनता की मात है। हर बार दोहराया जाता फिर पुराना इतिहास है। अन्याय का नहीं होता अंत , न होती न्याय की पूरी आस है। गर्म हवाओं को कहते हैं नेता , जनता देखो आया मधुमास है। एक समान नहीं देशवासी कोई आम है कोई ख़ास है। जिस जिस पर विश्वास किया उसी ने तोडा विश्वास है। बन गए सत्ता के गलियारे चोरों और ठगों के दास हैं। उनकी सत्ता की पालकी सजी हुई है , भीतर क्या है लोकतंत्र रुपी दुल्हन की लाश है।

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