Wednesday, 15 August 2018

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 12 डॉ लोक सेतिया

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग  12 

                                                डॉ लोक सेतिया 

       15 अगस्त की कहानी काफी हद तक सच भी है। और विडंबना भी है पिछली कुछ कहानियों की तरह जिस को सुखद अंत बताया जाता है क्या वो वास्तव में सुखद है। मुझे बहुत साल पहले इक दोस्त ने इक़बाल का शेर सुनाया था जो मैंने बाद में इक़बाल की शायरी में सही पढ़ा भी समझा भी। शुरुआत उस से ही। 

     जिस खेत से दहक़ां को मय्यसर नहीं रोटी , उस खेत के गोशा ए गंदुम को जला दो।

 शायद इक़बाल ही ऐसा कह सकते थे , कि जिस खेत से किसान को पेट भरने को रोटी भी नसीब नहीं होती , ऐसे खेत की गेहूं की बालियों को जला दो। मगर शायद उनको पता नहीं था ऐसा मुमकिन नहीं है कोई किसान अपनी उगाई फसल को जला नहीं सकता है। अपनी जान जोखिम में डालकर भी फसल को बचाता है ये भी जानते हुए कि उस पर किसान का हक भी नहीं रहा कोई उसकी ज़मीन को बैंक से खरीद चुका है। बंजर ज़मीन को महनत से सींच कर फसल बोता है उगाता है तो बैंक वाला बताता है ये ज़मीन बैंक की है बोर्ड लगा दिया गया है। अब तुम्हारी महनत की फसल भी उसी की है जो इस खेत को खरीदेगा। इस से पहले बैंक वाले ज़मीन गिरवी रखकर लिया क़र्ज़ चुकाने को एक साल की मोहलत देते हैं इस शर्त के साथ कि सात दिन में 15 लाख क़र्ज़ का ब्याज चार लाख जमा करवा दे अगर। इक पहली कहानी में बेटी और बेटा घर से पिता का धन चुरा लेते हैं और जिस कंपनी के मालिक का पैसा था वो उसकी शिकायत पुलिस को करता है। इस कहानी में भी असूल और मूल्यों को दरकिनार कर पत्नी ही बेटे को वो पैसे जो किसान अपना घर भी गिरवी रखकर लाया था दे देती है। ईमानदारी को हर बार यही ईनाम आखिर क्यों मिलता है अपने ही घर से धोखा। किस मिट्टी का बना है जो कुदरत भी कभी साथ नहीं देती और कुदरत से लड़ते हुए खेत की सिंचाई करता है। जब फसल लहलहाती है और लगता है अच्छे दिन आने वाले हैं तभी बैंक वाला बताता है तुम किसान नहीं इक गुनहगार हो अपराधी हो जो कब्ज़ा करना चाहता है अपनी बिकी हुई ज़मीन पर खेती कर के। मगर वो रहम खाने की बात करता है और पुलिस को किसान को जेल नहीं डालने की बात कहता है मगर साफ करता है कि अब खेत ही नहीं उस पर खड़ी लहलहाती फसल भी उसकी हो चुकी है जिस ने ज़मीन खरीद ली है बैंक से। उसी रात सालों बाद बारिश होती है जब फसल पकी खड़ी है और उसे डूब कर बर्बाद करना है। उधर किसान बिमार है और डॉक्टर उसे आराम करने की हिदायत देता है। बेटा पैसे लेकर घर से भागकर अपनी बाकी फीस चुकाकर डिग्री लेकर छोटी सी नौकरी कर रहा है शहर में। अपना अंजाम अपना भविष्य देख लेता है अपने ही गांव के ताऊ जी को गॉर्ड की नौकरी करते और भीख लेते देख कर ईनाम के नाम पर। किसान रात को बिमारी की हालत में फसल बचाने को बारिश में खेत जाता है पत्नी और बेटी के रोकने के बाद भी। अब फसल उसकी नहीं है मगर अपनी उगाई फसल को तबाह होते नहीं देख सकता है। वहीं रात को फसल बचाते बचाते बेहोश हो जाता है और सुबह पत्नी आकर देखती है और शायद लगता है ज़िंदा नहीं है मगर आंखें खुलते ही बच गई खेती को देख जी उठता है। 
          यही वास्तविकता है कठोर धरातल की , कोई सरकार कोई फसल बीमा कोई योजना की कोई बात ही नहीं है। कहानी लिखने वाला जनता है मगर ये सच सामने नहीं लाता और कहानी का सुखद अंत दिखाने को ज़मीन खरीदने वाले साहुकार को दयावान दिखला कर किसान पर दया करता दिखाते हैं जो कहता है जैसे तुम अभी तक किसानी करते आये आगे भी करोगे और जो कर्ज़ा लिया अब बैंक की जगह मुझे चुकता करोगे। खुश हैं सभी दर्शक भी एंकर भी। किसान की ज़मीन मज़बूरी में बिक जाती है और धनवान उस पर खुद तो खेती नहीं कर सकता और किसान को बोने को देता है उपकार करता है। जो आप नहीं जानते मुझे वो भी बताना है , कारोबारी लोग एहसान नहीं करते अपने मुनाफे की बात करते हैं। मिल हो या खेत हो मज़दूर को मज़दूरी देना उनकी ज़रूरत है दया नहीं है। किसान की बदनसीबी अभी भी कोई नहीं समझा है , उसका सब कुछ लुट जाता है ऐसे ही हालात की मज़बूरी में और मिलते हैं झूठे दिलासे झूठी तस्सली और झूठी संवेदना।
       आज मौसम में घुटन थी बहुत और मेरे सीने में उससे भी बढ़कर है घुटन।  लौट आया हूं आते आते इक ग़ज़ल भी याद आई उसे भी शामिल करता हूं ताकि जो अनकहा रह गया कहा जा सके।



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