Tuesday, 31 July 2018

हम देखेंगे मगर कब देखेंगे ( हम क्या क्या भूल गये हैं ) डॉ लोक सेतिया

        हम देखेंगे मगर कब देखेंगे ( हम क्या क्या भूल गये हैं ) 

                                              डॉ लोक सेतिया 

   वो इक गीत नहीं था जो हम भूल गए हैं। कोई कहानी नहीं थी इक ध्येय था संकल्प था मकसद था। हम देखेंगे इक दिन ज़रूर हम देखेंगे। जब ज़ुल्म सितम करने वाले महनतकश लोगों की जमात की आंधी से उसी तरह उड़ जाएंगे जैसे तेज़ हवा में रूई के फाहे उड़ते हैं। दबे कुचले लोग मनसद पर बिठाये जाएंगे , सब ताज़ उछाले जाएंगे सब तख्त गिराए जायेंगे। ये जो बुत खुदा बनकर अपनी इबादत कराते हैं उन सभी को बाहर निकाल उनकी जगह वास्तविक हकदार मज़दूर किसान और देश को अपने हाथों से बनाने वालों को आदर देकर उनको छत दी जाएगी। ऐसे कितने गीत हैं जो दिलों में आग सुलगाते थे कुछ कर गुज़रने के  जज़्बात पैदा किया करते थे , केवल गीत नहीं थे इक ख्वाब का जिसकी ताबीर सामने लानी थी। हम लाये हैं तूफ़ान से कश्ती निकल के इस देश को रखना मेरे बच्चो संभल के। जिन शायरों की ग़ज़ल सुनकर हम तालियां बजाते हैं उनका मकसद तालियां बजवाना हर्गिज़ नहीं था। कहां तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए , कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए। ये क्यों हुआ और होता आया हो रहा है , एक ज़ालिम था जो कुल बस्ती का पानी पी गया। ये कौन हैं जो विचार को कत्ल करने का फरमान जारी करते हैं खुलेआम। 
             बुद्धिमानों , जिस बांस की पोर ने , सीने में छेद करवा , प्रेम गीत छूने वाली , बांसुरी बनना,  था , वह बन न जाये , दस्ता कुल्हाड़ी का। कवि का नाम बताने से क्या होगा , उसकी बात सच है आज सच की बात लिखने वाले सत्ता की कुल्हाड़ी में दस्ता ही बने हैं , पेड़ का दर्द यही है कुल्हाड़ी में लगा दस्ता उसका अपना है लकड़ी का बना हुआ। दूसरों के घर लगी आग को , बसंत कहने वालो , दावानल तो दावानल है , जिसमें घिरे हो तुम भी। कवि की बात कविता की आग थी हमने बुझाया है कई चिरागों को , सबूत हैं मेरे घर में अंधेरों के ये धब्बे , कभी यहां उजालों ने ख़ुदकुशी की है। हमने कवि को फूल अर्पित कर समझ लिया क़र्ज़ अदा हो गया। उस का संदेश कब किसी तक पहुंचा अभी। सुनो उसकी आवाज़ को , साथ चलने को खुद आना चाहता है। पर ये तो बताओ तुमने अंधेरा चीर कर जाना है , या अंधेरे की ओर ही जाना है। कोई नहीं बोला कुछ भी सब को अंधेरे की ओर ही जाना था जा रहे हैं। दुष्यंत कुमार हो या नीरज या कोई पंजाबी कवि रेणु सभी का दर्द वही था। सत्ता और धनवानों ने कविता ग़ज़ल को अदबी महफ़िल से निकाल कोठे पर बिठा दिया है और किसी नाचने वाली की तरह घुंघरू की ताल पर नाच नाच उन्हीं का दिल बहला रहे हैं जो नाम शोहरत इनाम पुरुस्कार से खरीद कर उनको अपने मनोरंजन को लाये हैं। चंद सिक्कों को डालकर गुलाम बना उनकी आवाज़ के दर्द का लुत्फ़ उठाते हैं। 
                        मैं तो यही सोचकर घबरा जाता हूं कि हम चले कहां से थे और आ पहुंचे कहां हैं। मैं भी गुनहगार हूं , क्योंकि कवि कहता रहा , विद्रोह का अर्थ नहीं होता , सब कुछ सहज आसान सा। शब्द गुस्साते , देते चुनौती , हमें अर्थ दो , हमें अर्थ दो। मुझे जाना था सुकरात से मिलने , अब मैं खड़ा हुन , अपने सत्य के समक्ष , हो रहे हैं सवाल जवाब , कैसे मिटेगा अज्ञानता का अंधकार। यह कौन है , किसने , लटका दिया है , बीच चौराहे , सरे आम। मैं , स्वयं ही तो हूं , नित्य , आईना दिखलाता था , कहता था कानों में निरंतर , मेरी भी सुन , मेरी भी सुन। सब और कवियों शायरों की रचनाओं के बाद आखिर में मेरी अपनी भी रचनाएं शामिल करता हूं।

बेचैनी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया


पढ़ कर रोज़ खबर कोई ,
मन फिर हो जाता है उदास।

कब अन्याय का होगा अंत ,
न्याय की होगी पूरी आस।

कब ये थमेंगी गर्म हवाएं ,
आएगा जाने कब मधुमास।

कब होंगे सब लोग समान ,
आम हैं कुछ तो कुछ हैं खास।

चुनकर ऊपर भेजा जिन्हें ,
फिर वो न आए हमारे पास।

सरकारों को बदल देखा ,
हमको न कोई आई रास।

जिसपर भी विश्वास किया ,
उसने ही तोड़ा है विश्वास।

बन गए चोरों और ठगों के ,
सत्ता के गलियारे दास।

कैसी आई ये आज़ादी ,
जनता काट रही बनवास।

इक दिन  ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

सब से पहले आपकी बारी ,
हम न लिखेंगे राग दरबारी। 

और ही कुछ है आपका रुतबा ,
अपनी तो है बेकसों से यारी। 

लोगों के इल्ज़ाम हैं झूठे ,
आंकड़े कहते हैं सरकारी। 

होते सच काश आपके दावे ,
देखती सच खुद नज़रें हमारी। 

माना आज न सुनता है कोई ,
गूंजेगी इक दिन आवाज़ हमारी।

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