Friday, 13 July 2018

आदमी का मशीन हो जाना ( सच्ची बात ) डॉ लोक सेतिया

    आदमी का मशीन हो जाना ( सच्ची बात ) डॉ लोक सेतिया 

          कितना आगे बढ़ गया अब देखो इंसान। मैं अभी तक किसी और ही दुनिया में था। ऐसा तो ख्वाब में भी नहीं सोचा था। हम अपने माता पिता को उनके चले जाने के बाद सालों तक भुला नहीं पाते हैं। कभी कभी तो अजनबी लोग भी इतने अच्छे लगते हैं कि उनकी मौत की खबर पर यकीन नहीं होता है। कल ही तो देखा था भला आज कैसे हो गया ये सब। माना हादिसे होते हैं तो हम चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते कुदरत भी क्या क्या कहर ढाती है। दुर्घटना में बाढ़ में बिजली गिरने से मौत कब कैसे आती कोई कुछ नहीं कर सकता है। हर दिन शोकसभा में सुनते हैं ऊपर वाले की मर्ज़ी है क्या कर सकते हैं। दुआ मांगते हैं आत्मा को सद्गति दे ऊपर वाला और उसके प्रियजनों को दुःख सहने की शक्ति दे। सच कहूं अभी भी लिखने का साहस नहीं हो रहा है या फिर अभी भी यकीन नहीं हो रहा जो हुआ सच वही हुआ जो मुझे दिखाई दिया। नहीं भला ऐसे कैसे हो सकता है। या फिर कोई वास्तव में इतना ज्ञानी हो सकता है जो भगवान कृष्ण के अर्जुन को गीता के सन्देश की बात को समझ गया हो। मरना है सब को और इस सच्चाई को स्वीकार करना ही पड़ता है। फिर खुद उसी ने शोकसभा आयोजित क्यों की और सब को सूचना भी दी। और लोग माना शोक प्रकट करने जाते हैं केवल नाम को ही मगर जिसका अपना नहीं रहा उसका दुःख अपना ही होता है हज़ार लोग बांटने को आएं संवेदना व्यक्त करें वास्तव में कम नहीं होता है। मगर कोई अपने माता पिता के आकस्मिक निधन को ऐसे स्वाभाविक घटना की तरह समझ इस तरह से बातें कर सकता है जैसी कुछ हुआ ही नहीं हो मेरे लिए समझना कठिन है। मेरी खुद की आयु साठ साल है , क्या मतलब उसकी अस्सी साल से अधिक होगी और कितना जीना चाहिए। पास बैठा कोई दूसरा साथ दे रहा था ये अच्छा है दो तीन दिन आई सी यू में रहा नहीं तो महीनों बिस्तर पर पड़े रहना बहुत खराब मौत होती है उसके बाद। आपस में बातें कर रहे थे कोई रोग नहीं था कोई परेशानी नहीं थी घर से निकले भले चंगे और अचानक ये असंभव सी बात हो गई। बहुत आराम से रहते थे पेंशन मिलती थी पचास हज़ार से अधिक हर महीने और इस आयु में खाना पीना क्या होता है दाल सब्ज़ी , रोग भी कैसे होते हैं तेज़ाब बनना या गैस या कब्ज़। 
               छोड़ यार अपनी बात बताओ किस किस देश में सैर की। और उसके बाद आधा घंटा तक विदेशों की बात होती रही। होटल की खाने पीने की और वहां के तौर तरीकों की। किसी पार्टी में जाकर जैसे चर्चा करते हैं। मुझे मौत से डर नहीं लगता मगर ये मौत मुझे डरावनी लगी।  क्योंकि अधिकतर लोग जीना चाहते ही नहीं या जीना जानते ही नहीं मगर शायद बहुत थोड़े लोग होंगे जो सच में हर हाल में ज़िंदा रहते हैं। ऐसे व्यक्ति का निधन विचलित करता है , उसे जीना था जीना जनता था जीता भी था और जीना चाहता भी था। नहीं उसे इस तरह नहीं जाना था , ये नहीं सोचा था उसने। उसकी ज़िंदगी में कितनी अनहोनी घटनाएं घटी फिर भी वो ज़िंदादिल ज़िंदगी से हारा नहीं कभी। हम तो कायर लोग हैं जो जीना जानते ही नहीं और मौत से भी डरते हैं इसलिए जीते हुए भी मरते हैं। मैंने बहुत कम लोग अपने सामने ऐसे देखे हैं जिनके चेहरे पर शिकन नहीं दिखाई देती बेशक उनके भीतर कितने समंदर गहराई में दर्द वाले दबे रहते हैं। मैं तीस साल से जनता रहा हूं उनको अपने शहर में आकर आते जाते , फिर बसते हुए , और अब पता चला वो चले गए थे इस शहर से किसी और शहर , जहां से और और आगे चले गये हैं किसी दूसरी दुनिया में। जो मर गया उसे क्या फर्क पड़ता है कोई उसके जाने से दुखी है या नहीं।  सुनते रहे हैं कुछ लोग वसीयत मिलने पर खुश होते हैं , मगर यहां तो सब पहले दे दिया था उन्होंने। आदमी में और मशीन में एक ही अंतर है कि मशीन को सुख दुःख का एहसास नहीं होता है। आदमी की रगों में लहू बहता है जो लाल रंग का होता है , कहावत सुनी थी उसका लहू सफ़ेद हो गया है। शायद कुछ ऐसा ही लगा मुझे।

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