Thursday, 10 August 2017

मनचलों की परंपरा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

       मनचलों की परंपरा (  हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

ये क्या हुआ कैसे हुआ कब हुआ , जो हुआ जब हुआ तब हुआ को छोड़ो। सब कहते हैं बुरा हुआ बहुत बुरा हुआ , मगर बात फिर आकर पहुंची है वहां पर , ज़माने पुराने मनचले होते थे कभी जहां पर। इक मनचले ने सत्ता के नशे में किया गुनाह , इक महिला को समझा खिलौना खेलने का , मगर इक नारी नहीं घबराई नहीं साहस हारी , उस मनचले की गई थी नशे में मत मारी। जब नहीं बस चला दुशासन और धृतराष्ट्र का ,
कहने लगे बेटी है मेरी बहन है मेरी वो तो। इस नई सच्ची कहानी की धूम है , नहीं सुरक्षित महिला शहर की भी , सरकार भी है बहरी और अंधा कानून है। मौके पर ही पकड़ा गया मनचला मगर अपराधी निकला सत्ता का सपूत। अब किसे दिखाई देते गुनाह के सबूत। पिता नेता जा पहुंचे थाने लेकर सौ समर्थकों को छुड़वाने। बदल गई निगाह छोटा हो गया गंभीर गुनाह। मगर जब होने लगे हर तरफ से सवाल। क्या इसी को कहते हैं ईमानदार सरकार का 1000 दिन का विज्ञापन , यही है आपके अच्छे दिनों का कमाल। हुई मुश्किल तो फिर से पकड़ना पड़ा मनचले को , बयान देना पड़ गया इक पिता को। कहने लगे जिसको किया गया इतना परेशान , महिला तो वो है मेरी बेटी के समान। मनचले ने इक पुरानी रस्म निभाई , बनाया उसको बहन खुद बन गया भाई। देखना जिस दिन होगी उस बहन की विदाई , बहुत आंसू बहाएगा मुंह बोला भाई। जिसको बुरी निगाह से देखा उसे ही अपनी अपनी बहन बोला तो क्या जाने वास्तविक बहन पर क्या गुज़री। किसी का सर ऊंचा हुआ किसी ने गर्दन झुकाई। भाई बहन के रिश्ते को खेल समझना राजनेताओं की है बेशर्म चतुराई। 

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