Friday, 25 December 2015

अंधेर नगरी चौपट राजा ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

कुछ समझ नहीं आता हम किस तरफ जाना चाहते हैं। देश का राष्ट्रीय चरित्र क्या है। क्या सरकार का काम कानून का शासन कायम करना है अथवा अपनी सुविधा के अनुसार नियम कायदे कानून बदलना। जनहित का नाम लेकर लूट का कारोबार कब तलक चलेगा। बहुत पहले की बात है मेरे शहर फतेहाबाद में दुकानों की बोली होनी थी , लोग खरीदने को  आये हुए थे , मगर तभी मुख्यमंत्री से मिलकर कुछ लोगों ने वो मार्किट की जगह अपनी बिरादरी की धर्मशाला बनाने को देने को कहा था और बोली रद हो गई थी। ये तब मुख्यमंत्री भी जानते थे की नियमानुसार कमर्सियल जगह नहीं दी जा सकती। मगर कानून को ठेंगा दिखाने का काम हर नेता हर सरकार करती रही है। कम्युनिटी सेंटर की जगह किसी विभाग को देना कैसे सही हो सकता है , जब सरकार ,नेता प्रशासन खुद ही कानून का पालन नहीं होने देना चाहते , न्यायलय कहता रहे आप रिहायशी कोठियों में कारोबार होने देते हैं , तब कुछ भी सही भला कैसे हो सकता है।
         हरियाणा में पिछली सरकार ने सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा किये बैठे लोगों को ज़मीन का मालिकाना हक दे दिया था , अंधा बांटे रेवड़ियां की तरह। अब नई सरकार ने ऐलान किया है जो कई सालों से किराये पर बैठे हैं उनको दुकानों की मलकियत दे दी जाएगी। शायद आपको लगे की ऐसा गरीबों की भलाई करना होगा , जो वास्तव में नहीं है। इतने सालों में दुकान जाने कितने लोगों से कितने लोगों में बदलती रही और कभी एक ही के नाम पर चलती रही कागज़ों में और धंधा कोई और ही करता रहा , जाने कितने लोग पगड़ी का पैसा लेकर जाते रहे और बहुत लोग हैं जिनको उन दुकानों की ज़रूरत ही नहीं काम करने को , उनकी खुद की कितनी ही दुकानें हैं , असलियत कुछ और ही है। नेता लोग रिश्वत खाकर ये सारे काम करते हैं रिश्वत देने वालों को फायदा पहुंचाने के लिए।
                  कौन देखता है वास्तव में किसको ज़रूरत है सहायता की और सरकार किन लोगों की सहायता करती है , बस इक कहावत है चोरी का माल हो तो बांसों के गज होते हैं। मेरे इक भाई जो ठेकेदारी करते थे कहते थे की सरकार और माँ से जितना ले सको लेना उचित है , सरकारी घी मुफ्त मिलता हो तो पास बर्तन नहीं भी हो औंगौछे में डलवा लेते हैं , चाहे रिस जाये फिर भी जो चिकनाई बच जाएगी वही सही। ऐसे हो हो रहा है और जिनके पास है उनको ही और और मिलता जाता है , जिनके पास कुछ नहीं वो हमेशा खाली हाथ रहते हैं। ये देख कर लगता है गरीबों की गरीबी तब तक नहीं मिटेगी जब तक उनको सरकारी गोदामों में कोई रास्ता तलाश करना नहीं आता। अंधेर नगरी चौपट राजा , टके सेर भाजी टके सेर खाजा।

Sunday, 1 November 2015

ज़िंदगी चाहती है ( कविता ) 111 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

चाहती है ज़िंदगी
अभी शायद
और बहुत कुछ दिखाना
तभी चलते चलते
थोड़ा सा थामकर
कहती है बार-बार
सोचो देखो समझो
क्या है हासिल
और हर विपति मुझे
कुछ और ताकत
देकर जाती है हमेशा।
मालूम होता है तभी
कौन कैसा है अपना-पराया
जो नहीं जान सकते थे
बर्सों में भी हम
ज़िंदगी का कठिन दौर
दिखा देता है ,
समझा देता है
चंद ही दिनों में।
नहीं सोचता हूं मैं
जीना है कब तलक
न कोई डर है मौत का
मगर चाहता हूं
समझना अपने जीवन की
सार्थकता
नियति ने जो भी तय
किया होगा मेरा किरदार
मुझे निभाना है उसे
निष्ठा से इमानदारी से।

Sunday, 13 September 2015

हिंदी है माथे की बिंदी ( तरकश ) हिंदी दिवस 1 4 सितंबर पर विशेष - डॉ लोक सेतिया

हिंदी दिवस मनाने वाले हैं , पुराना राग सुनाने वाले हैं , हलवा-पूरी खाने वाले हैं , श्राद्ध पक्ष बताने वाले हैं , जाने किस किस को समझाने वाले हैं , रूठने और मनाने वाले हैं , अपना खेल दिखाने वाले हैं , हंस हंस कर रुलाने वाले हैं , रो रो कर भी हंसाने वाले हैं , रेवड़ियां खरीद कर लाने वाले हैं , दूर से सबको दिखाने वाले हैं , खुद ही सारी खाने वाले हैं , रहते अंग्रेजी शहर में साल भर घर अब वापस आने वाले हैं , हिंदी को बहलाने वाले हैं।
छोटा हमें बतायेंगे वो , अपना रौब जमायेंगे वो , नई किताबें लायेंगे वो , फिर सम्मान-पुरुस्कार पायेंगे वो , हिंदी हिंदी इक रोज़ गायेंगे वो , भाषा को बचायेंगे वो , महत्व मात्र भाषा का औरों को समझायेंगे वो , खुद नहीं अपनायेंगे वो , व्यथा अपनी सुनायेंगे वो , नहीं यहां रह पायेंगे वो , बस आयेंगे और जायेंगे वो।
किताब हम भी कोई छपवाते , समीक्षा मित्रों से लिखवाते , बार-बार विमोचन करवाते , काश राजधानी को जाते , किसी प्रकाशक को भी मनाते , बिना मोल जब कोई न छपता कीमत देकर खुद छपवाते , तब जुगाड़ कोई भिड़वाते , खबर अख़बारों में छपवाते , कोई पुरुस्कार झटक कर लाते , खुद ही उसका मोल चुकाते , और फिर पाकर के इतराते।
कुछ दिन की हैं बातें सारी , खत्म नहीं होती कभी ये बीमारी , कल उनकी आज अपनी बारी , हम खेलेंगे अपनी बारी , कुर्सी जब मिल गई सरकारी , थे जो कल तलक दरबारी , वही बने हैं आज अधिकारी , है पैसे की मारा मारी , बना है लेखक भी व्योपारी।
मिल कर जीजा मिल कर साला , लाएंगे इक नया उजाला , तुमने अब तक हमको पाला , अब हमने तुमको संभाला , लगा हुआ था घर पर ताला , साफ होगा अब सारा जाला , तुम भी इसको पढ़ लो खाला , भैंस बराबर आखर काला , देख के मछली जाल है डाला , बहता है बरसाती नाला।
गीत विदेशी भाषा के जो गायें , फिर उन्हीं को मुख्य-अतिथि बनायें , जो दे जायें सब खा जायें , लिख-लिखवा कर जो ले आयें , उसको पढ़ते नहीं घबरायें , सबको भाषण से बहलाएं , शब्द अंग्रेजी के दोहरायें , जब समझ हिंदी को न पायें , जिनको हमने पाल अब तक वही हमीं पर गुर्रायें , उनकी बातें समझ न पाएं , फिर भी ताली खूब बजायें , जो खुद सभा में देर से आयें , समय बहुमूल्य हमको बतायें , पहले आयें -पहले पायें।
              हर वर्ष वही तमाशा , न अधिक टोला न कम माशा , जाने है ये कैसे आशा , जो लगती जैसे निराशा , हिंदी का पेट है खाली लिखने से नहीं मिलती रोटी , उनको लगती है बताशा , हैं जो चौसर के खिलाड़ी  , जीत लेते वो हर पासा।
                    अपने भी हालात अब बदलें , हिंदी के दिन रात अब बदलें , दुनिया बदली हम भी बदलें कभी दिल के जज़्बात अब बदलें , खाली बातों से नहीं कुछ हासिल अपनी हर इक बात अब बदलें , गीत भी अपना हो धुन भी अपनी , कुछ अपनी आवाज़ अब बदलें।
                बिन माँ-बाप की बेटी है हिंदी , अंग्रेजी संग ब्याह रचाया , बनी रही इक अबला नारी , पति को परमेश्वर जो बनाया , हाथ जोड़ खड़ी है रहती , कुछ भी फिर भी हाथ न आया , भीख ही मिलती बस कहने को , नहीं कभी अधिकार को पाया , नहीं सरस्वती मां की कद्र कोई भी , कहने को है दीप जलाया , घर दफ्तर में लक्ष्मी की पूजा करना , सभी को यही है भाया , सरस्वती पुत्र दर दर खाते ठोकर , कैसी है प्रभु की माया , चलो वही तस्वीर सजायें , इक दिन हिंदी का है आया , लेकिन अब इसको भूल न जाना , किस खातिर है ये दिन मनाया।
              फिर से सबका गुरूर हो हिंदी , चाहत का सिंधूर हो हिंदी , परचम बने आंचल हिंदी का अब , हिंदी चमके बनकर देश के माथे की बिंदी।

Tuesday, 18 August 2015

मुझे जन्म देने से पहले , माँ ! ( आलेख डॉ लोक सेतिया )

यही अच्छा है कि मुझे अभी मार डालो , अपनी कोख में ही कर दो मेरे जीवन का अंत , अगर पाल-पोस कर बड़ी होने पर सालों बाद मार ही देना है , इस अपराध के लिये कि मैं अपनी इच्छा से जीना चाहती हूं , जिसको पसंद करती उसी से विवाह कर खुश रहना चाहती हूं , जाति - मज़हब की सीमा को नहीं मानती। अगर तब कानून से नहीं डरना , न ही इंसानियत की परवाह करनी है तो अभी भी क्यों संकोच करते हैं। कल अगर अपने झूठे मान सम्मान और अहंकार के लिये मुझे सूली चढ़ाना है तो मुझ पर उपकार कर दो , मुझे जन्म ही न लेने दो। आपके इस दकियानूसी समाज का यही चलन रहा तो हम बेटियां खुद ईश्वर से प्रार्थना करेंगी कि हमें नहीं जन्म दे ऐसे समाज में। जो समाज हैवानियत का नंगा नाच करने पर शर्मसार नहीं होता बल्कि शान से सिर उठाकर चलता है , उसमें बेटी बन जन्म लेना तिल तिल करके मरना है। उस समाज में बेटी , बहन , बहु क्या माँ तक का कोई स्थान नहीं हो सकता , उसे तो नारीविहीन होना चाहिए ताकि उसका अंत हो सके। जब बेटियां जन्म ही नहीं लेंगी तो वो समाज कब तक बचा रहेगा। मुझे ऐसे समाज से कुछ प्रश्न पूछने हैं।
    जिस धर्म , जिस इतिहास की आप बातें करते हैं , जिनपर कहते हैं गर्व है , क्या उसमें किसी ने प्यार नहीं किया था , प्रेम विवाह नहीं होते रहे , कन्या ने अपने वर चुनने के अधिकार का उपयोग नहीं किया था। किस किस को मिटाना चाहोगे , मीरा को , राधा को , कबीर के दोहों को , रहीम के दोहों को किताबों से नहीं जन जन के दिल से कैसे मिटा पाओगे। इक ताजमहल को ही नहीं और  तमाम प्रेम के स्मारकों को ध्वस्त करना होगा , कितने ही धर्म-स्थल को तोड़ना होगा , प्यार का नामो निशां मिटाना है अगर। खुद मिट जाओगे , नहीं मिटा सकोगे।
                आज मुझे हर समाज की , दुनिया भर की महिलाओं से इक बात कहनी है , जो माँ बनना चाहती हैं , बनने जा रही हैं। क्या आज जिसे अपनी कोख में पाल कर सृजन की अनूठी प्रसन्नता को हासिल करने का सौभाग्य प्राप्त कर रही हैं , कल अपने ही हाथों से झूठे रीति रिवाज़ों के नाम पर उसका अंत करना चाहेंगी।
ईश्वर ने तुम्हें मातृत्व का सुख इसलिए नहीं दिया कि तुम जब चाहो अपने ही अंश को मिटा दो। माँ बनना आसान नहीं है ममता का फ़र्ज़ निभाना होगा जीवन प्रयन्त।  बेटी को जन्म देना चाहती हैं तो संकल्प लें उसकी रक्षा करने का। माँ के नाते को समझे बिना माँ बनने की भूल नहीं करना। मेरी ही नहीं हर बेटी की हर माँ से यही विनती है , वो बेटियां जो जन्म ले चुकी हैं और वो भी जो अभी जन्म नहीं ले पाई।

Sunday, 16 August 2015

सुनो मेरी कहानी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

मैंने कुछ भी नहीं जोड़ा न ही कुछ कम किया , उस बेचारी डेमोक्रेसी नाम की महिला की बात सच सच लिख दी। क्या लिखता कौन दोषी है कौन निर्दोष , ये पढ़ने वालों पर छोड़ दिया , मुझे समझ नहीं आया इसको क्या शीर्षक दूं , इसलिये बिना किसी शीर्षक ही कहानी लिख दी। पढ़ते ही वो गंभीर हो गये , कहने लगे समस्या बहुत विकट है , तुम नहीं जानते बिना शीर्षक की कहानी का क्या हाल होता है। शीर्षक ही तो पढ़ने को मज़बूर करता है। बिना शीर्षक की कहानी तो कटी हुई पतंग की तरह है , छीना झपटी में ही फट जाती है , किसी के भी हाथ नहीं लगती।  या जिसके हाथ लगे वही मनमानी कर लेता है उसके साथ। ऐसी पतंग से कोई सहानुभूति नहीं जताता , क्या तुम चाहते हो तुम्हारी कहानी की ऐसी दशा हो देश की जनता जैसी। नहीं चाहते तो जाओ कहीं से कोई लुभावना सा शीर्षक तलाश करो जो बाज़ार में बिक सकता हो , फिर उसको कई गुणा दाम पर बेचो। ठीक वैसे जैसे मोदी जी का स्लोगन , अच्छे दिन आने वाले हैं , ऐसा भाया जनता को कि उनको जितना मांगते थे उससे भी बढ़कर बहुमत मिल गया।  ये सबक अरविन्द केजरीवाल को भी समझ आया और नतीजा देख लो , कहां उनको उम्मीद थी इतनी सफलता की। जब तक खुद अपनी कीमत बड़ा चढ़ा कर नहीं बताओगे , कोई इक धेला भी नहीं देगा। तुम जानते हो लोग अपनी आत्मकथा औरों से लिखवाते हैं , सभी को कहां लिखना आता है , ऐसे लेखक अपनी कीमत पहले वसूल लेते हैं दोगुनी , क्योंकि उनका नाम तो होता नहीं लिखने वाले के रूप में। अपने दुखों को बेचना तो बड़े बड़े लेखकों का काम रहा है , ऐसी मनघड़ंत कहानियां पुरुस्कार अर्जित किया करती हैं। इस तुम्हारी कहानी में न कहीं कोई नायक है न ही कोई खलनायक ही , कोई नाटकीयता भी नहीं , कोई सस्पेंस भी नहीं।  कोई प्रेम प्रसंग नहीं , न ही अवैध संबंध की ही बात। सब किरदार जैसे आस पास देखे हुए से लगते हैं , लोग , पाठक-दर्शक तो जो नहीं होता वही तलाश करते हैं। देख लो इन दिनों फिल्मों में नायक वो वो करते हैं जो नहीं किया जाना चाहिए , फिर भी लोग वाह-वाह करते हैं। अब तो खलनायक ही लोगों को अधिक भाते हैं। हर कहानी में ये सभी मसाले होने ज़रूरी हैं , वरना कहानी नीरस हो जाती है। लोग फिल्म देखते हैं या कहानी पढ़ते हैं तो रोमांच के लिए , न कि किसी विषय पर चिंतन करने को।  ये काम सभी औरों के लिए छोड़ चुके हैं , यार छोड़ , मस्त रह , मौज मना , ये सोच बना ली गई है।
          बिना मिर्च मसाले का फीका खाना तो लोग मज़बूरी में डॉक्टर के कहने पर भी नहीं खाते आजकल , तुमने कभी होटल रेस्टोरेंट का खाना खाया है , बड़े बड़े पांचतारा होटल का खाना न भी खाया हो , फिल्मों में , टीवी सीरियल में तो देखा होगा। कितना सुंदर लगता है , सजा कर परोसा जाता है , किसकी मज़ाल है जो उसको अस्वादिष्ट बता दे। कोई बताये तो लोग कहते उसको मालूम ही नहीं कांटिनेंटल खाना किसे कहते हैं। तुम्हारी कहानी कोई स्कूल की किताब में शामिल थोड़ा है जो पढ़नी ही होगी , कोई मुख्यमंत्री भी नहीं रिश्तेदार कि उसके प्रभाव से प्रकाशक तगड़ी रॉयल्टी देकर भी छापना चाहे। कहानी का नाम ही ऐसा रखो कि लगे कि ऊंचे दर्जे की कहानी है , अक्सर लोग जो कहानी समझ नहीं पाते उसको ऐसी समझते हैं। इक और बात जान लो , जिन कहानियों का प्रचार किया जाता है सच्ची घटना या किसी के जीवन पर है , उनमें सबसे ज़्यादा झूठ होता है। झूठ को कल्पना से मिला कर उसको बेचने के काबिल बनाया जाता है , कहानी का स्वरूप समय के साथ बदलता रहता है , अपनी इस कहानी को आधुनिक रूप दे दो , अच्छे अच्छे डॉयलॉग शामिल करो , खुद न लिख सको तो डॉयलॉग राइटर से लिखवा लो , या चाहो तो फिल्मों से टीवी सीरियल से अथवा पुरानी किताबों से चोरी कर लो , कोई नहीं रोकने वाला। जहां कहानी दुःख दर्द से बोझिल होती लगती है , वहां साथ में थोड़ा हास्य रस का समावेश कर दो , जैसे अभिनेता चुटकुले सुना देते हैं हंसाने को। शृंगार रस की कोई बात ही नहीं कहानी में , जैसे भी हो कोई दृश्य ऐसा हो कि पाठक - दर्शक फ़ड़फ़ड़ा उठें। कहानी में सभी की रूचि का ध्यान रखना है , आगे क्या होगा ये प्रश्न मत छोड़ो , अंत ऐसा हो कि  लोग वाह वाह कह उठें। ऐसा अंत सभी गलतियों को छुपा लेता है। अब बाकी रह जाता है किताब को या कहानी को आकर्षक ढंग से पेश करना , तो ये काम तुम संपादकों पर छोड़ दो , वे कहानी में से निकाल कर कुछ खूबसूरत शब्द ऐसे मोटे मोटे अक्षरों में छापेंगे कि  देखने वाला पढ़ने को उत्सुक हो जाये। जैसी मैंने समझाया वैसी कहानी लिखो तभी उसको अख़बार , पत्रिका , प्रकाशक छापेंगे।  लगता है मेरी कहानी अनकही अनसुनी ही रहेगी।

Saturday, 15 August 2015

ग़ज़ल 214 "महिलाओं के नाम" ( ज़माने को बदलना है , नई दुनिया बसाना है )

ज़माने को बदलना है , नई दुनिया बसाना है ,
उठा कर हाथ अपने , चांद -तारे तोड़ लाना है।
कभी महलों की चाहत में , भटकती भी रही हूं मैं ,
नहीं पर चैन महलों में , वो कैसा आशियाना है।
मुझे मालूम है , तुम , क्यों बड़ी तारीफ़ करते हो ,
नहीं कुछ मुझको देना , और सब मुझसे चुराना है।
इसे क्या ज़िंदगी समझूं , डरी सहमी सदा रहती ,
भुला कर दर्द सब , बस अब ख़ुशी के गीत गाना है।
मुझे लड़ना पड़ेगा , इन हवाओं से ज़माने की ,
बुझे सारे उम्मीदों के चिरागों को जलाना है।
नहीं कोई सहारा चाहिए मुझको , सुनो लोगो ,
ज़माना क्या कहेगा , सोचना , अब भूल जाना है।
नहीं मेरी मुहब्बत में बनाना ताज तुम कोई ,
लिखो "तनहा" नया कोई हुआ किस्सा पुराना है।

Wednesday, 12 August 2015

सब लूटने - सब बेचने की आज़ादी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

जाने क्यों मुझे लगा कि फेसबुक पर "बात महिला जगत की" पेज पर महिलाओं की बात लिखनी है तो कुछ पत्रिकाएं जो विशेषकर महिलाओं की कहलाती हैं को पढ़ना उपयोगी हो सकता है। और मैं अखबार - पत्रिकाएं बेचने वाले से ऐसी पत्रिकाएं खरीद लाया। जब पढ़ा उनको तो पता चला कि औरत को न तो खुद को कैसे ज़िंदा रखे इसकी चिंता है आज जब सुनते हैं छोटी छोटी बच्चियां तक वहशी लोगों की हवस का शिकार हो रही प्रतिदिन , न ही उसको और कोई गंभीर समस्या। पत्रिकाओं से पता चला कि आज की औरत की सब से बड़ी समस्या है कैसे उनका रंग गोरा हो सकता है , कैसे वो स्लिम हो सकती हैं , कैसे उनको नया फैशन अपनाना है , उनको मेहंदी कैसे लगानी हाथों पर , कौन सा इत्र , कौन सा दुर्गन्ध नाशक इस्तेमाल करना है , कैसे घर को कीमती चीज़ों से सजाना है। कहीं नहीं लगा कि उसको भूख की गरीबी की , खुद पर हो रहे अन्याय - अत्याचार की भी कोई समस्या है। अधिक नहीं तो 60 से 7 0 प्रतिशत महिलाओं की , जो खेतों में - घरों में दिन रत काम करती रहती , जो मज़दूरी करती हैं , जो सड़कों - गलियों से कूड़ा एकत्र कर बेच कर अपना और अपने बच्चों का पेट भरती हैं , जो हर जगह प्रताड़ित की जाती रहती हैं , डरी सहमी रहती हैं , उनकी एक भी बात मुझे नहीं मिली पढ़ने को।  लगा जो समाज मैं देखता हूँ आस पास वो तो यहां कहीं है ही नहीं , न जाने ये कहां की महिलाओं की बात है। मगर उन्हीं को दोष देना उचित नहीं है , यहां धर्म वालों को लोगों को धर्म क्या है , उस पर कैसे चलना है , नहीं सिखाना , उनको धर्म को बेचना है ताकि वो नाम शोहरत और दौलत कमा सकें।  कोई शिक्षा का कारोबार करता है , कोई स्वास्थ्य सेवाओं को बेचने में लगा है , मीडिया-पत्रकारिता की बात और सच्चाई की बात करने वाले , सच को नहीं तलाश करते वो सच का लेबल लगा कुछ भी बेच रहे हैं। पैसा कमाना ही एकमात्र उद्देश्य बन गया है सभी का। समाजसेवा तक एन जी ओ बना कर की जाती है ताकि सरकार से देश विदेश से चंदा लेकर जैसे मर्ज़ी उपयोग कर सकें। अब कोई आपकी पहचान का अफ्सर या विधायक - सांसद  बन गया तो उस से सरकारी धन अपने लिये पाने का ये आसान रास्ता है , इन जी ओ बना लो ! खास बात है सभी शीशे के घर में रहते हैं , कौन दूसरे को गलत बता सकता है। ये जो नेता उपदेश देते हैं आपको त्याग करने का औरों के लिये , आप सब्सिडी नहीं लो तो किसी और को देंगे , उनसे कोई पूछे तो कि देश में सब से बड़े परजीवी कौन हैं , आप नेता लोग जिनको इस गरीब देश से सभी कुछ चाहिए। जाते हैं गांधी जी की समाधि पर फूल अर्पित करने , की चिंता सब से दरिद्र की , भाषण देते हैं देशभक्त शहीदों का नाम लेकर , क्या यही सपना था उनका कि आप शासक बन राजसी शान से रहो और यहां हज़ारों लोग गरीबी से तंग आकर ख़ुदकुशी करते रहें !
       क्या कहोगे कि ख़ुदकुशी का गरीबी से कोई ताल्लुक नहीं , चलो नरेंदर मोदी जी की सरकार के पहले साल के ये आंकड़े देखते हैं  , जिन लोगों ने आत्महत्या की उनकी आमदनी क्या थी , देखें :::
91820 जिनकी वार्षिक आय एक लाख से कम थी।
35405 जिनकी वार्षिक आय एक लाख से पांच लाख तक थी।
3656 जिनकी वार्षिक आय पांच लाख से दस लाख तक थी।
785 जिनकी वार्षिक आय दस लाख से अधिक थी।
( अब भूख से मरने वालों की गिनती तो कोई करता ही नहीं , उसको तो किसी रोग से मरना बताते हैं )
      पंद्रह अगस्त को आज़ादी का जश्न कौन लोग मनाते हैं , कितने गरीब शोषित , गलियों में भीख मांगते बच्चे , रोज़ काम की तलाश में भटकने वाले युवा , और भी बदनसीब हैं जिनको अभी आज़ादी का अर्थ तक नहीं मालूम !

Tuesday, 4 August 2015

महिला जगत के लिये , पैगाम-ए-ग़ज़ल ( मजाज़ लखनवी से लोक सेतिया "तनहा" तक )

     मजाज़ लखनवी जी  की  ग़ज़ल :::::::
     हिजाबे फ़ितना परवर अब हटा लेती तो अच्छा था ,
     खुद अपने हुस्न को परदा बना लेती तो अच्छा था।
     तेरी नीची नज़र खुद तेरी अस्मत की मुहाफ़िज़ है ,
     तू इस नश्तर की तेज़ी आज़मा लेती तो अच्छा था।
    तेरा ये ज़र्द रुख ये खुश्क लब ये वहम ये वहशत ,
    तू अपने सर से ये बादल हटा लेती तो अच्छा था।
    दिले मजरूह को मजरूहतर करने से क्या हासिल ,
    तू आंसू पौंछकर अब मुस्कुरा लेती तो अच्छा था।
   तेरे माथे का टीका मर्द की किस्मत का तारा है ,
  अगर तू साज़े बेदारी उठा लेती तो अच्छा था।          ( साज़े - बेदारी = बदलाव का औज़ार )
  तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन ,
 तू इस आंचल को इक परचम बना लेती तो अच्छा था।
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                                ये शायद गुस्ताखी है कि ऐसे शायर के इतने लाजवाब कलाम के बाद ये नाचीज़ अपनी नई लिखी ताज़ा ग़ज़ल सुनाये।  मगर ऐसा इसलिये कर रहा हूं कि मुझे भी वही पैगाम आज फिर से दोहराना है , अपने अंदाज़ में।  पढ़िये शायद आपको कुछ पसंद आये :::::::
    ज़माने को बदलना है , नई दुनिया बसाना है ,
    उठा कर हाथ अपने , चांद तारे तोड़ लाना है।
    कभी महलों की चाहत में भटकती भी रही हूं  मैं ,
   नहीं पर चैन महलों में वो कैसा आशियाना है।
    मुझे मालूम है तुम क्यों बड़ी तारीफ करते हो ,
    नहीं कुछ मुझको देना और सब मुझसे चुराना है।
    इसे क्या ज़िंदगी समझूं , डरी सहमी सदा रहती ,
    भुला कर दर्द सब बस अब ख़ुशी के गीत गाना है।
    मुझे लड़ना पड़ेगा इन हवाओं से ज़माने की ,
    बुझे सारे उम्मीदों के चिरागों को जलाना है।
    नहीं कोई सहारा चाहिए मुझको , सुनो लोगो ,
    ज़माना क्या कहेगा सोचना , अब भूल जाना है।
    नहीं मेरी मुहब्बत में बनाना ताज तुम कोई ,
    लिखो "तनहा" नया कोई , हुआ किस्सा पुराना है।
              ( डॉ लोक सेतिया "तनहा" )  

Friday, 24 July 2015

है तो बहुत कुछ और भी बताने को , हो अगर फुर्सत कभी ज़माने को ( आलेख डॉ लोक सेतिया )

कभी कभी सोचता हूं क्या अच्छा होता है , खुश रहना , मौज मस्ती करना , मुझे क्या हर बुराई को देख यही सोचना या फिर उदास होना देख कर कि देश समाज कितना झूठा कितना दोगला और कितना संवेदनाहीन हो चुका है। कोई सत्येंदर दुबे मार दिया जाता है भ्र्ष्टाचार के बारे पत्र लिखने के बाद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को , क्योंकि वो पत्र लीक हो जाता है देश के प्रधानमंत्री कार्यालय से। नहीं ये अकेली घटना नहीं है , ये हर दिन होता है। हज़ारों पत्र लिखे जाते हैं मुख्यमंत्रियों को अधिकारियों को जो रद्दी की टोकरी में फैंक दिये जाते हैं। हमारा समाज देखता तक नहीं उनको जो चाहते हैं बंद हो ये सब , कोई दुष्यंत कुमार अपनी बात ग़ज़ल में बयां करता है तो कोई दूसरा लिखने वाला व्यंग्य या कहानी में। सोचता है कोई , समझता है कोई। हां जब कोई शोर मचाता है लोकपाल के लिये आंदोलन का या कुछ भी बताकर और खबरों में छा जाता है हम उसको मसीहा मान लेते हैं। हम क्यों देखें कि इनमें कौन क्या है , इक वो है जो आयकर विभाग से वेतन लेकर विदेश पढ़ने को जाता है मगर वापस आकर नियमों का पालन नहीं करता कि अब उसको दो साल विभाग को अपनी सेवायें अनिवार्य रूप से देनी हैं। इतना ही नहीं वो विभाग से लिया क़र्ज़ भी तब तक लौटने को तैयार नहीं होता जब तक चुनाव लड़ने को ऐसा करने को मज़बूर नहीं होता। क्या यही ईमानदार है , या फिर इनका दूसरा साथी जो कहने को शिक्षक है , वेतन पढ़ाने का पाता रहता है मगर काम कोई और ही करता है मीडिया में जुड़कर। ये सब अवसरवादी लोग सत्ता हासिल करते ही उन्हीं के जैसे हो जाते जिनको कोसते थे पानी पी पी कर। अब उनको एक ही काम ज़रूरी लगता है विज्ञापनों द्वारा खुद को महिमामंडित करना।
             चलो उनको छोड़ औरों की बात करते हैं , पिछली सरकार ने हर विधायक को मंत्री-मुख्य संसदीय सचिव बना रखा था , उसका विरोध करने वाले अब खुद वही कर रहे हैं। हरियाणा में जो पहली बार विधायक बने उनको भी कुर्सी मिल गई , किसलिये ? क्या प्रशसनिक ज़रूरत को , कदापि नहीं , ताकि वो भी अपना घर भर सकें। और मोदी जी क्या करना चाहते हैं , किन लोगों की चिंता है ? देश की इक तिहाई जनता जो भूखी रहती है आपको उसकी ज़रा भी चिंता है , लगता तो नहीं।  किसानों की बात भी ज़रूरी है , मगर मोदी जी मिलते हैं अमिताभ बच्चन जी जैसे किसानों से , कोई गांव का किसान भला मिल सकता किसी ज़िले के अफ्सर से भी , मंत्री की बात तो छोड़ो।  मिल कर भी क्या होगा , ये सत्ता पर काबिज़ होते ही भीख देना चाहते हैं उनको जो वास्तव में देश की मालिक है जनता। मोदी जी तो इक कदम आगे बढ़कर अब सब्सिडी को छोड़ने को कहते हैं ये वादा कर कि किसी और को देंगे। ये नेता और इनके वादे , प्रचार पर पैसा बर्बाद करने वाले क्या जानता ये पैसा जिनका है वो भूख से मर रहे हैं , ख़ुदकुशी करने वाले किसानों को मोदी जी के मंत्री नपुंसक और असफल प्रेमी बताते हैं निर्लज्जता पूर्वक।  शर्म करो। बात आम आदमी पार्टी की हो या भाजपा की , जो कांग्रेस किया करती थी अपनों के अपकर्मों पर खामोश रहना वही ये भी करते हैं। किसी शायर का इक शेर याद आया है :::::
                 " तो इस तलाश का अंजाम भी वही निकला ,
                   मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला। "
                  चलो इक और बात की जाये , बेटी बचाओ की बात , बेटी के साथ सेल्फ़ी की बात , अखबार भरे पड़े हैं तस्वीरों से , मुस्कुराती हुई।  वो जो कचरा बीनती फिरती हैं , कौन हैं ? वो जो घर घर सफाई बर्तन साफ करने का काम करती वो कौन हैं , इक सेल्फ़ी भी उनकी नहीं जिनके हिस्से कुछ भी नहीं है।  चलो छोड़ो उनका भाग्य ऐसा मानकर , मगर जिनकी सेल्फ़ी देख रहे हैं उनको क्या सब अधिकार मिलेंगे।  ये पूछना उस पिता से क्या उसको बेटे के बराबर सम्पति में हिस्सा दोगे ?
                सरकार बदलती है , तरीका नहीं बदलता , दिखाने को खिलाड़ियों को करोड़ों के ईनाम , असल में बच्चों को खेलने देने को समय नहीं न ही सुविधा। हरियाणा में किसी खिलाड़ी को स्कूल बनाने को ज़मीन , किसी को नौकरी भी पुरूस्कार भी। जब वक़्त आता देश के लिये पदक लाने का तब बिक जाते हैं खिलाड़ी बाज़ार में महंगे दाम पर। अब अदालत ने पूछा है हरियाणा सरकार से वो क्या कर रही थी जब सरकारी नौकरी पर नियुक्त खिलाड़ी विज्ञापन कर रहा था बिना अनुमति प्राप्त किये। लो इक नई खबर , वही पुराना तरीका , हरियाणा में अपने ही वरिष्ठ मंत्री , नेता को उन्हीं के विभाग के कर्यक्रम में नहीं बुलाना या समझ लो ऐसे बुलाना जैसे न आने को , फिर उसकी जासूसी करते सी आई डी वाले।  क्या डर है इनको , अगर सच ईमानदारी से देश सेवा करनी तो कोई आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। पर्दादारी की ज़रूरत तभी होती है जब राज़ होते हैं छुपाने को।

Saturday, 11 July 2015

आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली की दशा कैसी ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

कभी लगता है की जैसे सच में हमारी आयुर्वेदिक पद्धति फिर इक बार लोकप्रिय हो रही है , जबकि ये सही नहीं है। आयुर्वेद के नाम पर कुछ लोग दवाओं का कारोबार ज़रूर कर रहे हैं और खूब मुनाफा कमा रहे हैं , लेकिन वास्तव में वो आयुर्वेद का कोई भला नहीं कर रहे , उसका दुरूपयोग ही कर रहे हैं ! वे लोगों को रोगमुक्त करने को कोई दवा नहीं बना रहे , बनाते हैं कुछ दवायें जिनसे उनको मनचाहा मुनाफा मिल सके ! जैसे सुंदरता बढ़ाने का दावा करने वाली क्रीम या मोटापा दूर करने वाली दवायें ! यौवनशक्ति वर्धक दवायें या कोई लंबे बाल करने और गंजापन दूर करने की दवा ! यहां मुझे ये सवाल नहीं पूछना की वो कितनी कारगर हैं या मात्र धोखा हैं ! जो सवाल करना है वो उनसे भी और खुद अपने आप से भी करना है , वो ये कि क्या हम जानते हैं आयुर्वेदिक पद्धति का अभिप्राय क्या है ! ये पैसा बनाने का कोई कारोबार नहीं है , ये वो मानव कल्याण का मार्ग है जिसमें विश्व में सभी के स्वास्थ्य की कामना की गई है !आप आयुर्वेदिक दवाओं को मात्र कोई उत्पाद समझ नहीं बना और बेच सकते अपने लाभ के लिये ! आजकल जैसे आयुर्वेदिक दवाओं को विज्ञापन द्वारा प्रचार से या कुछ लोग अपनी शोहरत का उपयोग कर शहर-शहर फ्रैंचाइज़ी बेच कर रहे वो तो इक छल है आयुर्वेद के साथ। वास्तव में किसी भी पद्धति में ऐसे उपचार नहीं किया जा सकता न ही किया जाने दिया जा सकता है। ये तो लोगों के जीवन से खिलवाड़ करना है जिसको प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता , लेकिन खेद की बात है स्वास्थ्य विभाग ऐसा होते देख कोई कदम नहीं उठा रहा , खामोश रह सब होने दे रहा है।
 ये धारणा गल्त है कि हर दूसरा आदमी आयुर्वेदिक जानकार हो सकता है , अख़बार में विज्ञापन देकर या टीवी चैनेल पर रोगों का निदान और उपचार बताना अनुचित ही नहीं कानून के अनुसार भी अपराध है , और चिकत्सा क्षेत्र से तो धोखा करना है ही। पद्धति जो भी हो सब से महत्वपूर्ण होता है इक योग्य चिकित्स्क का होना जिसने ज्ञान , शिक्षा और प्रशिक्षण प्राप्त किया हो अर्थात क्वालिफाइड हो। सही निदान वही कर सकता है और निर्धारित करता है किसको क्या दवा दी जानी चाहिए।
                आपको आयुर्वेदिक ईलाज उसी चिकित्स्क से ही करवाना चाहिये , एलोपैथी हो , होमियोपैथी चाहे आयुर्वेदिक प्रणाली सभी में स्नातक कोर्स होते हैं , जिसमेंचिकित्सा के बहुत सारे विषय पढ़ाये जाते हैं , आयुर्वेद हज़ारों साल पुरानी प्रणाली है मगर यहां भी , द्रव्य-गुण , रोग-निदान , काया-चिकित्सा , शल्य-चिकित्सा , बाल-रोग , इस्त्री रोग जैसे तमाम विषय हैं पढ़ने को ! मगर आज भी लोग एक चिकित्स्क में और नीम हकीम में भेद करना नहीं जानते , तभी किसी से भी अपने स्वास्थ्य के बारे राय ले लिया करते हैं। अस्पताल में काम करने वाला हर कर्मचारी चिकित्सक नहीं हो सकता , बेशक वो इक अंग है जो सहायक है चिकित्स्या करने में। दवा बेचने वाला केमिस्ट जब आपको अधकचरी जानकारी से किसी रोग पर सुझाव देता है तो उसको भले थोड़े धन का लोभ हो वो आपके स्वास्थ्य से खिलवाड़ ही करता है। मगर आप हैं कि कम्पाउंडर या नर्स तो क्या वार्ड में रख-रखाव को नियुक्त व्यक्ति को भी अपना सलाहकार बना लेते हैं। कभी सोचा है खुद अपनी जान को कितना सस्ता समझ लिया है हमने। कुछ लोग ऐसा समझते हैं कि देसी दवा कोई भी बता सकता है , जो सही नहीं है। आपको नहीं मालूम आयुर्वेदिक प्रणाली को विकसित होने में हज़ारों वर्ष लगे हैं , आधुनिक प्रणाली में लैब में कुछ ही दिन में परीक्षण किया जाता है जबकि आयुर्वेद की दवायें अपने समय में चिकिस्क बहुत जोखिम उठा कर खुद पर परीक्षण करते रहे हैं। आपको हैरानी होगी कि वो जांच वो परीक्षण इतने सत्य थे कि हज़ारों साल पहले जो लिखा हुआ चरक-सुश्रुत में वो आज भी सही साबित होती हैं , जबकि आज जो बात आधुनिक लैब जांच के बाद डॉक्टर्स बताते हैं कुछ वर्ष बाद गल्त साबित होती रही हैं। कितनी दवायें सालों देते रहने के बाद प्रतबंधित की जाती रही हैं।
           आयुर्वेद कोई अवैज्ञानिक प्रणाली नहीं है , आपको मालूम है मोतिया बिंद ( कैटरेक्ट ) का जो ऑपरेशन किया जाता है वो कैसे संभव हुआ होगा , ये जानकारी भी आयुर्वेद के ग्रंथों की देन है। आज आयुर्वेद की दशा भी ईश्वर जैसी है , सब जगह लोगों ने आस्था को अपना कारोबार बना लिया है। आयुर्वेदिक दवायें बनाने वाली कम्पनियों ने भी , पंडित-मौलवी , धर्म-गुरु की तरह इसको मुनाफा कमाने को इस्तेमाल किया है फ़र्ज़ को दरकिनार कर के। उनका उदेश्य रोगों की दवायें बनाना नहीं है , उनको ऐसी दवायें बनानी हैं जो प्रचार से बेच कर तगड़ा मुनाफा कमाया जा सके। ये आयुर्वेद के साथ धोखा है , विश्वासघात है , छल है। वो ऐसी दवायें बेच करोड़पति बन गये मगर आयुर्वेद की प्रतिष्ठा को दांव पर लगाकर। मीडिया का दखल हर जगह बढ़ गया है , सही गल्त की पहचान करना और सभी को जानकारी देना उचित है , मगर बिना विषय की जानकारी भी खुद को निर्णायक समझने की मानसिकता ने उसको मार्ग से भटका दिया है। जब अख़बार टीवी पत्रिका वाले बताने लगें कि इस रोग की ये दवा है तब वो चिकित्सा नहीं आपके जीवन से खिलवाड़ है। मगर ऐसा काम खुले आम हो रहा है जो आयुर्वेद और जनता दोनों के लिये हानिकारक है। सरकार केंद्र की हो चाहे राज्यों की सभी ने जनता के स्वास्थ्य से किया जाने वाला ये अपराध होने दिया है। आयुर्वेद के साथ तो सौतेला व्यवहार किया जाता रहा है , सरकार के बजट का मात्र तीन प्रतिशत बाकी सब चिकिस्या पद्धति को और सत्तानवे प्रतिशत एलोपैथी को आबंटित किया जाता है। ऐसे में आयुर्वेद को बढ़ावा देने की बातें और आश्वासन कोरे झूठ हैं। मुझे इक पत्रिका ने कुछ साल पहले इक पत्र लिखा था जिसमें लिखा हुआ था कि आजकल लोग आयुर्वेद की ओर आकर्षित हैं और चाहते हैं आयुर्वेदिक ईलाज कराना , संपादक जी चाहते थे कि मैं आयुर्वेद का स्नातक होने के कारण उनकी पत्रिका के लिये इक कॉलम लिखूं लोगों को रोगों की दवायें बताऊं। वो गल्त नहीं कह रहे थे कि ऐसा करने से मुझे भी नाम मिलेगा और दूर-दूर तक पहचान भी। मगर मुझे आयुर्वेदिक चिकिस्या प्रणाली का दुरूपयोग अपने लाभ के लिये करना अनुचित लगा था और मैंने इनकार कर दिया था।मैंने उनको जवाब भेजा था कि मेरे विचार से ऐसे रोगों का सही उपचार नहीं किया जा सकता , हां अगर आप चाहें तो मैं पाठकों को कुछ लेख द्वारा जागरुक कर सकता हूं ताकि उनको जानकारी हो कि ज़रूरत पड़ने पर कैसे अपना चिकित्स्क और प्रणाली का चयन करना चाहिये। खान-पान , रहन-सहन , आचार-व्यवहार में क्या बदलाव कर स्वस्थ जीवन बिता सकते हैं। ये भी कि जानकारी दी जा सकती है कि कब किस डॉक्टर के पास जाना चाहिये , लोगों को समझाया जाना चाहिये कि छोटा-बड़ा अस्पताल या डॉक्टर नहीं होता है , देखना ये है कि कब आपको किसकी आवश्यकता है। हर वह डॉक्टर अच्छा नहीं हो सकता जिसके पास भीड़ लगी हो या जिसका नाम प्रचार बहुत सुना हो , सही ईलाज के लिये ऐसा डॉक्टर होना चाहिये जो आपकी सही जांच , और आपकी समस्या को ध्यान पूर्वक सुनने को समय दे सकता हो। इक सच आपको नहीं मालूम होगा कि जिनके पास बहुत अधिक भीड़ होती है उनको अपने डायग्नोसिस पर नहीं दवाओं पर ऐतबार होता है और वे आपको कितनी ही ऐसी दवायें लिख देते हैं जिनकी ज़रूरत नहीं होती अगर उनके पास रोग को समझने और निदान करने को समय या फुर्सत होती। सही इलाज के लिये सब से ज़रूरी है चिकत्स्क की योग्यता , अनुभव और अपने काम के प्रति उचित दृष्टिकोण। मगर उन संपादक जी को मेरा सुझाव नहीं पसंद आया था , क्योंकि उनको अपने पाठकों को प्रसन्न करना था जागरूक नहीं।
               मुझे ये स्वीकार करने में बिल्कुल संकोच नहीं है कि आयुर्वेद को खुद आयुर्वेदिक प्रणाली के शिक्षित लोगों ने भी दगा दी है। कई आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज में जहां मिश्रित प्रणाली की शिक्षा दी जाती है , छात्रों को एलोपैथी और आयुर्वेदिक दोनों का ज्ञान वा जानकारी दी जाती है , वहां भी अधिक ज़ोर आधुनिक प्रणाली पर दिया जाता है। हम अपने मरीज़ों को ये नहीं समझाना चाहते कि आयुर्वेदिक दवायें अधिक सुरक्षित हैं जबकि अंग्रेजी दवाओं के दुष्प्रभाव बहुत अधिक होते हैं। कितनी बार ऐसी दवायें रोग को खत्म नहीं करती , केवल लक्षणों को मिटाती हैं। यहां किसी प्रणाली को कमतर नहीं बताया जा रहा , बेशक एलोपैथी में नये अविष्कार और अनुसंधान से कितनी जटिल समस्याओं का हल मिला है शल्य-चिकिस्या द्वारा या बहुत सारी नई दवाओं से। ज़रूरत है सभी तरह की चिकित्सा को मिल कर अपना दायित्व निभाने की , सभी को स्वास्थ्य रहने में सहयोगी होने की। इक बात समझनी होगी कि सवासौ करोड़ की आबादी वाला देश बिना अपनी देसी चिकित्सा प्रणाली को महत्व दिये सभी को स्वस्थ रखने का मकसद हासिल नहीं कर सकता।
            शायद आपको मालूम होगा कि आज भी कितने ही रोगों की आधुनिक प्रणाली में कोई दवा नहीं है। एलोपैथिक डॉक्टर भी उनके लिये आयुर्वेदिक दवायें ही लिखते हैं , पीलिया , बवासीर , पत्थरी होना , पौरुष ग्रंथि का रोग , शुक्राणुओं की कमी , महिलाओं की समस्याओं का ईलाज आयुर्वेदिक दवाओं से ही किया जाता है। इक अपराध आयुर्वेद और अन्य सभी देसी प्रणाली के चिकित्स्क करते रहे हैं , अपनी जानकारी को गोपनीय बना पीड़ी दर पीड़ी अपने पास रखना , मानव कल्याण को भुला कर। हां इक अहम बात , ये मान लेना कि केवल नाड़ी देख कर सभी रोगों का पता चल सकता है , कदापि सही नहीं है , पल्स देखना एक हिस्सा मात्र है रोगी की जांच का। अब इक चौंकाने वाली डब्लू एच ओ की रिपोर्ट , कई साल पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी थी कि भारत में ज़रूरत से पांच गुणा अधिक दवायें इस्तेमाल की जा रही हैं और वो भी अधिकतर शहरी इलाके में , गांवों तक नहीं पहुंचती वो दवायें। इक कटु सत्य ये भी कि अस्पतालों-नर्सिंगहोम्स की बढ़ती संख्या के साथ रोग और रोगी कम नहीं हो रहे अपितु अधिक बढ़ रहे हैं , ये गंभीर चिंता की बात है। हमारे यहां भेड़ चाल की बुरी आदत है , हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती , ये जानते हुए भी चमक-दमक और प्रचार से प्रभावित हो कुछ भी अपना लेते हैं।
      मुझे लगा फेसबुक पर केवल खुद की अपने मतलब की बात को छोड़ , इक सार्थक काम किया जाये , सोशल मीडिया पर सभी को आयुर्वेद और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी और जहां संभव हो राय भी दी जाये।
मगर यहां भी लोग सोचते अपनी गंभीर समस्या को घर बैठे हल कर लें , जो हो नहीं सकता। ज़रा इक बात सोचना , जब आप जाते किसी डॉक्टर के पास तब क्या वो कोई एक दवा ही लिखता है ? नहीं , उसको पूरा इक नुस्खा लिखना पड़ता है आपकी समस्या को समझ कर। तब कोई एक दवा किसी भी इक रोग का पूरा उपचार कैसे हो सकती है। बेशक कुछ समस्याओं का समाधान हो सकता है उन पुराने तजुर्बों से , मगर हर बिमारी का ईलाज बिना चिकित्स्क को मिले नहीं हो सकता। आसानी कभी कठिनाई बन सकती है , याद रखना।
( आपने ये लेख पढ़ा , अपनी राय देना , और अच्छा लगा हो तो औरों को भी बताना।  नेक काम होगा )

Sunday, 31 May 2015

राष्ट्रपिता होने की निशानी मांगती है इक बच्ची ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

बच्चों का खेल नहीं है बच्चों के सवालों के जवाब देना। बड़े बड़े ज्ञानी लोग बच्चों के सवाल का हल नहीं खोज पाते। अपनी अज्ञानता को छुपाने को कह देते हैं , ये बच्चों की समझ की बातें नहीं हैं। मगर हमेशा ये इतना आसान नहीं होता। भले टीवी पर इक विज्ञापन दावा करता है की अमुक ब्रांड का जांगिया पहन आप असम्भव को सम्भव कर सकते हैं " बड़े आराम से "। सरकारी विज्ञापन कब से समझा रहे हैं जनता को की देश प्रगति कर रहा है , मगर हम क्या करें देश में भूख से लोग मरते हैं , किसान खुदकुशी करने को मज़बूर हैं , लोगों को साफ पानी तक नहीं मिलता पीने को , बच्चे आज भी पढ़ने की उम्र में मज़दूरी करने को विवश हैं , गरीबों को कहीं भी मुफ्त इलाज नहीं मिलता। सरकार उनके मरने पर बीमे की बात करती है , ज़ख्मों पर नमक छिड़क कर कहती है , लो अच्छे दिन आये हैं। लगता है मैं भावावेश में विषय से भटक गया , चलो मुद्दे की बात करते हैं। काश बाज़ार के और सरकार के विज्ञापन झूठे नहीं होते , तो हर समस्या का समाधान किया जा सकता। कल तक अगर किसी बच्चे के सवाल का जवाब नहीं दे सकते थे तो चुप रहने से काम चल जाता था। सतसठ साल से देश में सरकारें यही करती आई हैं , लेकिन सूचना के अधिकार ने  सरकार को बहुत परेशानी में डाल रखा है।
    लखनऊ वालों की बात ही अल्ग होती है , जब वहां रहने वाली लड़की का नाम ऐश्वर्या हो तो कहना ही क्या। दस साल की ऐश्वर्या ने देश की सरकार को दुविधा में डाल दिया है , वह भी इक सवाल पूछकर की किस आधार पर महत्मा गांधी को राष्ट्रपिता का दर्जा मिला हुआ है। बच्ची ने सवाल पीएमओ से पूछा था , पीएमओ ने उसे ग्रहमंत्रालय और ग्रहमंत्रालय ने उसे राष्ट्रीय अभिलेखागार को भेज दिया था , अभिलेखागार की सहायक निदेशक जयप्रभा रवींद्रन ने जवाब भेजा की उनके पास कोई भी ऐसा दस्तावेज़ मौजूद नहीं है। अर्थात भारत सरकार को इसकी जानकारी नहीं है की महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता किस आधार पर माना जाता है। अब इससे आगे का प्रश्न बहुत ही असहज करने वाला हो सकता है। पुरानी कितनी हिट फिल्मों की कहानी पिता के नाम की , मां की अथवा माता-पिता के कातिल की तलाश को लेकर होती थी। उन फिल्मों से स्टार सुपरस्टार क्या नायक महानायक तक बन गये लोग। हमारे समाज में पिता का नाम होना बेहद ज़रूरी है , यदा कदा उसके सबूत की ज़रूरत आन पड़ती है। कभी किसी के पिता या बेटे होने पर संशय हो तो मामला संगीन हो जाता है। इक राजनेता को अदालत में घसीटा गया , डीएनए टेस्ट करवाया गया ये साबित करने को की वो किसी का पिता है। अब दुनिया वाले हमसे सवाल पूछ सकते हैं की बताओ क्या सबूत है गांधी जी के राष्ट्रपिता होने का , ऐसे में हम डीएनए टेस्ट भी नहीं करवा सकते सतसठ साल पहले स्वर्ग सिधार चुके महात्मा गांधी जी का। यहां उनकी चीज़ों का कारोबार ही होता आया है , उनके विचार सब कभी के भुला ही चुके हैं। दिखाओ कोई हो जो इक धोती में रहता हो ये देख कर की लोग नंगे बदन हैं।
         जब भी ये सवाल खड़ा होगा साथ कितने और प्रश्न भी लायेगा , पिता के नाम के साथ जन्म की तिथि की भी बात होगी। देश आज़ाद भले 1947 में हुआ हो उसका जन्म तब नहीं हुआ था वो बहुत पहले से था , नाम बदलता भी रहा हो तब भी इतना तो तय है की देश का अस्तित्व महात्मा गांधी के जन्म लेने से पहले से था। अर्थात राष्ट्र के पिता का जन्म बाद में हुआ जबकि राष्ट्र पहले से था। बात मुर्गी और अंडे जैसी सरल नहीं है , लगता है हमने एक पुत्र को अपने ही पिता का पिता घोषित कर डाला। " चाइल्ड इस फादर ऑफ़ मैन " कहते भी हैं , लेकिन दार्शनिकता की नहीं ठोस वास्तविकता की बात है। लोग इधर नकली प्रमाण पत्र बना लेते हैं , हमें ऐसा नहीं करना है , तलाश करना है किस आधार पर उनको राष्ट्रपिता घोषित किया गया। क्या है कोई सबूत या यहां भी किसी फ़िल्मी कहानी की तरह कोई इतेफाक है जो अंत में मालूम पड़ता है। सरकार को संभल जाना चाहिये , मीडिया को भी हर किसी को भगवान घोषित करने से सबूत सामने रखना चाहिये , जो आम इंसान भी नहीं साबित होते कभी वक़्त आने पर , उनको आपने कैसे कैसे भगवान घोषित किया हुआ है , खुद आपका भगवान तो केवल पैसा ही है ना। कल कोई बच्चा अपने मां -बाप से कह सकता है , मुझे तो नहीं लगता की आप मेरे माता-पिता हैं।

Wednesday, 20 May 2015

बिटिया रानी को लिखी इक चिट्ठी ( डॉ लोक सेतिया ) 110 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

बिटिया रानी ,
कभी नहीं बुलाया ऐसे तो तुझे मैंने ,
हां अक्सर तेरी मां बुलाती है तुझको ,
जाने कितने प्यारे प्यारे नामों से ,
पर दिल चाहता है मैं भी बुलाता ,
तुझको कोई ऐसा ही प्यार भरा ,
सम्बोधन दे कर बेटी-पिता के नाते का।
अभी तो बीता नहीं इक महीना भी ,
बिदा किया तुझको बिठा कर डोली में ,
कितने चाव से कतने अरमानों से ,
हज़ारों दुआएं देकर तेरे भविष्य की ,
जाने कितनी खुशियों की उम्मीदों ,
कितने रंग बिरंगे सपनों के साथ।
अभी तो गुज़रे हैं दिन पंद्रह ही ,
जब दो पल को ही सही तू घर आई थी ,
पगफेरे की रस्म निभाने को संग लिये ,
अपने जीवन साथी को अपने ससुराल के परिवार को।
याद आती रहती हैं हम सभी को पल पल ,
बातें तेरी क्या बतायें कैसी कैसी ,
कह देती मुझे पापा आप फिर लिख दोगे ,
हर बात पर कोई कविता-कहानी ,
मुझे नहीं है सुननी ,
नहीं मुझे भी बेटी सुनानी।
पर आज नींद नहीं आई मुझे रात भर ,
करते करते तेरे फोन का इंतज़ार ,
लगता है कब से नहीं हो पाई खुल के ,
तुझसे तेरे मेरे सबके बारे में बात ,
 दिल करता है अभी मिलने को तुझे ,
बुला लूं तुझे या चला जाऊं तेरे पास।
याद है जब भी कभी होता था कुछ भी ,
तेरे मन में कहने को ख़ुशी का चाहे ,
छोटी छोटी आये दिन की परेशानियों का ,
करती थी फोन पर हर इक अपनी बात ,
क्या क्या बता देती थी कुछ ही पल में ,
चाहे रही हो कितनी भी दूर घर से ,
यूं लगता था होती हर दिन थी मुलाकात।
जानते हैं हम सभी खुश हो तुम बहुत ,
अपने जीवन में आये इस सुहाने मोड़ से ,
बहुत कुछ नया सजाना है जीवन में ,
समझना है निभाने है रिश्ते नाते सभी ,
नहीं खेल बचपन का गुड्डे गुड़ियों का विवाह ,
खिलने फूल मुस्कुराहटों के तेरे चमन में।
तुझे नहीं मालूम आज तबीयत मेरी ज़रा ,
लगती है कुछ कुछ बिगड़ी हुई सी ,
यूं ही ख्याल आया कभी ऐसे में ,
मुझे प्यार से डांट देती थी तुम कितना ,
और अधिक की होगी लापरवाही ,
बदपरहेज़ी ,
ख्याल रखते नहीं आप अपना पापा ,
मुझे देनी पड़ती थी कितनी सफाई ,
बताता था कब से आईसक्रीम नहीं खाई।
कहने को मन में हज़ारों हैं बातें ,
यही चाहता मिल के खुशियों को बांटे ,
तुझे बुलाना है तेरे अपने ही इस घर में ,
कितनी ही तेरी अपनी चीज़ें हमने ,
वहीं पे सजा कर रखी हैं जहां रखी तुमने ,
सभी कुछ वही है ,
तेरा था जैसा घर में ,
नहीं है वो रौनक जो होती बेटियों से ,
तरसती है छत ,
तेरे कदमों की आहट को ,
तू ही फूल हो जो खिला इस आंगन में।
समझना वो भी जो लिख नहीं पाया ,
ये खत नहीं है ,
नहीं है पाती ,
मुझे याद है वो जो तुम हो गुनगुनाती ,
सुना तुझसे था खुद भी साथ गाया ,
कभी भी नहीं धूप तुमको लगे बेटी ,
रहे प्यार का खुशियों का तुझपे साया।

Monday, 6 April 2015

ग़ज़ल
रात दिन साथ मिलकर चले किसलिये ,
फिर भी बढ़ते रहे फासिले किसलिये !

उम्र भर जब अकेला था रहना हमें ,
फिर बनाते रहे काफिले किसलिये !

देख कर लोग सारे ही हैरान हैं ,
इन बबूलों पे गुल सब खिले किसलिये !

हर किसी को बहुत कुछ है कहना मगर ,
चुप सभी लोग हैं , लब सिले किसलिये !

मिल के दोनों चलो आज सोचें ज़रा ,
दिल नहीं जब मिले , हम मिले किसलिये !

रोक लीं जब किसी ने हवाएं सभी ,
फिर ये पर्दे सभी खुद हिले किसलिये !

रौशनी को नहीं चाहते लोग जब
दीप "तनहा" तुम्हारे जले किसलिये !


Sunday, 8 March 2015

ग़ज़ल 217 ( कहां तेरी हकीकत जानते हम हैं )

कहां तेरी हक़ीकत जानते हम हैं ,
बिना समझे तुझे पर पूजते हम हैं।

नहीं फरियाद करनी , तुम सज़ा दे दो ,
किया है जुर्म हमने , मानते हम हैं।

तमाशा बन गई अब ज़िंदगी अपनी ,
खड़े चुपचाप उसको देखते हम हैं।

कहां हम हैं , कहां अपना जहां सारा ,
यही इक बात हरदम सोचते हम हैं।

मुहब्बत खुशियों से ही नहीं करते ,
मिले जो दर्द उनको चाहते हम हैं।

यही सबको शिकायत इक रही हमसे ,
किसी से भी नहीं कुछ मांगते हम हैं।

वो सारे दोस्त "तनहा"खो गये कैसे ,
ये अपने आप से अब पूछते हम हैं।

Saturday, 7 March 2015

ग़ज़ल 218 ( अभी बाकी यही इक काम करना है )

अभी बाकी यही इक काम करना है ,
हमें तकदीर को फिर से बदलना है।

चहक कर सब परिंदे कह रहे सुन लो ,
उन्हें हर आस्मां छूकर उरतना है।

यही इक बात सीखी आज तक हमने ,
न कह कर बात से अपनी मुकरना है।

न भाता आईना उनको कभी लेकिन ,
उन्हें सज धज के घर से भी निकलना है।

हमारी प्यास बेशक बुझ नहीं पाई ,
हमें बन कर घटा इक दिन बरसना है।

उसी से ज़िंदगी का रास्ता पूछा ,
कि जिसके हाथ से बेमौत मरना है।

नई दुनिया बसाओ खुद कहीं "तनहा" ,
हुआ मुश्किल यहां पल भर ठहरना है।

Thursday, 12 February 2015

आम आदमी पार्टी की जीत का राज़ ( तरकश ) डा लोक सेतिया

चलो पहले इक कहानी याद करते हैं। कोई आम आदमी नेता बन गया , मंत्री पद मिल गया , इक पुराने दोस्त ने फ़ोन किया बधाई देने को। कह दिया जब अपने शहर आना तब मिलना , मंत्री बने मित्र बोले भाई तेरे घर आना तभी होगा जब चाय पिलाने का प्रबंध करो। पुराने दोस्त ने याद दिलाया यार तुम जब भी आते थे घर तब खुद ही रसोई घर में चले जाते थे , सबको पसंद जो थी तुम्हारी बनाई हुई चाय। मंत्री बन चुके मित्र ने समझाया कि उनके पी ए से पूछ लेना कैसा प्रबंध करना है। पी ए साहब ने समझाया कि नेता जी के साथ पूरा लावलश्कर होता है , अकेले चाय नहीं पीते , और खूब साज सज्जा और खाने पीने की व्यवस्था करनी होगी। उन पुराने दोस्त ने कहा पी ए साहब अपने मंत्री जी को बता देना उनको शायद भूल हुई है ये वो मित्र हैं ही नहीं जो मैं समझा था। वो तो बिना बताये जब मन हो चला आता था , बुलाना नहीं पड़ता था। और जब भी आता था कितने ही फूल खिल जाते थे उसकी मुस्कुराहट से। ये तो कोई दूसरा ही है जिसको बुलाना तो क्या मिलने से भी डर लगने लगा है। फिर भी कहना उनको जब ये मंत्री पद नहीं रहे तब शर्माना नहीं , हम नहीं बदलेंगे कभी। शासक बनते ही लोग आम आदमी नहीं रह जाते। कहानी का अंत बाद में , पहले राज़ की बात।
                                    यकीनन केजरीवाल एंड पार्टी को वो अलादीन का चिराग मिल गया है। अब जनाब केजरीवाल साहब कोई झूठे वादे थोड़ा करते हैं , ईमानदार , देश और जनता के सेवक , राजनीति को साफ सुथरा बनाने वाले नायक हैं। जो वादे किये उनको पांच साल में अवश्य ही पूरा करेंगे। ज़रा देखते हैं उनको क्या क्या काम करना है और किस रफ्तार से करना होगा। उनकी सरकार के पास पांच साल अर्थात १८२५ दिन हैं। ५०० नए स्कूल खोलने हैं मतलब हर ३. ६५ दिन में इक स्कूल , अर्थात हर चौथे दिन। २० नए कॉलेज भी खोलने हैं मतलब हर तीन महीने में नया इक कॉलेज खुलेगा। १५००००० सी सी टी वी कैमरे भी लगाने हैं , हर २ मिनट में इक कैमरा लगेगा। २००००  पब्लिक टॉयलेट्स बनाने हैं मतलब हर १३ मिन्ट में एक शौचालय बनेगा। झोपड़ी वालों को घर भी मिलेगा , इसका हिसाब भी लगाना है हर दिन सैंकड़ों मकान नए बनेंगे , सरकार बना कर देगी।
अब इसके बजट भी आयेगा ही , बजट में बिजली आधे रेट पर , पानी मुफ्त , और वैट की दर भी कम की जाएगी।
               ये करने का एक ही तरीका मुमकिन है , केजरीवाल जी को कोई अलादीन का चिराग मिल गया है , जो हुक्म मेरे आका बोलेगा और जो वो आदेश देंगे झट कर देगा।

Monday, 9 February 2015

वेलेनटाईन डे पर विशेष , प्रेम , ईश्क , क्या होता है ( आलेख ) डा लोक सेतिया

इधर सुनते हैं प्यार , इश्क़ , मुहब्बत की बहार आई हुई है। कोई नया तरीका है ये प्यार करने का। फलां दिन फूल देना है , इस दिन चॉकलेट , उस दिन परपोज़ करना है , और किस दिन इज़हार करना है। लगता है प्यार नहीं किया कोई अनुबंध किया है बाकायदा तरीके से। कमी रह जाती है तो इतनी कि इसका कोई दस्तावेज़ नहीं लिखा जाता न कहीं उसको दर्ज ही किया जाता है , वर्ना इसको भी कारोबार ही कहते। सच कहता हूं ऐसे प्यार की बात में मैं किसी भी सच्चे प्यार करने वाले का नाम नहीं शामिल करना चाहता। अपमान होगा उनका जिनका प्यार इक इबादत था , जुनून था , इक मिसाल था। नहीं सुना किसी सच्चे आशिक़ ने उसको बेवफ़ा कहा हो जिसको खुदा समझा और प्यार किया उस से। इधर तो कसमें वादे जाने क्या क्या करते हैं। इक शायर ने लिखा था इक नज़्म में , अपनी प्रेमिका को "तू मुझे ठुकरा के जा भी सकती है , मेरे हाथ में तेरा हाथ है जंजीर नहीं "। शायर उस प्यार को प्यार नहीं मानता जो उसी को अपनी गुलाम बना कर रखना चाहता हो , उम्र भर को ही नहीं , मरने के बाद भी चाहता हो वो कब्र में भी मेरे साथ ही लेटी हो। कैसा प्यार है जो किसी को पिंजरे में बंद करना चाहता है , इक बार पिंजरे में आया तो फिर उसको कोई आज़ादी नहीं बाहर जाने की। हैरानी की नहीं ये खेद की बात है कि हर तरफ लोग किसी की बेवफ़ाई की दुहाई देते फिरते हैं। अगर जानते क्या है प्यार तो खुद अपने प्यार को यूं रुसवा नहीं करते। वो प्यार प्यार है ही नहीं जिसमें कोई शर्त हो , पाने की , प्यार खुद को समर्पित करना है , किसी को हासिल करना नहीं। अगर कोई किसी को सच्चा प्यार करता है तो वो उसकी ख़ुशी चाहेगा जिसको चाहता है , अपनी ख़ुशी , अपनी मर्ज़ी , अपना स्वार्थ तो प्यार नहीं। प्यार जान देने या जान लेने का नाम नहीं , प्यार है इक तड़प , इक बेकरारी जो कभी खत्म नहीं होती। प्यार रूहानियत की बात है जिस्म की बात तो इक इल्ज़ाम है प्यार पर इश्क़ पर। प्यार वो है जो बंदे को खुदा बना दे , जो इंसान को इंसान भी नहीं रहने दे वो और जो भी हो प्यार हर्गिज़ नहीं है।
                                    होगा किसी संत का दिन वेलेनटाईन डे , मगर प्यार का ऐसा रूप तो उस ने कभी नहीं सोचा होगा जैसा आजकल दिखाई देता है। कोई बाज़ार है , कोई कारोबार है , कोई तमाशा है प्यार , ये क्या हो गया है तथाकथित प्रेमियों को। आडंबर नहीं होता है प्यार। चलो इक प्यार का गीत , फ़िल्मी ही सही , दोहराते हैं। किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार , किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार , जीना इसी का नाम है।

Sunday, 8 February 2015

लेखक से बोले भगवान ( कटाक्ष ) डा लोक सेतिया

आज फिर वही बात , जब मैंने हाथ ऊपर उठाया मंदिर का घंटा बजाने को तो पता चला घंटा उतरा हुआ है। मन ही मन मुस्कुराते हुए भगवान से कहना चाहा " ऐसा लगता है तुम्हारे इस मंदिर के मालिक फिर आये हुए हैं "। जब भी वह महात्मा जी यहां पर आते हैं सभी घंटे उतार लिये जाते हैं , ताकि उनकी पूजा पाठ में बाधा न हो। ऐसे में उन दिनों मंदिर आने वाले भक्तों को बिना घंटा बजाये ही प्रार्थना करनी होती है। कई बार सोचा उन महात्मा जी से पूछा जाये कि क्या बिना घंटा बजाये भी प्रार्थना की जा सकती है मंदिरों में , और अगर की जा सकती है तब ये घंटे घड़ियाल क्यों लगाये जाते हैं। पूछना तो ये सवाल भी चाहता हूं कि अगर और भक्तों के घंटा बजाने से आपकी पूजा में बाधा पड़ती है तो क्या जब आप इससे भी अधिक शोर हवन आदि करते समय लाऊड स्पीकर का उपयोग कर करते हैं तब आस-पास रहने वालों को भी परेशानी होती है , ये क्यों नहीं सोचते। अगर बाकी लोग बिना शोर किये प्रार्थना कर सकते हैं तो आप भी बिना शोर किये पूजा-पाठ क्यों नहीं कर सकते। बार बार मेरे मन में ये प्रश्न आता है कि किसलिये महात्मा जी के आने पर सब उनकी मर्ज़ी से होने लगता है , क्या मंदिर का मालिक ईश्वर है अथवा वह महात्मा जी हैं। ये उन महात्मा जी से नहीं पूछ सकता वर्ना उनसे भी अधिक वो लोग बुरा मान जाएंगे जो उनको गुरु जी मानते हैं। इसलिये अक्सर भगवान से पूछता हूं और वो बेबस नज़र आता है , कुछ कह नहीं सकता। जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि भगवान ऐसे मंदिरों में कैद है , छटपटा रहा है।
                   कुछ दिन पहले की बात है। मैं जब मंदिर गया तो देखा भगवान जिस शोकेस में कांच के दरवाज़े के पीछे चुपचाप बैठे रहते हैं उसका दरवाज़ा खुला हुआ था। मुझे लगा शायद आज मेरी आवाज़ भगवान सुन सके , कांच की दीवार के रहते हो सकता है मेरी आवाज़ उस तक नहीं पहुंच पाती हो। मैं अपनी आंखें बंद कर प्रार्थना कर रहा था कि अचानक आवाज़ सुनाई दी "हे लेखक तुम सब की व्यथा लिखते रहते हो , कभी तो मेरे हाल पर भी कुछ लिखो " मैंने चौंक कर आंखें खोली तो आस-पास कोई दिखाई नहीं दिया। तभी उस शोकेस से भगवान जी बोले , " लेखक कोई नहीं है और यहां पर , ये मैं बोल रहा हूं तुम सभी का भगवान"। मैंने कहा प्रभु आपको क्या परेशानी है , कितना बड़ा मंदिर है यह आपके लिये , कितने सुंदर गहने - कपड़े आपने पहने हुए हैं , रोज़ लोग आते हैं आपकी अर्चना करने , सुबह शाम पुजारी जी आपका भोग लगाते हैं घंटी बजा बजा कर। किस बात की कमी है आपको , कितने विशाल मंदिर बने हुए हैं हर शहर में आपके। जानते हो भगवान आपके इस मंदिर को भी और बड़ा बनाने का प्रयास किया जा रहा है , कुछ दिन पहले मंदिर में सड़क किनारे वाले फुटपाथ की पांच फुट जगह शामिल कर ली है इसको और सुंदर बनाया जा रहा है। क्या जानते हो भगवान आपकी इस सम्पति का मूल्य अब करोड़ों रूपये है बाज़ार भाव से , और तेरे करोड़ों भक्त बेघर हैं। साफ कहूं भगवान , जैसा कि तुम सभी एक हो ईश्वर अल्ला वाहेगुरु यीशू मसीह , तुम से बड़ा जमाखोर साहूकार दुनिया में दूसरा कौन हो सकता है। अकेले तेरे लिए इतना अधिक है जो और भी बढ़ता ही जाता है। अब तो ये बंद कर दो और कुछ गरीबों के लिये छोड़ दो। अगर हो सके तो इसमें से आधा ही बांट दो गरीबों में तो दुनिया में कोई बेघर , भूखा नहीं रहे।
       प्रभु कहने लगे " लेखक क्यों मज़ाक कर रहे हो , मेरे जले पर नमक छिड़कने जैसी बातें न करो तुम। मुझे तो इन लोगों ने तालों में बंद कर रखा है। तुमने देखा है मेरे प्रमुख मंदिर का जेल की सलाखों जैसा दरवाज़ा , जिस पर पुजारी जी ताला लगाये रखते हैं। क्या जुर्म किया है मैंने , जो मुझे कैद कर रखते हैं। इस शोकेस में मुझे कितनी घुटन होती है तुम क्या जानो , हाथ पैर फैलाने को जगह नहीं। ये कांच के दरवाज़े न मेरी आवाज़ बाहर जाने देते न मेरे भक्तों की फरियाद मुझे सुनाई पड़ती है। सच कहूं हम सभी देवी देवता पिंजरे में बंद पंछी की तरह छटपटाते रहते हैं "।
                     तभी किसी के क़दमों की आहट सुनाई दी और भगवान जी चुप हो गये अचानक। मुझे उनकी हालत सर्कस में बंद शेर जैसी लगने लगी , जो रिंगमास्टर के कोड़े से डर कर तमाशा दिखाता है , ताकि लोग तालियां बजायें , पैसे दें और सर्कस मालिकों का कारोबार चलता रहे। पुजारी जी आ गये थे , उन्होंने शोकेस का दरवाज़ा बंद कर ताला जड़ दिया था। मैंने पूछा पुजारी जी क्यों भगवान को तालों में बंद रखते हो , खुला रहने दिया करो , कहीं भाग तो नहीं जायेगा भगवान। पुजारी जी मुझे शक भरी नज़रों से देखने लगे और कहने लगे आप यहां माथा टेकने को आते हो या कोई और ईरादा है जो दरवाज़ा खुला छोड़ने की बात करते हो। आप जानते हो कितने कीमती गहने पहने हुए हैं इन मूर्तियों ने , कोई चुरा न ले तभी ये ताला लगाते हैं। जब तक मैं वहां से बाहर नहीं चला गया पुजारी जी की नज़रें मुझे देखती ही रहीं। तब से मैं जब भी कभी मंदिर जाता हूं तब भगवान को तालों में बंद देख कर सोचता हूं कि सर्वशक्तिमान ईश्वर भी अपने अनुयाईयों के आगे बेबस हैं। जब वो खुद ही अपनी कोई सहायता नहीं कर सकते तब मैं इक अदना सा लेखक उनकी क्या सहायता कर सकता हूं। इन तमाम बड़े बड़े साधु , महात्माओं की बात न मान कौन इक लेखक की बात मानेगा और यकीन करेगा कि उनका भगवान भी बेबस है , परेशान है।

Sunday, 1 February 2015

प्रेम केवल प्रेम है ( कविता ) 109 भाग दो ( डा लोक सेतिया ) { वेलेनटाइन डे पर }

किसी सुंदर हसीना ,
किसी खूबसूरत नवयुवक ,
को गुलाबी रंग का प्रेम पत्र ,
लाल गुलाब का कोई फूल ,
देना किसी ख़ास दिन को ,
और आई लव यू कहकर ,
करना प्यार का इज़हार ,
क्या ऐसा ही होता है प्यार ,
जैसे सजता है हर साल ,
गली गली ,
शहर शहर ,
कोई खुला बाज़ार ।
काश कि इतना सुलभ होता ,
सच में प्यार मिल जाता सभी को ,
मगर नहीं है आसान मिलना ,
जीवन भर की तलाश में भी ,
इक ऐसा सच्चा प्यार जो ,
महका दे जीवन को ऐसे ,
इत्र की खुशबू हो जैसे ,
महका दे तन मन को ,
फूलों की महक हो जैसे।
प्यार किसी की मुस्कान है ,
बस किसी की इक नज़र है ,
कब हुआ ,
क्योंकर किस से ,
कहां होती किसी को खबर ,
न होता करने से ये कभी ,
न रुकता किसी के रोकने से ,
अपने बस में नहीं होता कुछ भी ,
दिल ,
जान सब लगता है ,
नहीं कुछ भी हमारा अब ,
जाने कैसे हो गये पराये सब।
इक तड़प है ,
बेकरारी है ,
न साथ देती दुनिया सारी है ,
प्यार है ईनाम भी ,
सज़ा भी है ,
है इबादत भी ,
खता भी है ,
भटक रहे लोग यहां सहरा में ,
समझ रहे चमकती रेत को पानी ,
इक आग है इश्क़ दुनिया वालो ,
चांदनी मत समझना इसको ,
राहें हैं कांटों भरी प्यार की ,
लिखी जाती है आह से आंसुओं से ,
जो भी होती है सच्ची प्रेम कहानी। 

Friday, 23 January 2015

बदलाव की बातें नहीं बदलाव चाहिए ( आलेख ) डा लोक सेतिया

चलो इक पुरानी कथा याद करते हैं , इक महात्मा जी ( सच्चे , आजकल जैसे नहीं ) किसी नगर में आये और धर्म क्या है ये समझाते रहे। थोड़े दिन बाद जब वो जाने लगे तब उनको गुरु समझने वालों ने रोकना चाहा तब वो बोले देखो तुमको सबक पढ़ा दिया है धर्म क्या है अब मुझे और लोगों को भी तो समझाना है , यही साधु का धर्म है , इक जगह नहीं रहना। ज्ञान को बांटना होता है पूरे जगत में। आप सब याद किया करना जो सबक सीखा है हर दिन। बहुत दिन बाद जब वो वापस उधर लौटे तब देखा लोग हर रोज़ रटते रहते लिखी लिखाई बातों को , ठीक वैसा जैसा इधर हम सभी करते हैं। किसी पुस्तक को तोते की तरह सुबह शाम रटना , समझना नहीं। महात्मा जी निराश हो कर बोले ये आप सभी क्या करते हैं। जो पढ़ते हो उनपर अमल बिल्कुल नहीं नज़र आता। व्यर्थ गया मेरा सारा प्रयास। सोचो ये कहानी किसलिये याद आई , क्या देखा। चलो बताता हूं।
       कल हरियाणा में प्रधानमंत्री जी ने बेटियों को बचाने की शपथ दिलाई भरी सभा में हज़ारों लोगों को। क्या ये शपथ पहली बार किसी ने दिलाई , कितनी बार खिलाई गई ऐसी कितनी कसमें , भ्र्ष्टाचार के विरुद्ध , बाल मज़दूरी , दहेज़ , जाति धर्म के भेदभाव को मिटाने को और जाने क्या क्या। नतीजा नज़र आया कभी , कुछ लोगों को इस से मतलब नहीं कुछ फर्क पड़ता है या नहीं , उनको नाम शोहरत मिलती है कि वो महान काम कर रहे हैं। आमिर खान जैसे लोग नित नये शगूफे छेड़ते हैं , आजकल शर्म का ताज पहनाने का विज्ञापन दिखाई देता है , क्या ऐसे किसी को किसी को अपमानित करने का अधिकार है। क्या आप ऐसा कर सकते हैं , नहीं ? ये भी इक अपराध है , मगर जो लोग खुद को नियम कायदे से ऊपर समझते हैं उनको इसकी परवाह कहां। केजरीवाल कोई अकेले नहीं जो समझते हैं वे जो भी करें वो सही है और जो उनको सही नहीं मानता वो गल्त। इन लोगों की परिभाषायें बदलती रहती हैं। बात हो रही थी मोदी जी की बेटी बचाओ योजना की , ब्रांड अम्बेस्डर बनाया गया माधुरी दीक्षित जी को। पूरे हरियाणा में न भारत देश में कोई और लड़की या महिला इस काबिल मिली जो ये कार्य कर सके। शायद ऐसे ही आप महिलाओं को उनके अधिकार दिलाएंगे , जिनके पास पहले सब कुछ उनकी झोली में और खैरात डालनी है , और जो खाली हैं उनकी कोई सुध ही नहीं लेनी।
           दिल्ली में चुनाव में भी यही किया गया है , किरन बेदी जी को दल में शामिल करते ही मुख्यमंत्री पद की दावेदार भी बना दिया गया। क्या भाजपा में पहले कोई और महिला इस काबिल नहीं है , बता रहे हैं ऐसा चुनाव जीतने को किया गया। क्या मोदी जी का भरोसा खत्म हो गया , उनकी लहर नहीं रही या लगा कि काठ की हांड़ी अबकी बार नहीं चढ़ेगी। इससे तो लगता है इतना बहुमत पाकर भी भाजपा को अभी आत्मविश्वास की कमी डराती है। चुनाव जीतना हारना लोकतंत्र का हिस्सा है , येन केन प्राकेण चुनाव जितना आपको वहां ला खड़ा करता है जहां जनाब केजरीवाल साहब हैं। इक केजरीवाल से इतना डरते हैं आप कि मोदी को छोड़ किरन बेदी को पतवार थमा दी।
                    लोग शायद भूले नहीं जो वादे किये थे मोदी जी ने। मुझे तो कुछ भी नहीं बदला दिखाई देता। वही तौर तरीके जो कोई और अपनाता था अब भाजपा सरकार अपना रही है। प्रचार रैलियां और विज्ञापनों का शोर। सरकारी धन का दुरूपयोग। आखिर में इक पुरानी बात , आप बीती। 1980 की बात है मैं दिल्ली में रहता था , किरन बेदी जी तिलकनगर थाने में ए सी पी थी। कोई कॉलोनी में अवैध शराब का धंधा करता था। पत्र लिखा था और किरन बेदी जी ने इक दिन समय दिया था जवाब में पत्र भेज आकर मिलने को। लगा अब बात होगी न्याय की , मगर निराशा मिली थी , मिलने पर बोली थी मुझे जाना है आप अपनी बात उन हवलदार को बता दो , जो खुद ऐसे काम करवाता था महीना लेकर। तब किसी शायर का शेर याद आया था , " तो इस तलाश का अंजाम भी वही निकला , मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला "। कहीं जनता को मोदी जी से भी यही न मिले और अगर दिल्ली में किरन बेदी जी मुख्यमंत्री बन गई तो उनसे भी। चेहते और नाम नहीं बदलने हमने , जो भी सही नहीं सको बदलना है। बदलाव की बातें करना सब जानते हैं , बदलाव लाना सबके बस की बात नहीं होती।

Wednesday, 7 January 2015

की मैं झूठ बोलिया ( तरकश ) डा लोक सेतिया

बहुत बातें हैं मन में कई दिन से , समझ नहीं पा रहा कि कैसे लिखूं। व्यंग्य की बात नहीं है , मगर देख कर लगता है इस पर कोई हंसे या रोये। मुझे याद है पंजाबी में बोलियां डाली जाती थी , सच्चे फांसी चढ़दे वेखे झूठा मौज मनाये , लोकी कहंदे रब दी माया , मैं कहंदा अन्याय  , वे की मैं झूठ बोलिया , वे की मैं कुफ्र तोलिया । कोइना भाई कोइना। और भी बहुत हैं ऐसी बोलियां।
    चलो मुहावरे की भाषा को छोड़ सीधे जो कहना कहता हूं। गुरु जी बने हुए हैं , करते कारोबार हैं झूठ का , लेबल बिकता है सच के नाम का। अनुयाई हैं लाखों जो देखते ही नहीं गुरु किसको बनाया हुआ है , जो खुद भटका हुआ वो सभी को रास्ता दिखाता है। कोई गीता का ज्ञान बेचता है , कोई कुरान कोई गुरुग्रंथ साहिब को अपना अधिकार समझ व्यवसाय करता नज़र आता है। सब सफल हैं , सब मालामाल हैं। बचपन में पढ़ते थे वो कहानी हाऊ मच लैंड ए मैन नीड्स। खड़े होने को दो हाथ और मरने के बाद दो गज़ ज़मीन , जानते तो सभी हैं ,फिर भी भाग रहे हैं अधिक की चाह में। जब भी जाते किसी शोक सभा में तब देखते हैं कि वहां भी किसी तथाकथित गुरु का प्रचार किया जा रहा है , कैसी विडंबना है ऐसी जगह भी किसी को लगता अपना विस्तार करने का अवसर है। बहुत दिन से इक गुरु के अनुयाई किया करते थे इक जाप , इधर इक और ने उसी की तर्ज़ पर नया जाप लिखवा लिया सुना कर अपना प्रचार पाने को। अब ये राम और कृष्ण की बात करते हैं तो लगता है मानो उनका उपहास किया जा रहा है। नगर नगर में इनका नेटवर्क बनाया हुआ है , और सच कहूं तो अज्ञानी लोग ज्ञान देने की बात करते हैं। थोड़ा ध्यान दो तो मालूम होता है ये क्या सबक पढ़ा रहे हैं , कहीं सच्चाई की बात नहीं है , सब शॉर्टकट बताते स्वर्ग जाने का। केवल माला जपने से सब मिल जाना है , चाहे जीवन भर जो भी किया हो। मुझे लगता है अगर इनकी बात सच है तब नर्क तो कोई नहीं जाता होगा , सभी तो बैकुंठ को जाते हैं ये दावा किया जाता है। सब की शोक सभा में उसका गुणगान धर्मात्मा के रूप में करते हैं , क्या ऐसे जगह जो बोला जाता वो सच है। कहीं ऐसा तो नहीं जहां सिर्फ सच होना चाहिये वहां झूठ भी भरी सभा में ज़ोर ज़ोर से बोलते हैं। जो माता-पिता को रोटी नहीं खिलाते थे वो उनके नाम पर लंगर चलाते हैं , मृत्युभोज देते हैं। उनको लगता है ये भी अवसर है खुद को दानवीर कहलाने का। अगर गौर से देखो तो अब कलयुगी गुरुओं के कलयुगी ही शिष्य हैं , जिनको अपकर्म करते कभी ईश्वर याद नहीं आया जीवन भर वो धर्म बेचने वालों के साथी बन गये हैं। मुझे लगता है अगर ये सब सही है और जितने भी आजकल के संत महात्मा , साधु सन्यासी हैं वो सच्चे हैं तब धरती पर पापी कोई भी नहीं मेरे सिवा। चलो अच्छा है मुझे पता है मरने के बाद मुझे क्या मिलेगा , नर्क कोई बुरी जगह नहीं होगी , इस दुनिया से बुरी तो कदापि नहीं। और कितना अच्छा होगा वहां कोई और नहीं होगा , न कोई अपना न कोई पराया , न कोई दोस्त न कोई दुश्मन। बाकी सभी तो स्वर्ग में चले गये होंगे , वहां मुझे कितना चैन मिलेगा , चिंतन भी कर सकूंगा बैठ कर , अपने कर्मों का फल तो मिलना ही है उसमें घबराना क्या। लेकिन फिर भी खुश रहूंगा मैं नर्क में भी क्योंकि इस दुनिया से भगवान का बनाया नर्क भी बेहतर ही होगा। की मैं झूठ बोलिया।