Thursday, 30 January 2014

नाखुदा खुद को बताने वाले ( तरकश ) डा लोक सेतिया

एक जाने माने शायर का शेर याद आ रहा है। कौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ , रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ। नेता चाहे किसी भी दल का हो होता नेता ही है , सब का मकसद वही है हर मुद्दे को उपयोग करना अपने सत्ता पाने के लिये। हर बात में वोटों का गणित ही इनकी प्राथमिकता होता है , किसी की भावना से इनमें से किसी को भी कोई सरोकार नहीं होता है। किसी ने एक बयान क्या दिया बाक़ी लोगों को भी अवसर मिल गया अपनी अपनी राजनीति करने का। सब फिर से चले आये दंगों के ज़ख्मों को फिर से कुरेदने , ये क्या दवा लगायेंगे , इनको मालूम ही नहीं किसी का दर्द क्या होता है। इनकी संवेदना झूठी है , दिखावे की है , चार दिन की है। बस वोट पाने तक , उसके बाद सब भूल जायेंगे। कितनी बार कितने लोगों ने यही किया है इंसाफ दिलाने का वादा , मगर कभी नहीं मिला इंसाफ किसी को। किस किस की बात की जाये , क्यों सब के ज़ख्मों को फिर से हरा करने का काम करें। और शिकायत भी जाकर करें तो किस से , पता नहीं इनमें ही कौन कौन कब कब ऐसा ही करता रहा है। मुझे अपनी ही इक ग़ज़ल का एक शेर याद आता है। "तूं कहीं मेरा ही क़ातिल तो नहीं , मेरी अर्थी को उठाने वाले"। ग़ज़ल का मतला भी ऐसा ही है। "हमको ले डूबे ज़माने वाले , नाखुदा खुद को बताने वाले"।
                                            जब बात हो रही थी दिल्ली और गुजरात और उत्तरप्रदेश महाराष्ट्र के दंगों की , तब याद आया हर शहर में चली थी तब वही गर्म हवा। हमारे शहर में भी थे कुछ सभ्य कहलाये जाने वाले लोग जो बहती गंगा में हाथ धो रहे थे। तब उस दल में शामिल थे जो दंगे करवा रहा था और आज इस दल में शामिल हैं जो तब के अपराधियों को सज़ा दिलाने की बात कर रहा है। यहां फिर किसी शायर का शेर याद आ रहा है। "मेरा कातिल ही मेरा मुनसिब है , क्या मेरे हक में फैसला देगा"। ये जो लोग आज आंसू बहा रहे हैं क्या कल तक नहीं जानते थे कि जिनके साथ उनका हर दिन का मेल जोल है , मधुर संबंध हैं वो वही हैं जो दंगइयों की भीड़ को लेकर चले थे किसी को सबक सिखाने। दो दिन बाद जब यही भरी सभा में भाईचारे की बात करेंगे तब मुझे फिर अपना इक शेर याद आयेगा। "भाईचारे का मिला ईनाम उनको , बीज नफरत के जो रोपित कर रहे थे। बहस भ्रष्टाचार पर वो कर रहे थे , जो दयानतदार थे वो डर रहे थे"।
                                                         यादों की खिड़की फिर खुल गई है। कुछ साल पहले की बात है इश्तिहार पढ़ा कि कुछ लोग जय प्रकाश नारायण जी की संपूर्ण क्रांति पर चर्चा करेंगे। सब को बुलाया गया था , मैं भी कभी रहा था शामिल उस अंदोलन में इसलिये वहां जाना ज़रूरी लगा था। मगर वहां जो देखा उसकी कल्पना नहीं की थी , जश्न का सा माहौल था , अच्छा खाने पीने का प्रबंध , सब हाथ मिला रहे थे , गप शप कर रहे थे। सभा शुरू हुई , दो लोग मंच पर बैठे थे , एक महिला गीत सुना रही थी पुरानी फिल्मों के मनोरंजन के लिये। फिर बात होने लगी थी कई प्रकार की समितियां बनाने की , चंदा जमा करने की। जिस बात का शोर था इश्तिहार में उस विषय पर किसी ने एक भी शब्द नहीं बोला था। मुझसे नहीं रहा गया , मैं खड़ा हुआ इक पर्ची पर लिखा मुझे सवाल करना है और जाकर पकड़ा आया उनको जो मंच पर विराजमान थे। वो तब मुझे नहीं जानते थे और उन्होंने वो पर्ची दे दी उनको जो संचालन कर रहे थे सभा का। मुझे कहा गया सभा के बाद रुक कर मिल सकता हूं अगर उन नेता जी से मिलना चाहता हूं। मैंने तब अपनी जगह खड़े होकर यही पूछा था कि आपने जिस विषय पर चर्चा का इश्तिहार बांटा था , उस पर तो कोई बात ही नहीं हुई। तब इस आयोजन का क्या मतलब रह जाता है। ये सुन कर वो मुख्य अतिथि भी हैरान हो कर बोले कि उनको भी इस बात का पता नहीं था , वो तो यहां आये हैं अपने दल की शाखायें बनाने , सदस्य बनाने और समितियों का गठन करने।
                        बार बार यही होता है , लोग किसी विषय को उपयोग कर अपना राजनीतिक मकसद हल करते हैं और मतलब पूरा होने के उसपर फिर कोई बात ही नहीं करते। अपने साथ भीड़ जमा करने के लिये , वोट बटोरने के लिये , नेता बन जनता की भावनाओं को उपयोग किया जाता है।

Sunday, 26 January 2014

दर्शन दो लोकतंत्र ( तरकश ) डा लोक सेतिया

यही मंत्र है जिसका जाप सभी करते हैं। कोंग्रेस भा ज पा वामपंथी समाजवादी जनता दल वाले सालों से करते आये हैं और आप वाले भी जपने लगे हैं। किस किस की गिनती की जाये , राष्ट्रीय क्षेत्रीय बहुत हैं। हर राजनैतिक दल के अखिल भारतीय प्रधान से आम कार्यकर्त्ता तक सुबह शाम सोते जागते यही मंत्र जपते हैं। ज्ञानीजन समझाते हैं कि लोकतंत्र मंत्र जपने से राजसुख की प्राप्ति होती है। जिसे ये मंत्र सिद्ध करना आ गया वो विधायक सांसद मंत्री मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री कुछ भी बन सकता है। जैसे क्रिकेट के खिलाड़ी क्रिकेट को खाते हैं पीते हैं ओढ़ते हैं , ऐसे दावे किया करते हैं विज्ञापनों में , कुछ उसी तरह नेता लोग भी सच में करते हैं। लोकतंत्र को खाते हैं , लोकतंत्र को पी जाते हैं , लोकतंत्र को सेज बना कर उस पर सो जाते हैं लोकतंत्र को ओढ़कर। कभी कभी लगता है कि सारा का सारा लोकतंत्र इन नेताओं के हिस्से में आ गया जिसको जाने ये खा गये या पी गये या उसको किसी जगह सुला दिया है गहरी नींद में। देश की जनता भटक रही है सच्चे लोकतंत्र की खोज में आज़ादी के बाद से आजतक। दिखाई ही नहीं दे रहा लोकतंत्र। कांग्रेस में भा ज पा में क्षेत्रीय दलों में वामपंथी दलों में नहीं मिला तो इक नये दल में ढूंढना चाहा मगर उसमें भी नहीं नज़र आया। बार बार कोई वादा करता है लोकतंत्र का मगर सत्ता मिलते ही मनमानी करने लगता है। हर नेता खुद को लोकतंत्र का रखवाला बताता है और हर नेता लोकतंत्र से खिलवाड़ करता है शासक बनते ही। अब तो लगता है लोकतंत्र भी हमारे लिये मृगतृष्णा के समान है। अपने दल में लोकतंत्र न होने की बात पर कुछ लोग दल को छोड़ कर अपना खुद का एक दल बना लेते हैं। ऐसा भी मुमकिन है कि अपने दल के वही अकेले सदस्य ही हों। ये एक सुविधाजनक दशा है असहमति की कोई गुंजाईश ही नहीं रहती। यकीन मानें ऐसे लोग मंत्री तक बनते रहे हैं। इस देश में कोई चालीस सदस्यों का दल सरकार बना सकता है और एक सौ चालीस सदस्यों वाला उसको बाहर से समर्थन दे सकता है। वैसे भी शासन करने के लिये सरकार में शामिल होना ज़रूरी नहीं होता है। ये प्रयोग भी सफलता पूर्वक किया जा चुका है कि प्रधानमंत्री कोई था और सरकार कोई और ही चलाता रहा। हर दल वाले को अपने दल में लोकतंत्र की चिंता नहीं होती लेकिन बाकी दलों में लोकतंत्र नहीं है ये चिंता सताती है। कांग्रेस को लगता है भाजपा हिंदुत्व की समर्थक ताकतों के ईशारे पर चलती है , भाजपा को लगता है कांग्रेस परिवारवाद की राह पर चलती है। बाकी दल भी दूसरे सब दलों पर आरोप लगाते हैं कि वो लोकतंत्रिक नहीं। किसी का लोकतंत्र बिहार चला जाता है किसी का उत्तरप्रदेश , हरियाणा वालों को शिकायत है दिल्ली ने उनके लोकतंत्र को हमेशा बंधक बना कर रखा है। दिल्ली कहती है कि वो इधर कभी आया ही नहीं , शायद छुट्टी मनाने हिमाचल चला गया होगा। लोग कश्मीर से पंजाब तक तलाश कर आये , पश्चिम बंगाल से गुजरात तक खोज लिया , नहीं मिला कहीं भी लोकतंत्र। हर प्रदेश के लोकतंत्र का अलग सवभाव है लोग बताते हैं। महाराष्ट्र में सुना है शिवसेना के यहां कभी तो कभी एन सी पी के यहां लोकतंत्र दुहाई दे रहा होता है। कमाल की बात है कि पूरे देश में लोकतंत्र के होने का शोर है , लेकिन जो देखना चाहते हैं अपनी नज़रों से उनको कहीं भी दिखाई नहीं देता। जैसे भगवान है सब जगह ये आस्था है विश्वास है हमें लेकिन हम उसको देख नहीं पाते कभी। लेकिन अब लोग शंका करने लगे हैं कि अगर भगवान है तो धरती पर पाप और पापी क्यों बढ़ रहे हैं। ग्रंथ बताते हैं कि जब अन्याय और अत्याचार सीमा पार कर जाते हैं तब भगवान प्रकट होते हैं। शायद लोकतंत्र भी ऐसा ही करता हो , जब घोटाले , गुंडाराज और सत्ता का अहंकार हर सीमा को लांग जाये तब लोकतंत्र भी प्रकट हो जाये , क्या अभी कुछ कसर बाकी है इनमें। जैसे धर्म स्थलों पर भगवान पण्डे पुजारियों की मर्ज़ी पर भक्तों को दर्शन देते हैं , वो जब चाहें कपाट बंद कर सकते हैं , भगवान के नाम का सारा चढ़ावा चट कर जाते हैं। उसी तरह लोकतंत्र के मंदिर कहलाने वाले स्थलों पर उन लोगों ने कब्ज़ा कर लिया है जो लोकतंत्र को कत्ल कर खुद उसपर माला डाल उसके पुजारी बन बैठे हैं। हे लोकतंत्र इस देश को विश्व का सब से बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। सब गुणगान करते हैं तुम्हारी महिमा का , कहते हैं तुम सब के दुःख दूर कर सकते हो। हम करोड़ों देशवासी कब से तेरे नाम की माला जप रहे हैं , हर बार वोट डालते हैं तुझे पाने की उम्मीद लगाये। हर बार धोका खा जाते हैं हम और कुछ नये नेता तेरा अपहरण कर सत्ता सुख का मोक्ष पा शासक बन लोकतंत्र का उपहास करते हैं। कब इस जनता की पुकार सुनाई देगी तुम्हें , कब दर्शन दोगे लोकतंत्र। 

Sunday, 19 January 2014

अंदाज़ देशभक्ति के ( तरकश ) डा लोक सेतिया

कुछ लोग गहन विचार-विमर्श कर रहे हैं। देशभक्ति की बात हो रही है। कोई सवाल उछालता है , ये क्या चीज़ है , सुना है बड़े काम आती है आजकल। एक नवयुवक बताता है मनोजकुमार की फिल्म का गीत गाना देशभक्ति का काम है , मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती। जो जितना ऊंचे स्वर में गाता है वो उतना ही महान देश भक्त समझा जाता है। वैसे और भी गीत हैं , कुछ सरकारी विज्ञापन भी हैं , मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा एवं कम-आन इंडिया , दिखा दो। ये भी देशप्रेम को प्रदर्शित करने का ही काम करते हैं। क्रिकेट का खेल देखते हुए तिरंगा लहराना और अपने चेहरे या वस्त्रों को तिरंगे के रंगों में रंगना भी देशप्रेम का प्रमाण है। छबीस जनवरी या पंद्रह अगस्त को दूरदर्शन का सीधा प्रसारण देखते हुए गप शप करना हो , चाहे छुट्टी का मज़ा लेते हुए पिकनिक मनाना ये भी देशभक्ति का ही अंग हैं। देशभक्ति ही वो सलोगन है जो प्रतियोगिता में जीत दिलवा सकता है। ये वो फार्मूला है जो हमेशा हिट रहता है , सौंदर्य प्रतियोगिता में भाग लेने वाली सुंदरियां तक अपने जवाबों में इसकी मिलावट करके अच्छे अंक बटोर सकती हैं। इसलिये वे देश से अनपढ़ता और गरीबी को मिटाने के उदेश्य की बात करती हैं। मगर जब प्रतियोगिता में जीत जाती हैं तब इन सब को भूल कर बड़ी बड़ी कंपनियों के विज्ञापन करने और चमक दमक वाले कार्यक्रम करती हैं देशभक्ति समझ कर। देशभक्ति वो विषय है जिसपर कुछ खास दिनों में लिखता है लेखक , छापते हैं अखबार वाले और पत्रिका वाले। अध्यापक को भी ये विषय पढ़ाना होता है छात्रों को ताकि परीक्षा में अच्छे अंक मिल सकें। इस सबक को समझना ज़रूरी है न ही समझाना ही। रटने का सबक है , तोते की तरह हम सब रटते रहते हैं। कुछ अन्य लोगों के लिये ये एक रंगारंग कार्यक्रम की जैसी है वे देशभक्ति के नाम पर कितने ही आयोजन आयोजित किया करते हैं। कभी किसी दौड़ का नाम , कभी मानव श्रृंखला बनाकर प्रदर्शित की जाती है देशभक्ति। पहले कभी देशभक्ति के मुशायरे और कवि सम्मलेन भी आयोजित किये जाते थे मगर आजकल उनका चलन बाकी नहीं रह गया। अब देशभक्ति पर पॉप संगीत के कार्यक्रम सफल होते हैं। आई लव माई इंडिया गाते हुए नाचना इस युग की वास्तविक देशभक्ति समझी जाती है। इस नज़र से देखो तो युवा पीढ़ी देशभक्ति से भरी पड़ी है।
                        इन दिनों कई तरह की देशभक्ति दिखाई देती है। आधे घंटे का सीरियल जिसमें दो कमर्शियल ब्रेक हों , और तीन घंटे की फिल्म भी जिसको कई कंपनियां मिल कर प्रयोजित करें। टीवी के हर चैनेल में देशभक्ति का तड़का ज़रूरी है , उदेश्य भले पैसा बनाना ही हो , बात देश प्रेम की ही करनी होती है। सब चैनेल अपने को बाकी से बड़ा देशभक्त साबित करने का प्रयास करते हैं। इन टीवी सीरियल और फिल्मों के नाम और विज्ञापन लुभावने तो होते हैं मगर देखने पर इनका प्रभाव दूसरा ही नज़र आता है। दर्शक सोचते हैं कि देशभक्ति कोई समझदारी का काम नहीं है। बस एक बेवकूफी है , पागलपन है। क्या मिला देशभक्तों को जान गवांने से , क्या काम आई उनकी कुर्बानी। न देश को कुछ मिला न जनता को। बस मुट्ठी भर लोगों ने सब की आज़ादी को , लोकतंत्र को ढाल बना अपनी कैद में कर लिया। आजकल ज़रा दूसरी तरह की देशभक्ति होती है , आंदोलन होते हैं , दंगा फसाद करवाते हैं , तोड़ फोड़ की जाती है। जनता को मूर्ख बना सत्ता हासिल करने को समझौते किये जाते हैं। चुनाव जीत सरकार बनाते ही सब भूल कर वही दुहराते हैं जिसका विरोध किया था। शासक बन ऐश करते हैं , झंडा फहराते हैं ,सलामी लेते हैं , देशभक्त कहलाते हैं। अफ्सर लोगों के लिये देशभक्ति ऐसा ब्यान है जिसे कभी भी किसी भी अवसर पर दिया जा सकता है। जनता के धन से खुद हर सुख सुविधा का उपयोग करते हुए गरीबों की हालत से दुखी होने की बातें करना और गरीबी मिटाने को कागज़ी योजनायें बना उनको कभी सफल नहीं होने देना , देश के विकास के झूठे आंकड़े बनाना देशभक्ति है। सत्ताधारी नेता की चाटुकारिता , मंत्री के आदेश पर हर अनुचित कार्य करना , पद का दुरूपयोग करना भी देशभक्ति है।
           नेताओं के लिये देशभक्ति ऐसा नशा है जिसको अपने भाषणों द्वारा जनता को पिला मदहोश कर उससे मनचाहा वरदान पा सकते हैं। देश को लूट कर खाने वाले नेता डंके की चोट पर देश के लिये अपना सर्वस्व न्यौछावर करने का दावा करते हैं। चुनाव करीब आते ही नेताओं पर देशभक्ति का ज्वर चढ़ जाता है। हर नेता नई रौशनी लाना चाहता है , सत्ता मिलते ही फिर अंधेरों का सौदागर बन जाता है। एक बार कुर्सी मिल जाये तो हर नेता उसे अपनी बपौती समझने लगता है। देशभक्ति इनके लिये कारोबार है , कभी गल्ती से देशभक्ति के नाम पर कोई जेलयात्रा कर आया हो तो वो ही नहीं उसका परिवार भी मुआवज़ा पाने का हकदार बन जाता है। कुछ लोगों की देशभक्ति जनता पर चढ़ा हुआ ऐसा कर्ज़ है जिसका भुगतान करते करते उसकी कमर टूट चुकी है , तब भी वो चुकता नहीं हो रहा , कुछ लोगों के वारिसों को उसका ब्याज ही मिला है , असल बाकी है।

Thursday, 16 January 2014

सवाल विशेषाधिकार का ( तरकश ) डा लोक सेतिया

यमराज जब पत्रकार की आत्मा को ले जाने लगे तब पत्रकार की आत्मा ने यमराज से कहा कि मैं बाकी सभी कुछ यहां पर छोड़ कर आपके साथ यमलोक में चलने को तैयार हूं , आप मुझे एक ज़रूरी चीज़ ले लेने दो। यमराज ने जानना चाहा कि वो कौन सी वस्तु है जिसका मोह मृत्यु के बाद भी आपसे छूट नहीं रहा है। पत्रकार की आत्मा बोली कि मेरे मृत शारीर पर जो वस्त्र हैं उसकी जेब में मेरा पहचान पत्र है उसको लिये बिना मैं कभी कहीं नहीं जाता। यमराज बोले अब वो किस काम का है छोड़ दो ये झूठा मोह उसके साथ भी। पत्रकार की आत्मा बोली यमराज जी आपको मालूम नहीं वो कितनी महत्वपूर्ण चीज़ है , जिस किसी दफ्तर में जाओ तुरंत काम हो जाता है , अधिकारी सम्मान से बिठा कर चाय काफी पिलाता है , अपने वाहन पर प्रैस शब्द लिखवा लो तो कोई पुलिस वाला रोकता नहीं। पत्रकार होने का सबूत पास हो तो आप शान से जी सकते हैं। यमराज ने समझाया कि अब आपको जिस दुनिया में ले जाना है मुझे , उस दुनिया में ऐसी किसी वस्तु का कोई महत्व नहीं है। पत्रकार की आत्मा ये बात मानने को कदापि तैयार नहीं कि कोई जगह ऐसी भी हो सकती है जहां पत्रकार होने का कोई महत्व ही नहीं हो। इसलिये पत्रकार की आत्मा ने तय कर लिया है कि यमराज उसको जिस दुनिया में भी ले जाये वो अपनी अहमियत साबित करके ही रहेगी।
                       धर्मराज की कचहरी पहुंचने पर जब चित्रगुप्त पत्रकार के अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब देख कर बताने लगे तब उसकी आत्मा बोली मुझे आपके हिसाब किताब में गड़बड़ लगती है। आपने मुझसे तो पूछा ही नहीं कि आप सभी पर मेरी कोई देनदारी भी है या नहीं और अपना खुद का बही खाता खोल कर सब बताने लगे। आपको मेरी उन सभी सेवाओं का पारिश्रमिक मुझे देना है जो सब देवी देवताओं को मैंने दी थी। आपको नहीं जानकारी तो मुझे मिलवा दें उन सब से जिनके मंदिरों का मैं प्रचार करता रहा हूं। कितने देवी देवता तो ऐसे हैं जिनको पहले कोई जानता तक नहीं था , हम मीडिया वालों ने उनको इतना चर्चित कर दिया कि उनके लाखों भक्त बन गये और करोड़ों का चढ़ावा आने लगा। हमारा नियम तो प्रचार और विज्ञापन अग्रिम धनराशि लेकर करने का है , मगर आप देवी देवताओं पर भरोसा था कि जब भी मांगा मिल जायेगा , इसलिये करते रहे। अब अधिक नहीं तो चढ़ावे का दस प्रतिशत तो हमें मिलना ही चाहिये। धर्मराज ने समझाया कि वो केवल अच्छे बुरे कर्मों का ही हिसाब रखते हैं , और किसी भी कर्म को पैसे से तोलकर नहीं लिखते कि क्या बैलेंस बचता है। हमारी न्याय व्यवस्था में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि अच्छे कर्म का ईनाम सौ रुपये है और किसी बुरे का पचास रुपये जुर्माना है। और जुर्माना काटकर बाक़ी पचास नकद किसी को दे दें। पत्रकार की आत्मा कहने लगी , ऐसा लगता है यहां लोकतंत्र कायम करने और उसकी सुरक्षा के लिये मीडिया रूपी चौथे सतंभ की स्थापना की बहुत ज़रूरत है। मैं चाहता हूं आपके प्रशासनिक तौर तरीके बदलने के लिये यहां पर पत्रकारिता का कार्य शुरू करना , मुझे सब बुनियादी सुविधायें उपलब्ध करवाने का प्रबंध करें। धर्मराज बोले कि उनके पास न तो इस प्रकार की कोई सुविधा है न ही उनका अधिकार अपनी मर्ज़ी से कुछ भी करने का। मुझे तो सब को उनके कर्मों के अनुसार फल देना है केवल।
                        पत्रकार की आत्मा कहने लगी हम पत्रकार हमेशा सर्वोच्च अधिकारी से ही बात करते हैं। आपके ऊपर कौन कौन है और सब से बड़ा अधिकारी कहां है , मुझे सीधा उसी से बात करनी होगी। ऐसा लगने लगा है जैसे पत्रकार की आत्मा धर्मराज को ही कटघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रही है। जैसे धर्मराज यहां पत्रकार के कर्मों का लेखा जोखा नहीं देख रहे , बल्कि धर्मराज की जांच पड़ताल करने को पत्रकार की आत्मा पधारी है यहां। आज पहली बार धर्मराज ये सोचकर घबरा रहे हैं कि कहीं इंसाफ करने में उनसे कोई चूक न हो जाये। पत्रकार की आत्मा धर्मराज के हाव भाव देख कर समझ गई कि अब वो मेरी बातों के प्रभाव में आ गये हैं , इसलिये अवसर का लाभ उठाने के लिये वो धर्मराज से बोली , आपको मेरे कर्मों का हिसाब करने में किसी तरह की जल्दबाज़ी करने की ज़रूरत नहीं है। जब चाहें फैसला कर सकते हैं , लेकिन जब तक आप किसी सही निर्णय पर नहीं पहुंच जाते , तब तक मुझे अपनी इस दुनिया को दिखलाने की व्यवस्था करवा दें। मैं चाहता हूं यहां के देवी देवता ही नहीं स्वर्ग और नर्क के वासियों से मिलकर पूरी जानकारी एकत्रित कर लूं। पृथ्वी लोक पर भी हम पत्रकार पुलिस प्रशासन , सरकार जनता , सब के बीच तालमेल बनाने और आपसी विश्वास स्थापित करने का कार्य करते हैं। कुछ वही यहां भी मुमकिन है।
                          काफी गंभीरता से चिंतन मनन करने के बाद धर्मराज जी इस निर्णय पर पहुंचे हैं कि अगर इस आत्मा से पत्रकारिता के भूत को नहीं उतारा गया तो ये यहां की पूरी व्यवस्था को ही छिन्न भिन्न कर सकती है। इस लोक में पत्रकारिता करके नया भूचाल प्रतिदिन खड़ा करती रहेगी। तमाम देवी देवताओं को प्रचार और उनके साक्षात्कार छापने - दिखाने का प्रलोभन दे कर प्रभावित करने का प्रयास कर सकती है। पृथ्वी लोक की तरह यहां भी खुद को हर नियम कायदे से ऊपर समझ सकती है। पहले कुछ नेताओं अफ्सरों की लाल बत्ती वाली वाहन की मांग भी जैसे उन्होंने स्वीकार नहीं की थी उसी तरह पत्रकारिता के परिचय पत्र की मांग को भी ठुकराना ही होगा। धर्मराज जी ने तुरंत निर्णय सुना दिया है कि जब भी अच्छे बुरे कर्मों का हिसाब किया जायेगा तब इसका कोई महत्व नहीं होगा कि किस की आत्मा है। नेता हो अफ्सर हो चाहे कोई पत्रकार , यहां किसी को कोई विशेषाधिकार नहीं होगा।

Wednesday, 15 January 2014

नेता पति हैं , पत्नी है जनता ( तरकश ) डा लोक सेतिया

ये सबक पढ़ाना बहुत ज़रूरी है। तुम औरत हो जनता हो , मैं पुरुष हूं राजनेता हूं। तुमने विवाह किया है , अब तुम पति के बराबर नहीं हो सकती हो , पति तुम्हारा भगवान है , वो देवता है तुम्हारा और तुम उसकी दासी हो पुजारन हो। जनता तुमने हमें सांसद चुना है , विधायक चुना है , ये करके तुमने अपने आप को हमें समर्पित कर दिया है। अब हम शासक हैं और हमने तुम पर शासन करना है। यही लोकतंत्र है। मगर तुम्हें हमेशा मर्यादा में रह कर ही बात करनी है। तुम घर की मालकिन हो मैं जब ऐसा कहूं तो तुम खुश भले होना मगर ये मत भूलना कि तुम्हें ये अधिकार तब तक ही हासिल रहेगा जब तक मेरी इच्छा हो। अब तुमने पत्नी धर्म निभाना है और मैं तुमको जिस हाल में भी रखूं , उसी में खुश रहना है। मेरी लंबी उम्र की कामना करना कर्तव्य है तुम्हारा ,मेरे लिये व्रत रखना और मुझे खिला कर बाकी बचा हुआ खाना ही सदा से भाग्य रहा है तुम्हारा। जनता रूपी पत्नी को बोलने का कोई अधिकार नहीं होता , जो उसके चुने प्रतिनिधि कहें वही उसकी आवाज़ है। हर पत्नी का धर्म है पति की आज्ञा का पालन करना , पति का विरोध घोर अपराध है। जनता को सांसदों और विधायकों का भूल कर भी विरोध नहीं करना चाहिये। पति का विरोध कर के कोई पत्नी घर में क्या रह सकती है। बेघर होकर दर दर की ठोकरें खाती है उम्र भर , नेताओं का विरोध करना भी लोकतंत्र का विरोध माना जायेगा। पति बिन पत्नी का कल्याण नहीं हो सकता न ही नेताओं के बिना लोकतंत्र का भला हो सकता है।
                हम नेता इतने भी तानाशाह नहीं हैं कि जनता को कुछ बोलने का हक ही नहीं दें। जनता नेताओं को भ्रष्ट कहे मगर उसी तरह जैसे पत्नी अपने पति को जुआरी और शराबी कहती है। मगर न किसी पत्नी को शराब बंदी लागू करने का अधिकार मिल सकता है न ही जनता को भ्रष्टाचार को रोकने का कोई उपाय करने का ही हक दिया जा सकता है। जब कोई पत्नी पति को शराब पीने से रोकती है तब उसको मारने पीटने पर विवश हो जाता है पति भी। ये दमन नहीं न ही अत्याचार ही है , ये पति का अपने विशेषाधिकार कायम रखना है। जब जनता सरकार को चुनौती देती है तब विरोध करने वालों पर लाठियां भांजना , गोली चलाना सरकार की मज़बूरी हो जाती है। सत्ता को चुनौती मत दो , अपने पति को विवश मत करो ताकत का उपयोग करने के लिये। अपनी भड़ास निकालनी है तो गली मोहल्ले में , आस पड़ोस में यूं ही कभी चर्चा करती रहो , मगर जब कोई उकसाये कुछ भी करने को तब ये भी बताती रहो कि भले जैसा भी हैं मेरा पति मेरा देवता है। वोट डालने और वरमाला पहनाने के बाद फिर कुछ नहीं हो सकता , जिसको चुना उसकी जय बोलनी ही होगी। जनता जैसे लोगों को चुनती है उसको वैसी ही सरकार मिलती है , जो बीजा था वही मिलना ही था। हर औरत को अपना नारी धर्म और जनता को लोकतंत्र की मर्यादा हमेशा याद रखनी चाहिये। जब भूल जाते हैं तब वही होता है जो आजकल हर तरफ हो रहा है। नेताओं की जय में जनता का और पति सेवा में पत्नी का वास्तविक सुख है। इतिहास गवाह है इस बात का।
                                राम को जब बनवास मिलता है तब सीता जी को पत्नी धर्म निभाना पढ़ता है पति के सुख़ दुख़ में उसका साथ निभा कर हर दशा में। लेकिन जब राम जी की बारी आती है तब उनकी मर्यादा राज्य का शासक होने का फ़र्ज़ निभाना ही याद रखती है और ये भूल जाती है कि उनको भी अपनी पत्नी का साथ हर सुख़ में हर दुख़ में निभाना भी उतना ही महत्व रखता है। राम राजा हैं , शासक हैं उनको राज करना है इसलिये वे अपनी पत्नी सीता को चुपचाप वन में छोड़ आने का आदेश दे सकते हैं। यही सबक हर शासक को याद रहता है , कुर्सी के लिये सत्ता के लिये सभी का त्याग करने का। क्या सीता जी ने कोई प्रश्न खड़ा किया था अपने प्रिय राम जी के निर्णय को लेकर। नहीं , क्योंकि पति भगवान है , परमात्मा है जिसकी पूजा की जाती है , उसपर संदेह नहीं किया जा सकता। राम राजा हैं , उनको जब यज्ञ करने को पत्नी की ज़रूरत हो तब वो सोने से सीता जी की प्रतिमा बनवा काम चला सकते हैं। क्या कोई पत्नी कर सकती है ऐसा कि पति की जगह उसकी मूर्ति रख कर कोई अनुष्ठान संपन्न कर ले। जनता भी नेताओं के बुत उनके जीते जी नहीं बना सकती है , उसे जैसे भी हो उनकी प्रतीक्षा करनी होती है , जो भी आदेश हो उनका उसे पालन करना ही पड़ता है। औरतों को मर्दों के बराबर अधिकार की बातें करते सदियां गुज़र गई हैं , कितने और युग गुज़र जायेंगे तब भी कुछ भी नहीं बदलेगा। पति पति ही रहेगा और पत्नी पत्नी। जनता हमेशा जनता ही रहेगी , उसको झूठा ख्वाब नहीं देखना चाहिये स्वयं को देश का मालिक समझने का। भ्रम में जी रही हैं वो महिलायें जो मान बैठी हैं कि उनको बराबरी के सभी अधिकार मिल गये हैं। औरत के अपने पैरों पर खड़ा हो जाने और मर्दों की तरह हर काम करने के बावजूद भी उनकी दशा वही है। आज भी परिवार की मुखिया वो नहीं है , उसको पति के घर में रहना होता है और सब पुरुषवादी नियमों का पालन करना ही होता है। जनता को भी शासक की बराबरी का सपना कभी नहीं देखना चाहिये , वर्ना अंजाम बुरा होता है। नेता कहते रहते हैं जनता ही देश की मालिक है , पति भी कहते रहते हैं पत्नी को कि तुम्हीं घर की मालिक हो , लेकिन समझते दोनों ही खुद को ही मालिक हैं। जनता को झूठे वादों से तो पत्नी को दिखावे की मुहब्बत से छला जाता रहा है और छलते ही रहेंगे दोनों दोनों को। ये घर चलने के लिये और देश पर शासन करने के लिये एक मृगतृष्णा की तरह लुभाती रहती है। देश की जनता का भाग्य भी औरत के समान ही है , जो भी जैसा भी मिला हो उसी से निबाह करना पड़ता है। कब तक अच्छे पति की तलाश में कुंवारी बैठी रहे , अच्छे नेताओं की तलाश में जनता को अभी कई जन्म और तपस्या करनी होगी। इस कलयुग में नायक जन्म नहीं ले सकते , खलनायक ही आज के युग के नायक हैं।

Tuesday, 14 January 2014

चिराग़ अलादीन का ( हास-परिहास )

हो सकता है कि वास्तव में अलादीन नाम का कोई शख्स इस दुनिया में कभी हुआ ही नहीं हो न ही कोई अलादीन का चिराग ही रहा हो। ये दोनों मुमकिन है किसी लेखक की कल्पना ही हों। लेकिन किसी कहानी का ये फलसफा इस कदर लोकप्रिय हो गया कि सब ने यकीन कर लिया कि कहीं न कहीं ऐसा कोई चिराग़ ज़रूर है। और सब यही चाहने लगे कि उनको ही मिल जाये ये चिराग़ अलादीन का। अलादीन का चिराग़ सब कुछ कर सकता है , और जिसके भी पास हो उसकी हर आज्ञा का पालन भी करता है , कोई वेतन भी नहीं मांगता। नेता चुनाव से पहले बड़े बड़े वादे करते हैं , मगर जब सत्ता मिल जाती है तब सरकार का हर मंत्री यही बात कहता है कि हमारे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है न ही अलादीन का चिराग़ है कोई जो पलक झपकते ही सब कर सके। सरकार जनता को सब्र रखने का पाठ पढ़ा रही है कितने सालों से , अनपढ़ जनता है कि मानती ही नहीं। अलादीन का चिराग़ जिसे मिल जाये वो बिना पंख उड़ सकता है , पल झपकते जहां जाना चाहे जा सकता है , जो पाना चाहे पा सकता है। मैंने ऐसे चिराग़ को लेकर गहरा चिंतन किया है तब मुझे पता चला है इसका एक दूसरा विकल्प भी है। जो शायद उस चिराग़ से बेहतर ढंग से काम करता है। इससे भी अच्छी बात ये है कि बड़ी इराफात में उपलब्ध भी है , इतना कि विश्व की आधी आबादी को मिल सकता ही नहीं बल्कि मिल ही जाता है। अपने इस देश में तो सुनते हैं कि इसका अनुपात और भी अधिक है , अर्थात अलादीन के चिराग़ अधिक हैं और जिनको इसकी ज़रूरत है उनकी संख्या कम है।
                                  अगर ये सरल सी बात आपकी समझ में नहीं आई तो शायद आप खुद एक चिराग़ अलादीन का हो सकते हैं। अगर आप शादीशुदा पुरुष हैं तो समझ लो आप अपनी पत्नी को मिल चुके ऐसे ही एक चिराग़ ही हैं। महिलाओं की सब से बड़ी , बल्कि प्रमुख समस्या ही पति नाम का अलादीन का चिराग़ तलाश करना होता है। उनको सदा से यही समझाया जाता है कि शादी हो गई तो समझ लो जन्नत का रास्ता खुल गया है। अब जिस किसी ने भी आपसे विवाह रचाया है वो बना ही आपके इशारों पर नृत्य करने के लिये है। उसका फ़र्ज़ है आपकी हर मांग को पूरा करना। शादी में पत्नी की मांग भरने का निहितार्थ कुछ ऐसा ही होता है। सुहागन होने का भी यही प्रमाण है कि उसकी मांग हमेशा भरी होनी चाहिये। हर पत्नी को ये अधिकार सात फेरों के साथ ही ऐसे मिलता है कि जल्द ही वो इसे छीन लेने का हक बन लेती है। पति हो या चिराग़ हो अलादीन का , उससे कुछ भी मांगते समय ये नहीं सोचना पड़ता कि कोई काम संभव है अथवा असंभव। ये दोनों होते ही " जो हुक्म मेरे आका " कहने के लिये हैं। अंग्रेजी का एक लेखक तो यहां तक कहता है कि पत्नी को खुश करने को जो भी करना पड़े करना चाहिये। उसकी इच्छा पूरी करने के लिये उधार लो चाहे क़र्ज़ या फिर चोरी ही करो सब किया जाना उचित है। जीवन का कल्याण तभी संभव है।
               एक अन्य दार्शनिक कहते है कि दुनिया में लूट , चोरी , ठगी , भ्रष्टाचार इन सब कि जड़ अलादीन के चिराग़ रूपी पति को मज़बूरी ही होती है। महनत और ईमानदारी से हर पति रोटी कपड़ा तो कमा सकता है , मगर गाड़ी बंगला सोना चांदी नहीं ला सकता। इसलिये अपने आका रूपी पत्नी का हुक्म बजा लाने की मज़बूरी उसे ये सब करने को विवश कर देती है। जब भी ये कहा जाता है कि हर सफल पुरुष के पीछे किसी महिला का हाथ होता है , तब इसका मतलब यही होता है कि क्योंकि उसकी पत्नी पल पल उसे ये एहसास करवाती रही कि तुमने कुछ भी हासिल नहीं किया तभी उसको तरक्की करने को सब करना पड़ा। इतिहास गवाही देता है कि पत्नी के ताने से कवि तुलसीदास पैदा हो जाते हैं। हर इक पत्नी को मौलिक अधिकार है अपने पति को बुद्धू समझने का। घर से बाहर भले पूरी दुनिया उसे काबिल या समझदार कहे पत्नी के लिये पति निरा मूर्ख ही होता है जो बदकिस्मती से उसके पल्ले पड़ गया है। लाख प्रयास करने के बावजूद भी किसी महिला को समझदार पति नहीं मिलता और ये बात हर पत्नी हमेशा अपने पति को कहती रहती है शिकायत के रूप में। ऐसे में पति इतना ही कह सकते हैं कि अगर समझदार होते तो क्या तुम्हीं से शादी करते। कुछ लोग जो शादी के जाल में नहीं फंसते , नहीं जानते कि वो कितने खुशनसीब हैं जो उम्र भर आज़ाद रहे। कई बार उनके मन में भी शादी का लड्डू खाने की बात आ ही जाती है। ज्ञानीजन तभी शादी को ऐसा लड्डू बताते हैं जिसको खा कर भी पछताते हैं और बिना खाये भी। बहुत सारे लोग खुद बेशक शादी करके पछताते हों , दूसरों को करने को प्रेरित किया करते हैं। शायद उनको मज़ा आता है अपने जैसे सितम औरों पर भी होता देख कर। हर कहानी में हर इक अलादीन के चिराग़ को आखिर में आज़ादी मिल ही जाया करती है , लेकिन पत्नी को शादी में मिला चिराग़ का ये जिन्न उम्र भर का कैदी होता है। इसलिये अक्सर शादी को उम्र कैद भी कह दिया जाता है।

Sunday, 12 January 2014

मुक्ति ( कहानी ) डा लोक सेतिया

पता नहीं किसे ये दुनिया जीने के काबिल लगती होगी , कौन ज़िंदगी को जीता है यहां पर। मैं तो कभी ज़िंदा थी ही नहीं। हां मरती ज़रूर रही हूं हर दिन। मैं तो ये भी नहीं जानती कि इसकी शिकायत किस से करूं। किसे कहूं कि मुझे क्यों जीवन दिया अगर ज़िंदगी ही नहीं दे सकते थे। मां-बाप का भी क्या कसूर था , उन्हें कहां यह मालूम था कि जिस अपनी दुनिया को वो हसीन समझते हैं वो कितनी बुरी है। अब लगता है कि वो कुछ साल जो मां-बाप के साथ बिताये थे , जिनमें कभी दो वक्त पेट भरने को रोटी भी नहीं मिलती थी , तन ढकने को कपड़े भी नहीं होते थे , न कोई रहने का ठिकाना ही था , कभी इधर कभी उधर भटकते रहते थे , जहां मां-बाप को जो काम मिला कर लिया , जब रोटी मिली तो खा ली नहीं मिली तो पानी पी कर ही पेट भर लिया , तब न बचपन का पता था न ही बड़े होने का , तब शायद मैं किसी न किसी तरह ज़िंदा ज़रूर थी। मगर अब तो उन दिनों की यादें भी याद नहीं हैं , मालूम नहीं कब और कैसे मैं बड़ी हो गई और मेरी शादी हो गई। उस बाली उम्र में शादी जैसे गुड्डे-गुड़ियों का खेल ही था कोई। मैंने तो कभी न बचपन देखा न किसी सहेली के साथ कोई खेल ही खेला। बचपन की उम्र बीती भी नहीं थी कि मैं खुद बच्चों की मां बन गई। मां-बाप भूल गये या जाने कहीं खो गये और मैं भी अपने बच्चों में ही खो गई। मुझे जब अपने बच्चे दुनिया में सब से सुंदर , सब से अच्छे और सब से प्यारे लगने लगे तभी समझी कि मुझे भी मेरे मां-बाप इतना ही प्यार करते होंगे। मैंने बहुत कोशिश की कि खुद भूखी रह कर भी किसी भी तरह अपने बच्चों का पेट भरती रहूं। इसके लिये रात दिन काम किया , हर तरह का काम किया मगर फिर आज तक दोनों वक्त बच्चों का पेट नहीं भर सकी। अब तो मैं हर दिन बीमार रहने लगी हूं , अब सोचती हूं मैंने अपने बच्चों को जन्म क्यों दिया। मेरी तरह ये भी नादान हैं , बेबस और मज़बूर हैं। न खाने को रोटी न रहने को ठिकाना , न कोई उम्मीद। पढ़ना लिखना तो सोच भी नहीं सकते , अभी तो ये जानते ही नहीं कि उनकी दुनिया कितनी बेरहम है। यहां आदमी आदमी को खा जाना चाहता है। दूसरे की मज़बूरी का फायदा उठाना चाहता है हर कोई। एक अपना और अपने बच्चों का पेट भरने को क्या क्या नहीं करना पड़ता। मज़दूरी , घरों का काम ,बोझा ढोना ही नहीं जब कोई काम नहीं मिलता तब भीख मांगना क्या मज़बूरी में चोरी तक करने की नौबत आ जाती है।
                                          सब लोग नफरत से देखते हैं हमें , उनको लगता ही नहीं कि हम भी इंसान ही हैं। क्या उसी भगवान ने बनाया है हमें भी जिसने इनको बनाया है , जिनके पास खाने को सब कुछ है , रहने को घर है , पढ़ने को स्कूल , नौकरी - कारोबार सब है। शायद ये जानते होंगे ज़िंदगी किसे कहते हैं और  उसे कैसे जिया जाता है। मुझे तो चक्कर सा आ गया था , शायद दो दिन से भूखी थी , मगर जब आंख खुली तो इस सरकारी अस्पताल में थी। बच्चों ने बताया कि मैं बेहोश हो गई थी और किसी के कहने पर वो मुझे रिक्शा में डाल कर यहां ले आये थे। रिक्शा वाला कोई भला आदमी था जो बिना पैसे लिये मुझे यहां पंहुचा गया था। होश आने पर डॉक्टर साहब ने बताया कि तुम्हारी जांच से पता चला है कि कोई बड़ा रोग है तुमको। बड़े अस्पताल जाना होगा आप्रेशन करवाना होगा जिसके लिये बहुत पैसे चाहिये होंगे ईलाज और दवा के लिये। अभी चार दिन पहले ही बच्चों का बाप काम की तलाश में दूर किसी बड़े शहर गया है , क्या पता अब कहां होगा। जब काम मिलेगा तब चाय वाली दुकान वाले के पते पर पोस्टकार्ड भेजेगा। अगर कहीं रास्ते में रेलगाड़ी में ही पकड़ा गया बिना टिकट तो मज़े से कुछ दिन जेल में पेट भर रोटी खाकर वापस आ जायेगा पिछली बार कि तरह। आदमी का क्या है , कैसे भी रह लेगा। मगर मैं औरत जात , इन छोटे छोटे बच्चों के साथ इस दुनिया में मर मर के जी रही हूं। डॉक्टर साहब बता गये हैं कि तुरंत आप्रेशन नहीं करवाया तो किसी भी समय जान जा सकती है। दिल में तो आता है यही अच्छा है , मौत आ जाये तो मुझे चैन आ जायेगा। लेकिन मैं चैन से मर भी नहीं सकती , मेरे बाद मेरे बच्चों के साथ ये दुनिया क्या क्या नहीं कर सकती। मैं जानती हूं इनको आज तक इन भेड़ियों से किस तरह बचा कर रखा है।
                                    क्या मैं डायन बन गई हूं जो अपने ही बच्चों को मार डालूं। जिन बच्चों को ठोकर भी लगती थी तो मुझे रोना आ जाता था , जब ये बीमार होते तो रात रात भर गोद में लिये जगती रहती थी। जिन बच्चों से हसीन मुझे दुनिया की कोई भी चीज़ नहीं लगती है , उन अपने बच्चों को मैं खुद ही ज़हर दे कर मार डालूं , इसलिये कि मैं मर गई वह कैसे जियेंगे। मेरी तरह उम्र भर रोज़ मरते रहेंगे।  हां जब तक मां बाप ज़िंदा थे मैं भी ज़िंदा थी और जब तक जीती इनके लिये ज़िंदगी तलाश करती रहती। मगर मेरे मरने के बाद ये जिस तरह मरेंगे , मेरे जीने की ही तरह , उससे तो यही अच्छा होगा कि मेरे साथ ही इनको भी मौत आ जाये। यही अच्छा है कि ज़हर रोटी से सस्ता है और एक बार खाने से सभी ज़रूरतों ,सब मुश्किलों से निजात मिल जाती है। ज़िंदगी तो मेरे बस में नहीं रही कभी भी , लेकिन मौत तो हो सकती है। इसलिये मैंने आज अपने साथ अपने बच्चों को भी खिला दिया है। शायद ये ग़म हमारा आखिरी ग़म हो और सब ग़मों से मुक्ति।

Saturday, 11 January 2014

जो बिक गये , वही खरीदार हैं ( तरकश ) डा लोक सेतिया

कहानी एक वफादार कुत्ते की है। अपने गरीब मालिक की रूखी सूखी रोटी खा कर भी वो खुश रहता। कभी भी गली की गंदगी खाना उसने स्वीकार नहीं किया। वो जानता था कि मालिक खुद आधे पेट खा कर भी उसको भरपेट खिलाता है। इसलिये वो सोचता था कि मुझे भी मालिक के प्रति वफादार रहना चाहिये , उसके सुख़ दुःख को समझना चाहिये। वो दिन रात मालिक के घर और खेत खलियान की रखवाली करता। अचानक कुछ लोग मालिक के घर महमान बन कर आये और उसके कुत्ते की वफादारी को देख उससे कुत्ते को खरीदने की बात करने लगे। गरीब मालिक अपने कुत्ते को घर का सदस्य ही मानता था इसलिये तैयार नहीं हुआ किसी भी कीमत पर उसको बेचने के लिये। तब उन्होंने कुत्ते को लालच दे कर कहा कि तुम इस झौपड़ी को छोड़ हमारे आलीशान महल में चल कर तो देखो। मगर वफादार कुत्ते ने भी उनके साथ जाने से इनकार कर दिया। ऐसे में उन्होंने दूसरी चाल चलने का इरादा कर लिया और कुत्ते से कहा कि तुम रहते तो यहीं रहो , बस कभी कभी ख़ास अवसर पर जब हम बुलायें तब आ जाया करना। हम भी तुम्हें खिला पिला कर दिखाना चाहते हैं कि तुम हमें कितने अच्छे लगते हो। बस यही राजनीति की चाल थी , वे यदा कदा आते और कुत्ते को घुमाने को ले जाते। कभी कोई बोटी डाल देते तो कभी हड्डी दे देते चबाने को। धीरे धीरे कुत्ता उनकी आने की राह तकने लगा , और उनके आते ही दुम हिलाने लगा। इस तरह अब उसको मालिक की रूखी सूखी रोटी अच्छी नहीं लगने लगी और धीरे धीरे उसकी वफादारी मालिक के प्रति न रह कर चोरों के साथ हो गई। जब महमान बन कर आये नेता ही चोर बन उसका घर लूटने लगे तो बेखबर ही रहा। अपने कुत्ते की वफादारी पर भरोसा करता रहा जबकि वो अब चोरों का साथी बन चुका था।
                              आजकल किसी गरीब की झौपड़ी की रखवाली कोई कुत्ता नहीं करता है। अब सभी अच्छी नस्ल के कुत्ते कोठी बंगले में रहते हैं कार में घूमते हैं। मालकिन की गोद में बैठ कर इतराते हैं , और सड़क पर चलते इंसानों को देख सोचते हैं कि इनकी हालत कितनी बदतर है। हम इनसे लाख दर्जा अच्छे हैं। इन दिनों कुत्तों का काम घरों की रखवाली करना नहीं है , इस काम के लिये तो स्कियोरिटी गार्ड रखे जाते हैं। कुत्ते तो दुम हिलाने और शान बढ़ाने के काम आते हैं। जो आवारा किस्म के गली गली नज़र आते हैं वे भी सिर्फ भौंकने का ही काम करते हैं , काटते नहीं हैं। जो रोटी का टुकड़ा डाल दे उसपर तो भौंकते भी नहीं , जिसके हाथ में डंडा हो उसके तो पास तक नहीं फटकते।
                                     चुनाव के दिन चल रहे हैं , ऐसे में एक नेता जी अखबार के दफ्तर में पधारे हैं , अखबार का मालिक खुश हो स्वागत कर कहता है धनभाग हमारे जो आपने यहां स्वयं आकर दर्शन दिये। मगर नेता जी इस बात से प्रभावित हुए बिना बोले , साफ साफ कहो क्या इरादा है। अब ये नहीं चल सकता कि खायें भी और गुर्रायें भी। संपादक जी वहीं बैठे थे , पूछा नेता जी भला ऐसा कभी हो सकता है। हम क्या जानते नहीं कि आपने कितनी सुविधायें हमें दी हैं हर साहूलियत पाई है आपकी बदौलत। आप को नाराज़ करके तो हमें नर्क भी नसीब नहीं होगा और आपको खुश रख कर ही तो हमें स्वर्ग मिलता रहा है। आप बतायें अगर कोई भूल हमसे हो गई हो तो क्षमा मांगते हैं और उसको सुधार सकते हैं। नेता जी का मिज़ाज़ कुछ नर्म हुआ और वो कहने लगे कि कल आपके एक पत्रकार ने हमारी चुनाव हारने की बात लिखी है स्टोरी में , क्या आपको इतना भी नहीं पता। संपादक जी ने बताया कि अभी नया नया रखा है , उसको पहले ही समझा दिया है कि नौकरी करनी है तो अखबार की नीतियों का ध्यान रखना होगा। आप बिल्कुल चिंता न करें भविष्य में ऐसी गल्ती नहीं होगी। अखबार मालिक ने पत्रकार को बुलाकर हिदायत दे दी है कि आज से नेता जी का पी आर ओ खुद स्टोरी लिख कर दे जाया करेगा और उसको ही अपने नाम से छापते रहना जब तक चुनाव नहीं हो जाते। सरकारी विज्ञापन कुत्तों के सामने फैंके रोटी के टुकड़े हैं ये बात पत्रकार जान गया था।
                     सच कहते हैं कि पैसों की हवस ने इंसान को जानवर बना दिया है। जब नौकरी ही चोरों की करते हों तब भौंके तो किस पर भौंके। भूख से मरने वालों की खबर जब खूब तर माल खाने वाला लिखेगा तो उसमें दर्द वाली बात कैसे होगी , उनके लिये ऐसी खबर यूं ही किसी छोटी सी जगह छपने को होगी जो बच गई कवर स्टोरी के शेष भाग के नीचे रह जाता है। कभी वफादारी की मिसाल समझे जाते थे ये जो अब चोरों के मौसेरे भाई बने हुए हैं। जनता के घर की रखवाली करने का फ़र्ज़ भुला कर उसको लूटने वालों से भाईचारा बना लिया है अपने लिये विशेषाधिकार हासिल करने को। जब मुंह में हड्डी का टुकड़ा हो तब कुत्ता भौंके भी किस तरह। अपना ज़मीर बेचने वालों ने जागीरें खड़ी कर ली हैं इन दिनों। जो कोई नहीं बिका उसी को बाकी बिके लोग मूर्ख बता उपहास करते हैं ये पूछ कर कि तुमने बिकने से इनकार किया है या कोई मिला ही नहीं कीमत लगाने वाला क्या खबर। वो मानते हैं कि हर कोई किसी न किसी कीमत पर बिक ही जाता है। तुम नहीं बिके तभी कुछ भी नहीं तुम्हारे पास , खुद को बेच लो ऊंचे से ऊंचा दाम लेकर ताकि जब तुम्हारी जेब भरी हो तिजोरी की तरह , तब तुम औरों की कीमत लगा कर खरीदार बन सको और ये समझ खुश हो सको कि सब बिकाऊ हैं तुम्हारी ही तरह।

Friday, 10 January 2014

भ्रषटाचार के अंत के बाद क्या होगा ( तरकश )

आखिर देश से भ्रष्टाचार का नामोनिशान मिट ही गया। अब सब जगह हर काम बाकायदा नियम कायदा और जन हित को महत्व देकर पूरी ईमानदारी से होता है। अब आप जब चाहें अपनी मर्ज़ी से प्लाट खरीद कर मकान नहीं बना सकते हैं। आपको सबसे पहले आवास मंत्रालय से अनुमति लेनी होगी , बताना होगा किस सरकारी विभाग से प्लाट आबंटन चाहते हैं अथवा किस बिल्डर से खरीदना चाहते हैं। इसके लिये आपको जानकारी देनी होगी मंत्रालय को कि आपके पास पहले कोई मकान या प्लाट या कोई फ्लैट है अथवा नहीं। अगर है तो कहां कहां कैसे कैसे कितनी जायदाद बना रखी है , कब और किस तरह का पूरा विवरण साथ देना होगा। मंत्रालय विभाग से जांच करवायेगा कि क्या वास्तव में आपको मकान या ज़मीन की आवश्यकता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि इससे उन बेघर लोगों का घर बनाना कठिन हो जायेगा , आप जैसे लोगों को कई कई जगह मकान बनाने देने से घर बनाना महंगा हो जाने से , जो देश में सब को मूलभूत सुविधा देने का वादा संविधान करता है। अफ्सरों , सांसदों , विधायकों , मंत्रियों को भी सरकारी आवास तभी उपलब्ध करवाया जायेगा जब वो अपना निजि मकान अगर किसी अन्य जगह है तो उसको सरकार के हवाले कर देंगे ताकि उसको किसी दूसरे सरकारी आदमी को दिया जा सके। वे जब तक मुफ्त के सरकारी आवास में रहेंगे तब तक उनका निजि मकान बिना किसी किराये के सरकार के पास रहेगा। ये सब देश की आवास समस्या को हल करने के लिये लागू की गई निति के अनूरूप ही होगा। अब जब से भ्रष्टाचार मिटा है और सरकार व प्रशासन ईमानदारी से काम करने लगा है ताकि जनता की समस्याओं का शीघ्र अंत हो , तब से जिनके पास ज़रूरत से अधिक धन है उनके लिये नई समस्या खड़ी हो गई है कि इन पैसों का करें क्या।
         अस्प्ताल सरकारी हो चाहे निजि , केवल पैसे वालों का ही ईलाज नहीं किया जा रहा है , जिनकी जेब खाली है उनको भी कायदे से उचित स्वास्थ्य सेवा मिलती है। दूसरी तरफ कुछ धनवान मरीज़ों को बताया जा रहा है कि क्योंकि आपका रोग अधिक गंभीर नहीं है इसलिये आपको अभी दाखिल नहीं किया जा रहा है। बिना दाखिल किये भी आपका ईलाज किया जा सकता है , दाखिल होने के लिये अभी आपको इंतज़ार करना होगा। अब किसी को भी सिर्फ पैसा देने से अच्छा इलाज नहीं मिलता है , जिसको ज़रूरत हो केवल उसी को मिलता है। अब नेता अफ्सर या पत्रकार होने से आप को वी आई पी नहीं माना जायेगा , किसी को भी किसी प्रकार का विशेषाधिकार नहीं मिलेगा। हर नागरिक को समान समझा जाता है अब। पहले जैसे बाकी लोगों को अनदेखा कर आपको प्राथमिकता दी जाती थी अब नहीं मिल रही है।अब चाहे राशनकार्ड बनवाना हो या फिर अपने ड्राइविंग लाइसेंस का नवीनीकरण करवाना हो इनको भी खुद जाना होगा सरकारी कार्यालय और इंतज़ार करना होगा अपनी बारी का। अब कोई नहीं सुनेगा कि आपका समय कितना कीमती है और न ही ये कि आम जनता की तरह इंतज़ार करना आपको अपना अपमान लगता है। आप कोई वाहन चला रहे हों अथवा कोई उद्योग चलाते हों , कोठी - कारखाना जो भी बनाना चाहते हों , सभी नियमों का पूरी तरह पालन करना ही होगा। मनमर्ज़ी करके जुर्माना भरने से अब छूट नहीं सकते हैं। किसी को भी अपनी सुविधा से ऐसा कुछ भी नहीं करने दिया जाता है जिससे बाकी लोगों को परेशानी हो सकती हो। जब चाहे गली या सड़क को रोक नहीं सकते हैं न धार्मिक आयोजन करने के लिये न ही सभा आयोजित करने के लिये और विरोध करने के लिये भी कोई किसी तरह आम जनता को ढाल नहीं बना सकता है। कानून ऐसा होते देख चुपचाप नहीं रहता अब। अब किसी को शोर मचाने और गंदगी फैलाने का भी कोई अधिकार नहीं रह गया , ऐसे हर कदम पर सज़ा मिलती है। अब कभी किसी को कुछ भी विरासत में नहीं मिलेगा न ही सिफारिश से ही। स्कूल कॉलेज में दाखिले से नौकरी तक सब काबलियत से ही मिलेगा , बाप दादा का नाम और पैसा सब आसानी से नहीं दिलवा सकता है।
          कहना कठिन है कि राजनैतिक दलों को आसानी होगी या उनकी मुश्किलें अधिक बढ़ जायेंगी। अब उनके लिये सीमा से एक रुपया अधिक भी चुनाव पर खर्च करना मुसीबत बन जायेगा। दोषी पाये जाने पर उनका चुनाव ही रद्द नहीं होगा , उनको सज़ा भी मिलेगी और भविष्य में चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध भी। सब से बड़ी मुश्किल होगी सांसदों विधायकों को मिलने वाली हर वर्ष की कल्याण राशि को खर्च करने की। बिना भ्रष्टाचार किये ये कर पाना जब कठिन लगेगा तब वो खुद ही इस संविधान विरोधी अधिकार को छोड़ना चाहेंगे। जिस दिन से भ्रष्टाचार का अंत हुआ है , मीडिया वालों के दिन खराब आ गये हैं , न उनको ख़बरें मिल रही हैं न काम करने में कोई लुत्फ़ ही आ रहा है। अब कोई नेता कोई अफ्सर उनसे डरता नहीं है , कोई भी सर पर नहीं बिठाता है। वो पहले सी धाक नहीं रही कि प्रैस शब्द लिखवा लिया वाहन पर तो कोई रोक टोक नहीं हो , न ही पत्रकार हैं का परिचय देने से ही सब हाथ जोड़ काम कर देते हैं। अब जब कोई बताता है कि मैं पत्रकार हूं तो जवाब मिलता है तो हम क्या करें , यहां सभी एक समान हैं। आम और खास का रत्ती भर भी अंतर नहीं रह गया है जब से भ्रष्टाचार समाप्त हुआ है। सब लोग जो आसमान पर उड़ते रहते थे आजकल ज़मीन को तलाश करते नज़र आते हैं। ये सब जिस दवा से हुआ है वो है लोकपाल नाम की भ्रष्टाचार के कीटाणु को जड़ से मिटाने वाली रामबाण दवा , शायद कई देश चाहेंगे इसे हमसे खरीदना अपने देश से भ्रष्टाचार मिटाने के लिये।

Thursday, 9 January 2014

बड़ा जूता अधिक पालिश ( तरकश ) डा लोक सेतिया

हमने बड़े अधिकारी से कहा " विभाग आपका बहुत ही बदनाम है। भ्रष्टाचार खुलेआम है , बिना रिश्वत होता नहीं किसी का भी काम है। " अधिकारी बोले साफ साफ कहो आपका कैसा काम है , हर काम का फिक्स दाम है। सच पूछो तो इसमें ही आराम है , जो भी है सरेआम है। हमको तो काम ही काम है , क्या बतायें सुबह है कि शाम है। पैसे का ही खेल सारा है। कर्मचारियों में कायम भाईचारा है। हर दिन का यही किस्सा है। बराबर सभी का हिस्सा है। लेने और देने वाले जब राज़ी हैं। आप किस बात के क़ाज़ी हैं। बेबुनियाद आपके इल्ज़ाम हैं। मुफ्त में कर रहे बदनाम हैं। नासमझ बीस पचास ले लेते हैं। ईमान को सस्ते में बेच देते हैं। हम कभी न ऐसा करते हैं। जब बिकते हैं अपना घर भरते हैं। वे ईमानदार कहलाते हैं , जो खुद भी खाते हैं और दूसरों को भी खिलाते हैं। हर दिन सब के काम आते हैं। जो भी देता है उसका ही हुक्म बजाते हैं। कुछ नोट मिल जाते हैं , सब चेहरे खिल जाते हैं। और नहीं दुनिया में कोई नाता है। सब जगह झूठा बही खाता है। चंद सिक्कों में बेड़ा पार है। नौ नकद न तेरह उधार है। तेल है तेल की धार है , आजकल का ये सच्चा प्यार है। आप तो बेवजह घबराते हैं , न खुद खाते हैं न हमें खिलाते हैं। खाली बातें ही बनाते हैं। बातों से कभी पेट भरता है , तुम क्या जानो पापी पेट क्या करता है। भ्रष्टाचार भी इक तपस्या है , ये नहीं कोई समस्या है। यह हर रोग की दवा है। तुम भी उधर चलो जिधर की हवा है। समझदारी से राह आसान हो जाती है , कुछ नोटों से गहरी पहचान हो जाती है। वरना यहां किसे कौन जानता है , जब भाई की भाई तक नहीं मानता है। सौ दो सौ लेने वाले रंगे हाथ पकड़े जाते है। वही रिश्वतखोर कहलाते हैं। लाखों खाने वाले नहीं हाथ आते हैं। करोड़ों खाने वाले सब छूट जाते हैं। "
    " रुपया दो रुपया भीख मांगना शर्म की बात होती है। चंदा मांगने वालों की और ही बात होती है। तब बस देने वालों की औकात होती है। कमीशन और दलाली बाज़ार के बड़े शो रूम वाला खेल है। भीख सड़क किनारे लगी सेल है। नेताओं को एंटीसिपेटरी बेल है , रहने को रेस्ट हाउस कहने को जेल है। भ्रष्टाचार तो दिलों का मेल है। इसकी बनी न कोई नकेल है। आप भी प्यार मुहब्बत को चलने दीजिये , जलने वालों को जलने दीजिये। चाहने वाले कहां घबराते हैं , राह नई रोज़ बनाते हैं। देश में कितने घोटाले हुए , कितने चेहरे काले हुए। कभी दलाली कभी हवाले हुए। सब के सब बरी होते रहे , आप तब चैन से सोते रहे। जाने कब सीधी राह पे आओगे , बहती गंगा में नहाओगे। अब भी नहीं समझे तो पछताओगे , प्यासे आये थे प्यासे ही जाओगे। "
                  सुनकर उनका प्रवचन हम तो घबरा गये , जाने कहां हैं हम लोग आ गये। दिन में भी लग रही रात है। हां ये इक्कीसवीं सदी की बात है। अधिकारी से बचकर जो बाहर को आये। बड़े बाबू से थे जा टकराये। वो मुस्कुरा कर बोले तो उनसे मिल आये , होंठ लगता है सिल आये। कहना जो हमारा मान जाते , सस्ते में ही छूट जाते। मामला जितना ऊपर जाता है , रिश्वत का भाव बढ़ता जाता है। बड़ा जूता अधिक पालिश खाता है। अब आपका काम करने से सब कर्मचारी डर गये हैं। समझो रिश्वत के दाम चढ़ गये हैं। ईमानदारी की बात करना छोड़ दीजिये , भ्रष्टाचार से नाता जोड़ लीजिये। काम आपका हो जायेगा। वहीं कोई सरकारी साधु भजन गा रहा था " जो खोयेगा वही पायेगा।  "

Wednesday, 8 January 2014

मृत्त्युलोक का सीधा प्रसारण ( तरकश ) डा लोक सेतिया

यमराज उस परेशान आत्मा को लेकर सीधे धर्मराज जी की कचहरी में आये। चित्रगुप्त ने बही खाता खोल कर उनके कर्मों का विवरण प्रस्तुत किया। और धर्मराज को बताया कि इस आत्मा ने सदा सदकर्म ही किये हैं जीवन भर , मगर हमेशा ही परेशान होते रहे हैं धरती पर लोगों को अपकर्म करते देख कर। लेकिन इनके मन में ईश्वर के न्याय के प्रति हमेशा सवाल उठते रहे हैं। यहां तक कि मरने के बाद जब यमराज इनकी आत्मा को ला रहे थे तब भी इनकी आत्मा यही सोचती आ रही थी कि अगर ईश्वर से सामना हुआ तो पूछेंगे कि अपनी बनाई हुई सृष्टि की व्यवस्था को सुधारने का कोई कारगर उपाय क्यों नहीं करते आप हे ईश्वर। परेशान आत्मा की बात समझ धर्मराज जी को भी उचित  लगा उसे उसके सवालों के जवाब स्वयं भगवान से दिलवाना। ईश्वर के निजि कक्ष में धर्मराज जा पहुंचे उस आत्मा को साथ लेकर , ईश्वर ने जानना चाहा ऐसी क्या परेशानी है जो आपको मेरे पास आना पड़ा। धर्मराज बोले कि इस आत्मा के कुछ सवाल हैं जो सुन कर मुझे भी चिंता करने वाले ही लगे और उनका जवाब आप ही दे सकते हैं। ये आत्मा आपकी बनाई सृष्टि की खराब व्यवस्था से बेहद चिंतित है और चाहती है आप उसको सुधारने को कोई कारगर उपाय शीघ्र करें। ईश्वर कहने लगे हे परेशान आत्मा आपकी परेशानी सही है और मैं भी बहुत ही बेचैन रहता हूं इस बात को सोच सोच कर। मगर कोई उपाय सूझ ही नहीं रहा है। जिनको सत्य का धर्म का मार्ग दिखलाना था सभी को वही खुद भटक गये हैं , लोग उनको धर्मगुरु मान सर झुकाते हैं जबकि वो लोभ मोह अहंकार में डूबे रहते हैं। बात एक कंस या एक रावण की होती तो मैं खुद अवतार लेकर उसका अंत कर देता , मगर वहां तो तमाम कपटी लोग खुद को मेरा ही अवतार घोषित करने लगे हैं और करोड़ों लोग उनके झांसे में आ उनकी जयजयकार करते हैं। अब इतने लोगों के इस अंधविश्वास का अंत कैसे करूं और कैसे सच और झूठ उनको समझाऊं ये मेरी भी समझ में नहीं आ रहा है। परेशान आत्मा बोली ईश्वर मैं आपको एक सुझाव देना चाहता हूं , हमारे देश में जब किसी समस्या का कोई हल नज़र नहीं आता है तब सरकार एक प्रतिनिधिमंडल अपने नेताओं एवं अफ्सरों का विदेश भेजती है कि वे देख कर आएं कि उस देश में ये सब क्यों नहीं है। क्या उपाय किया हुआ है उन देश वालों ने। वो अलग बात है वो नेता अफ्सर वहां ये जानने का प्रयास नहीं करते , बस सैर सपाटा कर लौट आते हैं। आने के बाद कोई एक नई समस्या खड़ी कर देते हैं , पहले चल रही कितनी ही असफल योजनाओं जैसी एक और योजना प्रस्तुत कर , जिसका कार्यभार उनको सौंप दिया जाये। नतीजा वही ढाक के तीन पात , लेकिन आप ऐसा नहीं हो इसलिये अपने ऐसे ईमानदार देवी देवताओं को पृथ्वी का भ्रमण करने को भेजें जिनको अपनी पूजा , अपने नाम पर बनाये मंदिरों के चढ़ावे और वहां आये भक्तों की भीड़ को देख प्रसन्न होने की बुरी आदत नहीं हो। जो किसी पापी या अधर्मी को क्षमा नहीं करते हों प्रार्थना सुनकर।
                   ईश्वर बोले परेशान आत्मा आपने मेरे सामने उस लोक से लेकर इस लोक तक की सही तस्वीर प्रस्तुत कर दी है। मैं आपको अपना विशेष सलाहकार नियुक्त करना चाहता हूं इस समस्या को समाप्त करने के उपाय खोजने के काम में योगदान दें आप भी। परेशान आत्मा बोली कहीं आप वही जल्दबाज़ी तो नहीं करने जा रहे जो हमारे प्रदेश में मुख्यमंत्री किया करते हैं। जिसको अपना विश्वासपात्र समझ ओ एस डी नियुक्त करते हैं वही उनके नाम पर सत्ता के जमकर दुरूपयोग करता है। सब से अधिक भ्रष्टाचार , घोटाले ऐसे ही लोग करते हैं , आप ऐसे आंख मूंद किसी का भी ऐतबार नहीं कर सकते। अधिकार मिलते ही सब बदल जाया करते हैं , मुझे खुद अपने आप पर भरोसा नहीं कि आपने मुझे इतनी शक्ति दे दी तो मैं क्या करूंगा , हो सकता है आपको भी धोखा देने लग जाऊं , इस कलयुग में कुछ भी संभव है हे ईश्वर। ये सुन ईश्वर की चिंता और अधिक बढ़ गई , उन्होंने पूछा परेशान आत्मा आपने तो मुझे दुविधा से निकालने की जगह मेरी दुविधा को और बढ़ा दिया है। आप क्या ये कहना चाहते हैं कि मैं अपने ही घर के सदस्य सभी देवी देवताओं पर भी भरोसा नहीं किया करूं। भला मैं ऐसा किस तरह कर सकता हूं , इस कदर अविश्वास करके हम एक साथ कैसे रह सकते हैं। परेशान आत्मा ने कहा कि अगर मेरी बात का बुरा नहीं मानें तो मैं आपको सुझाव दे सकता हूं। ईश्वर बोले अवश्य बताओ और अगर उचित लगा तो हम उस पर अमल भी करेंगे। परेशान आत्मा ने कहा हे ईश्वर आप सब कि पल पल की निगरानी की व्यवस्था करें। ईश्वर बोले ये सच है कि ऐसा माना जाता है कि मुझे सब की हर बात की खबर है , मगर मैं ऐसा नहीं कर सकता हूं , मुझे एक सीमा से अधिक किसी की निज्जता में झांकना अनुचित प्रतीत होता है। पल पल की बात पूछना या जानना तो मुमकिन नहीं है किसी भी तरह , आखिर मुझे भी कुछ समय चाहिये खुद के लिये। परेशान आत्मा कहने लगी मैं उपाय बताता हूं जिससे आपको कोई परेशानी नहीं होगी न किसी को कुछ मालूम होगा कि उनकी निज्जता में कोई दखल है , सब गोपनीय तरीके से होगा , आपको छोड़ किसी को भी कोई भनक नहीं लगेगी। बस आपको ये पुराने ढंग छोड़ नई तकनीक का सहारा लेना होगा। ईश्वर हैरान हो कर बोले बताओ ऐसी क्या तकनीक हो सकती है। तब परेशान आत्मा ने बताया बिग बॉस नामक टीवी शो में यही होता है , बिग बॉस किसी को दिखाई नहीं देता मगर उसको सब नज़र आता रहता है। वह आदेश देता है , निर्देश देता है , कैमरे और माईक से पल पल की खबर रखता है। घर में रहने वाले अगर चाहें भी झूठ नहीं बोल सकते , ज़रूरत होने पर उनको उनकी असलियत दिखाई जा सकती है। आप मृत्युलोक से अपने पास सीधा प्रसारण करवाने की व्यवस्था करें , और खुद देखते रहें सब कुछ। आपको नज़र आएगा किस तरह नेता , अफ्सर देश को लूट रहे हैं , सरकार और प्रशासन कितना अमानवीय कर्म कर रहे हैं। जब सभी के अपकर्मों को आप खुद देख सकेंगे तब अपने सभी देवी देवताओं को भी निर्देश दे सकेंगे कि वे अपने अपने भक्तों को अपकर्मों की कड़ी सज़ा दें न कि अपनी स्तुति से प्रसन्न हो उनके अपराध क्षमा करते रहें। जब ईश्वर ने अपने लोक में नये टीवी चैनेल स्थापित करने की योजना को स्वीकृति प्रदान कर दी तब परेशान आत्मा ने कहा हे ईश्वर एक अंतिम बात और बतानी ज़रूरी है। सावधान रहना , अपना चैनेल किसी मुनाफाखोर को ठेके पर कभी मत देना वर्ना कोई हमारे देश के टीवी चैनेलों की तरह झूठे विज्ञापनों द्वारा पैसा कमाने के लालच में अपने ध्येय से भटक सकता है। ईश्वर ने इस कार्य के लिये महाभारत वाले संजय की सेवायें लेने का निर्णय लिया है। नेता , अपराधी , पाप - अधर्म करने वालों के साथ साथ धर्मोपदेशक भी संभल जायें , क्योंकि ईश्वर न केवल खुद सब देखेगा बल्कि इनके अपकर्मों को सभी को दिखाया भी करेगा , बिग बॉस की तरह। अब पता चलेगा असली बिग बॉस कौन है।  

Tuesday, 7 January 2014

कविता की बात ( हास-परिहास ) डा लोक सेतिया

हमने पहले से ही तय कर लिया था कि अगर कभी भी हम प्यार करेंगे तो सिर्फ कविता से करेंगे। जब हम कवि हैं तो हमारी कविता भी होनी चाहिये कोई , जिसे दिलोजान से प्यार करें उम्र भर हम। मगर हमारे नसीब में लिखा ही नहीं था किसी कविता नाम की लड़की से कभी मुलाकात करना। फिर भी ये शब्द हमें अपना सा लगता था और हम हमेशा यही सोचा करते थे कि अगर हमें कोई कविता नहीं मिलेगी तब हम जो भी मिलेगी विवाह के बाद उसका नाम कविता रख लेंगे। अफसोस न कोई कविता नाम वाली मिली न हमने कभी इश्क़ किया। समझा जाता है कि इश्क़ में आशिक को अच्छी कविता लिखना खुद ब खुद आ जाता है। लेकिन जब हमारे विवाह की बात चली तो और हमें बताया गया कि कन्या का नाम कविता है तो हमने देखे बिना ही हामी भर दी। अब जिसका नाम कविता है उसे देखने की क्या ज़रूरत , सोच लिया उम्र भर कविता को ही देखेंगे , कविता ही पढ़ा करेंगे , लिखते तो पहले से ही हैं। शादी का शुभ महूर्त निकालते समय पंडित जी कहने लगे कि कविता नाम तुम पर बहुत भारी पड़ सकता है इसे बदलना ही उचित है , हमने कहा कि ऐसा है तो ग़ज़ल नाम रख देते हैं , मगर ये भी उनको नहीं जचा तो हमने कह दिया कि फिर हमारा नाम बदल कर कविता के हिसाब से रख दो। ये सुन कर हंस दिये सभी कि भला ऐसा कहीं होता है , लेकिन हमने कविता को कविता ही रहने देने की ज़िद ठान ली और नाम को नहीं बदलने दिया। इस तरह हमने अपनी ख़ुशी से शादी कर ली कविता नाम की लड़की के साथ। और बहुत जल्द हमें कविता कविता में ज़मीन आसमान का अंतर नज़र आने लगा , साथ ही इस बात का अर्थ भी समझ आने लगा कि एक म्यान में दो तलवारें कभी नहीं समा सकती। पर अब हमें तो तमाम उम्र दोनों कविताओं को साथ रखना ही था।
                                    इधर जब से हमें बुलावा आया है कवि सम्मलेन में कविता सुनाने का तब फिर से खुद के कवि होने का यकीन होने लगा है , अन्यथा श्रीमती जी की बातों को मान हमने भी सोच लिया था कि हम जो लिखते हैं वो बेकार की तुकबंदी के सिवा कुछ भी नहीं है। यूं भी पत्नी होने के नाते हमारी कविताओं को बिना पढ़े , बिना सुने ही रद्द करने का उनका विशेषाधिकार है। जब सुहागरात को ही हमने उनको अपनी कविता सुनाई थी जो उनके नाम लिखी थी हमने तभी उन्होंने तय कर लिया था कि कैसा बर्ताव अपनी सौतन से करना है। बस वही पहली और आखिरी बार हमारी कविता सुनी थी श्रीमती जी ने। बहुत कोशिश की मगर कविता जी को कविता कभी पसंद नहीं आ सकी। हमने उनकी तारीफ में भी लिखी कविता , मगर उनको वो तारीफ भी फीकी ही लगी , हम हार गये इस प्रयास में आखिर। एक बार यूं ही भूले से कह बैठे कि आग लगा सकती है ये कविता तो वे बोलीं देखेंगी किसी दिन चूल्हे में डालकर। तब से हमने उनको अपनी कविताओं से और अपनी कविताओं को उनसे फासले पर रखना लाज़मी समझा है। अब उनको भी तसल्ली है कि बच गई हैं मेरी कवितायें सुनने से। हमें इस बात का अफ़सोस रहता था कि हमारे फन की कद्र नहीं जानती हैं। जब कभी घर आ कर बताते कि दोस्तों ने कविता सुन बड़ी दाद दी , तब उनका कहना होता कि ज़रूर उनको कुछ मतलब होगा , तभी खुश करना चाहते हैं आपको।श्रीमती जी को यकीन ही नहीं बल्कि उनका दावा है कि जो वो मानती हैं या कहती हैं वही सब से बड़ा सत्य है और बाकी सब कुछ मिथ्या है। एक दिन जब बाहर से घर आये तो देखा कि जिन कागज़ों पर हमारी कवितायें लिखी हुई हैं वो नीचे फर्श पर बिखरी पड़ी हैं। पूछने पर जवाब मिला कि तुमने ही बोला था घर की साफ सफाई के लिये , इसलिये कबाड़ी को बुलाया था फालतू का सामान बेचने के लिये। सब खरीद कर ले गया लेकिन इन स्याही से लिखे कागज़ों को उसने अखबार की रद्दी के भाव भी लेने से इनकार कर दिया। देख लो इन कविताओं को ढाई रुपये किलो भी नहीं खरीदा उसने। हमने शुक्र मनाया कि बाल बाल बच गये और अपनी कविताओं को समेट कर अलमारी में रख ताला लगा दिया। लेकिन जब से हमने अपनी रचनायें पत्र पत्रिकाओं में भेजना शुरू किया और वो छपने लगी तब से श्रीमती जी के तेवर थोड़ा नर्म होने लगे थे। जब पहली बार किसी कवि सम्मेलन का बुलावा आया तो श्रीमती जी कहने लगी वहां सफेद कुर्ता पायजामा पहन कर मत जाओ , लोग सुना है अंडे टमाटर साथ लाते हैं फैंकने को। मगर हम नहीं माने थे , और जब सही सलामत घर वापस आये तो अपना कुर्ता उतार कर उनके हाथ में पकड़ा कर कहा कि देख लो कोई दाग़ नहीं लगने दिया इसपर हमने। श्रीमती जी आदत से मज़बूर कुर्ते की जेब को टटोलने लगी , और उसमें से एक लिफाफा निकाल बोली ये क्या है। हमने कहा , याद आया ये कवि सम्मेलन के आयोजकों ने दिया था ये कह कर कि सम्मान पूर्वक दे रहे हैं। श्रीमती बोली कि इसमें है क्या , हमने कहा कि हमने देखा नहीं आप ही देख लो क्या डाला हुआ है। उन्होंने देखा तो ढाई सौ रुपये निकले , मगर श्रीमती जी ये मानने को हर्गिज़ तैयार नहीं कि जिस रद्दी को कबाड़ी ढाई रुपये किलो भी लेने को नहीं माना था उसके दो पन्नों को पढ़ कर सुनाने पर कोई ढाई सौ रुपये दे देगा। हमने कहा ये आपके लिये हैं तो खुश होकर पैसे रखने के बाद भी उनका मानना है कि ये खुद हमने अपनी जेब में रखे होंगे उनको खुश करने के लिये। और जैसा सदा वे समझती हैं जो वो मानती हैं वही सच है। हम तो बस मन ही मन सोचते रह जाते हैं कि काश कविता जी कभी कविता का मोल समझ पाती। ये इक कविता की बात है और दूजी कविता का दर्द भी। 

Monday, 6 January 2014

फ्रैंडली क्रिकेट मैच ( तरकश ) डा लोक सेतिया

इस देश में हर किसी को एक काम करना बहुत अच्छी तरह आता है। क्रिकेट खेलना। नेता अभिनेता अफ्सर शिक्षक डॉक्टर वकील छात्र चाहे जो भी कुछ हों हम , अपना वास्तविक काम भले करना जानते हों या नहीं , क्रिकेट खेलना ही नहीं इस खेल की हर बात जानते हैं सभी। इसमें पुरुष या स्त्री का भी कोई अंतर नहीं , सब इक दूजे से बढ़कर हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि टीम इंडिया के खिलाड़ियों को छोड़ कर बाक़ी सब बेहतरीन क्रिकेट खेलने वाले हैं। लगता है हमारे देश के लोगों के पास ये खेल खेलने को फुर्सत ही फुर्सत है , उसके इलावा और कुछ भी करना बिल्कुल ज़रूरी नहीं है। सब के पास वक़्त है क्रिकेट खेलने के लिये , तभी यहां फ्रैंडली क्रिकेट मैच आयोजित होते रहते हैं। कभी नेताओं कभी कलाकारों कभी प्रशासन कभी पुलिस कभी पत्रकारों का ,तो कभी इनमें से किसी का किसी के साथ फ्रैंडली क्रिकेट मैच होता ही रहता है। खेल भले कोई भी रहा हो , जनता ताली बजाने को रहती है हर बार। भारत देश में जिसे क्रिकेट खेलना नहीं आता उसका देश प्रेम अधूरा समझा जाता है। क्रिकेट का खेल ही अब पैमाना है देशप्रेम को परखने का , हम देशप्रेम प्रकट करने के लिये अन्य किसी बात किसी खेल को महत्व नहीं देते , बस यही एक साधन है देश के प्रति अपनी भावना व्यक्त करने के लिये। क्रिकेट में हारना जीतना हमारे लिये राष्ट्रिय चिंता का विषय होता है। अब तो हम ये भी मानते हैं कि क्रिकेट को खाया जा सकता है , बिछौना बना कर सोया जा सकता है , ओढ़ना पड़े तो ओड़ा जा सकता है , और ज़रूरत हो तो शीतल पेय की तरह पिया जा सकता है। ऐसे जनता को जो भी चाहिये , रोटी , पानी , छत या वस्त्र सब मिल सकते है केवल इसी से। बड़े ही काम की चीज़ है क्रिकेट। दोस्त को दुश्मन बना सकता है ये खेल और दुश्मन को दोस्त भी यही बना सकता है। यहां तक कि किसी को भगवान बना सकता है क्रिकेट। क्रिकेट ने एक नया भगवान दिया है हमें , देने को सिनेमा ने भी दिया है दूसरा एक भगवान लेकिन जो बात क्रिकेट वाले भगवान की है वो और किसी की भला हो सकती है। क्रिकेट माया है और इक मायाजाल है क्रिकेट का। क्रिकेट जैसा और कुछ भी नहीं है। इसकी महिमा का बखान करना इस तुच्छ लेखक के बस की बात नहीं है। क्रिकेट तो क्रिकेट ही है।
                                     चोरियों के सुहाने मौसम में चौकीदार इलैवन का थानेदार इलैवन के साथ फ्रैंडली क्रिकेट मैच रखा गया है। ये बताने की ज़रूरत नहीं है कि प्रयोजक चोर सभा ही है और मामला चोरी के माल में बंदरबांट का भी है। दोनों ही टीमों में चोरों को शामिल किया गया है जीत की संभावना बढ़ाने के लिये। कौन सी टीम कितने रन बनाती है और कितने विकेट बचा पाती है इसी को आधार बनाया जायेगा ये तय करने का कि चोरी के माल में उसका कितना हिस्सा होगा। इसलिये बात खेल भावना से अधिक पापी पेट की बन गई है। कुछ पुराने समझदार चोरों ने चौकीदार इलैवन के कप्तान को समझाने का प्रयास किया कि थानेदार इलैवन को जीतने देने में ही सबकी भलाई है। लेकिन वो ज़िद पर अड़ गया है कि उनको हरा कर ही रहेगा ताकि अधिक हिस्सा हासिल कर सके। वो थानेदार इलैवन को कड़ी टक्कर देने की बात करने लगा है। अब वो ये नहीं होने देना चाहता कि सारा माल बंदर हड़प जायें और हम बिल्लियों की तरह आपस में झगड़ते रह जायें। थानेदार को भी आसार अच्छे नहीं नज़र आ रहे , उसे भी लग रहा है कि अब उसका रौब पहले जैसा नहीं चल रहा है। चोरों की बातों का असर चौकीदारों पर भी होने लगा है , उनको भी लगता है कि मेहनत हम करते हैं और फल कोई और खाता रहता है। मुकाबला शुरू होने से पहले दोनों टीमें अभ्यास में जुटी हुई हैं। जब थानेदार और चौकीदार टॉस करने लगे तब चोरों को एक सुनहरी अवसर मिल गया है।
                            अचानक चोरों ने ये घोषणा करके सनसनी पैदा कर दी है कि वे थानेदार या चौकीदार इलैवन में शामिल होकर नहीं खेलेंगे , बल्कि अपनी अलग टीम बना खेल में भाग लेंगे। उन्होंने मांग की है कि एक मैच न रख कर त्रिकोणीय मुकाबला करने को तीन मैच होने चाहियें ताकि सब को समान अवसर मिले अपनी प्रतिभा दिखाने का। खेल खेल न रह कर जंग बनता जा रहा है। मामला बिगड़ नहीं जाये इसलिये एक सर्वदलीय बैठक आयोजित की गई जिसमें कुछ वरिष्ठ लोगों की समिति का गठन किया गया खेल के नियम और रूपरेखा तय करने के लिये ताकि खेल को मित्रता की भावना से खेला जा सके। समिति ने विचार विमर्श करने के सब सुलझा दिया है। सब को ये बात समझा दी गई है कि हम सभी का हित जीत हार में नहीं बल्कि आपसी भाईचारा कायम रखने में है। एक प्रकार से मैच को पहले से फिक्स कर दिया गया है। सभी की भलाई इसी में है ये सब मान गये हैं। समिति का कहना है कि जब टीम इंडिया के खिलाड़ी खेल से अधिक ध्यान विज्ञापनों की आय पर रख सकते हैं तो चोरों , चौकीदारों को ही क्रिकेट की चिंता करने की क्या ज़रूरत है। सब को अपना अपना हिस्सा मिलता है और मिलता रहेगा। हमारा ध्येय आपसी प्यार को विश्वास को बढ़ाना है। थानेदार इलैवन की जीत ही चोरों और चौकीदारों की जीत है।

Sunday, 5 January 2014

कब और कैसे बदलेगी तस्वीर देश की ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

हक़ नहीं खैरात देने लगे , इक नई सौगात देने लगे। मेरी ये ग़ज़ल तब भी सच थी जब खाद्य सुरक्षा कानून लागू किया गया था और आज भी सच है। बहुत खेद की बात है कि हर सत्ताधारी खुद को दाता और जनता को भिखारी समझता है। जनता को उसके अधिकार कब मिलेंगे और कैसे असली सवाल यही है। बहुत सारी बातें हैं चर्चा को , बारी बारी से कुछ खास पर आज चिंतन किया जाये। सब से पहले उसकी बात जो सब बातों का आधार है , लोकतंत्र के बारे में सोचा जाये। शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि कोई सरकार जनता के पचास प्रतिशत से अधिक वोटों को हासिल कर बनी हो , इसके बावजूद नेता दावे करते हैं कि उनको जनादेश मिला है। वास्तव में कभी किसी भी दल ने ये ज़रूरी ही नहीं समझा कि सच में देश की जनता का बहुमत उसको मिले। सभी का ध्येय निर्वाचित सदस्यों का बहुमत हासिल करना रहा है। और उसको जुटाने के लिये हर किसी से समझौता किया जाता है , विचारधारा का कोई सवाल ही नहीं। मतलब सब की विचारधारा एक समान है कि जैसे भी हो कुर्सी पर आसीन होना। जनता जब एक दल को हराती है और दूसरे को चुनती है तब उसको केवल नाम और चेहरे नहीं बदलने होते , व्यवस्था में परिवर्तन करना होता है। मगर बार बार धोखा मिलता है देश की जनता को , लोग , नाम , दल , चेहरे ही बदलते हैं बाकी कुछ भी नहीं बदलता है। एक बात हैरानी की है कि हम लोग धर्म और राजनीति दोनों के बारे सोचते हैं सब जानते हैं जबकि जानते बहुत ही कम हैं। हम जिन ग्रंथों को पूजते हैं उनमें जो लिखा है उस पर शायद ही विचार करते हैं। अगर करते होते तो इतने धर्मों , मंदिर , मस्जिद , गिरिजाघर और गुरुद्वारों के होने और इतने धार्मिक आयोजन होने के बाद इतना पाप इतना अधर्म हर तरफ दिखाई नहीं देता। कुछ ऐसा ही हम लोकतंत्र को और जिस पर हमारा लोकतंत्र टिका है उस संविधान को ही जानते हैं। क्या आप जानते हैं कि संविधान में किसी दलीय लोकतंत्र की कोई बात नहीं कही गई है। केवल जनता द्वारा अपने प्रतिनिधि चुनने की बात है , और ये भी कि जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि चुनेंगे देश की सरकार चलाने को पधानमंत्री अथवा राज्यों का मुख्यमंत्री। आज क्या हो रहा है , कब से होता आया है कि कोई दल पहले से तय करता है कि कौन अगली सरकार का मुखिया होगा। क्या ये अधिकार उनका नहीं होना चाहिये जिनको जनता अपना प्रतिनिधि चुनेगी। एक और बेहद महत्वपूर्ण बात है कि हम सब बातें करते हैं आज़ादी की जबकि हमारे विधायक और सांसद तक आज़ाद नहीं हैं , उनको अपने दल की हर बात माननी होती है। क्या राजनीतिक दल बड़े हैं , हमारी निजि आज़ादी उनके हितों से छोटी है। दिल्ली में एक नई सरकार बनी है अभी अभी , बहुत बदलाव की बातें की इन लोगों ने।  मगर चार दिन भी नहीं टिक पाये अपनी बातों पर। ये भी नहीं सोचा कि उनको कोई पूर्ण बहुमत नहीं मिला जिसको सही मायने में जनादेश समझा जाता और अभी से इतराने लगे हैं। अब वे भी अन्य दलों की तरह सोचते हैं कि यहां सत्ता मिल गई अब देश की सत्ता को हासिल करना है। काश कोई सोचता कि केवल सत्ता ही हासिल नहीं करनी बल्कि व्यवस्था को बदलना है जिससे तंग आकर जनता ने पिछली सरकार को हराया है। सिर्फ बिजली पानी में छूट देने से कुछ नहीं बदल सकता , साफ कहें तो ये एक छल है क्योंकि जो सबसिडी सरकार किसी भी रूप में देती है वो भार जनता पर ही पड़ता है घूम फिर कर। इनसे महत्वपूर्ण काम हैं , अस्प्तालों में सही इलाज , स्कूलों में सही शिक्षा सभी को एक समान मिले , कानून व्यवस्था को सही किया जाये , अन्याय और शोषण बंद हो। सब से पहला काम होना चाहिये कि कुछ मुट्ठी भर लोग ही सब फैसले करने के हकदार नहीं हों। विधानसभा हो या संसद या फिर कोई संगठन हो चाहे मंत्री परिषद , हर जगह सभी की राय ली जानी चाहिये। लोकतंत्र के नाम पर अभी तक कुछ लोग , कुछ परिवार ही शासन करते रहे हैं , अब इसका अंत होना ही चाहिये।जिस देश की दो तिहाई आबादी गरीबी की रेखा से नीचे नर्क से बदतर जीवन जीती हो उसके नेता अगर विलासिता पूर्वक जीवन जनता के पैसे से जियें तो ये किसी जघन्य अपराध से कम नहीं। कहने को लोकतंत्र में जनता देश की मालिक है और प्रशासन व सांसद , विधायक उसके सेवक।  मगर क्या ये उचित है कि जो मालिक हो वो भूखा रहे और जो उसके सेवक हों वो ऐश से रहें। बहुत बातें की जाती हैं सब को बराबर सब कुछ मिलने की , मगर कैसे हो ऐसा ये कोई नहीं बताता। देश का धन , संपति , हर सुविधा का एक बहुत बड़ा हिस्सा कुछ एक लोगों के कब्ज़े में है , अगर गरीबों का कल्याण करना है तो अमीरों से लेना ही होगा जो उनके पास ज़रूरत से बहुत अधिक है। अभी तक सरकारें इसका उल्टा ही करती आई हैं। आम जनता को जब भी कुछ देने की बात होती है तो ढोल बजाकर प्रचार किया जाता है , लेकिन उससे कहीं अधिक बड़े बड़े उद्योग घरानों को चुपचाप दे दिया जाता है। आपने देखा होगा वित्तमंत्री प्रधानमंत्री को इन सभी से मिलते , इनकी बात सुनते। कभी देखा है गरीबों से मिलते उसकी बात सुनते , नहीं उसको केवल भाषण सुनाये जाते हैं या अपने दरबार में बुलाया जाता है हाथ जोड़ भीख मांगने को। संविधान की रक्षा की शपथ लेने वालों ने आज तक उसकी भावना का अनादर ही किया है। आज तक किसी अदालत ने ये सवाल नहीं किया कि संविधान में विधायिका को खुद कोई धन खर्च करने का अधिकार ही नहीं दिया गया है उसे योजना बनाने और कार्यपालिका से लागू करवाना चाहिये और उसकी निगरानी करनी चाहिये। ये जो सांसदों और विधायकों को कल्याण राशि मिलने का प्रावधान किया गया है और जिसमें भ्रष्टाचार बहुत आम है वो संविधान की अवधारणा के विपरीत है। जनता के धन को नेताओं ने चोरी का माल समझ कर हमेशा बेदर्दी से बर्बाद किया है। चुनाव जीतते ही इनको कोठी कार ही नहीं जाने कितना ताम झाम चाहिये। हर दिन करोड़ों रुपये इनकी रैलियों पर खर्च होते हैं , जो किसी इमानदार की जेब से नहीं आते , ये सारा पैसा आता है उन लोगों से चंदा या उगाही करके जिनको अनुचित लाभ मिलते हैं। कभी सोचा है कि जब कोई मुख्यमंत्री बनता है तब उसका परिवार , बेटा बेटी , पत्नी दामाद , सब के सब इस तरह आचरण करते हैं जैसे उनकी रियासत हो। ये मीडिया वाले भी ऐसे में उनके बच्चों तक का साक्षात्कार लेने लगते हैं। इस देश में कितने लोग बेघर हैं , मगर शायद ही कोई नेता हो जिसके पास अपना घर नहीं हो। फिर भी विधायक सांसद , मंत्री बनते ही इनको सरकारी आवास चाहिये। चलो माना इनको जहां इनका अपना घर है वहां रह कर काम करने में असुविधा हो तो दूसरी जगह घर मिल जाये , लेकिन तब क्या इनका पहले का घर तब तक सरकारी उपयोग में नहीं रहना चाहिये जब तक इनको मुफ्त आवास सरकार से मिला रहे। वास्तव में किसी भी अफ्सर को जब सरकारी घर मिले तब उसके खुद के घर को जो जिस किसी भी नगर में हो सरकार अथवा जनता के काम के लिये उपयोग किया जाये तो इनकी खुद की आवास समस्या हल हो सकती है। बाकी सब बातों से पहले प्रमुख बात ये है कि क्या कभी इन तथाकथित जनसेवकों को महसूस होगा कि इनसे पहले सभी कुछ उस जनता को मिले जिसकी सेवा करने का ये दम भरते हैं। चलो आज इतना ही , बाकी फिर कभी। 

Saturday, 4 January 2014

लौट के वापस घर को आये ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

सचिवालय क्या होता है मुझे मालूम नहीं था , कभी गया ही नहीं था अभी तक ऐसी किसी भी जगह। जाने को तो मैं किसी कत्लगाह भी नहीं गया मगर नाम से ही पता चलता है कि वहां क्या होता होगा। सचिवालय शब्द से समझ नहीं सकते कि वो क्या बला है। जब हमारे नगर में सचिवालय भवन बना तब लगा कि वहां सरकार के सभी विभागों के दफ्तर साथ साथ होंगे तो जनता को आसानी होती होगी , काम तुरंत हो जाते होंगे। वहां कुछ पढ़े लिखे सभ्य लोग बैठे होंगे जनसेवा करने का अपना दायित्व निभाने के लिये। मगर देखा वहां तो अलग ही दृश्य था , जानवरों की तरह जनता कतारों में छटपटा रही थी और सरकारी बाबू इस तरह पेश आ रहे थे जैसे राजशाही में कोड़े बरसाये जाते थे। सरकारी कानून का डंडा चल रहा था और लोगों को कराहते देख कर्मचारी , अधिकारी आनंद ले रहे थे , उन्हें मज़ा आ रहा था। कुर्सियों पर , मेज़ पर और अलमारी में रखी फाईलों पर बेबस इंसानों के खून के छींटे साफ नज़र आ रहे थे। कुछ लोग इंसानों का लहू इस तरह पी रहे थे जैसे सर्दी के मौसम में धूप में गर्म चाय - काफी का लुत्फ़ उठा रहे हों। लोग चीख रहे थे चिल्ला रहे थे मगर प्रशासन नाम का पत्थर का देवता बेपरवाह था। उसपर रत्ती भर भी असर नहीं हो रहा था , लगता है वो अंधा भी था और बहरा भी। मैं डर गया था , वहां से बचकर भाग निकलना चाहता था , लेकिन उस भूल भुलैयां से निकलने का रास्ता ही नहीं मिल सका था। तब मुझे बचपन में नानी की सुनाई कहानी याद आई थी जिसमें राजकुमारी राक्षसों के किले में फंस जाती है और छटपटाती है आज़ाद होने के लिये। मगर उसकी तरह मेरा कोई राजकुमार नहीं था जो आकर बचाता मुझे। मैं उन राक्षसों से फरियाद करने , दया की भीख मांगने के सिवा कुछ नहीं कर सकता था।
                                 मुझे नज़र आया एक दरवाज़ा जिसपर बजट व अर्थव्यवस्था का बोर्ड टंगा था , सरकारी लोग उसमें से कहीं जा रहे थे। उस पर लिखा हुआ था आम जनता का जाना मना है , मगर मैं परेशानी और घबराहट में देख नहीं सका और उधर चला आया था। मैंने देखा वहां से एक नदी बहती हुई निकल रही थी और दूर बहुत दूर राजधानी की तरफ जा रही थी। आम जनता का जो लहू सचिवालय के कमरों के फर्श पर बिखरा हुआ था वो धीरे धीरे बहता हुआ उस नदी में आकर पैसे चांदी सोने में बदल जाता था। उसी से बंगले फार्महाउस नेताओं के बनाये जा रहे थे। इस जादू के खेल को वहां लोकतंत्र नाम दिया जा रहा था। उस नदी के एक तरफ स्वर्ग जैसी दुनिया बसी हुई थी , नेता अफ्सर , धनवान लोग जिसमें सब सुख सुविधा पाकर रहते थे।  तो उस पार नदी के दूसरी तरफ नर्क का मंज़र था जहां तीन चौथाई देश की जनता मर मर कर जीने को विवश थी। बता रहे थे हर पांच साल बाद चुनाव रूपी पुल बना कर नेता आते हैं जनता के पास और वादा करते हैं कि बहत जल्द आपके लिये भी स्वर्ग का निर्माण किया जायेगा। झूठे सपने दिखला कर जनादेश लेकर वापस चले जाते हैं अपने स्वर्ग का आनंद लेने को।
                                 सचिवालय की सब से ऊपरी मंज़िल बेहद खास लोगों के लिये आरक्षित थी। उसके प्रमुख द्वार पर कड़ा पहरा था और एक बड़ा सा ताला उसपर लगाया हुआ था। सूत्रों से ज्ञात हुआ कि उसमें आज़ादी नाम की मूल्यवान वस्तू बंद कर रखी गई थी जिसके दर्शन केवल वी आई पी लोग ही कर सकते थे। कभी कभी उधर से अफवाह की तरह से जानकारी मिलती थी कि आज़ादी की दशा शोचनीय है , लेकिन हर बार सरकार और सचिवालय खंडन करते थे और कहते थे वो ठीक ठाक है बल्कि पहले से स्वस्थ है। हर वर्ष जश्न मनाते थे और सरकारी समारोह आयोजित कर बताते रहते थे कि आज़ादी इतने वर्ष की हो गई है। मैंने वहां सुरक्षा में तैनात कर्मियों से विनती की थी कि मुझे दूर से ही अपनी आज़ादी की देवी को देख लेने दो , मगर उन्होंने इंकार कर दिया था और मुझसे कहा था तुम सीधे सादे आम आदमी लगते हो , गलती से यहां आ गये हो , चुपचाप वापस चले जाओ वर्ना कोई देश द्रोह का झूठा इल्ज़ाम लगा कर बेमौत मारे जाओगे। तुम्हें नहीं पता कि लोकतंत्र में आम आदमी को आज़ादी को सच में क्या सपने में देखना तक प्रतिबंधित है। हां अगर तुम भी नेता या अफ्सर बन जाओ तो आज़ादी को देख ही नहीं उसके साथ कोई खेल भी खेल सकते हो। तब तुम्हें छूट होगी जो चाहे करने की।
                                किसी तरह उस इमारत से बाहर आया था और उसके पिछले हिस्से में पहुंच गया था। देखा सभी दल के नेता वहां वोटों की राजनीति का सबक पढ़ रहे थे। जाति धर्म के नाम पर जनता को मूर्ख बनाने और लाशों पर सत्ता का गंदा खेल खेलने का पाठ पढ़ाया जा रहा था। चुनाव में जीत कर इंसानों की खोपड़ियों को फूलमाला बना गले में पहन इतरा रहे थे। कल तक चुनाव में दुश्मन की तरह लड़ने वाले सहयोगी बन गये थे , इक दूजे को गले लगा बधाई दे रहे थे। नैतिकता की बात करने वालों का अनैतिक गठबंधन हो गया था , विरोधी सहयोगी बन गये थे। दोनों को वोट देने वाली जनता ठगी सी खड़ी थी , अब अगले पांच साल इनकी बंधक बन चुकी थी। उसे अभी भी नर्क में ही रहना है और जब भी सचिवालय की तरफ आना पड़े उसे वही सब झेलना है। मैं भटकते भटकते सचिवालय के सामने पहुंच ही गया था। भाग कर अपने घर वापस आ गया हूं और कसम उठा ली है फिर कभी उधर नहीं जाने की। जान बची तो लाखों पाये।

आईना बेमिसाल ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

आज मैं इक नये मंदिर में खड़ा हूं , जहां किसी भगवान की कोई मूर्ति नहीं है , हर तरफ दर्पण ही दर्पण हैं। हर दर्पण अपनी तरह का है , सब की अपनी अपनी विशेषता है। एक ऐसा दर्पण है जिसमें आप जिस शहर जिस गांव जिस जगह को देखना चाहते हैं वही आपको दिखाई देता है। दूसरा दर्पण आपको फिर से अपना बचपन भी दिखला सकता है और ये भी कि बीस वर्ष बाद आप कैसे नज़र आयेंगे। देखते देखते मैं आईनों के देवता के सामने आ गया हूं , वहां जो आईना टंगा है उस पर लिखा हुआ है , आईना बेमिसाल। मैं उस देवता से सवाल करता हूं कि इस बेमिसाल आईने की विशेषता क्या है। वो बताता है कि इसमें सब कुछ अच्छा दिखाई देता है। बदसूरत से बदसूरत को भी ये सब से खूबसूरत दिखलाता है , पतझड़ भी इसमें बहार नज़र आती है। मुझे लगा कि ये तो सरकार के बजट जैसा , राजनैतिक दलों के चुनावी घोषणापत्र जैसा और प्रशासन की फाईलों जैसा है , उनमें भी जनता को खुश करने को यही तो होता है। मैंने आईनों के देवता से वही आईना मुझे देने को कहा , देवता ने पूछा उस आईने से जाना चाहते हो इसके साथ इसके देश में। आईना बेमिसाल मान गया और देवता ने मुझे देते हुए हिदायत दी कि इसका सही उपयोग ही करना। जब लोगों को पता चला कि मेरे पास ऐसा दर्पण है तो बहुत सारे लोग उसे मांगने लगे हैं। हर किसी का दावा है कि वही इसको पाने का हकदार है। पर्यावरण विभाग वाले चाहते हैं कि उन्हें ये मिल जाये ताकि वो हर तरफ हरियाली दिखा अपने झूठे आंकड़े सही साबित कर सकें। प्रशासन भी इसको लेकर वो विकास दिखाना चाहता है जो अभी तक उसने फाईलों में किया दिखा रखा है। पुलिस वाले इसको अपने हैड आफिस में लगाना चाहते हैं कानून और न्याय व्यवस्था को चाक चौबंद दिखाने के लिये। वो चाहते हैं कि दर्पण में नज़र आये कि पुलिस वाले रिश्वत नहीं लेते न ही शराब पी कर ड्यूटी पर गलत आचरण ही करते हैं। नगरपालिका के लोग चाहते है कि उनको ये मिल जाये ताकि वो दिखा सकें कि कहीं पर भी गंदगी के ढेर नहीं हैं , कोई सड़क टूटी फूटी नहीं है , किसी गली में भी अंधेरा नहीं है और सब को साफ़ पीने का पानी मिल रहा है। सत्ताधारी दल चाहता है इसको मुझसे मुंह मांगी कीमत में खरीद कर जनता को दिखाना कि उसके शासन में कोई भ्रष्टाचार नहीं है , महंगाई नहीं है , लोग असुरक्षित नहीं हैं , कोई भूखा नहीं है , कोई बेघर नहीं है , कोई अशिक्षित नहीं है न ही कोई बेरोज़गार है कोई भी। जो जो वादे किये थे जनता से वो सब के सब पूरे कर दिये गये हैं। और ये देख कर लोग फिर से सत्ता सौंप दे। जनता को नज़र आये कि सब को मूलभूत सुविधायें मिल रही हैं , प्रशासन ईमानदारी से कर्त्तव्य निभा रहा है , कल्याण राशि शत प्रतिशत जनता तक पहुंच रही है , किसी नेता ने चुनाव जीत कर फार्महाउस नहीं बनाये न पैट्रोल पंप उनको मिले हैं। आतंकवाद का नामोनिशान तक मिटा दिया गया है और लोग निडर हो चैन से रहते हैं। जो दुश्मन देश बुरी नज़र से देखता था उसको सबक सिखा दिया गया है , वो फिर कभी इधर देखने का सहस नहीं कर सकता है।
                           इन सभी के सामने मैंने आईने से पूछा कि किसके पास जाना पसंद करोगे तुम। उसने इन में किसी के भी साथ नहीं जाने की बात कह कर इनको वापस लौटने को कह दिया है। उसका कहना है वो कोई झूठ छल फरेब नहीं कर सकता है। ये सब जो करते हैं वो मैं दर्पण कहला कर कभी नहीं कर सकता हूं। आईना बेमिसाल चाहता है मैं उसे बच्चों को ले जाकर दिखाऊं , उनको आशावादी बना सकूं ये देश की खूबसूरत तस्वीर दिखा कर और बताऊं कि आप ही ऐसा कर सकते हो , बस तय कर लो कि जागरुक रहना है और ठान लेना है छिहासठ सालों की निराशा का ख़त्म करना है। आईना बेमिसाल ने मुझसे वादा लिया है उसको देश के गांव गांव गली गली ले जाने का ताकि अपने देश की बदहाली का अंत कर सकूं। अचानक मैं नींद से जाग गया हूं और वो सपना अधूरा रह गया है। मगर मुझे लगने लगा है , अंधेरा छटने को है , सुबह होने वाली है।

Friday, 3 January 2014

संपादक जी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

संपादक जी मेरे दिये समाचार को पढ़ रहे थे और मैं सोच रहा था कि ये सब क्या हो रहा है। समाज किस दिशा को जा रहा है , आखिर कहीं तो कोई सीमा होनी चाहिये। नैतिक मूल्यों का अभी और कितना ह्रास होना बाकी है। "शाबाश अरुण" संपादक जी उत्साह पूर्वक चीखे तो मेरी तन्द्रा भंग हो गई , "धन्यवाद श्रीमान जी " मैं इतना ही कह सका। उनहोंने चपरासी को चाय लाने को कहा व फिर मेरी तरफ देख कर बोले "तुम वास्तव में कमाल के आदमी हो , क्या खबर लाये हो खोजकर आज , कल फ्रंट पेज के शीर्षक से तहलका मचा देगी ये स्टोरी। " मुझे चुप देख कर पूछने लगे " क्या थक गये हो " मैंने कहा कि नहीं ऐसी बात नहीं है। तब उनहोंने जैसे आदेश दिया , अभी बहुत काम करना है तुम्हें , किसी दूसरे अख़बार को भनक लगे उससे पहले और जानकारी एकत्र करनी है। इधर उधर से जो भी जैसे भी हासिल हो पता लगाओ , ये टॉपिक बहुत गर्म है इसपर कई संपादकीय लिखने होंगे आने वाले दिनों में। एक तो कल के अंक में लगाना चाहता हूं , थोड़ा मसाला और ढूंढ लाओ तो मज़ा आ जाये। " सम्पादक जी को जोश आ गया था और मैं समझ नहीं पा रहा था कि जिस खबर से मेरा अंतर रोने को हो रहा है उस से वे ऐसे उत्साहित हैं जैसे कोई खज़ाना ही मिल गया है। कल अख़बार में इनका संपादकीय लेख पढ़ कर पाठक सोचेंगे कि ये बात सुनकर बहुत रोये होंगे संपादक जी। कितनी अजीब बात है जो आज ठहाके लगा रहा है वो कल अखबार में दर्द से बेहाल हुआ दिखाई देगा। चाय कब की आ गई थी और ठंडी हो चुकी थी , मैंने उसे पानी की तरह पिया और इजाज़त लेकर उनके केबिन से बाहर आ गया था। मुझे याद नहीं संपादक जी क्या क्या कहते रहे थे , लेकिन उनका इस दर्द भरी बात पर यूं चहकना मुझे बेहद खल रहा था। उनके लेखों को पढ़कर जो छवि मेरे मन में बन गई थी वो टूट चुकी थी।
                  मैं भी इस बारे और जानकारी हासिल करना चाहता था , संपादक जी के आदेश से अधिक अपने मन कि उलझन को मिटाने के लिये। शाम को कई बातें मालूम करने के बाद जब दफ्तर पहुंचा तो संदेश मिला कि संपादक जी ने घर पर बुलाया है। जाना ही था पत्रकार होना भी क्या काम है। उनको भी मेरा बेसब्री से इंतज़ार था , पूरी जानकारी लेने के बाद कहने लगे अब यही कांड कई दिन तक ख़बरों में , चर्चा में छाया रहेगा। ये सुन उनकी श्रीमती जी बोली थी इससे क्या फर्क पड़ता है। उनका जवाब था , बहुत फर्क पड़ता है , हम अख़बार वालों को ही नहीं तमाम लिखने वालों को ऐसा विषय कहां रोज़ रोज़ मिलता है। देखना इसी पर कितने लोग लिख लिख कर बहुत नाम कमा लेंगे और कुछ पैसे भी। इस जैसी खबर से ही अख़बार की बिक्री बढ़ती है , जब अख़बार का प्रसार बढ़ेगा तभी तो विज्ञापन मिलेंगे।  देखो ये अरुण जो आज इस खबर से उदास लग रहा है , जब कल इसके नाम से ये स्टोरी छपेगी तो एक अनजान लड़का नाम वाला बन जायेगा। अभी इसको ये भी नहीं समझ कि इसकी नौकरी इन ख़बरों के दम पर ही है , कल ये भी जान जायेगा अपने नाम की कीमत कैसे वसूल सकता है। मैं ये सब चुपचाप सुनता रहा था और वापस चला आया था।
                अगली सुबह खबर के साथ ही मुखपृष्ठ पर संपादक जी का लेख छपा था :: " घटना ने सतब्ध कर दिया और कुछ भी कहना कठिन है ::::  :  " मुझे बेकार लगा इससे आगे कुछ भी पड़ना , और मैंने अख़बार को मेज़ पर पटक दिया था। मैं नहीं जानता था कि साथ की मेज़ पर बैठे सह संपादक शर्मा जी का ध्यान मेरी तरफ है। शर्मा जी पूछने लगे , अरुण क्या हुआ सब कुशल मंगल तो है , खोये खोये से लग रहे हो आज। मैंने कहा शर्मा जी कोई बात नहीं बस आज की इस खबर के बारे सोच रहा था। और नहीं चाहते हुए भी मैं कल के संपादक जी के व्यवहार की बात कह ही गया। शर्मा जी मुस्कुरा दिये और कहने लगे अरुण तुमने गीता पढ़ी हो या नहीं , आज मैं तुम्हें कुछ उसी तरह का ज्ञान देने जा रहा हूं , जैसा उसमें श्रीकृष्ण जी ने दिया है अर्जुन को। अपना खास अंदाज़ में मेज़ पर बैठ गये थे किसी महात्मा की तरह। बोले :"देखो अरुण किसी पुलिस वाले के पास जब क़त्ल का केस आता है तो वो ज़रा भी विचलित नहीं होता है , और जिसका क़त्ल हुआ उसी के परिवार के लोगों से हर तरह के सवाल करने के साथ , चाय पानी और कई साहूलियात मांगने से गुरेज़ नहीं करता। कोई इस पर ऐतराज़ करे तो कहता है आप कब हमें शादी ब्याह पर बुलाते हैं। इसी तरह वकील झगड़ा करके आये मुवकिल से सहानुभूती नहीं जतला सकता , क्योंकि उसको फीस लेनी है मुकदमा लड़ने की। जब किसी मरीज़ की हालत चिंताजनक हो और बचने की उम्मीद कम हो तब डॉक्टर की फीस और भी बढ़ जाती है। पुलिस वाले , वकील और डॉक्टर दुआ मांगते हैं कि ऐसे लोग रोज़ आयें बार बार आते रहें। पापी पेट का सवाल है। ख़बरों से अपना नाता भी इसी तरह का ही है , और हम उनका इंतज़ार नहीं करते बल्कि खोजते रहते हैं। देखा जाये तो हम संवेदनहीनता में इन सभी से आगे हैं। ये बात जिस दिन समझ जाओगे तुम मेरी जगह सह संपादक बन जाओगे , जिस दिन से तुम्हें इन बातों में मज़ा आने लगेगा और तुम्हें इनका इंतज़ार रहेगा उस दिन शायद तुम संपादक बन चुके होगे। कुछ लोग इससे और अधिक बढ़ जाते हैं और किसी न किसी पक्ष से लाभ उठा कर उनकी पसंद की बात लिखने लगते हैं अपना खुद का अख़बार शुरू करने के बाद। हमारी तरह नौकरी नहीं करते , हम जैसों को नौकरी पर रखते हैं। सब से बड़ा सत्य तुम्हें अब बताता हूं कि आजकल कोई अख़बार ख़बरों के लिये नहीं छपता है , सब का मकसद है विज्ञापन छापना। क्योंकि पैसा उनसे ही मिलता है इसलिये कोई ये कभी नहीं देखता कि इनमें कितना सच है कितना झूठ। सब नेताओं के घोटालों की बात ज़ोर शोर से करते हैं , सरकार के करोड़ों करोड़ के विज्ञापन रोज़ छपते हैं जिनका कोई हासिल नहीं होता , सरासर फज़ूल होते हैं , किसी ने कभी उन पर एक भी शब्द बोला आज तक। शर्मा जी की बातों का मुझ पर असर होने लगा था और मेरा मूड बदल गया था , मैंने कहा आपकी बात बिल्कुल सही है शर्मा जी। वे हंस कर बोले थे मतलब तुम्हारी तरक्की हो सकती है।
              इन बातों से मेरे मन से बोझ उतर गया था और मैं और अधिक उत्साह से उस केस की जानकारी एकत्र करने में जी जान से जुट गया था। शाम को जब अपनी रिपोर्ट संपादक जी को देने गया तो उन्होंने मुझे कि उनकी बात हुई है अख़बार के मालिक से तुम्हारी पदोन्ति के बारे और जल्दी ही तुम सह संपादक बना दिये जाओगे। जी आपका बहुत शुक्रिया , जब मैंने संपादक जी का आभार व्यक्त किया तब शर्मा जी की बात मेरे भीतर गूंज रही थी। मैं शर्मा जी का धन्यवाद करने गया तब उन्होंने पूछा कि अरुण तुम्हें कर्म की बात समझ आई कि नहीं। मैंने जवाब दिया था शर्मा जी कर्म का फल भी शीघ्र मिलने वाला है। हम दोनों हंस रहे थे , अख़बार मेज़ से नीचे गिर कर हमारे पांवों में आ गया था , कब हमें पता ही नहीं चला।

Thursday, 2 January 2014

तलाश लोकतंत्र की ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

जाने कितने वर्ष हो गये हैं इस मुकदमें को चलते हुए , मगर देश की सुरक्षा की बात कह कर इसे अति गोपनीय रखा गया है। किसी को मालूम नहीं इसके बारे कुछ भी , उनको भी जिनका दावा रहता है सब से पहले हर इक बात का पता लगाने का। आज मैं आपको उस मुकदमें का पूरा विवरण बता रहा हूं बिना किसी कांट छांट के , बिना कुछ जोड़े , घटाये। जनता का आरोप है कि उसने लोकतंत्र का क़त्ल होते अपनी आंखों से देखा है। नेताओं ने मार डाला है लोकतंत्र को। क्योंकि कातिल सभी बड़े बड़े नेता लोग हैं इसलिये पुलिस और प्रशासन देख कर भी अनदेखा कर रहा है। अदालत ने पूछा कि क्या लोकतंत्र की लाश बरामद हुई है , उस पर किसी ज़ख्म का निशान मिला है , पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट क्या कहती है। जनता ने बताया है कि लोकतंत्र को एक बार नहीं बार बार क़त्ल किया जाता रहा है और उसकी लाश को छिपा दिया जाता रहा है। नेताओं ने परिवारवाद को पूंजीवाद को लोकतंत्र का लिबास पहना कर इतने सालों तक देश की जनता को छला है। अदालत ने जानना चाहा है कि क्या कोई गवाह है जिसने देखा हो क़त्ल होते और पहचानता हो कातिलों को। जनता बोली हां मैंने देखा है। अदालत ने पूछा है कि खुलकर बताओ कब कैसे कहां किसने किया क़त्ल लोकतंत्र को। जनता ने जवाब दिया कि आज़ादी के बाद से देश में हर प्रदेश में इसका क़त्ल हुआ है। कभी विधानसभाओं में हुआ है तो कभी संसद में हुआ है। अदालत को सबूत चाहिएं थे इसलिये जनता ने कुछ विशेष घटनाओं का विवरण प्रस्तुत किया है। एक बार आपात्काल घोषित करके लोकतंत्र को कैद में बंद रखा गया था पूरे उनीस महीनों तक। जब ये मुक्त हुआ और जनता ने राहत की सांस ली तब इसको दलबदल का रोग लग गया और ये अधमरा हो गया था। हरियाणा प्रदेश में इसको जातिवाद ने अजगर की तरह निगल लिया था , एक बार महम उपचुनाव में राजनीति के हिंसक रूप से लोकतंत्र लहू लुहान हो गया था। तब भी इसका क़त्ल ही हुआ था मगर उसको एक दुर्घटना मान लिया गया। कितने ही राज्यों में लोकतंत्र के नाम पर तानाशाही चलती रही और चल रही है। पिता मुख्यमंत्री है तो सारा परिवार ही शासक बन जाता है। किसी नेता का निधन हो जाये तो लोक सभा , राज्य सभा अथवा विधान सभा की जगह उसके बेटे , पत्नी , दामाद को मिलना विरासत की तरह क्या इसे लोकतंत्र माना जा सकता है। बिहार में , पश्चिम बंगाल में हिंसा में मरता रहता है लोकतंत्र। साम्प्रदायिक दंगों में दिल्ली , पंजाब , उत्तर प्रदेश , गुजरात और कितने ही अन्य राज्यों में लोकतंत्र की हत्या की गई है। भ्रष्टाचार रूपी कैंसर इसको भीतर ही भीतर खोखला कर रहा है कितने ही वर्षों से , बेजान हो चुका है लोकतंत्र। वोट पाने के लिये जब धन का उपयोग होता है तब भी लोकतंत्र को ही क़त्ल किया जाता है। सांसद खरीदे गये , विधायक बंदी तक बनाये गये हैं बहुमत साबित करने के लिये। संसद और विधान सभाओं में नेता असभ्य और अलोकतांत्रिक आचरण करते हैं जब , तब कौन घायल होता है। अभी तक सरकारी वकील चुपचाप बैठा था , ये सब दलीलें जनता की सुन कर वो सामने आया और कहने लगा , जनता को बताना चाहिये कि कब उसने लोकतंत्र को भला चंगा सही सलामत देखा था। जनता ने जवाब दिया कि पूरी तरह तंदरुस्त तो लोकतंत्र लगा ही नहीं कभी लेकिन अब तो उसके जीवित होने के कोई लक्षण तक नज़र नहीं आते हैं। आप किसी सरकारी दफ्तर में , पुलिस थाने में , सरकारी गैर सरकारी स्कूलों में , अस्प्तालों में , कहीं भी जाकर देख लो , सब कहीं अन्याय और अराजकता का माहौल है जो साबित करता है कि देश में लोकतान्त्रिक व्यवस्था चरमरा चुकी है। सरकारी वकील ने तर्क दिया है कि जब किसी का क़त्ल होता है तो उसकी लाश का मिलना ज़रूरी होता है , मुमकिन है वो कहीं गायब हो गया हो , अपनी मर्ज़ी से चला गया हो कहीं। बिना लाश को बरामद किये क़त्ल का पक्का सबूत नहीं माना जा सकता इन तमाम बातों की सच्चाई के बावजूद। जनता का कहना है कि उसको शक है नेताओं ने ही उसको क़त्ल करने के बाद किसी जगह दफ़न किया होगा। सरकारी वकील का कहना है कि अदालत को जल्दबाज़ी में कोई निर्णय नहीं करना चाहिये। लोकतंत्र को लापता मान कर उसको अदालत के सामने पेश होने का आदेश जारी कर सकती है या चाहे तो उसको जिंदा या मुर्दा होने की जानकारी देने वाले को ईनाम देने की भी घोषणा कर सकती है। सब से पहला सवाल ये है कि क्या वास्तव में लोकतंत्र था , कोई सबूत है उसके कभी जीवित होने का , अगर किसी के जिंदा होने तक का ही सबूत न हो तो उसका क़त्ल हुआ किस तरह मान लिया जाये। लगता है इस मुकदमें में भी नेता संदेह का लाभ मिलने से साफ बरी हो जायेंगे , जैसे बाकी मुकदमों में हो जाते हैं। अदालत ने सरकार को कहा है कि अपने प्रशासन को और पुलिस को आदेश दे लोकतंत्र को ढूंढ कर लाने के लिये , कोई समय सीमा तय नहीं है। जनता को अभी और और इंतज़ार करना होगा। लोकतंत्र की तलाश जारी है। 

Wednesday, 1 January 2014

मरने भी नहीं देते ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

ख़ुदकुशी करना अगर जुर्म है तो जीना किसी सज़ा से कम नहीं। शायद यही अकेला जुर्म है जो कामयाबी से करने पर सब सज़ाओं से बचा लेता है मगर इस जुर्म करने में जिसे नाकामी हासिल हो उसे कई सज़ायें झेलनी पड़ती हैं। उस पर कुछ लोग जो मरने के नाम से ही थर थर कांपने लगते हैं , ये इल्ज़ाम लगाते हैं कि ख़ुदकुशी करना कायरता है। हम अच्छी तरह जानते हैं कि ये कितने साहस का काम है। हर कोई नहीं कर सकता ऐसा हौसला , यूं मरने की बातें सभी करते रहते हैं। मौत जब सामने आती है तो सब जीने की चाहत करते हैं। अब कानून का क्या है वो ख़ुदकुशी को सही माने चाहे गल्त। कानून क्या सभी को जीने के अधिकार की बात नहीं करता है , तो क्या सब को मिलता है जीने का अधिकार। क्या हम सब जी रहे हैं जिस तरह उसको ज़िंदगी कह सकते हैं। अदालतों ने कभी इस पर कुछ कहा है कभी कुछ और कह दिया। करते रहें बहस लोग कि ख़ुदकुशी करने का अधिकार देना उचित होगा या अनुचित जिसने मरने को ठान लिया उसे इस सब से क्या मतलब। कल अगर कानून ख़ुदकुशी करने की इजाज़त दे भी दे तो क्या हर कोई जो मर जाने की बात करता है सच में ख़ुदकुशी करने का सहस कर सकेगा। मांगने से मौत कब मिलती है किसी को।
              "मरने भी नहीं देते दुश्मन मेरी जां के" गीत मुझे शादी से पहले भी बेहद पसंद था लेकिन शादी के बाद तो मैं इसके सिवा दूसरा कोई गीत कभी गुनगुना ही नहीं सकी। मुझे आज भी याद है जब मैंने तय कर लिया था कि ख़ुदकुशी करके मरना है और हिम्मत करके नदी में कूद गई थी। मगर मेरी इस सहस पूर्वक की कोशिश को नाकाम करने ये जाने खां से चले आये थे और मुझे मरने नहीं दिया था। जब आंख खुली तो सामने भीड़ को देख जितना घबराई थी उतना तो सामने मौत को देख भी नहीं डरी थी। तब मेरी हालत को देख इन्होंने सब को जाने को कह दिया था और मुझे पकड़ कर कुछ दूर ले गये थे। जब इन्होंने मुझसे ख़ुदकुशी करने का कारण पूछा और पुलिस की बात की तो मैंने इनसे कह दिया प्लीज़ आप ये बात किसी को मत बताना। तब इनको वादा किया था फिर कभी ख़ुदकुशी नहीं करने का। जब ये मुझे मेरे घर छोड़ने आये तो इन्होंने ही बहाना बना दिया था कि मेरा पांव फिसल गया था और मैं नदी किनारे से नदी में गिर गई थी। और उसके बाद मेरे पांव ही नहीं मेरा दिल भी फिसल गया था और मैं इनके प्रेमजाल में फस गई थी। हमारी शादी हो गई थी लेकिन मैं इस बात से अनजान थी कि मुझे उम्र भर कीमत चुकानी है अपनी जान बचाने की। उसके बाद मैं कब कब कैसे कैसे मरती रही कोई नहीं जानता न मैं ही बता सकती हूं किसी को। लेकिन ये समझ आ गया था कि अब मरना भी उतना आसान नहीं रह गया है। अब तो मुझे पानी से भी डर लगने लगा है। कभी भूले से इनको कह बैठी कि ऐसा जीना भी कोई जीना है तो इनका जवाब होता है कि मैं तुम्हें बचाने की सज़ा ही तो काट रहा हूं। शादी को उम्र कैद बताते हैं , कहते हैं कि उनका एहसान है जो ज़िंदा हूं वरना कब की मर गई होती। कभी कहते हैं कि अगर मैं जीने से बेज़ार हो चुकी हूं तो वे खुद मुझे अपनी भूल को सुधार नदी में धक्का दे देते अगर कानून ऐसी अनुमति प्रदान करता। बहुत से देशों में मांग हो रही है मरने का हक देने की , कभी न कभी तो ये मांग हमारे देश में भी पूरी हो जायेगी। तब पूछूंगी इनसे क्यों मुझसे मेरा अधिकार छीना था , मुझ पर कोई उपकार नहीं किया था तुमने। ज़िंदा रह कर मुझे क्या कुछ नहीं झेलना पड़ा है , कितने दर्द कितनी मुश्किलें मुझे सहनी पड़ी हैं आपके कारण। मेरी जान बचाने के बदले इनको तो मैं मिल गई थी उम्र भर के लिये ईनाम सवरूप। मुझे क्या दे सकते अगर कल कानून बदल जाये और ऐसा समझे कि ये दोषी हैं मुझे बचाने के और इस कारण मुझे कितनी तकलीफें सहनी पड़ी हैं। इनके कारण मेरी हालत ऐसी हो गई है कि न जी सकती हूं न मर ही सकती हूं। कितने सालों से इनकी गल्ती की सज़ा मुझे मिल रही है न चाहते हुए भी इनके लिये जीने की। उस एक गल्ती को सुधारने का क्या कोई उपाय नहीं है। आपको समझ आये तो बताना मुझे या फिर आत्महत्या का कोई सरल उपाय ही सुझा दें , बढ़िया सा तरीका जिसे कोई असफल नहीं कर सके इस बार।