Thursday, 25 December 2014

नेताओं और मीडिया वालों का शोर ( आलेख ) डा लोक सेतिया

समझना होगा सच क्या है , वो जो टीवी पर अख़बारों में परोसा जा रहा है अथवा वो जो हमें अपने सामने दिखाई दे रहा है। स्वछता अभियान और सुसाशन अभियान क्या हैं। सालों से ऐसे जाने कितने अभियान आये और चले गये , कभी किसी ने नहीं सोचा उनका हासिल क्या रहा। क्या क्या संकल्प क्या क्या बातें होती रही , सब आडंबर को , जनता को बहलाने को। ये विचत्र बात है आजकल नेता अफ्सर हर काम जो उनको खुद करना चाहिये , कहते हैं जनता ये तुमको करना है। इनको क्या करना है ? मात्र अधिकारों का उपयोग। कर्तव्य की बात किसी को याद ही नहीं। जब तक ये लोग मानते ही नहीं कि हमने अपना फ़र्ज़ नहीं निभाया अभी तक इसलिये देश की दुर्दशा हुई है ,तब तक इनसे कर्तव्य बिभाने की आशा भी करें तो कैसे। लेकिन अब इनका ये खोटा सिक्का भी लोग समझते हैं चल जायेगा। बहुत शोर हुआ था मोदी सरकार के समय पर दफ्तर पहुंचने का , क्या हो गया सब , आज भी देख लो कोई भी अधिकारी समय पर तो क्या प्रतिदिन दफ्तर जाता भी है। अभी कुछ दिन पहले एक चैनेल के एक शो के इकीस वर्ष पूरे होने पर इक आयोजन हुआ जिसमें प्रधानमंत्री राष्ट्रपति और तमाम मंत्री लोग शामिल हुए। क्या ऐसा ज़रूरी था , क्या उनके लिये ये जनता के कामों से अधिक ज़रूरी था। सच तो ये है कि ऐसा कदापि नहीं होना चाहिये , मगर जब इन नेताओं को ये भी समझ नहीं हो कि इनको किसी के कारोबार से , अपने प्रचार से अधिक महत्व देश के प्रति अपने काम को देना चाहिये तब इनसे क्या उम्मीद रखें बदलाव की। और ये जो खुद को लोकतंत्र का रक्षक बताते हैं वो खुद क्या हैं , विज्ञापनों और पैसे के लिये कुछ भी करने वाले व्योपारी। क्या क्या नहीं दिखाते , ये वही हैं जो पैसे लेकर किसी को गुरु बनाते हैं उसकी महिमा का गुणगान करते हैं और जब पोल खुलती तब उसको अपराधी भी बताते हैं , बिना ये स्वीकार किये कि खुद ये भी उसी का हिस्सा रहे हैं। ये बहस करते हैं और बताते हैं कैसे किसकी सरकार बन सकती है , बिना ये समझे कि ये उनका अधिकार क्षेत्र नहीं है। इनको ये भी लगता है कि जो ये बताते उसका असर लोगों पर इतना अधिक होता है कि इनकी मर्ज़ी से सरकार बन सकती है। ये खुद को खुदा मान बैठे लोग जानते ही नहीं कि खुद ऊपर जाने की चाह में कितना नीचे पहुंच गये हैं। अब इनका हिसाब किताब कौन पूछे। सच तो ये है कि नेता और मीडिया वाले दोनों ही अपने हित को देश हित से अधिक महत्व देते हैं। तभी ये झूठा प्रचार आडंबर दोनों को उचित लगता है।
         पहले भी ये सब होता रहा है किसी न किसी रूप में। गरीबी हटाओ , बालमज़दूरी खत्म करो , भ्र्ष्टाचार बंद करो आदि आदि। क्या बदला , कुछ भी नहीं , सब भाषणों में , सरकारी आंकड़ों में होता रहा। वही फिर दोहराया जा रहा है , टीवी अख़बार पर नहीं वास्तव में सफाई और सुशासन चाहिये। मगर क्या ऐसा होगा , ये सब तो वही है जो कितनी बार आज़माया जाता रहा है , जनता को बहलाने को। ये शोर भी जो सुन रहे हैं इक दिन ख़ामोशी में बदल जायेगा , ऐसा अंदेशा है।
                                          

Sunday, 7 December 2014

रिश्तों की डोरी ( कविता ) 108 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कभी देखा है ,
धागे जब उलझ जाते हैं ,
बहुत कठिन हो जाता है ,
उनको बचाकर अलग करना ,
ज़रा सा खींचा कोई धागा ,
टूट जाता है पल भर में ,
इक थोड़ा सा खींचने मात्र से।
जीवन में रिश्ते नाते सभी ,
रहते हैं इक साथ ऐसे ही ,
हम सभी के अपने ही हाथों में ,
खोना नहीं चाहते हैं किसी को भी ,
मगर ज़रा सी भूल से हो जाता है ,
अक्सर ऐसा भी हम सभी से ,
कोई इक रिश्ता उलझ जाता है ,
अपने किसी दूसरे रिश्ते से अचानक ,
नहीं आता सभी को ये काम ,
हर रिश्ते नाते को बचाकर रखना।
मिलना जाकर किसी दिन इक बुनकर से ,
देखना उसको बुनते हुए धागों से ,
कितने रंग वाले ,
कैसे कैसे होते हैं ,
सब को अपनी जगह पर रखता ,
सब को उतना ही कसता जितना ज़रूरी ,
सभी में रखता है थोड़ी थोड़ी सी दूरी ,
कोई धागा नहीं उलझने देता वो ,
टूटने नहीं देता इक भी धागा ,
और कभी कोई टूट भी जाता है ,
थोड़ा अधिक खींचने से अचानक ,
तब उसको अलग रखता दूसरे धागों से ,
गांठ नहीं लगता है कभी बुनकर ,
प्यार से उसी धागे के दोनों सिरे ,
फिर से मिला देता उनको कैसे ,
कभी टूटा ही नहीं था वो जैसे।
दोस्तो सीखना सभी बुनकर से ,
प्यार मुहब्बत दोस्ती वाले सब रिश्ते ,
कैसे रखने हैं सभी हमने संभाल कर ,
और उस से बुनना है अपना जीवन ,
किसी खूबसूरत चादर की तरह ,
जिस में मिलकर हर धागा देता है ,
बहुत ही सुंदर शक्ल।

Sunday, 30 November 2014

खोखले लोगों का धर्म ( आलेख ) डा लोक सेतिया

कभी कभी हैरानी होती है कि क्या लोग सच में नहीं देख पाते कि जहां वो धर्म या समाजसेवा की बात समझ कर जाते हैं वहां न तो धर्म ही होता है न ही कोई सच्ची समाज सेवा ही। जो हो रहा होता है वो इक छल होता है , धोखा होता है , आडंबर होता है , दुनिया को दिखाने को इक तमाशा होता है। कोई संत बन स्वर्ग को बेच रहा है ,कोई आपको सारे पापों की सज़ा से बचाने का प्रलोभन देता है उसको गुरु बनाने पर , कोई अपने इस कारोबार में आपको भी शामिल कर लेता है। अधर्म को धर्म का नाम दिया जा रहा है , ऐसा धर्म किसी का कल्याण नहीं कर सकता। इस से बेहतर है आप किसी धर्म को न मानें , कोई गुरु न बनायें , किसी ईश्वर किसी देवी देवता की उपासना न करें। बल्कि इस से नास्तिक होना लाख दर्जा बेहतर होगा। ये बात कि कोई गुरु होना ही चाहिये या किसी न किसी धर्म का मानना ही चाहिये उन्हीं लोगों ने कही और सब जगह दोहराई जिनको ऐसा करने से कुछ हासिल करना था। कभी निष्पक्ष होकर पढ़ना सभी तथाकथित धर्म ग्रंथों को और समझना वो आपको ज्ञान देना चाहते हैं या ऐसा चाहते हैं कि आप कुछ भी न सोचें न ही समझने का ही प्रयास करें कि सही क्या गल्त क्या है। धर्म वो जो आपके विवेक को जागृत करे ताकि आप अच्छे बुरे , पाप पुण्य , सच झूठ को पहचान सकें। मुझे तलाश है ऐसे धर्म की ऐसे गुरु की , नहीं नज़र आता कोई , मगर मुझे ज़रूरत भी नहीं है। मेरी अंतरात्मा मेरा गुरु है जो बताती है सब से बड़ा धर्म मानवधर्म है। ईश्वर है या नहीं है मुझे इस से कोई फर्क नहीं पड़ता , न ही इस से कि कोई अगला या पिछला जन्म होता है या नहीं। हां जाता हूं मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे , देखता रहता क्या क्या होता धर्म के नाम पर वहां और सोचता जो सर्वशक्तिमान है क्या उसका बस नहीं चलता इन पर या वो भी अपने गुणगान से खुश होता है और अपने नाम पर ये सब होता देख कर भी अनदेखा करता है। नहीं ऐसा नहीं  है भगवान को इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग उसको मानें या न मानें , उसकी अराधना अर्चना पूजा करें या न करें। उसको फर्क पड़ता होगा कि लोग उसके बनाये इंसानों से प्यार करते हैं या नहीं करते। जो जीवन में सभी से प्यार मुहब्बत से नहीं रहते , सद्कर्म नहीं करते , बिना स्वार्थ कुछ भी नहीं करते , अथवा अपने स्वार्थ के लिये सही गल्त सब कुछ करते हैं उनसे ईश्वर प्रसन्न नहीं हो सकता , ये सभी जानते हैं। फिर भी लोग जानकर अनजान क्यों बने हुए हैं , समझना होगा।
                   ये जो लोगों की भीड़ दिखाई देती संतों , साधुओं , धर्मस्थलों पर उनका किसी धर्म से कोई सरोकार नहीं होता है। यहां लोग चाहते हैं किसी भी तरह कुछ पाना , कोई पहचान , कोई नाम , शोहरत , कोई रुतबा या समाज में वो कहलाना जो न तो हैं न ही बन सकते हैं। जब इनको अवसर मिलता है किसी भी तरह अपना नाम पहली कतार में लाने का तब ये उसको उपयोग करते हैं अपने मन की झूठी तसल्ली के लिये कि लोग मुझे ऐसा मानते हैं , वैसा होना कदापि नहीं चाहते। इक छल है खुद से , इसको धर्म नहीं कह सकते , धर्म क्या है ये जानना समझना कौन चाहता है। खुश हैं अमुक गुरु के अमुक कार्य में प्रचार में उनका भी नाम शामिल है , इक आयोजन है समाज सेवा के नाम पर अथवा धर्म प्रचार के नाम पर उसके निमंत्रण पत्र पर उनका भी नाम लिखा हुआ है सैंकड़ों और नामों में , कभी सोचा है क्या है ये। इक खोखलापन है , जो ये शोर हर तरफ होता दिखाई देता है उसका सच यही है। खाली ढोल बज रहा है , ढोल की पोल जब खुलती है तब पता चलता उसके भीतर तो कुछ भी नहीं था। क्या झूठ कहा मैंने , सोचना।

Wednesday, 26 November 2014

लोग बड़े बड़े मकसद वाले ( तरकश ) डा लोक सेतिया

कलयुग की बात है , दिन में अंधेरी रात है। देखो धर्म बिकता है , इक डाल है दूजा हर पात है। देखो बने हैं महल कितने सन्यासियों के वास्ते , होती जाने कैसे उनपर धन दौलत की बरसात है। अब मोह माया छोड़ने के उपदेश देता कौन है , सब तरफ नज़र आती चोरों ही की बारात है। साधू बने अपराधी चेले बचाने को मिले , सब देख कर अंधे हुए नेता हों या अफ्सर बड़े। नतमस्तक सभी अपने अपने मतलब के लिये , किसको है परवाह जनता यहां कैसे जिये। लिखा हुआ किस ग्रंथ में संत बन संचय करो , भगवान को हो बेचते कैसे कहें उससे डरो। है खेल ये कैसा जो इंसानियत से खेलते ,सच की बातें ही काफी झूठ की वंदना करो। गली गली फिरते साधु बनकर भिखारी , और कुछ बनाकर डेरे बने हैं बड़े शिकारी। गीता को भी बेचते सन्यासी कहते ज्ञान है , जिनको बनाया शिष्य पर उनका कुछ और अरमान है। ये खेल बहुत टेड़ा है भाई तू न उलझना यहां , तूने नहीं समझा इसे तू बहुत नादान है। बात इतनी जान ले बड़े लोगों की बड़ी शान है। देश की राजनीति भी बन चुकी दुकान है , जो चीज़ बिकती नहीं उसी का ऊंचा दाम है। सब को बड़े लक्ष्य पाने हैं , बंगले सभी को बनाने हैं। जो जितना बड़ा पद पाता है वो उतना ही और ललचाता है। कभी नगर पार्षद बन कर भी खुश था अब सांसद होकर भी नहीं चैन आता है , दिल का करें क्या जो मंत्री बनने को ललचाता है। इधर नहीं मिला अगर उधर को भाग जाता है। कभी लाख का सपना देखता था अब करोड़पति है गरीब कहलाता है। क्या करे कोई सभी का लक्ष्य बढ़ता जाता है।
           सरकार भी छोटे लक्ष्य नहीं बनाती अब , रोटी कपड़ा मकान , शिक्षा रोज़गार की बात नहीं होती।  गरीबी की रेखा का रोना सरकारें आजकल नहीं रोती। स्वदेशीकरण को भूल कर विदेशी बाजार की बात होती है। सब कुछ विदेशी कंपनियों को सौंप कर सरकार खुद बस सोती है। आतंकवाद हो या साम्प्रदायिकता नेताओं को दोनों चर्चा को याद रहते हैं , जिनको बताया दुश्मन कभी उसी को मसीहा कहते हैं। नेता हों या अफ्सर बड़े विदेश सब को भाता है , सोना बिकता नहीं पीतल खरीद लाता है। काला धन हो या हो भ्र्ष्टाचार दोनों ही सत्ता दिलाते हैं , सरकार जब बन गई तब सच यही समझाते हैं। कालाधन कभी नहीं आयेगा जनता को क्यों भरमाते हैं। सब को मालूम है मिलकर सभी ही खाते हैं।
      जो भी बैठा है पद पर सब यही दोहराते हैं , अपने अपने को रेवड़ियां हरदम खिलाते हैं। लोकतंत्र के नाम पर होता वही तमाशा है , सब को अपने बेटे से दामाद से ही आशा है। देश की बात रहती नहीं याद है , देखलो कर रहे विदेश जा फरियाद है। परमाणु बंब और अंतरिक्ष में मंगल की बात करते हैं , ये नहीं आता नज़र लोग अभी भी भूखे मरते हैं। हर नई सरकार धन प्रचार पर लुटाती है , हम बड़े महान हैं वाले पुराने गीत दोहराती है। लो समाजवाद भी ले आया विदेशी बग्गी है , राजसी शान की लालसा सभी में जग्गी है। साईकिल हो हाथी हो चाहे लालटेन हो , है इरादा सब का कुछ लेन हो कुछ देन हो। देखो किसी के आज भी खोटे सिक्के चल गये , कुछ लोग बहती गंगा में हाथ धोने से ही रह गये। क्या क्या दिखायें आपको देखो जिधर यही बात है , रौशन हैं बड़े नगर और गांवों में अँधेरी रात है। भीख मिलती है उसे जिसकी बड़ी औकात है।

Monday, 24 November 2014

कैद ( कविता ) 3 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

जाने कब से बंद थे ,
हम खुद अपनी ही कैद में ,
छटपटाते रहे अब तक ,
रिहाई के लिये हर दिन ,
किया ही नहीं हमने कभी ,
मुक्त होने का प्रयास भी ,
समझते रहे अपनी कैद को ,
अपने लिये इक सुरक्षा कवच।
जानते थे ये भी हम कि ,
जीने के लिये निकलना ही होगा ,
इस अनचाही कैद से इक दिन ,
मगर देखते रहे इक सपना कि ,
आयेगा कभी कोई मसीहा ,
मुक्त करवाने हमको ,
खुद अपनी ही कैद से।
तकदीर ने शायद हमको ,
दिखलाया है रास्ता ,
बंधनमुक्त होने का ,
और खुद हमने थामा है ,
इक दूजे का हाथ ,
और तब नहीं है बाकी कोई निशां ,
अपनी निराशा और तनहाई ,
की खुद ही बनाई उस कैद का।
संग संग उड़ रहे हैं हम ,
और खुले गगन में ,
चले हैं छूने प्यार में ,
आकाश की नई ऊंचाई को ,
गा रहे हैं अब गीत ख़ुशी के।

Wednesday, 19 November 2014

वी आई पी अपराधी , आम अपराधी ( तरकश ) डा लोक सेतिया

अपराध वही होता है अपराधी अलग अलग होते हैं। सरकार हो चाहे लोग ये देख कर आचरण करते हैं कि अपराध किसने किया है। अभी हरियाणा में एक अपराधी को अदालत के सख्त आदेश के बाद जैसे पकड़ा गया वो बताता है कि सरकार या सत्ताधारी दल बदलने से भी बदलता कुछ भी नहीं। सरकार पहले इक मेडिकल बोर्ड बनाती है जो अपराधी को गंभीर रूप से बीमार घोषित करता है , जब अदालत फटकार लगाती है कि आपने बिना उसकी अनुमति या जानकारी के कोई बोर्ड कैसे बनाया तब विवश होकर अपराधी को गिरफ्तार किया जाता है और दावा किया जाता है कि सरकार ने कितना महान कार्य किया है। जो लोग सड़क पर किसी जेबकतरे को पकड़ पीट देते हैं वही लोग गंभीर अपराध करने के बावजूद किसी का बचाव इसलिये करते हैं क्योंकि वो उनका गुरु है। अब ऐसे कलयुगी गुरु कैसी शिक्षा देते हैं ये समझ लेना चाहिये , क्या सीखा आपने अपने धर्म से अपने गुरु के प्रवचनों से , यही कि पापी और अपराधी का बचाव करना। मुझे किसी भी धर्मग्रंथ में ये लिखा नहीं मिला कि अन्यायी और पापी अगर कोई अपना है तो उसको सही बताना है। मतलब साफ है ये जो लाखों करोड़ों लोग जाते हैं कहने को धर्म की बात सुनने समझने उनको भी धर्म नहीं अपनाना है , धार्मिक होने का आडंबर करना है , इक तमगा लगाना है। तभी दुकान पर किसी धर्म का नाम लिखने से ये नहीं समझना कि वहां झूठ या लूट का कारोबार नहीं होगा। इक मुखौटा है धर्म भी लोगों को अपने अपकर्म को ढकने को। मगर हम केवल सरकार पर ही दोष नहीं दे सकते , जब कोई नेता जेल जाता है तब भी उसके समर्थक यही करते हैं , जब संजय दत्त को जेल में जाना पड़ता है तब बड़ी बड़ी बातें करने वाले फिल्मों वाले उनके पक्ष में खड़े नज़र आते हैं। सरकार और पुलिस सालों तक खामोश होकर देखती रहती है धर्म के नाम पर गुंडों का गिरोह बनते , खुद सरकारें बनाती हैं रामपाल , भिंडरावाले , आसाराम , रामरहीम जैसे लोगों को। और जब ये लोग खुद सरकार को चुनौती देते हैं तब जाकर समझ आता है हमने खुद जिनको देव के नाम पर दैत्यों जैसे कर्म करने दिये वो कितने भयानक हो गये हैं। क्या लोग समझेंगे इन सब की वास्तविकता को , नहीं कभी नहीं , क्योंकि लोग जो मापदंड दूसरों के लिये निर्धारित करते हैं खुद अपने पर उनको लागू नहीं करते। ये मीडिया वाले भी हमेशा दोहरे मापदंड ही अपनाते हैं , जब किसी और के साथ होता तब तमाशाई बन जाते हैं , जब खुद पर गुज़रती तब बेहाल हो जाते हैं। पुलिस भी जब इनके साथ आम लोगों की तरह बर्ताव करती तब इनको समझ आता सच क्या है। वर्ना ये भी बड़े लोगों के अपराधों पर खबर भी ऐसे देते हैं जैसे उनको नायक साबित करते हों। शायद कोई सबक इनको भी सीखना है , कि अपराध अपराध ही होता है चाहे जो भी अपराधी हो।

Tuesday, 18 November 2014

भारत का आईना ( तरकश ) डा लोक सेतिया

ये कुछ अलग है , मोदी मोदी का शोर विदेशों में खूब मचा हुआ है। एन आर आई भारतीय देश का झंडा लिये या तिरंगे के रंग में रंगे परदेस में अपने देश के प्रधानमंत्री का स्वागत कर रहे हैं जोश के साथ। टिकट खरीद कर बहुत दूर चल कर मोदी जी का भाषण सुनने आ रहे हैं। अच्छा है इक उम्मीद जागी है उन लोगों में देश में कुछ बदलाव की। मगर क्या वो सच भी होगी या जैसा कितनी बार पहले भी होता रहा है ये सब हम भूल ही जायेंगे। सवाल ये है कि क्या हम ये मान बैठे हैं कि सरकार बदलने से सब बदल जायेगा , सिर्फ मोदी नाम का मसीहा सब बदल देगा या हम खुद भी अपने को बदलेंगे। क्या ये सच नहीं है कि देश का बंटाधार होता रहा और हम हमें क्या सोच कर चुपचाप तमाशाई बने रहे। क्या अन्याय का विरोध करने कभी खुद सामने आये ? क्या भ्रष्टाचार करने वालों का विरोध करना तो क्या हम उनके सामने नतमस्तक नहीं होते रहे , और क्या फिर से वो कभी नहीं दोहरायेंगे। कहीं हम आडंबर तो नहीं रच रहे कि हम देशभक्त हैं जबकि हमको अपने अपने स्वार्थ को छोड़ बाकी कुछ भी दिखाई ही नहीं देता। क्या ये लोग जो भीड़ में शामिल हैं वो खुद भी कुछ देना चाहते हैं अपने देश को या मात्र दिखावा ही करते हैं देश प्रेम का। जानता हूं देशभक्ति की परिभाषा बदल चुकी है , देश की समस्याओं पर चिंता नहीं करते अब , उनको हल करने को प्रयास नहीं करते , ये काम सरकार का है , हमें तो क्रिकेट मैच में देशभक्ति का प्रदर्शन करना है , या किसी अन्ना किसी मोदी की जयजयकार ही करनी है। ये आसान है , वो भगत सिंह वो गांधी वाली देशभक्ति आउट ऑफ़ डेट हो चुकी है। अपने जीवन देश को अर्पित करना या लोग नंगे हैं तो खुद एक धोती पहनने की बात सोचना , है कोई ऐसी देशभक्ति वाला। ज़रा सोचना क्या मोदी कभी उन लोगों में भी भाषण देने ऐसे ही बन ठन कर जायेंगे जो देश की इक तिहाई जनता बदहाल है , जिसके पास न काम है न छत है न पैसा है न साधन हैं। पीने को पानी तक को तरसती है जो , दो वक़्त रोटी जिसको सपना लगता है। क्या मोदी जी प्राथमिकता में वो लोग कहीं हैं जो सब से निचले पायदान पर हैं। सवाल फिर वही है कब तक सरकारें जिनके पास है उनको और अधिक देने को महत्व देती रहेंगी , और जिनके पास कुछ नहीं वो हाशिये पर ही रहेंगे। उस आज़ादी उस लोकतंत्र का क्या मतलब जिसमें देश में इतनी असमानता हो। अमीरों को और अमीर बनाने से ये अंतर और बढ़ता ही जाता है , क्या किसी मोदी में है साहस कि जिनके पास अम्बार लगे हैं उनसे लेकर उनको दे सके जिनके पास कुछ भी नहीं है। ये गरीबी की रेखा क्या कभी खत्म होगी।
            कभी तो सोचना होगा कितना चाहिये धनवानों को , अंबानी को टाटा को , अमिताभ को , सचिन को , और इन नेताओं को अपने लिये। क्या अपराध नहीं है मानवता के प्रति कि कुछ लोग भूख से , बिना इलाज से मरते रहें और कुछ लोगों के पास इतना धन सड़ता रहे कि उनको खुद नहीं पता हो इसका करना क्या चाहिये। ये क्या हो रहा है धर्म के नाम पर , बड़े बड़े आश्रमों में , क्या जानते भी हैं धर्म को ? संचय करना किस धर्म में सही बताया गया है , और ये जो धन संपत्ति के अंबार जमा किये बैठे हैं ये धर्मगुरु हैं। और इनके अनुयायी क्या करते हैं अपने तथाकथित गुरु का बचाव चाहे वो अपराध ही करता रहे , देश की न्याय व्यवस्था को चुनौती देने वाले धर्म क्या अधर्म के मार्ग पर नहीं चल रहे। रावण को कंस को भगवान बनाने वालो कभी तो समझो ये क्या कर रहे हो। सब से पहले सच और झूठ की पहचान करना सीखो , तब मालूम होगा धर्म क्या है , सत्य ही धर्म है , ये सब धर्मग्रंथ समझाते हैं , प्रवचन से धर्म नहीं आयेगा न ही भाषण देने सुनने से देशभक्ति। विडंबना की बात है रास्ता दिखाने वाले खुद रास्ते से भटक गये हैं।
अंत में मेरी ग़ज़ल के कुछ शेर :::::::::::::::::::::::
रास्ता अंधे सबको दिखा रहे ,
वो नया कीर्तिमान हैं बना रहे।
सुन रहे बहरे बड़े ध्यान से ,
गीत मधुर गूंगे जब गा रहे।
उनपर है सबको ऐतबार भी ,
झूठ को सच जो हैं बता रहे।
हक दिलाने की बात कह कर ,
झोंपड़ी भी उनकी हैं हटा रहे।
दाग़ चेहरे के आते नहीं नज़र ,
आईना झूठा है ये बता रहे।

Thursday, 13 November 2014

इस बदलाव का सच ( ये ज़रूर पढ़ना ) डा लोक सेतिया

टीवी पर हर समाचार चैनेल पर धूम मची है , मोदी जी का डंका विदेश में बजने लगा है। ऑस्ट्रेलिया में हज़ारों लोग टिकट खरीद कर मोदी जी भाषण सुनेंगे। आज बाल दिवस है। मुझे याद है पिछले साल मेरे एक मित्र अपनी बेटी को मिलने गये थे वहां , जब उनकी बेटी ने कहा था कि देखो यहां कूड़े का नामोनिशान तक नहीं है , तब उनके मुंह से अचानक ये शब्द निकल गये थे "अगर भारत में कचरा न हो तो एक तिहाई आबादी तो भूखी ही मर जायेगी , उनको तो रोटी ही कूड़े से मिलती है "। ये व्यंग्य नहीं वास्तविकता है इस देश की जिसको आज तक कोई नेता कोई सरकार न देखना चाहती है न ही समझना। वास्तव में हमारी सरकार , प्रशासन और आधुनिक इंडिया में रहने वाले लोग इनको देखना तक नहीं चाहते , इनको कुछ देने की तो बात ही क्या करें।
बात दिवस पर दो ख़बरें छपी हैं अख़बारों में , एक राजस्थान की है जहां चौदह साल के स्कूल का इक बच्चा ख़ुदकुशी करते हुए पत्र लिख कर छोड़ गया है अपने अध्यापकों को सज़ा देने को , जो उसको बेरहमी से पीटते थे होमवर्क नहीं करने पर। दूसरी हिसार की है हरियाणा में जिसमें अध्यापक का अमानवीय अत्याचार की बात है , क्या यही अध्यापक न्याय की डगर पर चलना सिखा सकते हैं , मगर यहां समस्या कुछ और ही है। ये लोग शिक्षा देने को अध्यापक नहीं बने हैं , इनमें से अधिकतर आईएएस आईपीएस या कुछ और ही बनना चाहते थे जब नहीं सफल हुए तब ये नौकरी कर ली वेतन पाने को। और आजकल जिनको सरकार हो या निजि स्कूल वाले नाम मात्र को वेतन देकर रखते हैं वे तो कुंठा के शिकार रहते ही हैं। उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है। हम बात बाल दिवस की और बच्चों की कर रहे थे , उसी पर आते हैं। इक घटना रेडियो पर सुनी थी मैंने बहुत साल पहले , इक बच्चे को सज़ा देकर बंद कर दिया अध्यापक ने कमरे में , और भूल गया उसको निकालना बाहर , उस दिन गर्मी की छुट्टियां होनी थी दो महीने की। दो महीने बाद उस बच्चे का शव मिला था स्कूल के कमरे में जब छुट्टियां समाप्त हुई। पिछले साल ऐसी इक घटना घटी थी हरियाणा में , कई घंटों बाद जब देखा जाकर अभिभावकों ने तब बच्चा बेहोश था , उसको चंडीगढ़ में पी जी आई में दाखिल किया गया था , मगर उसके दिमाग पर बहुत बुरा असर हो चुका था उम्र भर को। देखते रहते हैं स्कूली बच्चों को बंधक की तरह हर सरकारी कर्यक्रम में शामिल किया जाता है , लिखा था कुछ दिन पहले ये भी जब देखा था एक अधिकारी को फोन पर सरकारी स्कूल के मुख्य अध्यापक को ये कहते कि उपायुक्त जी के आने से पहले इतने बच्चे भेजने हैं। शिक्षा का अधिकार क्या मिल गया सबको , आज चौदह साल से कम उम्र के बच्चे अख़बार बांटते हैं कपास चुनते हैं कम मज़दूरी लेकर। कितने तथाकथित समाजसेवी लोगों के घर नौकर हैं छोटे बच्चे। मेरे शहर में इक बाल भवन है जो वास्तव में अफसरों की संपत्ति है , वो जिसको चाहे उपयोग करने की इजाज़त देते हैं। शायद लोग नहीं जानते कि वास्तव में वो जगह किसी ने कभी स्कूल की लायब्रेरी बना कर दान में दी थी , जो अब सरकारी संपत्ति बन चुकी है। कभी गुरु दत्त की फिल्म का इक गीत चर्चा में था " जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं "। कितने साल हो गये हैं मगर लगता है कुछ भी बदला नहीं है। बदलेगा भी कैसे जब सरकार बदलते ही देश के हालात को बदलने की बात छोड़ सब शामिल हो जाते हैं अपने राज्य अपने शासन को विस्तार देने में। भाजपा को हरियाणा महाराष्ट्र के बाद और राज्य जीतने हैं , अब जो धर्मगुरु कानून के शिकंजे में फंसे हैं भाजपा नेता वोट बैंक की खातिर उनकी शरण में हैं , अब ऐसे में क्या उम्मीद की जा सकती है। किसी शायर का इक शेर कहीं सच न हो जाये। "तो इस तलाश का अंजाम भी वही निकला , मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला "।  

Wednesday, 12 November 2014

कब तक तमाशाओं से बहलाएंगे देश को ( सवाल - तरकश ) डा लोक सेतिया

भाजपा को लगता है सत्ता की सीड़ी मिल गई है , हर रोग की एक ही दवा है मोदी नाम का जाप। सब यही रट रहे हैं , देश का शासन मिला अब राज्यों का भी मिलने लगा है। ऐसे में सत्ता हासिल करना ही कहीं इक मात्र ध्येय न बन जाये , बहुत मुमकिन है। सपनों से देश की जनता को छलते आये हैं हमेशा से ही राजनेता। कहीं फिर वही कहानी इस बार भी न दोहराई जाये , संभलना ज़रूरी है। चलो देखते हैं देश की सतसठ साल में जो बर्बादी हुई है उसके पीछे कारण क्या रहे हैं। इधर देश विदेश में काले धन की और घोटालों की राशि की बहुत बातें सुनाई दी हैं , मोदी जी का अवतार काफी हद तक इसी माहौल के कारण ही संभव हो सका है। मगर क्या मोदी जी सब बदल देंगे या कम से कम बदलना चाहते हैं। कुछ सवाल पहले याद रखने हैं।
क्या देश के गरीबों की गरीबी दूर होगी ?
क्या भूख से अब लोग नहीं मरेंगे ?
क्या शिक्षा सब को एक समान मिलेगी , शिक्षा का बाज़ार बंद हो सकेगा , क्या ये कारोबार और सिर्फ मुनाफे का कारोबार नहीं बना रहेगा ?
क्या सब को स्वास्थ्य सेवा एक समान मिला करेगी , क्या चिकित्साक्षेत्र की लूट थमेगी ताकि सही इलाज संभव हो सके या सारी सुविधायें धनवानों के लिये ही आगे भी सुरक्षित रहेंगी ?
क्या नौकरी काबलियत से मिला करेगी , बिना सिफारिश बिना रिश्वत ?
क्या प्रशासन न्यायकारी बन जायेगा , पुलिस जनता की मित्र बन सकेगी , इस विभाग को सुधारा जायेगा ताकि ये जनता का दमन न करके उसको सुरक्षा देने का कर्तव्य निभा सके ?
कोई ये न कहे कि आपने देश की सब से गंभीर बिमारी भ्र्ष्टाचार की बात ही नहीं की , तो उस पर पूरी चर्चा करते हैं। किसी भी योजना का धन अगर देश की जनता को नहीं मिलकर कुछ अन्य लोगों को मिलता है जिस से देश या जनता का कोई भला नहीं होता , और ही काम पर खर्च या बर्बाद किया जाता है तब उसको घोटाला कहते हैं। शायद बहुत लोग हैरान हों कि आज़ादी के बाद से इक ऐसा घोटाला देश की और राज्यों की सभी सरकारें करती आई हैं , वो है सरकारी प्रचार के अनावश्यक विज्ञापन। उनसे किसी को कुछ नहीं मिलता , मिलता है मुट्ठी भर अखबार टीवी वालों को मुफ्त का धन और नेताओं को झूठा प्रचार भी और मीडिया को अपने प्रभाव में रखने का रास्ता भी। यकीन करें इन विज्ञापनों पर इतना धन बर्बाद किया गया है जितना देश में आज तक हुए सभी घोटालों को देश विदेश में जमा काले धन की राशि में जोड़ कर भी नहीं हुआ है। लेकिन इसको रोकने की बात भला कौन करेगा , सच बोलने वाले ये सच कभी बोलते ही नहीं , पापी पेट का सवाल जो है। अभी बात हुई है किसी ने अपने किसी कार्यक्रम में देश के प्रधानमंत्री जी को क्यों नहीं बुलाया है। मुझे लगता है देश के प्रधानमंत्री को राज्यों के मुख्यमंत्रियों को ही नहीं सांसदों विधायकों और प्रशासन के बड़े अधिकारियों को मुख्य अतिथि बनने से अधिक ज़रूरी और बहुत काम करने चाहियें। मुझे याद है कुछ साल पहले हमें बाल भवन में साहित्य की मासिक सभा करने की मनाही इसलिये की गई थी कि हमने इक कवि सम्मलेन में उपायुक्त महोदय को मुख्य अतिथि नहीं बनाया था। क्या ये लोग जनता की संपत्ति को अपनी निजि जायदाद समझना छोड़ देंगे।
                       गंगा की सफाई की बात हो रही है , थोड़ी सफाई संसद की भी की जानी चाहिये। संविधान में तीन कार्यों के लिये तीन अंग बनाये गये थे , कार्यपालिका अर्थात प्रशासन का काम था देश के विकास और जनता की सुविधाओं पर आबंटित धन को इमानदारी से खर्च करना , विधायिका का काम था उसपर निगाह रखना और योजनायें बनाना बजट पारित करना , न्यायपालिका का काम था न्याय व्यवस्था कायम रखना। जिस दिन नरसिंहराव जी ने सांसदों को हर वर्ष विशेष निधि देने का प्रावधान रखा था उस दिन ही विधायिका ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर अतिक्रमण किया था जिसको तभी न्यायालय में चुनौती दी जानी चाहिये थी। मगर ये रोग ऐसा बढ़ता गया कि अब कोई प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री इसको रोकने को सोच भी नहीं सकता है। कौन नहीं जानता है कि ये राशि कैसे खर्च की जाती है , हर सांसद हर विधायक को जो हिस्सा देता है उसी ठेकेदार को ठेका मिलता है। यहां के पिछले विधायक ने तो खुद टाइलों की फैक्ट्री ही लगा ली थी और पांच साल तक हर विभाग उनकी टाइलें ही चौगुने दाम पर खरीदता रहा। मोदी जी क्या ये असंवैधानिक कार्य जो भ्र्ष्टाचार का बहुत बड़ा माध्यम भी है बंद कर सकते हैं। स्वच्छता की ज़रूरत आपके अपने घर को भी है , याद है संसद में प्रवेश करते समय माथा टेका था , मंदिर की पवित्रता को बखूबी जानते हैं नरेंद्र मोदी जी। कब शुरुआत करते हैं हम भी देखना चाहते हैं।  

Sunday, 9 November 2014

नेहरू से लेकर मोदी तक ( इंडिया का कड़वा सच ) डा लोक सेतिया

देश को आज़ाद हुए सतसठ वर्ष हो गये मगर अभी भी कहने को विकास की बात की जाती है मगर होता क्या है ? देश का धन बर्बाद किया जाता है , क्या अंतर है नेहरू की सरकार करे इंदिरा की वाजपेयी की मनमोहन की या अब मोदी की। भूल तो नहीं गये इमरजेंसी के विज्ञापन , आपात्काल का गुणगान , फिर फील गुड का दावा , भारत निर्माण का प्रचार , हरयाणा या अन्य राज्यों का अपना अपना नंबर वन का डंका बजाना। ये सब क्या है , किसी को लोकप्रिय साबित करने के लिये देश के धन की बर्बादी। कभी किसी ने नहीं सवाल किया इस देश में आज तक का सब से बड़ा घोटाला क्या है , कैसे बतायेंगे अखबार टीवी वाले कि हम शामिल हैं इस लूट में। इनका पेट भरता ही नहीं बिना सरकारी विज्ञापनों के , ये बैसाखियां ज़रूरी हैं इनके लिये। जो खुद अपने पैरों पर चलना नहीं चाहते वो सब से तेज़ सब से आगे होने का दम भरते हैं। हैरानी होती है कोई सरकार कोई नेता ये बदलना नहीं चाहता , क्या जनता को विज्ञापनों से पता चलेगा कि सच सब बदल चुका है। अगर बदलेगा तो लोगों को दिखाई नहीं देगा , दुष्यंत कुमार ने चालीस साल पहले जो लिखा था वो आज भी सच है। " रोज़ अख़बारों में पढ़कर ये ख्याल आया हमें , इस तरफ आती तो हम भी देखते फसले बहार "। कभी हिसाब लगाना सतसठ साल में कितने लाखों हज़ार करोड़ रुपये इस तरह विज्ञापनों पर बर्बाद किये गये , मात्र मिडिया वालों को खुश रखने और अपने या अपने बाप दादा के नाम का डंका बजाने का काम करने के लिये , लोकतंत्र के नाम पर इस से बड़ा धोखा क्या हो सकता है। अभी सफाई अभियान की बात शुरू हुई है और हर तरफ बड़े बड़े विज्ञापन सड़कों पर लग गये हर विभाग के , देखा कल यहां पैमाइश की जा रही थी सड़कों की पार्कों की ये आंकड़े बनाने को कि इतनी जगह की सफाई की गई ताकि उसका बजट दिखाया जा सके , वही कागज़ी काम। इन विभाग वालों को दिखाई नहीं देता सीवर का होल सालों से खुला पड़ा है , पानी की लाईन कब से लीक करती है , फुटपाथ कब से रोक रखा है दुकानदारों ने , विभाग वाले सालों से किराया वसूल करते आ रहे हैं गैरकानूनी ढंग से , अफ्सर के घर सब्ज़ी जाती है और सामान जाता है रोज़ मुफ्त में , कितने तथाकथित नेता हैं जो किसी दुकानदार से सामान ले जाते बिना दाम चुकाये। क्या क्या बताया जाये , फिर दुष्यंत का शेर याद आता है। "इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं , आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार "।
     योजना के नाम पर फिर वही लोग उसी तरह लूट में शामिल हैं , इक तमाशा है जनता को दिखाने को। इक काम हमेशा सरकार ने किया है हर बात का दोष लोगों पर डालने का। विज्ञापन है लोग खुले में शौच करते हैं , उनको शर्मसार किया जाता है , क्या है ये ? कौन चाहता है खुले में शौच को जाना , क्या सुविधा है सब जगह लोग जा सकें जब मज़बूरी हो , पहले आपको वो सुविधा देनी होगी , अगर नहीं जानते हैं तो बता दूं आयुर्वेद में लिखा हैं मल मूत्र आदि के वेग को रोकना जानलेवा साबित हो सकता है। जब तक सरकार खुद अपना कर्तव्य निभाना नहीं चाहती बल्कि उसका दोष जनता पर डालने का काम करती रहेगी , वास्तविकता नहीं बदलेगी। हां इक बात तो बताना भूल ही गया सरकार या अफ्सर जो करना चाहते उसके लिये पैसा बजट सब हो जाता है। जो नहीं करना उसी को लेकर रोना रोते रहते धन नहीं है , धन की बर्बादी जब तक नहीं रूकती , जनता का कोई भला नहीं होने वाला। अगर जो मनमानी कभी कोई और करता था वही आपको भी करनी है तो नतीजा भी वही ही निकलेगा। क्या अफ्सर सेवक बन जायेंगे , नेता शासक नहीं रहेंगे ? यही देखना है।

Monday, 3 November 2014

दो आज़ाद पंछी गगन के ( कहानी ) डा लोक सेतिया

महानगर के बस अड्डे पर अचानक प्रेम व प्रीति की मुलाकात हो गई। सालों बाद इस प्रकार कॉलेज का पुराना सहपाठी कभी कोई ऐसे मिल जाये तो यूं लगता है मानो गुज़रा हुआ ज़माना वापस लौट आया है। इत्तेफाक से दोनों को अपनी अपनी कंपनी के काम से एक ही नगर को जाना था। दो दिन के लंबे सफर में तो अजनबी सहयात्री भी अपने से लगने लगते हैं , ऐसे में पुराना सहपाठी मिल जाये तो मन झूमने लगता है। प्रेम और प्रीति दोनों को भी ऐसा ही प्रतीत हो रहा था। प्रेम ने बुकिंग विंडो पर जाकर दोनों की टिकट बुक करवा ली थी और बस में साथ साथ बैठ कर कॉलेज के दिनों की बातें करने लगे थे। कुछ ही पल में ऐसे घुल मिल कर बातें कर रहे थे जैसे वो कभी बिछुड़े ही नहीं थे। बातों बातों में दोनों ने इक दूजे से विवाह और जीवन साथी के बारे भी पूछा था जिसका जवाब दोनों ने ही इस प्रकार संक्षिप्त सा दिया था मानो उनको इस विषय पर बात करनी ही नहीं हो। मगर शायद दोनों को ही ये बात समझ आ गई थी कि मेरी तरह उसको भी ज़िंदगी की सच्ची खुशी हासिल नहीं हुई है और उसके सपने भी मेरी तरह टूट कर बिखर चुके हैं। दोनों जिधर ज़िंदगी ले जा रही थी जाते जा रहे हैं। कुछ ही घंटो में वे इक दूजे से इतना बेतकल्लुफ हो बात करने लगे थे जितना कॉलेज में चार साल साथ पढ़ते भी नहीं हो पाये थे। प्रीति को तब प्रेम की बातें अजीब लगती थी जब वो बहस में अपनी बात पर अड़ जाता था कि पैसा ही सब कुछ नहीं होता , और हमें सुंदरता को महत्व नहीं देकर व्यक्ति के सवभाव को देखना चाहिये। सुंदरता हमेशा नहीं रहती है , मधुर व्यवहार हमेशा साथ रहता है और सच्चा मित्र सुख दुःख दोनों में साथ देता है , जो वक़्त और ज़रूरत को दोस्त बनाता है वो दोस्ती का अर्थ नहीं जनता। प्रेम मानता था कि दोस्त बहुत मुश्किल से मिलता है हर किसी को दोस्त नहीं समझा जा सकता। जिसके बहुत दोस्त होते हैं वास्तव में उसका कोई दोस्त नहीं होता है। प्रीति का विचार था कि किसी को भी सीधा सरल नहीं होना चाहिये जैसा समय हो खुद को उसी तरह बदल लेना चाहिये। खुश रहने के लिये पैसा और दोस्त जितने भी बन सकें बनाना चाहिये। प्रेम की भावुकतापूर्ण बातें प्रीति को पसंद नहीं आती थी , उसको रमेश की बातें अच्छी लगती थी जो रोज़ नये नये दोस्तों के साथ कर्यक्रम बनाने और मौज मस्ती से जीने में यकीन रखता था। प्यार मुहब्बत को रमेश किस्से कहानियों की बातें समझता था और कहता था कि असली जीवन में ये सब फ़िज़ूल की बातें हैं। इसके बावजूद प्रीति के दिलोदिमाग पर रमेश ही छाया रहता था , उसको मालूम था कि प्रेम क्यों उसको चोरी चोरी अजीब सी नज़रों से देखता रहता है , जैसे कुछ कहना चाहती हों उसकी नज़रें प्रीति से। उसकी सहेली आशा कहती थी प्रेम तुमको बेहद चाहता है उसे अपना दोस्त बना लो मगर प्रीति को प्रेम का ऐसे उसको तिरछी नज़रों से तकना बिल्कुल पसंद नहीं था , वो सोचती रहती थी काश कभी रमेश उसको ऐसी नज़रों से देखे। उसने प्रेम को कभी कोई अहमियत नहीं दी थी , एक बार जब कॉलेज के वार्षिक समारोह में प्रेम ने कोई नाटक प्रस्तुत करना था और उससे पूछा था नायिका का किरदार निभाने के बारे तब प्रीति ने जैसे उसको डांट ही दिया था "तुमने ऐसा सोचा भी कैसे कि मैं तुम्हारी नायिका का अभिनय करने को मान जाउंगी"। मगर प्रेम ने तब इतना ही कहा था तुमको मेरी बात बुरी लगी है तो क्षमा चाहता हूं। प्रेम का चेहरा बुझ सा गया था और उसने नाटक का विचार ही छोड़ दिया था। प्रीति को ये समझना ज़रूरी नहीं लगा था कि किसलिये प्रेम ने उसकी जगह किसी और लड़की को अपने साथ नाटक में शामिल होने को नहीं कहा था। प्रीति के उपेक्षापूर्ण व्यवहार से प्रेम चुप चाप रहता था पर कभी कोई शिकायत नहीं करता था। जब भी परीक्षा नज़दीक होती प्रेम खुद उससे पूछता था किसी तरह की कोई ज़रूरत तो नहीं प्रीति को और तब प्रीति उसके नोट्स लिया करती अपनी कई प्रॉब्लम्स हल करवाती थी प्रेम से। मगर प्रीति रमेश के प्रति आकर्षित थी चाहे वो प्रीति को कभी भी विशेष महत्व नहीं देता था आशा ने कितनी बार समझाया था प्रीति को कि ये इकतरफा प्यार तुमको कुछ नहीं देगा , पर दिल पर किसी का बस नहीं होता है , जो आसानी से मिल रहा हो अक्सर हम उसकी कद्र नहीं करते और जो नहीं हासिल हो सके उसको पाने को तरसते रहते हैं। सभी कभी न कभी ऐसी मृगतृष्णा का शिकार हो जाते हैं। मगर प्रीति को वही प्रेम आज बेहद अच्छा लग रहा था और उसके मन में ये सवाल खुद ही आया था कि किसलिये उसने प्रेम से तब उपेक्षा का व्यवहार किया था जबकि उसने कभी कोई खराब हरकत नहीं की थी कोई गल्त बात न बोली थी , उसने तो अपने मन की बात तक भी प्रीति को नहीं कही थी। शायद आशा सही कहती थी कि ये भी उसके प्यार का ही इक रूप था , प्रीति खुद ही मानना नहीं चाहती थी कि वो प्रेम को भी चाह सकती है , आशा शायद उसको खुद से ज़्यादा समझती थी। बीते समय की बातें करते करते दोनों खो गये थे यादों में , और इक ख़ामोशी सी छा गई थी। जाने कब प्रीति प्रेम के कंधे पर सर रख कर गहरी नींद में सो गई थी। तभी इक हिल स्टेशन पर बस पहुंच कर रुकी थी , सभी यात्रियों से कहा गया था कि अब चार घंटे रुकना है यहां ताकि सब उस खूबसूरत जगह को देख सकें। शाम छह बजे तक सबको वहीं आना था आगे का सफर जारी रखने के लिये।
                             आज प्रेम और प्रीति दोनों को लग रहा था अब कुछ दिन खुश रह सकते हैं घर के तनाव भरे माहौल से दूर किसी दोस्त के साथ हंस कर जी सकेंगे। उनको लगता था जैसे उनकी ज़िंदगी में जहां पतझड़ ही पतझड़ थी , कोई खुशबू नहीं किसी फूल की उसमें अचानक बहार आ गई हो चार दिन को ही सही। प्रीति ने कुछ सोच कर प्रेम से कहा था क्यों न हम इस जगह की सैर करने की जगह कहीं चल कर बैठें ताकि अपना हल चाल बता सकें पूछ सकें। थोड़ा आराम भी मिलेगा और हम शायद इक दूसरे को करीब से समझना भी चाहते हैं। प्रेम ने कहा था प्रीति यही ठीक है घूमना तो कभी भी हो सकता है मगर हम जाने फिर कब यूं मिल सकें। वे अपने अपने बैग लेकर कुछ दूर इक पार्क में चले आये थे , प्रेम पास से कुछ खाने को और दो कप काफी ले आया था और प्रीति ने घास पर इक चादर बिछा दी थी ताकि बैंच पर न बैठ कर उसपर आराम से बैठा जा सके। काफी पीते पीते प्रीति ने कहा था प्रेम तुम कॉलेज में जो बातें किया करते थे मुझे तब उनकी समझ नहीं थी मगर अब उसको समझती हूं , जानती हूं तुम्हें किसी दोस्त की तलाश थी , शायद मुझे तुमने हमेशा अपनी मित्र ही समझा मगर मुझे ही नहीं पता था कि तुम मेरे लिये क्या हो। तुमने तब कभी कुछ नहीं कहा था और आज भी जब हम दोनों विवाहित हैं तब तो शायद बिल्कुल ही नहीं कह सकोगे , मगर मुझे आज अपनी भूल का सुधार करना ही है ,ये अवसर दोबारा मिलेगा ऐसी संभावना नहीं नज़र आती कहीं। इन कुछ ही पलों में हम जितना करीब हो गये हैं कॉलेज में चार साल में कहां हो सके थे। प्रेम मुझे कब से इक ऐसे सच्चे दोस्त की ज़रूरत महसूस होती रहती थी जिसको मैं अपना सब कुछ बिना झिझक बता सकूं पूर्ण विश्वास करके , मगर नहीं मिला एक भी , हम चाहे कॉलेज में अधिक करीब नहीं हुए हों तब भी इक दूजे को बहुत भली भांति समझते तो रहे हैं , इसलिये मुझे लगता है अब तुम और मैं चाहे दूर ही रहते हों दोस्ती का रिश्ता निभा सकते हैं। मैं तुम पर पूरा भरोसा करती हूं इसलिये अपनी हर बात तुम्हें बताना चाहती हूं ताकि जब भी मुझे ज़रूरत हो इक सच्चे दोस्त की सलाह मिल सके और तुम भी मुझे अपनी ऐसी ही दोस्त अभी भी समझ सको तो सच मैं भग्यशाली हूंगी तुम्हारी सच्ची दोस्त बन कर। प्रीति की बात सुन कर प्रेम ने कहा था जो तुमने आज कहा है वो शायद मेरा ही सपना है , ये तुमने जब कहा तब तुम भी जानती थी मैं भी यही चाहता रहा हूं और समझती भी हो कि ये कहने का साहस मैं आज भी नहीं कर पाउंगा। अब शायद नियति ने हमें इसलिये ही इस मोड़ पर फिर से मिलवा दिया है ताकि हम आपस में अपने जीवन की हर बात सांझी कर थोड़ा सुकून हासिल कर सकें। प्रीति अब तुम बता सकती हो तुम्हारे जीवन में जो भी कठिनाई हो , क्या तुम्हारी पति से या घर में किसी से कोई समस्या है जो हमेशा चहकने वाली प्रीति यूं गुमसुम हो गई है। प्रीति ने कहा प्रेम आज मुझे तुमसे सब बताना है अपने बारे जो कभी किसी को नहीं बता सकी। प्रेम ऐसा नहीं है कि मेरे पति कोई बुरे इंसान हैं , मगर अक्सर जो हम सोचते हैं वो वैसा मिलता नहीं ज़िंदगी से , मेरे पति को मेरे काम करने से जॉब करने से कोई ऐतराज़ तो नहीं है लेकिन वो मेरी क़ाबलियत को बिल्कुल महत्व नहीं देते। वही पुरानी सोच , औरत मर्द के पांव की जूती है , उसका अपमान करना मर्दानगी है , उसको प्रताड़ित करना पति का अधिकार। पत्नी को सर पर नहीं बिठाना चाहिये , उसको दबा कर रखना चाहिये , वो बस उपयोग की इक वस्तु मात्र है जब मन चाहा जैसे भी इस्तेमाल किया। इक ऐसा जीवन साथी जो भावनाशून्य हो , आदमी नहीं कोई मूरत हो पत्थर की , जो समझता हो औरत को खाना पीना गहने कपड़े मिल रहे तो और क्या चाहिये उसको। प्यार की दो बात के लिये समय नहीं हो जिसके पास , हर शाम थक कर आना घर और खा पी कर सो जाना , कुछ भी न पूछना न ही कुछ भी बताना। लगता है दो अजनबी इक साथ रहते मज़बूरी में। कभी शराब के नशे में प्यार की बात भी ऐसे करना जैसे पत्नी नहीं बाज़ार से खरीदी कोई वस्तु है जिसको चाहे इस्तेमाल किया चाहे रख छोड़ा कहीं। प्रेम लगता है ज़िंदगी की गाड़ी दो बेमेल पहियों पर घिसट कर चल रही है , जाने अनजाने , किधर जाना नहीं मालूम। कोई कारण नहीं कि अलग होने की बात कहें पर साथ रहने को मन चाहे ऐसा भी कुछ नहीं , इक नीरस सा जीवन जैसे कोई बोझ है जिसको ताउम्र ढोना है। प्रेम यही है मेरी ज़िंदगी की कहानी , खुद ही तुम्हें बतानी चाही है क्योंकि कभी कोई और मुझे तुमसा विश्वसनीय मिल ही नहीं सका। प्रेम तुम भी मुझे अपनी हर बात बताना चाहो ऐसा बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है , फिर भी अगर तुम भी मुझे ऐसे ही अपना सुख दुःख का साथी समझ कर अपने जीवन के बारे अपनी ख़ुशी अपने दर्द के बारे बता सको तो मुझे अच्छा भी लगेगा और ख़ुशी भी होगी। मुझे पता है मेरे पति जैसा व्यवहार तुम किसी भी महिला से नहीं कर सकते , तभी ये सब तुमको बताने से मुझे इक राहत सी मिली है।
                                              प्रीति की बात सुनने के बाद प्रेम ने कहा , प्रीति तुम्हारी ही तरह मैंने भी अपनी बात किसी से नहीं की आज तक , लेकिन तुम जानती हो तुमसे नहीं छिपा सकता। अब इसलिये भी बताना चाहता हूं ताकि तुम समझ सको कि तुम अकेली नहीं हो दुनिया में जिसके सपने टूट कर बिखर गये , मैं भी ऐसे लोगों में शामिल हूं और हम जैसे जाने और कितने लोग हैं जो ऐसे ही जीते हैं घुट घुट कर। सच कहूं तो मुझे कभी किसी से कोई भी शिकायत नहीं होती है , बस इतना नहीं समझ पाता कि सब से मुझे तिरस्कार किसलिये मिलता है हमेशा। अपनी पत्नी को मैं इस दुनिया का सब से नकारा और बेवकूफ व्यक्ति लगता हूं। हर दिन मुझे नाकाबिल होने के ताने देती है , आस पास के बाकी सभी पुरुष उसको काबिल और समझदार लगते हैं , वो अपनी किस्मत को कोसती है जो मुझ जैसा पति उसको मिला। वो कहती है वो कितना भी प्रयास कर ले मैं कभी नहीं सुधर सकता। ये बात सच भी है मैं जैसा भी हूं वैसा ही रहना चाहता हूं , बदलना नहीं चाहता। मुझे हमेशा यही एहसास रहता है कि मैं कभी किसी को भी प्यार के काबिल नहीं लग सकता। क्या मुझे शादी करनी ही नहीं चाहिये थी , और विवाह करके मैंने पत्नी का जीवन बर्बाद कर दिया है। मुझे कभी ये बात नहीं समझ आई कि अगर मैं उसको इतना बुरा लगता हूं तो वो मुझे छोड़ किसलिये नहीं देती , इतनी नफरत भरी है उसके मन में मेरे लिये तब भी कैसे मेरे साथ रहती है। मैं खुद उसको छोड़ कहीं नहीं जा सकता क्योंकि समझ नहीं आता कि जाऊं तो कहां , इक दोस्त तक नहीं मिला जिसको समझा सकता अपना हाल। मैंने हमेशा प्रयास किया उसको हर मुमकिन सुख सुविधा देने का , हर कदम साथ देता रहा हूं मगर उसकी हर अपेक्षा हर चाहत को नहीं कर पाया पूरा। कारोबार में बार बार असफल होने से मेरा आत्मविश्वास बिखर चुका है और मैं ज़िंदा हूं क्योंकि जीना है मरने तक। प्रेम की कहानी सुन प्रीति की आह निकल गई , वो बोली प्रेम लगता है तुम्हारी और खुद मेरी ज़िंदगी की बर्बादी का कारण मैं हूं , काश मैंने तभी तुमसे रिश्ता कायम किया होता और तुमको वो सब देती जो मुझे देना चाहिये था , और मुझे जो भी चाहिये था बिना मांगे ही मिल जाता। जाने क्यों प्रीति की बात सुन प्रेम की आंखें भर आई थी , ये देख प्रीति ने कहा था प्रेम अब मैं तुमको कभी रोने नहीं दूंगी , हम अब चाहे कहीं भी रहें इक दूसरे का साथ हर ख़ुशी हर दुःख में देते रहेंगे। जो बात आज मैं कहने जा रही हूं वो दुनिया को शायद कभी समझ नहीं आये मगर मेरा विश्वास है कि तुम मेरी भावना को समझोगे। हमारा अपराध क्या है ? हम प्यार के सम्मान के अपनेपन के भूखे हैं तो इसमें गलत क्या है , क्या हमें अपनी ज़िंदगी जीने का हक नहीं है।तमाम उम्र हम दोनों किसी और के अनुसार कैसे जी सकते हैं , और ऐसा करने के बाद भी हम दोनों से हमारे विवाहित जीवनसाथी खुश नहीं होने वाले न ही खुद हमको कभी कोई ख़ुशी देने वाले हैं , ये बात मैं भी जानती हूं और तुम भी प्रेम। शायद जीवन भर हमें ऐसे ही घुट घुट कर जीना होगा। अब जब किस्मत ने हमें एक सप्ताह के लिये साथ रहने का अवसर दिया है तो क्यों न हम इसको वैसे बितायें जैसा हम कॉलेज के दिनों में दोस्ती कर के बिता सकते थे। तुम्हारी इक तम्मना मैं पूरी कर सकूं और तुम भी मेरी इक आरज़ू और चाहत को पूरा कर सको। हम अगले सात दिन के लिये भूल जायें कि हमारी किसी से शादी हो चुकी है , मैं केवल प्रीति हूं किसी की पत्नी नहीं और तुम सिर्फ प्रेम हो किसी के पति नहीं। मेरी ये बात सुनकर कोई और मुझे बदचलन समझे मगर तुम मेरी भावना को समझना , हम दोनों तपती गर्मी में झुलसते रहे कुम्लाहे मुरझाये से पौधे हैं जिनको आने वाले सात दिनों की बरसात नया जीवन दे सकती है। मुझे पता है प्रेम तुम ये बात कभी नहीं कह सकते , मैं खुद लाज शर्म को छोड़ कर जाने कैसे ये कह रही हूं ताकि जो सच्चा प्यार मुझे नहीं मिला कभी मेरी ही भूल से उसको पा सकूं और शायद अपनी भूल का प्रायश्चित भी कर पाऊं। तुम तब भी बोले थे जब कोई बंधन नहीं था तो अब तो कभी नहीं बोलते लेकिन मुझे लगता है तुमने जितना प्यार मुझसे किया शायद कोई किसी से नहीं कर सकता। मैंने भी इक सपना देखा है कि काश कभी कोई मुझे भी मुहब्बत से प्यार से सम्मान से , मेरी इच्छाओं का आदर करते हुए अपना बनाये। एक पवत्र प्रेम न कि शारीरिक आकर्षण या केवल वासना , प्रेम क्या ऐसा मुमकिन है अब ये सात दिन हम इक दूजे के होकर जियें। जैसे सदा सदा से हम इक दूसरे के हैं और बाकी दुनिया से अपना कोई नाता नहीं है। प्रेम प्रीति की बातें सुनते सुनते जैसे किसी सपनों की दुनिया में खो गया था , बोला था प्रीति क्या ये सच है या मेरा सपना , कॉलेज के दिनों मैंने हमेशा यही ख्वाब देखा था कि इक दिन तुम खुद मेरे पास आओगी और अपने प्यार का इज़हार करोगी। अब दुनिया क्या सोचती है इस से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है , मेरी ज़िंदगी मेरी है और तुम्हें भी अपनी ज़िंदगी अपनी मर्ज़ी से जीने का पूरा अधिकार है। इसलिये तुम्हारा ये प्रस्ताव मुझे स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है। अगले सात दिन हम प्रेमी प्रेमिका बन कर ही जियेंगे ताकि इन दिनों का खुशनुमा एहसास उम्र भर हमें जीने की ऊर्जा प्रदान करता रहे। कहते हैं न ज़िंदगी प्यार की दो चार घड़ी होती है , चाहे थोड़ी भी हो ये उम्र बड़ी होती है। प्रेम ने पूछा था प्रीति मैंने कभी तुमको कोई उपहार देने को सोचा था मगर नहीं दिया ये सोच कर कि तुम स्वीकार न करोगी , क्या आज मैं कुछ देना चाहूं तो तुमको मंज़ूर होगा। "ज़रूर "प्रीति बोली थी आओ बाज़ार चलें हमें बस का समय होने से पहले वापस भी आना है। प्रीति ने प्रेम की पसंद की ड्रेस , चूड़ियां , बिंदी , लिपस्टिक ले ली थी , इक मंगल सूत्र को देख रुक गया तो प्रीति ने कहा था ले लो मुझे पसंद है। वक़्त गुज़रते पता ही नहीं चला था और जब तक बस स्टैंड पर पहुँचते उनकी बस निकल चुकी थी। लेकिन उनको बस छूटने का कोई अफ़सोस नहीं था , दूसरी कोई बस भी नहीं मिल सकती थी और उन्होंने तब वहीं किसी होटल में वो रात इक साथ गुज़ारने का तय कर लिया था। प्रेम ने पूछा था प्रीति क्या दो कमरे लेने हैं , प्रीत ने कहा था नहीं अब जब तक यहां हैं एक ही कमरे में रहेंगे। होटल के कमरे में आकर दोनों ने इक दूजे से उपहार में मिले कपड़े पहने थे , और इक दूजे को प्यार भरी नज़रों से निहारते रहे थे। प्रीति ने आज प्रेम को पति मान अपना श्रृंगार किया था और ये सोच खुद ही शरमा रही थी , फिर प्रेम के करीब जाकर बोली थी मेरा मंगलसूत्र कहां है प्रेम जी। प्रेम को लगा था मानो आज सारी दुनिया उसके कदम चूमने लगी है और उसने मंगलसूत्र प्रीति के गले में पहना दिया था। प्रीति ने झुक कर प्रेम के पांव छू लिये थे और पत्नी की तरह अपने हाथों को अपनी मांग पर फेरा था जैसे पति का आशिर्वाद लिया हो। ये प्यार वालों का अपना बंधन था जिसमें किसी तीसरे की कोई ज़रूरत नहीं थी , उन्होंने खुद को पति पत्नी मान लिया था। प्रेम जब सोफे पर सोने लगा तब प्रीति ने कहा था प्रेम दुनिया की नज़र में मेरा पति कोई भी हो मेरे लिये तुम ही मेरे पति हो सब कुछ हो , मैं आज खुद को तन मन से तुम्हें समर्पित करती हूं , मुझे अपना लो अपनी आगोश में ले लो , आज की रात अपनी सुहागरात है। मुझे अपना प्यार तुम पर बरसाना है और तुम भी मेरी जन्म जन्म की प्यास बुझा दो। ऐसे वो दोनों सुध बुध खो इक दूजे में समा गये थे , प्यार के सच्चे रिश्ते के लिये दुनिया के सब रिश्तों को भुलाकर।
     अगली सुबह उनको उठते ही जाना था बाकी सफर पूरा करने ताकि जिस काम को जाने को निकले थे वो पूरा कर सकें और अगले छह दिन साथ गुज़ार सकें ऐसे ही। टैक्सी मिल गई थी और सफर पूरा करने के बाद उन्होंने उस शहर में भी एक ही कमरा लिया था होटल में। सफर की थकान मिटाने को वो जल्दी ही सो गये थे।
   जब अगली सुबह जागे तो सुबह का अख़बार पढ़कर दंग रह गये थे , खबर छपी थी कि जिस बस में वो यात्रा कर रहे थे वो उसी रात खाई में गिर गई थी और उसमें जितने मुसाफिर थे सब मर गये थे। टूरिस्ट कंपनी ने उनका नाम भी दे रखा था मरने वालों की लिस्ट में। उनको समझ नहीं आ रहा था कि इस खबर का सन्देश क्या है। क्या वे अपने अपने घर सूचित कर दें कि हम ज़िंदा हैं या इस खबर को अपने लिये इक उपहार समझ जिस प्यार के रिश्ते को सात दिन को अपनाया था उसको उम्र भर का नाता मान लें। क्या अपने परिवार वालों को सच सच बता दें कि हम उस बस में नहीं थे और इक साथ पुराने सहपाठी के साथ थे दो दिन दो रात इक साथ। मुमकिन है तब वो कहते इससे तो अच्छा होता तुम मर ही जाते। काफी विचार विमर्श के बाद उन्होंने इसे तकदीर का फैसला समझने का निर्णय लिया है , और तय किया है कहीं और जाकर अपनी प्यार की नई दुनिया बसा लेंगे। अपना जीवन जीने का हक सभी को है , प्रेम प्रीति भी अपने सपने साकार करना चाहते हैं। घुट घुट कर मरने से अच्छा है दुनिया की नज़र में मर कर भी प्यार की दुनिया बसा कर ख़ुशी से जीना। ये सोच कर दोनों को लगा था वे अब किसी बंद पिंजरे के पंछी नहीं हैं , खुले गगन के दो आज़ाद पंछी हैं। "पंछी बनूं उड़ती फिरूं मस्त गगन में , आज मैं आज़ाद हूं दुनिया के चमन में "। प्रीति गुनगुना रही थी , उन दोनों के मन मयूर नाच रहे थे।
                                   ( इक सत्य घटना पर आधारित है ये कहानी )

Thursday, 30 October 2014

क्या सच में कुछ बदल रहा है ( आलेख ) डा लोक सेतिया

कई दिन के बाद लिखने को आया हूं ब्लॉग पर। सच कहूं तो खुद निजि बातों में खोया रहा कुछ दिन से और हर दिन लिखना छूट सा गया। हर लेखक के जीवन में ऐसा होता है कभी जब उसका ध्यान लिखने में नहीं रहता है। शायद एक महीना मैंने लिखने को लेकर सोचा ही नहीं। सत्ता बदली देश में भी राज्य में भी , समझ रहा था क्या जो बदलता हुआ लग रहा है वो वास्तव में बदल भी रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमेशा की तरह नाम ही बदलें बाकी सब वही चलता रहे। कुछ बातें नज़र आईं हैं जिनसे थोड़ा भरोसा हुआ है जनता को कि शायद अब सच में सब बदलने वाला है। डर लगता है कहीं फिर देश की उम्मीदें टूट न जायें , सत्ता ही बदले व्यवस्था जस की तस बनी रहे। कम से कम कुछ बातें तो हैं जिनको फिर से दोहराया जाने लगा है , आडंबर जो कोई और करता था किसी और रूप में वो कोई दूसरा नये ढंग से करता लग रहा है। कहां से शुरू की जाये बात , चलो आज के दिन से करते हैं।
          सरदार पटेल के नाम पर मैराथन दौड़ क्या है , कुछ सुविधा संम्पन लोगों का मात्र दिखावा नहीं क्या। क्या देश की जनता का इस से कुछ भला होने वाला है , क्या आम लोग शामिल होंगे ऐसे खेल में। कब तक आखिर कब तब यूं ही देश का धन फज़ूल दिखावों पर बर्बाद किया जाता रहेगा। महाराष्ट्र में शपथ ग्रहण समारोह पर ऐसा महंगा आयोजन किसलिये , समझना होगा भाजपा को उसको शासन का अधिकार मिला है या देश जनता की सेवा का। अंतर इतना सा ही है , सब मांगे देश और जनता की सेवा का अवसर हैं , मगर जब कुर्सी मिलती है तब शासक बन जाते हैं। बहुत अचरज हुआ जब जो कांग्रेस किया करती थी अपने सांसदों को बुला छप्पन प्रकार के व्यंजन परोसना वही मोदी जी ने भी किया। अगर सत्ताधारी ऐसे ही राजसी शान से रहते रहेंगे तब गरीब भूखा ही रहेगा , भाषण से पेट नहीं भरता।
            मैं कभी आगरा नहीं गया , ताजमहल मुझे हमेशा लगता किसी शासक ने जनता के खून पसीने की कमाई से अपना खज़ाना भर उसको अपनी ख़ुशी पर बर्बाद किया। शायद उस धन से लोगों को कितनी सुविधायें दी जा सकती थी। ये जो बुत , समाधियां बनाने का चलन है मैं इसको लोकतांत्रिक नहीं मानता , अभी भी सत्ताधारी खुद को देश का मालिक ही समझने लगते हैं। अन्यथा जिस देश की आधी जनता को दो वक़्त रोटी नहीं नसीब होती हो उस देश में मरने के बाद नेताओं की समाधियों पर धन कभी खर्च नहीं किया जाता। सोचो अगर वो नेता वास्तव में देश के और जनता के सेवक थे तो क्या उनको ऐसा किया जाना पसंद होता। काले धन की बात हो रही है , काला धन विदेशी बैंकों में ही नहीं है , नब्बे प्रतिशत देश में ही है ,उसको ढूंढने में उसपर अंकुश लगाने में कोई संधि बाधा नहीं है। क्या चाहती है सरकार रोक लगाना काले धन पर , मुश्किल नहीं है , एक कानून होना चाहिये हर नागरिक को बताना पड़े उसके पास क्या क्या है , घर ज़मीन , नकद , गहने या जो भी , और बिना घोषित कुछ भी हो उस को देश की संम्पति घोषित किया जाये। किसी को भी जितने भी चाहे घर खरीदने का अधिकार नहीं होना चाहिये ताकि जो बेघर हैं वही खरीद सकें। जो व्योपारी हैं उनको खेती की ज़मीन खरीदने का अधिकार किसलिये , काला धन सफ़ेद करने को। जब तक राजनेता खुद सादगी से नहीं रहते उनको गांधी का आलाप लगाने का कोई हक नहीं है। खुद को देश को जनता को धोखा देते रहे हैं नेता हमेशा , लेकिन कब तक। अभी भी भाजपा हो चाहे कोई दल सबका एक मात्र ध्येय सत्ता पाना ही है , और उसके लिये जो भी करना हो करते हैं। कुछ उसी तरह जैसे हम मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे बनाते जा रहे और जो वास्तविक धर्म है उसको समझना ही नहीं चाहते। लिखा बहुत जा सकता है मगर यहीं अंत करता हूं इस लेख का दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल के कुछ शेरों से।
   हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए ,
   इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
  सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं ,
  मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
  मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही ,
  हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।

Friday, 10 October 2014

सच हुए सपने ( कविता ) 107 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

सच हुए सपने ( कविता )
सपने तो सपने होते हैं ,
देखते हैं सभी सपने ,
मैंने भी देखे थे कुछ ,
प्यार वाले सपने ,
कोई अपना हो ,
हमराज़ भी हो ,
हमसफ़र भी हो ,
हमज़ुबां भी हो ,
चाहे पास हो ,
चाहे कहीं दूर हो ,
हो मगर दिल के ,
बहत ही करीब ,
जिसको पाकर ,
संवर जाये मेरा ,
बिगड़ा हुआ नसीब।
सब दुनिया वाले ,
यही कहते थे ,
किस दुनिया में ,
रहता हूं मैं अब तक ,
और किस दुनिया को ,
ढूंढता फिरता हूं ,
ऐसी दुनिया जहां ,
कोई स्वार्थ न हो ,
कोई बंधन न हो ,
और हो सच्चा प्यार ,
अपनापन , भरोसा ,
अटूट विश्वास इक दूजे पर।
मगर मेरा विश्वास ,
मेरा सपना सच किया है ,
तुमने ऐ दोस्त ऐ हमदम ,
जी उठा हूं जैसे फिर से ,
निकल कर जीवन की निराशाओं से ,
तैर रहा आशाओं के समंदर में ,
तुम्हारा हाथ थाम कर ,
मिलेगी अब ज़रूर ,
उस पार मेरी मंज़िल ,
इक सपनों का होगा ,
महल वहीं कहीं ,
जहां होगा अपना हर कोई ,
मुहब्बत वाला इक घर ,
जिसकी खिड़की दरवाज़े ,
दीवारें और छत भी ,
बने होंगे प्यार से ,
स्वर्ग सा सुंदर होगा ,
अपना छोटा सा आशियाना।

Sunday, 5 October 2014

रसीली ( कहानी , इक वेश्या की ) डा लोक सेतिया ( भाग दो )

                        ( अब आगे कहानी का दूसरा और अंतिम भाग )
वो रसीली ही थी , प्यार के रस से लबालब भरी हुई।  अपना नाम सार्थक करती थी , हमेशा हर किसी से मीठी मीठी बातें करना हंसना खिलखिलाना बचपन से सवभाव था उसका। घर का छोटा बड़ा सदस्य हो ,आस पास का कोई चाहे राह से गुज़रता कोई अनजान अजनबी सब से बिना झिझक बात करना हसी मज़ाक करना आदत थी रसीली की। सब का मन मोह लिया करती अपने भोले चेहरे निश्छल व्यवहार और सब के काम में साथ देने से। उसको नहीं पता चला कि कब उसने बचपन से किशोर अवस्था में और फिर जवानी में कदम रखा था। वो अभी भी वैसी ही थी , झूम कर किसी को गले लगा लेना , घुल मिल जाना सभी से बचपन जैसा ही था। घर के लोग चाहते थे उसको समझाना कि वो बच्ची नहीं रही अब और उसको हमउम्र लड़कों से थोड़ा दूरी रखनी चाहिये। रसीली नहीं समझ पाई थी कि अपने बचपन के दोस्तों से प्यार से मिलने , बात करने में बुराई क्या है। कोई उसको बिंदास कहता कोई नासमझ कोई बदचलन , मगर रसीली को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता था। वो मानती थी कि जब वो कुछ भी गलत नहीं करती तो कोई क्या सोचता है इससे क्या मतलब। रसीली की सहेलियां भी कहती थी उसको , तुझे लड़कों के साथ अकेले कहीं भी आने जाने में क्या डर नहीं लगता है। वो कहती मेरे अपने दोस्त ही तो हैं भला उनसे किस बात का डर। और तब उस अल्हड़पन की बाली उम्र में ही रसीली कब अपना दिल कमाल को दे बैठी उसको भी पता नहीं चला। एक हरदम खामोश रहने वाला अपने में मस्त खोया रहने वाला कमाल उसके दिल और दिमाग पर छा गया कुछ ही दिन की मुलाकातों में जाने कैसे। कुछ दिन छुट्टियां बिताने आया था पास किसी रिश्तेदार के घर में। जब कमाल को वापस जाना था अपने शहर को तब वो नई दोस्त बनी रसीली को मिलने आया था , बहुत उदास था। रसीली ने कहा था फिर कब आओगे कमाल यहां। वो बेहद निराशा भरे स्वर में बोला था , उसको नहीं मालूम कि अब कभी आ सकेगा भी या नहीं। उसकी इस बात से रसीली को जाने ऐसा क्या हुआ था जो उसने कह दिया था कमाल अगर तुम नहीं आओगे तो मैं जी नहीं सकूंगी तुम्हारे बिना अधिक दिनों तक , मर ही जाऊंगी। और फिर जो कुछ घटा वो कोई सपना ही था , कमाल का रसीली से शादी करने का वादा और रसीली का घर को छोड़ कमाल के साथ जाना उसके शहर में उसके घर।
                                    रसीली को अपने साथ लेकर जब कमाल अपने घर पहुंचा तब वहां हंगामा खड़ा हो गया , जैसे कोई भूचाल आ गया हो। एक चुपचाप हर बात पर जी हां कहने वाले बेटे से ऐसी अपेक्षा नहीं थी परिवार वालों को सपने में भी। कमाल को आदेश दिया गया कि रसीली को लेजाकर उसके घर छोड़ आये। लेकिन कमाल ने अपना घर ही छोड़ दिया था और रसीली का हाथ थाम इक कसम खाई थी कि अब चाहे सारा ज़माना सारी खुदाई भी उन दोनों के खिलाफ हो जाये वो हमेशा इक साथ ही रहेंगे। उन्होंने तय कर लिया था कि अब प्यार ही उनके लिए सब कुछ है , प्यार में जीना प्यार में मरना भी मंज़ूर है। बेशक लोग उनसे नफरत करें वो सब को प्यार का ही सबक सिखायेंगे उम्र भर। शायद किताबों कहानियों की तरह लोग भी बदल जायेंगे और उनसे प्यार करने लगेंगे। मगर किताबों और कहानियों के पात्र बदल जाते हैं वास्तविक जीवन में अक्सर ऐसा नहीं होता है। उन दोनों के लिये और विशेषकर रसीली के लिये अपनों की नफरत उसकी मौत भी कम नहीं कर सकी। रसीली को जब कमाल के घर में जगह नहीं मिली तब उसने प्रयास किया था अपने घर वालों से सहारा मिल जाये। रसीली ने अपनी इक सहेली को फोन किया था ताकि वो उसके परिवार वालों से पूछ सके कि अगर वो कमाल को लेकर आये वहां तो क्या उनको सवीकार करेंगे पति पत्नी के रूप में। शाम को सहेली ने बताया था कि जब वो रसीली के घर गई थी तब वो बातें कर रहे थे उन दोनों को तलाश करने और जान से मरने की। इसलिये उसने उनको ये पूछना ही उचित नहीं समझा और यही बताया कि वह तो रसीली से मिलने को आई थी और उसको रसीली की कोई जानकारी नहीं है। सहेली ने समझाया था तुम दोनों कहीं दूर चले जाओ और अपनी दुनिया वहां बसा लो जहां ये ज़ालिम नफरत करने वाले नहीं हों। रसीली और कमाल जैसे सपनों के आकाश से गिर कर दुनिया की पत्थरीली ज़मीन पर आ गये थे और उनको समझ नहीं आ रहा था प्यार करके ऐसा क्या गुनाह किया है उन लोगों ने। पूरा का पूरा समाज ही उनका दुश्मन क्यों बन गया है , क्या कोई जगह नहीं जहां प्यार करने वालों को शरण मिल सके। भटकते रहे बहुत दिन तक इधर उधर मगर नहीं मिली कोई भी जगह उनको रहने को। प्यार करने वाले दिल ज़िंदगी की जंग लड़ते रहे और दो वक़्त पेट भरना भी कठिन हो गया। न रहने को ठिकाना न पास कुछ भी पैसे , उस पर जहां किसी से सहायता मांगते , काम मांगते और कोई ठिकाना , हर जगह शिकारी वहशी दरिंदे ही मिलते। ये देख बहुत घबरा गये दोनों प्रेमी , मगर इक ज़िद ने ज़िंदा रखा कि अपने लिये नहीं अब साथी के लिये जीना है। ज़िंदगी की कशमकश में वे इक दूजे को प्यार करना तो भूल ही गये थे और बात बात पर आपस में उलझने लगे थे। ऐसे में हवस के भूखे भेड़ियों ने उनकी मज़बूरियों का फायदा उठा कर उनको अपनी राह पर चलने को विवश कर दिया था। बहुत जल्द इक प्रेम कहानी पाप कथा बन गई थी। समाज के एक शरीफ कहलाने वाले धनवान व्यक्ति  ने उनको दया करने का झांसा देकर ऐसा फंसाया कि उनको ऐसी बदनाम गलियों में पहुंचा दिया जहां से निकलने की कोई राह ही नहीं होती है। हर दिन पल पल ज़िंदगी की लड़ाई लड़ते लड़ते दोनों तंग आ गये थे और हार मान ली थी , अपने हालत को नियति स्वीकार कर लिया था। और ऐसे में वो दोनों नशे का शिकार हो गये थे। इक समाजसेवक ने शरण देकर उनका शोषण किया बहुत दिन तक , कमाल को कहीं अन्य जगह भेज काम से रसीली के साथ वो खुद और उसके साथी मिल कई दिन तक अनाचार करते रहे , जब ये सब कमाल ने देखा और विरोध किया तो उसको सज़ा दी गई अपाहिज बनाने की , उसको नपुंसक बना दिया गया। ऐसे इक प्रेमी अपनी ही प्रेमिका का सौदा करने वाला इक दलाल बना दिया गया। उनको इक बदनाम बस्ती में पहुंचा दिया कुछ शरीफ कहलाने वाले लोगों ने।
                          रसीली कभी भी बस्ती की बाकी औरतों जैसी नहीं बन पाई , उसका सवभाव तब भी सनेहपूर्ण ही रहा अपने पास आने वालों से प्रेम और अपनेपन से बातें करते उसके पास अपनी हवस मिटाने आये ग्राहक भी उसको चाहने लगते थे। उनको रसीली का जिस्म ही नहीं मिलता था और भी बहुत कुछ मिलता था जो बस्ती की दूसरी किसी औरत से नहीं मिलता था। एक पूरी तहर खुद को समर्पित करने वाली औरत जो उनसे उनके दुःख और परेशानियां भी जानना चाहती थी मित्र बन कर और उनसे सहानुभूति भी रखती थी। ऐसे में वो लोग भी रसीली के पास आकर रहने लगे जिनके पास उसको देने को पैसे नहीं भी होते थे। जीवन से निराश लोगों को अपनाना रसीली और कमाल की आदत बन गई थी , खाली पेट आते कई लोग तब उनको रसीली खुद खाना बना कर खिलाती थी और उनकी प्यास भी बुझाती थी , जिस बस्ती में सब कुछ पैसा हो वहां रसीली यूं रहती थी जैसे पैसे की कोई अहमियत ही नहीं हो। पैसा न होने से किसी को ठुकराया नहीं कभी रसीली ने , रसीली से सब को प्यार ही नहीं मीठे बोल भी मिलते थे और खाने को रोटी के साथ देसी शराब भी। जाने कितने लोग जिनको अपनों ने ठुकरा दिया था उनको रसीली की हमदर्दी ने फिर से जीना सीखा दिया था। प्यार रसीली के अंग अंग में उसके रोम रोम में बेशुमार भरा हुआ था।  हालात ने उसको वैश्या का नाम भले दे दिया था तब भी जिस्म बेचने वाली औरतों की तरह उसने पैसे को अपना सब कुछ नहीं समझा था। सब के प्यार की प्यास मिटा कर अपने और अपने साथी कमाल की पेट की भूख और बाकी ज़रूरतें पूरी करने का काम रसीली ने ऐसे किया उम्र भर जैसे कोई पूजा करता है , इबादत करता हो। वासना का कारोबार नहीं सीखा कभी भी रसीली ने , कमाल और रसीली ने कभी दुनिया वालों से कोई शिकायत नहीं की थी। मगर जब दोनों अकेले होते अपने घर में तब पूछा करते भगवान से ये सवाल कि उनको प्यार करने की ऐसी सज़ा क्यों मिली है। क्यों खुदा अपनी दुनिया में प्यार करने वालों की भी इक दुनिया बनाना भूल गया था।
      पिछले दो दिन से बस्ती गुमसुम सी है , सन्नाटा सा छाया हुआ है बस्ती में। जो बस्ती की औरतें ईर्ष्या किया करती थी रसीली से उनकी भी आंखे नम हैं चेहरे उदास हैं और घर में ग़म की गहरी छाया है। शायद उनको भी ख्याल आ रहा है कि किसी दिन उनका भी यही अंत होना है। पुलिस वाले चाहते थे किसी तरह कोई रसीली की लाश उनसे ले ले अंतिम संस्कार करने के लिये ताकि उनको रसीली का ये घर सील बंद नहीं करना पड़े और वे इसका कब्ज़ा किसी और जिस्म बेचने वाली औरत को देकर कुछ कमाई कर सकें। लगता है पापियों की बात भगवान भी जल्दी सुन लेता है , तभी तो पुलिस वाले अपनी गाड़ी में रसीली की लाश ले जाते उस से पहले ही इक अनजान व्यक्ति रसीली के घर के दरवाज़े पर आकर रुका था रिक्शा से उतरा था। जब उसको मालूम हुआ कि रसीली की मौत हो चुकी है तब वो फफक फफक कर रोने लगा था , पुलिस वालों को उसने बताया था कि जब भी इस शहर में आता है वो तब रसीली के घर ही मेहमान बन कर रुकता है। पिछली कई बार उसने रसीली को एक भी पैसा नहीं दिया था किसी काम के लिये भी , क्योंकि उसके पास थे ही नहीं तब देने को पैसे। आज ढेर सारे पैसे साथ लाया था ये सोचकर कि उसका सारा क़र्ज़ उतार देगा। जब पुलिस वालों ने बताया कि रसीली की देह को लेने को कोई उसका अपना तैयार नहीं है और अब उसका दाह संस्कार लावारिस घोषित कर उनको ही करना है तब उसने पुलिस वालों से पूछा था कि क्या वो उसका अपना बन उसकी लाश को ले जा सकता है ताकि रसीली का अंतिम संस्कार कर सके। पुलिस वाले कब से यही चाहते ही थे , उस व्यक्ति से कुछ कागज़ों पर लिखवा लिया है कि वो रसीली का मित्र है और उसकी लाश ले जाकर क्रियाकर्म करना चाहता है। शमशान भूमि का वाहन आ गया है और वो अकेला रसीली का शव लेकर जा रहा है , बस्ती वालों के साथ पुलिस वालों की भी आँखे नम हैं ये देख कर कि कोई है जो रसीली के प्यार की कीमत समझता है और उसका क़र्ज़ चुकाने आया है , चाहे रसीली की मौत के बाद ही।
   ( रसीली की ये कहानी यहां समाप्त होती है , मगर शायद मैं रसीली की सही छवि अभी भी नहीं बना पाया हूँ। तभी ये वास्तविक कहानी किसी पत्र पत्रिका ने छापना स्वीकार नहीं किया। यहां मुझे इक इंग्लैंड के मनोचिक्सक की याद आती है , उसने ये प्रचार कर रखा था कि जो भी कोई ख़ुदकुशी करना चाहता हो वो मरने से पहले एक बार उसको ज़रूर आकर मिले। लोग आते हर दिन और वो सब को ये मनाने को सफल हो जाता कि उनके पास अभी जीने की वजह है। मगर इक दिन वो ऐसा नहीं कर पाया और उसने इक व्यक्ति को ये कह दिया कि मैं भी आपको नहीं समझा सकता कि आपको क्यों जीना चाहिये। अब उस को मरना ही था ये सोच कर निकला तो उन मनोचिकित्स्क की सहायक जो केबिन के बाहर बैठी ये सब सुन रही थी , ने उसको रोक कर पूछा आप क्या करने जा रहे हो , जब उसने ख़ुदकुशी करने की बात कही तब उस सहायक ने पूछा था क्या आप मेरे साथ चल कर एक कप कॉफी पी सकते हैं मरने से पहले , वो मान गया था। तब थोड़ी ही देर में उसको अपना मित्र बना उस सहायक ने उसका ख़ुदकुशी का इरादा बदलवा दिया था। आज भी उस सहायक के नाम इक संस्था है जो निराश लोगों में जीवन की आशा जगाती है। दिल्ली में भी उसकी एक शाखा है सफदरजंग हवाई अड्डे के पास , बहुत साल पहले उसके लिये काम किया है मैंने। रसीली ने शायद कुछ ऐसा ही किया था उम्र भर। हो सके तो आप भी उसको समझना। )

Thursday, 2 October 2014

कब होंगे सब लोग समान , मोदी जी ? ( आलेख ) डा लोक सेतिया

आज बहुत दिन बाद कुछ कहने लगा हूं जो शायद कितनी बार दोहरा चुका हूं। ठीक वैसे जैसे कल गांधी जी के जन्म दिवस पर जो हुआ वो जाने कितनी बार पहले भी हुआ है , होता रहेगा। ये इक तमाशा सा लगता है , बहुत सारे साफ सुथरे लोग , शानदार झाड़ू , बैनर , मीडिया का जमावड़ा , लाइव टेलीकास्ट , भाषण। कितना पैसा बर्बाद किया गया आडंबर पर इस गरीब देश का। बहुत पहले किसी विदेशी अर्थशास्त्री ने लिखा था इंडियन एक्सप्रेस में कि भारत देश तब तक गरीबी से मुक्त नहीं हो सकता जब तक दिखावे पर झूठी शानो शौकत पर धन खर्च करना बंद नहीं किया जाता। यकीनन सफाई ऐसे नहीं की जा सकती , कितनी हैरानी की बात है कि मुझे इन सब बातों पर लिखते उम्र बीत गई है और वही लोग कल हाथ में झाड़ू पकड़ फोटो करवा रहे थे जो कहते हैं मुझे कोई दूसरा काम नहीं जो रोज़ आस पास सफाई के बारे पत्र लिखता रहता हूं। अगर मुझ सा आम आदमी कहे तो पागलपन और कोई ओहदे पर बैठा व्यक्ति वही कहे तो बहुत महान बात। मोबाईल पर संदेश मिला सफाई अभियान का भी उसी तरह जैसे मोदी जी की आवाज़ में वोट की अपील का। सत्ताशास्त्र व्यंग्य याद आ गया , इक तरफा संवाद करते हैं शासक। इन राजनैतिक दल वालों को कभी समझ नहीं आया कि मैं किस तरफ हूं। पत्रकार मित्र भी पूछते हैं , मैंने इक बार इक सांध्य दैनिक के ऑफिस के महूर्त पर यही कहा था , आप या तो जनता की तरफ हो सकते हैं या नेता अफसर और शासन की तरफ। ये सच कोई माने या नहीं माने मगर वास्तविकता यही है कि देश में चालीस सालों में पत्रकारिता का पतन हद से अधिक हुआ है , और ये पथ से भटके ही नहीं ये तो विपरीत दिशा को भाग रहे हैं। विज्ञापन प्रसार संख्या की दौड़ में अंधे हो चुके हैं। जनता हूं आज देश विदेश में प्रधान मंत्री मोदी जी की धूम है , और मेरी आदत है मैं किसी की इबादत नहीं करता चाहे कोई आदमी कितना ही बड़ा क्यों नहीं हो। इक बार महेश भट्ट जी का साक्षात्कार देखा था टीवी पर , उन्होंने इक बात कही थी कि हम गुलामी की मानसिकता वाले लोग हैं , हमें चाहिये कोई न कोई परस्तिश को। कभी अमिताभ कभी सचिन कभी कोई और। मगर बार बार ये भरम टूटता है , किसी शायर का इक शेर है "तो इस तलाश का अंजाम भी वही निकला , मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला"।
                          इसलिये कहना चाहता हूँ कि चाहे कोई भी हो अंध भक्ति नहीं करना  , खुद भगवान से भी सवाल पूछना कभी मिल सके कहीं गर। भारतीय जनता पार्टी क्या कहती है , मोदी जी क्या कहते हैं , इतना काफी नहीं है। वो क्या करते हैं ये देखना ज़रूरी है। आज जिनको टिकट देकर खड़ा किया है भाजपा ने कौन हैं वो , कल तक उसी दल में तो नहीं थे जिनको गुंडा राज का दोष दे रहे या जिन पर घोटालों पर घोटालों के आरोप हैं जब सत्ता में था उनका दल। दलबदलू नैया पर नहीं किया करते बीच मझधार डुबोते हैं। गटर का पानी मिलता रहेगा तो गंगा को गटर ही बना लोगे। बहुत वादे किये हैं , मुश्किल काम है देश से भूख गरीबी और छोटे बड़े का अंतर मिटाना जो कैसे होगा शायद मोदी जी भी नहीं जानते। चलो आखिर में अपनी पहली कविता सुनाता हूं , जो कल भी सच थी , आज भी सच है।
पढ़ कर रोज़ खबर कोई ,
मन फिर हो जाता है उदास।
कब अन्याय का होगा अंत ,
न्याय की होगी पूरी आस।
कब ये थामेंगी गर्म हवायें ,
आयेगा जाने कब मधुमास।
कब होंगे सब लोग समान ,
आम हैं कुछ तो कुछ हैं ख़ास।
जिन को चुनकर ऊपर भेजा ,
फिर वो न आये हमारे पास।
सरकारों को बदल देखा ,
हमको न कोई आई रास।
बन गये चोरों और ठगों के ,
सत्ता के गलियारे दास।
कैसी आई ये आज़ादी ,
जनता काट रही बनवास।

Wednesday, 1 October 2014

ग़ज़ल 213 ( अब यही ज़िंदगी अब यही बंदगी ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

अब यही ज़िंदगी , अब यही बंदगी ,
प्यार की जब हमें भा गई बेखुदी।
आपके वास्ते ग़ज़ल कहने लगे ,
थी हमारी मगर हो गई आपकी।
इश्क़ करना नहीं जानते हम अभी ,
खुद सिखा दो तुम्हीं कुछ हमें आशिक़ी।
पास आओ करें बात भी प्यार की ,
छांव कर दो ज़रा खोल दो ज़ुल्फ़ भी।
वक़्त मिलने का तुम भूल जाना नहीं ,
रोज़ मिलते वही याद रखना घड़ी।
किस तरह हम कहें बात दिल की तुम्हें ,
आप सुनते कहां बात पूरी कभी।
जब से "तनहा" दिवाना हुआ आपका ,
भूल जाती उसे बात बाकी सभी।

Thursday, 25 September 2014

एक नीति कथा ( इंसाफ )

एक नीति कथा। न्याय। 
कोई राजा था जिसका न्याय बिलकुल सही माना जाता था। एक बार एक साथ तीन लोग एक ही अपराध करते हुए पकड़े गये और राजा की कचहरी में पेश किये गये। राजा ने तीनों को अलग अलग सज़ा दी , ये देख इक मंत्री को अचरज हुआ।  तब मंत्री की दुविधा को समझ राजा ने उसको अपने तीन आदमी उन तीनों के पीछे भेजने को आदेश दिया ताकि समझ सके कि किस पर उसको दी गई सज़ा का क्या असर होता है।
       तीनों का पीछा करने वालों ने वापस आकर बताया जो उनको नज़र आया था। पहले एक व्यक्ति को राजा ने केवल इतना ही कहा था "आपने भी ऐसा अपराध किया " और कोतवाल को उसको छोड़ने का आदेश दे दिया था। उसका पीछा करने वाले ने आकर बताया था कि उसने घर जाते ही खुद को फांसी पर लटका ख़ुदकुशी कर ली थी।
                 दूसरे व्यक्ति को राजा ने ये सज़ा सुनाई थी कि वो भरी सभा में खुद अपनी पगड़ी उतार घर जा सकता है। उसका पीछा करने वाले ने बताया था की वो शहर को छोड़ कहीं और चला गया है , खुद को अपमानित महसूस कर के।
                        तीसरे को सज़ा सुनाई गई थी कि कोतवाल उसका मुंह काला कर नगर में सात चक्कर लगवाये। उसका पीछा करने वाले ने बताया था कि जब उसको नगर में घुमाया जा रहा था तब नगर के लोगों में उसकी अपनी पत्नी भी तमाशा देखने में शामिल थी अपने घर के बाहर खड़ी होकर। जब उसका पांचवा चक्कर लगवा रहे थे तब उस व्यक्ति ने अपने घर के पास से गुज़रते हुए अपनी पत्नी से कहा था कि क्या यहां खड़ी तमाशा देख रही हो , बस दो चक्कर बाकी हैं पूरे करते घर आता हूं तुम जाकर मेरे लिये स्नान का पानी गर्म करो।
                          मंत्री समझ गया था राजा ने उचित निर्णय किया था।
( नीति कथाओं के लेखक कौन थे ये नहीं पता चलता क्योंकि ये सदियों से इक दूजे की ज़ुबानी सुनी और सुनाई जाती हैं शिक्षा देने को )

Sunday, 21 September 2014

रसीली ( कहानी इक वेश्या की ) डा लोक सेतिया ( भाग एक )

रसीली मर गई भूख से , जाने कितने दिन से भूखी थी रसीली। कोई नहीं जान सका कि वो किस तरह तड़प तड़प कर अपने छोटे से घर में मरी होगी अकेली। उसके मरने के बाद बस्ती के लोगों , कॉलोनी के धनवान लोगों , जो खुद को बड़ा दयालू समझते हैं , और पुलिस वालों ने देखा कि रसीली के घर अनाज का एक दाना तक नहीं था। उसके पर्स में इक पैसा तक नहीं मिला , खाली था। बस्ती वालों ने बताया कई दिन से उसके घर का चूल्हा जलता बहुत कम ही दिखाई दिया था। जब से उसके साथी कमाल , जो हमेशा उसके साथ रहा , का निधन हुआ , तब से रसीली के पास ग्राहक , उसके खरीदार कम ही नज़र आने लगे थे। रसीली की वो खनकती आवाज़ और कहकहों वाली हंसी सुनाई दी ही नहीं कमाल की मौत के बाद।  जाने ये कैसा सम्बन्ध था उनके बीच , कोई नाम नहीं था उनके नाते का। सारी रौनकें गम हो गई थी कमाल के जाने से और एक ख़ामोशी सी छा गई थी रसीली के घर में। रसीली हरदम गुमसुम सी रहने लगी थी , कहीं भी आती जाती नहीं थी , गली से गुज़रती तो लगता कोई लाश चली जा रही है। जाने कैसे अपने ही ख्यालों में खोई रहती थी , मगर तब भी उसकी आंखों में वही चमक थी , कुछ कहना चाहती थी दुनिया से रसीली की नज़रें। अब समझ सकता हूँ उन आँखों में कैसा दर्द था क्या संदेश था , वो बताना ज़रूरी हो गया है मेरे लिये। रसीली भले जिस्म फरोश थी , मगर उसके जीवन में कमाल को छोड़ कोई दूसरा कभी नहीं आ सका था। किसी को साथी बनाना तो क्या अपने पास तक नहीं आने दिया उनको जो चाहते थे उसके प्यार बेचने के कारोबार में सहयोगी बनना। रसीली की ज़िंदगी में कमाल की जगह दूसरा कोई ले भी नहीं सकता था , कोई नहीं समझ सकता था कि रसीली वैश्या का कारोबार करने वाली बाकी औरतों जैसी नहीं थी। वो तो सब को हमेशा खुशियां बांटती रहती थी , प्यार  देती थी बेशुमार जो किसी की प्यास बुझा देता था। कमाल के बाद ग्राहक आते भी कैसे , बिना दलाल के ग्राहक मिलते कहां हैं , जो भी बस्ती में आता जिस्म बेचने वाली बाकी औरतों के दलाल खड़े रहते थे पटाने को।
                            शहर की सब से पॉश कॉलोनी के ठीक सामने ये बदनाम बस्ती कॉलोनी के आबाद होने से भी पहले की बसी हुई है। खाली सरकारी भूमि पर अपना सर छुपाने को अपने हाथों से बनाये थे अपने अपने घर रसीली जैसी औरतों ने। कब्ज़ा कर बनाई ये बस्ती बदनाम है अवैध कामों के लिये , कॉलोनी वालों ने कितनी बार प्रयास किया बस्ती को हटवाने का मगर सफल नहीं हो सके। ये माना जाता है कि जब भी बस्ती को हटाने की कोशिश होती , वैश्यावृति करने वाली औरतें इसको बचा लेती , नेता , अफ्सर , पुलिस वालों का बिस्तर गर्म करके। हर दिन इक दूजे से लड़ने झगड़ने वाली सब इक साथ खड़ी हो जाती ऐसे में। पापी पेट का सवाल जो आ जाता था , मगर तब भी रसीली अपनी ज़िद पर कायम रहती थी , किसी की रातें रंगीन करने कभी किसी के घर , होटल या फार्म हॉउस नहीं जाती थी। उसका कहना था जिसको उसकी ज़रूरत है वो बेझिझक चला आये उसके घर का दरवाज़ा खुला रहता है सब के लिये। जिसको डर लगता हो , शर्म आती हो , या जिसको ये बुरा काम लगता हो वो रहे अपने घर में। रसीली जो भी करती थी उसको उसमें कोई झिझक नहीं थी , कोई ग्लानि या अपराधबोध नहीं था। अपना बदन है जो चाहे करे किसी को कोई ज़बरदस्ती थोड़ा बुलाती है। वो ये गीत हमेशा गुनगुनाया करती थी "प्यार बांटते चलो -प्यार बांटते चलो।
                                      रसीली और कमाल ने ज़िंदगी में इतनी ठोकरें खाई थी कि अब उनको किसी भी मुसीबत से कोई डर नहीं लगता था , उन्होंने कभी भी ये चिंता नहीं की कि अगर बस्ती उजड़ गई तो क्या होगा उनका। जब दूसरे बस्ती वाले घबरा रहे होते थे तब भी रसीली सब को हौसला देती , खिलखिला कर मस्ती भरी बातें किया करती। जिंदादिल थी रसीली। सब से प्यार और अपनेपन से बात करती थी वो। कुछ सालों से वो बिमार सी , मुरझाई सी लगती थी , तब भी उसके घर रौनकें लगी रहती , ठहाकों की आवाज़ गूंजती रहती। कमाल दिन भर उसके लिये ग्रहक ढूंढ कर लाता रहता , वो बहुत आसानी से पहचान लेता था कि कौन अपनी हवस मिटाना चाहता है और उससे बात कर ले आता था रसीली के घर। जो एक बार रसीली के घर आता वो बार बार आता ही रहता ,रसीली की बातों उसके अपनेपन में कोई बाज़ारूपन नहीं होता था। बस्ती की बाकी औरतें अपने पास आने वालों से अखड़पन से बात किया करती थी और जैसे भी हो अधिक पैसा छीन लेना चाहती थी , मगर रसीली को ये पसंद नहीं था। उसने जिस्म भी बेचा मगर पूरी ईमानदारी से। उसका व्यवहार अपने ग्राहक से ऐसा रहता जैसा कोई महमान आया हो उसके घर। ये रसीली के घर ही हो सकता था कि जो भी आया हो उसको कमाल साथ शराब का जाम पेश करता अगर पीता हो और जब खुद खाना खाती तब रसीली ग्राहक को भी अपने हाथ से बना कर रोटी खिलाती। वहां वैश्या के घर जैसा माहौल नहीं था , ये हिसाब नहीं लगाती थी रसीली कि किसने क्या दिया क्या नहीं। धंधा अपनी जगह और घर आये लोगों से व्यवहार अपनी जगह। आने वालों को वो वैश्या का कोठा नहीं कोई घर लगता था जिसमें उन दो को छोड़ रोज़ नये सदस्य होते थे।  बस्ती वाली कई औरतों ने कमाल पर डोरे डालने का प्रयास भी किया कई बार उसको अपना दलाल बनाने को मगर उसकी ज़िंदगी में रसीली के सिवा किसी के लिये भी कोई जगह नहीं थी। बस्ती की बाकी औरतों का साथ देना तो दूर की बात , उनसे बात तक करना जुर्म था कमाल के लिये। रसीली को जब पता चलता किसी ने उसके कमाल पर डोरे डालने का प्रयास किया तो वो अपना सवभाव बदल कर चंडी का रूप बन जाती थी। सालों आमने सामने रहते बस्ती वाले और कॉलोनी वाले इक दूजे को अच्छी तरह पहचानते थे। बस्ती वाले कॉलोनी वालों को आते जाते सलाम साहब सलाम मेम साहिब कहते रहते मगर उनके कार्यों को जान कॉलोनी वाले उनसे नफरत करते थे। फिर भी जब कोई मेहनत मज़दूरी का काम होता तब बस्ती वाले कभी इनकार नहीं करते थे , मांगते तक नहीं थे अपनी मज़दूरी , जो कोई दे देता चुपचाप रख लेते। आज सोचता हूँ जिन बस्ती वालों का नाम तक नहीं जानते थे उनसे कॉलोनी वाले किसलिये नफरत करते थे।  कुछ भी बुरा उनके साथ नहीं किया था कभी बस्ती वालों ने। कितनी अजीब बात है कि कॉलोनी में बहुत लोग ऐसे रहते थे जो किसी को धोखा देने , अन्याय करने , अपने से कमज़ोर का अधिकार छीनने जैसे अनैतिक काम करते थे तब भी उनसे कोई नफरत का व्यवहार नहीं करता था। वैश्या तो जिस्म बेचती है ये लोग तो दीन ईमान तक बेचते हैं , क्या ये कम बुरे हैं। जैसे अपराधों का कॉलोनी वालों को भय था वो बस्ती वालों ने कभी किया ही नहीं था। खुद को सभ्य और उनको असभ्य मान कुछ लोगों ने बस्ती वालों को उन अपराधों की भी सज़ा दी जो किया ही नहीं था बस्ती में रहने वालों ने। आज अगर पुलिस का अधिकारी आकर कॉलोनी वालों से इस बारे बात न करता और रसीली के परिवार का सदस्य रसीली की ज़िंदगी की उसकी खुद की प्रेम कहानी सब को नहीं बताता तो किसी को पता ही नहीं चलता रसीली के जीवन की सच्चाई। रसीली ने जब कमाल की मौत की खबर उसके घर वालों को भेजी थी तब उसको नहीं पता था वो रसीली के साथ ऐसा भी करेंगे। कमाल के परिवार वाले आये थे , उसकी लाश को कैंटर में डाल कर ले गये थे। रसीली रोई थी गिड़गिड़ाई थी मगर उसको साथ नहीं जाने दिया था। तुम उसकी विवाहिता पत्नी नहीं हो , तुम्हारा न उसके साथ कोई रिश्ता है न ही हमारे साथ। दुनिया वाले कभी नहीं समझ सकते उनके बीच क्या रिश्ता था और कितना गहरा था। कमाल की मौत के बाद रसीली वो रसीली नहीं रह गई थी , पूरी तरह टूट गई थी बिखर गई थी। अकेली पड़ गई थी ,  और ऐसे बहुत समय जी नहीं सकती थी। अब सोचता हूँ जब भी वो सामने से गुज़रती थी उसकी आंखे क्या कहना चाहती थी सब लोगों से। हमने ये महसूस किया था कि कुछ बोलना चाहती हैं दो आंखें , मगर हमें वो भाषा समझना नहीं आता था और रसीली को वही भाषा ही आती थी। हम यूं कहने को इंसानियत के धर्म की बातें करते हैं मगर क्या कभी जाकर जाना है किसी का दुःख दर्द , पूछा किसी से कभी हाल उसका। बस्ती में जो रहते वो भी हैं तो इंसान ही ,  उनका उनकी मज़बूरी उनकी परेशानी किसी कॉलोनी वाले ने जानी , समझी। इसी कॉलोनी में रहते हैं वो भी जो समाज सेवक होने का दम  भरते हैं ,  कई महिलायें हैं जो महिला शक्ति और महिला उद्धार की बात किया करती हैं। उनको सब मालूम था उनके सामने की इस दलदल के बारे में , नहीं किया किसी ने प्रयास उनको इस दलदल से बाहर निकालने का। कॉलोनी वाले बचा हुआ खाना जानवरों को खिलाते हैं पुण्य समझ , कूड़ेदान में भी फैक देते हैं पर इन बस्ती वालों का पेट भरने को नहीं देते। कहते हैं ये गंदे हैं इनको पास नहीं रहने देना , एक बार दिया तो बार बार चले आयेंगे। ऐसे लोग क्या कभी समझ सकते हैं कि  कैसे अपना और अपने अपाहिज साथी कमाल का पेट भरने को रसीली ने अपना बदन वासना के भूखे भेड़ियों के सामने परोसा होगा। कितना दर्द    कितनी पीड़ा झेल विवश होकर।
           पुलिस वालों ने हम सबको ये बताया कि आपके सामने बस्ती में रहने वाली रसीली नाम की औरत की मौत दो दिन पहले ही हो चुकी है और कोई नहीं है जो उसकी लाश को ले कर अंतिम संस्कार कर सकता हो। दो दिन पहले बस्ती में रहने वालों ने रसीली के परिवार को और कमाल के घर वालों को फोन पर बताया तो जवाब मिला था उनका रसीली से कोई नाता नहीं रहा है , वो कब की मर चुकी है उनके लिये। आज जब बदबू होने लगी तब बस्ती वालों ने पुलिस थाने रपट दर्ज करवाई है कि कोई शव सड़ रहा दो दिन से बिना किसी देखभाल के। अब पुलिस को ही उसको लावारिस घोषित कर सब करना होगा , मगर उसके लिये आपको रसीली की पहचान कर कुछ कागज़ी करवाई में सहयोग देना होगा। पुलिस वाले सुन कर हैरान रह गये थे कि जो कब से उनके घरों के सामने रहती थी किसी कॉलोनी वाले को उसका नाम भी मालूम नहीं था। जानते भी कैसे जब वो उनसे बात करना तक पसंद नहीं करते थे। बस्ती वालों ने बताया था एक रिश्तेदार रहता है जो मिलने आता है कभी कभी रसीली से जब कोई मतलब होता है। पुलिस वाले खोज लाये थे उसको मगर उसने भी इनकार कर दिया रिश्ता निभाने से। हमने उसको कहा था कि जो भी बात रही हो वो तुम्हारी अपनी थी , मरने के बाद तो सब भूल कर उसका अंतिम संस्कार कर दो , हम तुम्हें आर्थिक मदद देने को तैयार हैं। हमारी बातों ने उसको विवश कर दिया था रसीली की ज़िंदगी की पूरी दास्तां सुनाने के लिये। बात कई साल पुरानी है।
     ( ये अभी आधी कहानी है , बाकी की आधी अगली पोस्ट पर जल्द ही , पढ़ना पूरी )

Thursday, 11 September 2014

जीवन की पहचान ( कविता ) 106 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कभी सोचा है ,
कभी जाना है ,
खुद को कब ,
पहचाना है।
ये टेड़ी सीधी ,
जीवन की राहें ,
जाती हैं किधर ,
किधर जाना है।
खुद को खिलाड़ी ,
समझने वालो ,
कोई खेल रहा है ,
और खेलते जाना है।
तकदीर का लिखा ,
न जनता कोई भी ,
लकीरें हैं पानी पे ,
बस उसको मिटाना है।
इक नाटक है ज़िंदगी ,
किरदार सभी इसमें ,
जब तक हैं पर्दे पर ,
किरदार निभाना है।
औरों से शिकवा ,
खुद से गिला करना ,
हासिल नहीं कुछ भी ,
झूठा ही बहाना है।
जीने का तरीका ,
केवल है इतना ही ,
खोना है खुद को जब ,
तब ही सब पाना है। 

Monday, 8 September 2014

सखी ( कहानी ) डा लोक सेतिया

सखी कहकर पुकारा था मैंने इक दिन किरन को। कुछ साल ही रहा हम दोनों का साथ। मगर मुझे मालूम था कि वो मुझसे कहीं ज़्यादा किसी और को चाहती थी वा सब से अधिक खुद को चाहती थी। खुद को चाहना बुरा भी नहीं होता है , भले कोई आपको प्यार करे न करे आप तो अपने आप से प्यार करो। मैं शायद किरन के लिये उन खिलौनो की तरह थी जिनसे वो खेला करती जब भी चाहती और जब मन भर जाये तब उनको छुपा कर अपनी अलमारी में रख देती थी। अपने खिलौनो से बहुत प्यार था किरन को , जाने क्यों उसको लगता था कोई उससे उसके खिलौने छीन लेगा। बस मुझपर विश्वास था कि मैं कभी उसके खिलौने नहीं छीन सकती , वो जानती थी मैं नहीं खेलती कभी भी खिलौनो के साथ। खिलौने क्या मुझे किसी के साथ भी खेलना पसंद नहीं था। मैं तो हमेशा खामोश रहती थी और जो भी कुछ कोई बोलता हो चुपचाप सुना करती थी। अकेले में यूं ही कुछ सोचती रहती और अपनी पसंद के गीत गुनगुनाती रहती थी। रेडियो पर रात दिन पुराने दर्द भरे गाने सुना करती और उन में खुद को महसूस किया करती थी। अक्सर किसी गीत को सुनते मेरी आंखे भर आती थी और मैं सब से छुप कर रोया करती थी। इक और पागलपन किया करती थी मैं , अपना रोता हुआ मुखड़ा दर्पण में देखती और उसको देख और भी अधिक रोना मुझे आ जाता था। मुझे याद है हॉस्टल में किरन के कमरे से बाहर निकल रही थी मैं और मेरी पसंद का गीत , दस्तक फिल्म का रेडियो पर आ गया था। हम हैं मताये कूचा ओ बाज़ार की तरह , उठती है हर निगाह खरीदार की तरह। वहीं बुत बनी खड़ी रह गई थी मैं , मेरी पलकें भर आई थी आंसुओं से , मुझे किरन ने पहली बार रोते हुए देखा था। हैरान थी , पूछने लगी क्या हुआ तुझे पगली , कुछ भी नहीं मैंने कहा था। जानती थी इक पागलपन था वो सपनों की दुनिया बना कर उसी में जीना , खो जाना। किरन जैसे कोई तितली जैसी थी , हमेशा उड़ती रहती इधर उधर , अभी यहां थी अब कहीं और पल भर में। सभी की दुलारी थी वो , बहुत प्यार करते थे सब उसको , हॉस्टल कॉलेज घर में हर जगह। मगर उसकी खुशनसीबी भी अधूरी थी , जिसको वो चाहती थी दिलोजान से वही किरन की ज़रा भी परवाह नहीं करता था। किरन को ये उसकी इक अदा लगती थी , शायद वो मान ही नहीं सकती थी कि कोई उसकी चाहत को भी ठुकरा सकता है। उसका साथ पाते वो सब को भूल जाती थी , भुला सकती थी। हम दोनों का नसीब एक सा था , मैं उसकी सखी थी , उसको अपनी सखी बनाना चाहती थी मगर उसको किसी दूसरे की सखी बनना पसंद था। कई बार मेरे मन में भी ये बात आती थी कि क्यों नहीं मैं किसी और को सहेली बना उससे घुल मिल कर रहती हूं। किया ये भी प्रयास मगर उसकी जगह किसी को नहीं रख सकी।
                     किरन की शादी की बात चल रही थी , उसको कोई लड़का पसंद ही नहीं आता था। मां बाप की लाड़ली बेटी को हमेशा मिलता जो रहा था अपनी पसंद का सभी कुछ। वो लोगों को भी कपड़ों और खिलोनो की तरह रंग और चमक देख पसंद करती थी। उसको देखने जब कभी कोई लड़का और उसका परिवार आता तो मुझे पास बुला लिया करती थी , थोड़ी दूरी पर ही तो मेरा घर। शायद मेरे होने से उसे अपने सुंदर होने का , अच्छे पहनावे का , सब से खुल कर बातचीत करने का आत्मविश्वास बढ़ जाता था। इसलिये कि मैं साधारण नज़र आने वाली हरदम चुप रहने वाली , हमेशा बहुत ही आम से कपड़े पहनने वाली लड़की थी। जाने क्या देख कर किरन को सूरज पसंद आ गया था , मैंने देखा वो शरमा रहा था किसी लड़की की तरह , उसने किरन से कोई सवाल नहीं पूछा था। जैसे सूरज हम दोनों को कनखियों से देख रहा था उससे लगता था किरन का जादू उसपर चल गया था। जब दोनों से पसंद है का सवाल किया गया और हां हो चुकी तब किरन उसको अपने कमरे में लाई थी , और सूरज को मुझसे मिलवाते हुए कहा था ये मेरी सब से प्यारी सखी है। मैं यही जाने कब से सुनना चाहती थी , वो पल मेरे लिये ऐसे था जैसे मुझे पूरी दुनिया ही मिल गई है। मैंने उसको भावावेश में गले लगा लिया था और चूम कर बोली थी मेरी जान हो मेरी सखी , दुआ करती तुम यूं ही खुश रहना। किरन का परिवार इस बात को लेकर खुश था कि उनकी लाड़ली यहीं इसी शहर में रहेगी , सूरज की नौकरी यहीं लगी थी। मुझे भी ख़ुशी थी कि मैं जब भी चाहूंगी मिल सकूंगी उससे। किरन और मैं हमेशा हर नई फिल्म इक साथ देखते थे , किरन की सगाई के बाद आनन्द फिल्म रिजीज़ हुई थी वा मैंने उसको सूरज के साथ प्रोग्राम बनाने को कहा था , उसने मुझे तीन टिकट मंगवा लेने को कहा था , और सूरज को साथ लाने की बात की थी। किरन को घर से अनुमति मिल गई थी सूरज और मेरे साथ सिनेमा जाने की। जाने क्यों किरन के होने वाले दूल्हे के साथ फिल्म देखने को लेकर मैं बेहद उत्साहित थी , मैं खुद जाकर तीन टिकेट एडवांस बुकिंग से ले आई थी। किरन की बात फोन पर सूरज से हो गई थी , सिनेमा हाल पहुंच कर किरन ने बताया था कि उनके पास बॉक्स की टिकट हैं और वो दोनों अकेले बैठ कर उसमें फिल्म देखना चाहते हैं। मैं अलग अकेली ड्रेस सर्कल में बैठ देख लूं , और बाकी दोनों टिकट किसी को बेच दूं। शायद मुझे खुद समझना चाहिये था कि मुझे कवाब में हड्डी नहीं बनना चाहिये। मगर मैं उसकी बात से बहुत नाराज़ हो गई थी और जब वो दोनों अंदर चले गये थे तब मैंने वो तीनों टिकट फाड़ कर फैंक दी थी। दूसरे दिन मैंने किरन से अपनी नाराज़गी जता भी दी थी , उसको इतना ही बोली थी कि जब तुमको अलग बैठ कर फिल्म देखनी थी तो मुझे नहीं बुलाना चाहिये था। वो जान गई थी मैं बिना फिल्म देखे ही लौट आई हूं। किरन ने कहा था कि सच में ये फिल्म तो दोस्त बनाने के विषय पर है और ये उसको सूरज के साथ नहीं मेरे साथ ही देखनी चाहिये थी। उसने मुझसे वादा किया था मुझे खुद साथ ले जा कर आनन्द फिल्म दिखायेगी , मगर हमेशा की तरह वो भूल गई थी मुझसे किया हुआ वादा। मैंने कई साल तक वो फिल्म नहीं देखी थी , जब टीवी पर घर में अकेले बैठ सालों बाद देखी तब आनंद से खुद को मिला कर सोचती रही , लेकिन मेरी किस्मत में कोई बाबू-मोशाय जैसा दोस्त कहां था।
               किरन की शादी हो गई थी , वह बहुत खुश थी। अपने मायके वाले घर जब भी आती , मुझे झट बुला पास लिया करती। मुझे हर बार अपने घर आने को कहती थी , मगर मुझे संकोच होता था बिना कारण कैसे जाऊं। एक दिन अपनी कसम दे गई थी कि ज़रूर उसका घर देखने आऊं। जब किरन ने पूछा कब आओगी तब मैंने यूं ही सरप्राइज देने की बात कह दी थी। और एक दिन यही सोच किरन के घर चली गई थी उसकी ख़ुशी की खातिर। बैल देने पर दरवाज़ा सूरज ने खोला था , आओ अंदर आओ कहकर मुझे घर में प्रवेश करवाया था।  मैंने किरन को बुलाने को कहा था तो सूरज ने बताया कि वो घर के बाकी लोगों के साथ बाज़ार तक गई है आती ही होगी। मैं उठ कर वापस जाने लगी तो सूरज ने रोक लिया था ये बोलकर कि पहली बार आई हैं अपनी सखी के घर बिना कुछ लिये नहीं जा सकती। मैंने कहा था दोबारा फिर आउंगी , तो सूरज ने कहा की आप कोल्ड ड्रिंक पियें इतने में शायद आ ही जाये किरन। मुझे कोल्ड ड्रिंक देकर सूरज अपनी और किरन की शादी की एलबम्ब दिखाने का बहाना बना मेरे करीब आकर बैठ गया था। उसने बार बार मुझे जानबूझकर छूने का प्रयास किया था तो मुझे डर लगने लगा था , मेरी धड़कने बढ़ गई थी और मैं भाग जाना चाहती थी। उठ कर चलने लगी तो सूरज ने मेरा हाथ पकड़ लिया था। उसकी आंखो में वासना देख मैं घबरा गई थी , मगर जाने कैसे साहस कर सूरज को बोली थी आपको ऐसा सोचते हुए भी शर्म आनी चाहिये थी , आपकी बीवी की सहेली आपके लिये बहन जैसी होनी चाहिये। और अपना हाथ छुड़ा बाहर चली गई थी। ये मेरे साथ कभी नहीं हुआ था , मेरा बदन गुस्से से कांप रहा था व ये बात मैं किसी को नहीं बता सकती थी , किरन को बता कर पति पत्नी के नये नये रिश्ते में दरार नहीं डाल सकती थी। मुझे किरन पर गुस्सा आ रहा था कि क्यों मुझे अपनी कसम दी थी बुलाने को , जबकि इसमें उसका कोई दोष नहीं था। दूसरे दिन किरन अपने मायके वाले घर आई हुई थी , मुझे संदेशा भेजा था आने को , इनकार कर दिया था मैंने। कुछ ही देर में वो खुद चली आई थी , मस्ती के मुड़ में थी , उसको नहीं बताया था सूरज ने कि मैं उसको मिलने गई थी उसके घर। मुझे तब लगा किरन को उसके पति की उस हरकत के बारे बताना ही चाहिये , और मैंने उसको सब बता दिया था। बेचैन सी हो गई थी किरन और उसका चेहरा तमतमाया हुआ था , अचानक उसको जाने क्या हुआ कि उसने मुझे कई थपड़ जड़ दिये थे , और बुरा भला कह कर चली गई थी। मैं सन्न रह गई थी , समझ नहीं पा रही थी कि उसको बताना सही था या गल्त। मगर ये सोच लिया था अब कभी मिलना नहीं होगा किरन से ज़िंदगी भर।
              लेकिन अगले ही दिन जब मुझे किरन के नर्वस ब्रेकडाउन होने और अस्पताल में दाखिल होने का पता चला तब मैं खुद को रोक नहीं पाई थी। मुझे देखते ही मुझसे लिपट कर फूट फूट कर रोते हुए अपनी गलती की माफी मांगने लगी , मुझे बिना बात थपड़ मारने की और शायद अपने पति की गलती की भी। मेरे मुंह से अचानक निकल गया था सब भूल जाओ तुम , छोड़ो उस के लिये खुद को दोषी न समझो। जब मैं निकल रही थी कमरे से तब सूरज आया था मेरे पास और बोला था आई एम वेरी सॉरी , मुझसे अपराध बहुत बड़ा हुआ है फिर भी मुझे कर सको तो अपनी प्यारी सखी के लिये माफ कर देना। मुझे कुछ भी कहना ज़रूरी नहीं लगा था। बहुत दिन तक उस एक घटना ने मुझे बेचैन रखा था , लाख कोशिश करके भी उसे भुला नहीं पा रही थी। मुझे दूर अपने शहर से महानगर में जॉब मिली तो शायद इस सब से बचने के लिये मैंने नौकरी कर ली थी। कुछ दिन में मैंने खुद को संभाल लिया था , अपने काम में रात दिन जुटी रहती थी। मुझे पहले भी तनहाई पसंद थी और उस एक घटना के बाद तो किसी से जान पहचान बढ़ाना अच्छा नहीं लगता था। मगर समय के साथ मैं परिपक्व होती गई थी और अब सब से बेझिझक बात कर सकती थी। वो भय मिट गया था कि कोई मुझसे बदतमीज़ी कर सकता है।
      कई सालों बाद अचानक एक दिन मुझे पत्र मिला अपनी सखी किरन का। सूरज को यहां सुपर स्पेशलिस्ट को दिखाना था , मुझे अस्पताल से डॉक्टर की अपॉइंटमेंट लेनी थी और किरन को सूचित करना था। फिर एक बार मुझे पुरानी घटना याद आ गई थी जिससे मेरी दिमाग की नसें तनाव महसूस कर रही थी। मगर किरन को मैं मना नहीं कर सकती थी कभी भी , अब जब वो किसी परेशानी में थी तब तो हर हाल में उसका साथ देना ज़रूरी था। डॉक्टर से समय लेकर सूचित कर दिया था मैंने। किरन और सूरज अपने दो बच्चों को लेकर जब आये थे तब लगा जैसे वो सब भुला चुके हैं , मुझे भी यही करना था तभी साथ रह सकते थे इक परिवार की तरह। उनको अपने दो कमरों के छोटे से घर में रखना थोड़ा मुश्किल तो था मगर सब समझते थे वक़्त की नज़ाकत को। सदा की तरह किरन जो भी मुझसे चाहिये पूरे अधिकार पूर्वक लेती थी , ये भी बातों बातों में बता दिया था कि सूरज की बिमारी पर बहुत पैसा खर्च होने से वो आर्थिक तंगी में है। ऐसे में उनसे स्वाभाविक ही मुझे सहानुभूति हो गई थी। मैंने किरन को कह दिया था कि मेरे पास जो भी राशि जमा है वो जब भी चाहे ले सकती है। कई महीने तक सूरज का ईलाज चलता रहा और जितना भी मुमकिन था मैं खुद ही अस्पताल और दवाओं का खर्च करती रही , लेकिन सूरज की दशा में कोई सुधार नहीं हो सका था। डाक्टरों ने सूरज के दोनों गुर्दे खराब होने की बात बताई थी और किसी अपने को सूरज को अपना एक गुर्दा देकर उसकी जान बचाने की सलाह दी थी। सूरज के परिवार के लोग अलग अलग रहते थे और कोई भी गुर्दा देने को तैयार नहीं हुआ था। किरन चाहती थी किसी भी तरह अपने पति की जान को बचाना मगर उसका गुर्दा सूरज से मैच नहीं हो सकता था। जाने क्यों मैंने अपना गुर्दा देने पर विचार ही नहीं किया था , मुझे ये सोच कर ही अजीब लगा था कि मैं अपने शरीर का कोई अंग उसको दे दूं जिसने मुझे बुरी भावना से छुआ था।
              किरन की उम्मीद टूट रही थी हर दिन , मुझे उसका बुझा बुझा सा चेहरा देख कर घबराहट होने लगती थी , सूरज अस्पताल में दाखिल था , बच्चों को दादा दादी ले गये थे।  मैं और किरन अकेली थी घर में। किरन ने तब मुझे अपने गुज़रे हुए जीवन के बारे बहुत बातें बताई थी। कैसे सब अपनों के होते भी वो अकेली थी। अब भी उसको भरोसा था केवल बचपन की इस सखी पर तभी सूरज को लेकर मेरे पास आई थी। मैंने तभी निर्णय ले लिया था कि अपनी सखी को निराश नहीं होने दूंगी , और अगले ही दिन डॉक्टर से बात कर मैंने अपने सभी टेस्ट करवा लिये थे। सूरज को मेरा गुर्दा मैच कर गया था , हम दोनों का सफल ऑपरेशन हो गया और सूरज को डॉक्टर्स ने पूरी तरह सवस्थ घोषित कर दिया था। कुछ दिन आराम करने के बाद जब वापस जाने लगे तब किरन और सूरज दोनों की आंखों में आंसू छलक आये थे , सूरज की पलकों से पश्चाताप के आंसू और किरन की आंखों से कृतिज्ञता के। मेरी भी आंखें भर आई थी सखी भाव से। जाते जाते सूरज ने कहा था कि क्या मुझे अपना भाई समझ सकती हैं , मैं आपको दीदी बुला सकता हूं। मैंने भी मन से इस पवित्र रिश्ते को स्वीकार कर लिया था और अब मुझे जल्द ही अपनी सखी ही नहीं अपने भाई के घर भी जाना है। 

Sunday, 31 August 2014

प्रेमियों के दिन कब बदलेंगे ( कहानी ) डा लोक सेतिया

कहानी सच्ची है केवल नाम बदले हुए हैं। शायद अभी अधूरी है कहानी। लगता है नई कहानी का भी वही पुराना अंजाम ही होगा। ललित कॉलेज में पढ़ता था कुछ साल पहले जब उसको किसी से इश्क हो गया। मिलते रहे दोनों हर शाम , जन्म जन्म तक साथ देने की बातें की आपस में। शिक्षा पूरी करने के बाद ललित ने बाज़ार में अपना गिफ्ट शॉप का कारोबार शुरू कर लिया और प्रेमिका को एक अच्छी सरकारी नौकरी मिल गई। शहर अलग अलग थे दोनों के कुछ किलोमीटर की दूरी थी। अपना कारोबार जमा लेने के बाद ललित मिला अपनी प्रेमिका से जाकर और शादी की बात की उसके साथ। सोच में पड़ गई प्रेमिका क्या करे। उसको इस बीच साथ  जॉब करने वाले सीनियर अधिकारी ने परपोज़ किया था मगर  उसने माता पिता से बात करने को कह दिया था। तब पंद्रह साल पहले सब के पास फोन नहीं था हर दिन सम्पर्क करने को। ललित की मां को जब ललित ने बताया कि उसको किसी से प्यार है तो इकलौते बेटे की खुशी को सब से अधिक महत्व देने वाली ममता भरी मां कैसे नहीं मानती। वो खुद ही चली गई थी रिश्ते की बात लेकर। सोच कर बताने को कहा गया था। सोचना क्या था , जब दोनों इक दूजे को पसंद कर चुके थे। मगर जब प्यार को दुनियादारी के तराज़ू में तोला जाता तब अंजाम यही होता है। प्रेमिका मान गई थी कि माता पिता ठीक  ही कहते हैं कि उसके लिये सरकारी जॉब वाला लड़का ही सही रहेगा। देखने में सुंदर नहीं तो क्या हुआ , और प्यार तो शादी के बाद हो ही जाता है। बीस साल की उम्र का प्यार तो नासमझी में हो जाता है। तब लड़की किसी बेल की जैसी होती है जो सहारा मिले उसी को लिपट जाती है। कोई जवाब नहीं मिला था ललित को न उसकी मां को , वो इंतज़ार करते रहे और पता चला कि उस प्रेमिका की चट मंगनी पट शादी हो गई। ललित ने कोई शिकायत नहीं की थी किसी से , मान लिया था कि प्यार में अपनी नहीं उसकी खुशी देखनी चाहिये जिसको चाहते हो। शायद उसके लिये वही ठीक होगा। मां को भी समझा लिया था कि ये बात कभी किसी को नहीं कहनी है। मां ललित के लिये लड़की , अपनी बहू की तलाश अधूरी छोड़ दुनिया को अलविदा कहने से पहले अपनी ननद को ये काम पूरा करने को कह गई थी।
        ललित को आंटी ने अपना दूसरा बेटा मान लिया था और उसका ध्यान रखने लगी , दो घर थे साथ साथ , बीच की दीवार हटा कर एक बड़ा घर बन गया। आंटी जॉब करती , अपने बेटे की शिक्षा पूरी करवाती रही और ललित को शादी करने को मनाती रही।  ललित को कोई भी पसंद ही नहीं आती थी , आंटी सेवानिवृत हो गई , उसके बेटे की शादी भी हो गई मगर ललित अभी तक कुंवारा ही था। चालीस की उम्र में उसकी पसंद की लड़की मिलना और भी कठिन हो गया। आंटी चाहती थी ललित की बहू आये उसका घर संभाल ले ताकि वो अपने बेटे और बहू के साथ दूसरे नगर में जाकर रह सके। आंटी की इक सहेली को उनकी बहू ने बताया अपनी दोस्त राधिका के बारे में जो उनके राज्य में सरकारी नौकरी करती है और जो बहुत ही सुशील है मगर उसकी शादी नहीं हो पा रही क्योंकि उसकी जन्मकुंडली ही नहीं मिलती जिस किसी को भी पसंद करती जब रिश्ते की बात होती माता पिता से। जब उसने आंटी के भतीजे ललित के बारे बताया तो उसने कहा कि लगता तो दोनों के लिए सही है हां ललित की उम्र सात साल ज़्यादा है जबकि राधिका अपनी उम्र से भी कम की नज़र आती है। उस सहेली ने राधिका की बड़ी बहन को फोन पर बताया था। वंदना अपनी बहन राधिका के लिये ललित को देखने आई थी , उसको पसंद आया था ललित बहुत , वो कुंडली भी साथ लेकर आई थी और इक फोटो भी राधिका का। पंडित जी को फोन पर सब जानकारी देकर वंदना ने कुंडली मिलवा ली थी , जो मिल गई थी। ललित को आंटी ने तैयार कर लिया था और वो गया था राधिका को देखने। दोनों दो घंटे मिले थे अकेले में और खुल कर हर बात की थी , जाने कैसे क्या हुआ कि दोनों को महसूस हुआ था कि यही तो है जिसकी मुझे तलाश है। ललित ने राधिका को कहा था कि अभी हम दोनों सब सोच लें और एक दो बार और मिलते हैं ताकि बाद में कोई बात दिल में नहीं रह जाये , राधिका मान गई थी। मिले थे दो बार , रविवार को ललित आता था मिलने घर से बाहर। कुछ ही दिन में उनको प्यार हो गया था इक दूजे से। घर पर बता दिया था दोनों ने कि हमको रिश्ता मंज़ूर है , लगा बात बन गई है , मगर जो हुआ वो हैरान करने वाला था। पिता को लगा की दूसरे राज्य के शहर विवाह किया तो बेटी की नौकरी का क्या होगा और उन्होंने ये कह दिया ललित की आंटी को कि रिश्ता केवल तभी हो सकता अगर ललित यहां आकर कारोबार करने को राज़ी हो। ये बात आंटी को बिल्कुल भी पसंद नहीं थी कि कोई लड़का ससुराल जाकर रहे।बात बीच में ही रह गई थी।
        मगर ललित को लगा कि एक बार राधिका से बात करनी चाहिये दोस्त बन कर। जब उसने राधिका से पूछा कि क्या कोई रास्ता नहीं है इस समस्या का हल निकालने का। साफ साफ बता दो आपके दिल में मेरे लिये क्या भावना है। राधिका का जवाब था कि ललित जी आपको क्या लगता है मेरे बारे पहले आप मुझे बताओ। ललित ने कहा मुझे आप बेहद पसंद हैं और मैं आपको अपना जीवनसाथी बनाना चाहता हूं। राधिका बोली थी ललित जी मुझे भी आप बहुत ही अच्छे लगते हैं और मुझे भी आपको जीवनसाथी बनाना है। सच कहूं तो मुझे लगता है मुझे प्यार हो गया है आपसे मगर समझ नहीं पा रही थी आपसे कैसे कहूं। आज लगा कि अगर नहीं कहा तो आप मुझे कभी मिल नहीं सकोगे। मुझे अपनी नौकरी की चिंता नहीं है मैं आपके लिये उसको छोड़ सकती हूं मगर अपने परिवार को कैसे समझाऊं मैं नहीं जानती। तब ललित ने कहा था राधिका जी मैं भी इन कुछ ही दिनों में आपको दिलोजान से प्यार करने लगा हूं और आपके लिये सब कुछ कर सकता हूं। मेरा कारबार दस साल पुराना है और स्थापित है फिर भी मैं अगर आप कहोगी तो उसको बंद कर आपके राज्य में किसी शहर में नया फिर से शुरू कर सकता हूं , लेकिन किसी शर्त को मान कर नहीं , आपकी ख़ुशी के लिये। मगर आपके इस शहर को छोड़कर , क्योंकि ऐसा मुझे अनुचित लगता है , आप जिस भी शहर में अपना तबादला करवा लगी मैं वहीं आपके लिये घर खरीद लूंगा। आप अपने मॉम डैड को मना लो। राधिका ने कहा कि आपकी बात सही है और अगर आप मेरे लिये ये सब करने को तैयार हैं तो मुझ से भाग्यशाली और कोई नहीं हो सकती , लेकिन आपको ऐसा करने को विवश करके मैं खुद अपनी ही नज़र में गिर जाऊंगी इसलिये ये बात मैं कभी नहीं होने दूंगी। मुझे आपसे कोई शर्त नहीं मनवानी है मॉम डैड की। शायद अब मेरे प्यार का भी इम्तिहान है और मेरा प्यार स्वार्थी नहीं है। मैं आज ही सब को बता दूंगी कि मुझे आपको छोड़ किसी से भी शादी नहीं करनी है और मुझे अपने इस राज्य में नौकरी नहीं करनी है। हम आपके शहर में दूसरी नौकरी तलाश कर लेंगे। राधिका और ललित ने तभी वंदना दीदी को ये निर्णय बता दिया था ताकि वो घर में बाकी सब को मना सके। ललित और राधिका ने तय कर लिया था कि चाहे जो भी हम दोनों अलग नहीं होंगे। हर रविवार बीच में इक शहर में मिलते रहेंगे , वही प्रेमियों का पुराना बहाना , सतसंग को जाना और प्यार से मिलना।
              ललित ने आंटी को बता दिया था कि राधिका और मैं प्यार करते हैं और हमने तय किया है कि राधिका अपनी जॉब छोड़ देगी और यहां नई जॉब ढूंढ लेंगे हम मिलकर। उधर वंदना ने जब घर पर बताया कि ललित और राधिका इक दूजे को चाहते हैं और ये भी कि राधिका अपनी नौकरी छोड़ने को तैयार है ललित की खातिर। पुरानी सोच के माता पिता ये सुन कर आग बबूला हो गये थे , उनको लगा कि बेटी उनकी मर्ज़ी के बिना शादी करने को कैसे तय कर सकती है। वो अपनी पुरानी बात पर अडिग थे कि रिश्ता तभी हो सकता है अगर ललित उनके शहर में आकर रहने को राज़ी हो। इस तरह बहुत बातें दो परिवारों में होने लगी इक दूजे को अपनी बात समझाने को। वंदना ने ललित की आंटी को कहा था कि आंटी बेशक ऐसा मुझे भी उचित नहीं प्रतीत होता तब भी अगर आप और हमारे मॉम डैड अपनी अपनी बात पर अड़े रहे तो ये दोनों चाह कर भी खुश नहीं रह सकेंगे। फोन पर ही बात हुई थी , आंटी ने कहा था कि उनका मकसद कोई ज़िद नहीं है केवल ललित और राधिका का भविष्य है। आज ललित की बहुत ही अच्छी आमदनी है , चलता हुआ पुराना कारोबार है , कल अगर नई जगह ईश्वर न करे नहीं चल पाया तो परेशानी उन्हीं को होगी। और राधिका को जॉब हम यहां भी दिलवा सकते हैं। मैं आपके मॉम डैड से बात करूंगी और उम्मीद है वो भी समझेंगे। आखिर बेटी को जाना ही होता है पति के घर , आप भी तो उनसे दूर रहती हो अपने पति के साथ। आंटी ने उसी दिन शाम को फोन किया था और राधिका के डैड को कहा था कि मेरे लिये राधिका मेरी बेटी है मैं उसको कोई परेशानी नहीं आने दूंगी , आप ये शर्त छोड़ कर मेरी झोली में डाल दो राधिका को। अब वो मेरी बेटी है। मगर राधिका के माता पिता नहीं माने थे। राधिका के पिता ने कहा था कि आप धर्म को मानने वाली महिला होने की बात करती हैं और किसी से उसकी बेटी ज़बरदस्ती छीन लेना चाहती हैं , क्या ऐसा करना आपको शोभा देता है। आंटी ने कहा था भाई साहब मैं तो दोनों बच्चों की ख़ुशी चाहती हूं तभी आपसे निवेदन किया है , विवश करने का तो सवाल ही नहीं और छीनना तो कदापि नहीं। आपसे ये मेरा वादा है कि मैं कभी आपकी मर्ज़ी के बिना राधिका की शादी ललित से नहीं करना चाहूंगी , उनको ऐसा कोई कदम उठाने को मैं नहीं कह सकती। और ललित अगर चाहे तो कहीं भी राधिका के संग रह सकता विवाह करके , मैं रोकूंगी नहीं उसको , लेकिन जब खुद राधिका ही अपनी जॉब छोड़ना चाहती है तब उसको इतनी तो आज़ादी मिलनी ही चाहिये। आप ठंडे मन से सोच कर फैसला करें यही आग्रह करती हूं।
                      बात वहीं रुक कर रह गई थी , मगर ललित और राधिका हर रविवार मिलते रहे। शायद दोनों ने इसको नियति मान लिया था कि चाह कर भी वो एक नहीं हो सकते थे। फोन पर बात होती रहती थी ये बात ललित की आंटी भी जानती थी और राधिका के मॉम डैड और बड़ी बहन वंदना भी। और इस बीच इक घटना हुई या फिर इक इतेफाक कि जब शाम को राधिका को उसकी ट्रैन पर चड़ा कर ललित बसस्टैंड पहुंचा तब बस निकल चुकी थी उसके शहर जाने वाली , और वो सड़क पर किसी अन्य वाहन की राह देख रहा था। तभी एक कार रुकी थी और उसका मालिक चाय पीने लगा था स्टॉल पर , ललित ने जाकर उनसे पूछा था , अंकल जी आपको किधर जाना है।  मेरी आखिरी बस छूट गई है और मुझे अपने अमुक शहर जाना है , क्या आप मुझे लिफ्ट दे सकते अगर उसी तरफ जाना है। और वो मान गये थे , बताया था कि उनको जिस शहर तक जाना है वहां तक चल सकते और वहां से बस चौबीस घंटे मिलती भी है। रस्ते में इक दूजे को बताया दोनों ने अपना अपना परिचय। वो इक कहानीकार हैं और ललित उनके नाम से परिचित भी था इसलिये उनसे मिलकर ख़ुशी हुई उसको। इस बीच राधिका का फोन आया था , बताने को कि वो घर पहुंच चुकी है , ललित कहां तक पहुंचा है पूछना चाहती थी।  ऐसे में नेटवर्क चला गया और बात बीच में कट गई थी , कार चला रहे व्यक्ति ने पूछा क्या आपकी पत्नी का फोन था , अगर आपके फोन का नेटवर्क नहीं है तो मेरा उपयोग कर सकते हो। नहीं , वो मेरी प्रेमिका है हमारी दोनों की शादी हुई नहीं अभी तलक , मगर शुक्रिया आपका फोन उपयोग नहीं कर सकता न ही ज़रूरत है।  उनको ललित की साफगोई अच्छी लगी थी , उन्होंने कहा था बेटे मुझे आपकी निजि ज़िंदगी से कोई मतलब नहीं है मगर इतना अवश्य समझाना चाहता हूं कि जीवन में सच्चा प्यार पाने को सब कुछ करना चाहिये। ये इसलिये कहता हूं क्योंकि मुझे भी जवानी में किसी से प्यार हुआ था लेकिन मैंने उसका इज़हार तक नहीं किया था इस डर से कि वो इनकार कर देगी। बेशक मैं खुश हूं मेरी शादी हो चुकी है , बीवी अच्छी है , बच्चे हैं जो प्यारे हैं तब भी कभी कभी सोचता हूं कि मुझे उसको न केवल बताना चाहिये था कि मुझे उस से प्यार है बल्कि हर कोशिश करनी चाहिये थी। मैं नहीं जनता मेरी प्रेम कहानी का अंजाम क्या होता , और ये बात मेरी कहानियों में भी झलकती है अक्सर। मगर तुम अपनी प्रेम कहानी को सही अंजाम तक ज़रूर ले जाना। ललित ने कहा था अंकल आपसे मिलकर बेहद अच्छा लगा है , और मैं आपकी बात याद रखूंगा। शायद कभी आप हम दोनों की प्रेम कहानी भी पाठकों तक पहुंचा दो और लोग जान सकें कि आज भी ऐसा प्यार कोई किसी को करता है। अंकल बोले थे आप दोनों बताओगे और मुझे अनुमति दोगे तो ज़रूर लिखने की कोशिश करूंगा , लेकिन ऐसा तभी हो सकता है अगर मुझे सब की हर बात की सही जानकारी हो। ललित ने कहा था कि अपनी प्रेमिका से पूछ कर बतायेगा , सम्पर्क नंबर ले लिया था , उनको दे भी दिया था।
             उन अंकल ने ही फेसबुक की बात भी की थी और बताया था कि बहुत लोग उसपर ही पहचान करते हैं दोस्त बनते हैं। मगर सावधान भी रहना सब सच नहीं होता है , आजकल झूठ बहुत है। जाने क्या सोचकर ललित ने उस दिन अपना फेसबुक अकाउंट शुरू किया था और कुछ अजनबी लोगों को दोस्त बना लिया था। उन्हीं में इक महिला भी थी आशा रानी , उनसे चैट पर बात करते ललित ने अपनी बात बता दी थी। राधिका भी चाहती है और ललित भी तो कोई दूसरा कैसे रोक सकता है आशा जी को ये समझ नहीं आया था , भाग कर शादी कर लेने की सलाह दी थी उन्होंने ललित को। ललित ने अपनी उलझन बताई थी कि अगर मेरी आंटी नहीं चाहती , राधिका के मॉम डैड नहीं चाहते , यहां तक कि जिसने ये सब शुरू किया वो राधिका की बड़ी दीदी भी नहीं पसंद करती वो कैसे सही हो सकता है।   क्या हम अपने प्यार में इतने स्वार्थी हो जायें कि बाकी सभी की भावनाओं की परवाह ही नहीं करें। ललित ने राधिका को भी फेसबुक पर आशा रानी से दोस्ती कर सलाह करने को कहा था , राधिका ने ललित की बात मान ली थी मगर ये भी विचार प्रकट कर दिया था की यूं किसी की बात को बिना समझे नहीं मानेंगे हम दोनों।  जब जो वर्षों से हमें जानते हैं वो भी नहीं समझते कि हमारी भलाई किस में है तो ऐसे फेसबुक की पहचान के लोग कुछ ही दिन में क्या समझ सकते हैं।
           राधिका की बड़ी दीदी ज्योतिष पर यकीन रखती है , उनके पंडित जी ने ललित और राधिका की जन्म पत्री देख कर बताया है कि अभी उन दोनों के दिन ठीक नहीं हैं , जल्द ही अच्छे दिन आने वाले हैं। उन्होंने कोई पूजा करने को भी कहा है और पूजा को बुलाया है वंदना दीदी ने उनको। शायद अब भगवान ही उनको राह दिखा सकता है। दो प्रेमी इंतज़ार कर रहे उनके अच्छे दिन जाने कब आयेंगे। देश में अच्छे दिन आने का शोर बहुत था , मालूम नहीं किस किस को नसीब होते हैं अच्छे दिन।  मित्रो उनके लिये अपने अपने देवी देवता से प्रार्थना करना , शायद कोई दुआ कबूल हो जाये। आमीन।      

Wednesday, 20 August 2014

कौन बनेगा करोड़पति में पूछे जाने चाहिएं ये सवाल ( तरकश ) डा लोक सेतिया

" बिका ज़मीर कितने में हिसाब क्यों नहीं देते ,
  सवाल पूछने वाले जवाब क्यों नहीं देते। "
मेरी ग़ज़ल का मतला है। अब क्या बतायें कि किन लोगों के बारे सोच कर लिखा था। सब जानते हैं अब सब से अधिक सवाल कौन पूछते हैं। हर किसी से पूछते हैं कटघरे में खड़ा करके। मगर सब को आईना दिखलाने वाले खुद को नहीं देखते कभी। कभी माना जाता था कि जो बिक गया वो खरीदार नहीं हो सकता , मगर अब वही खरीदार हैं जो खुद बिक चुके हैं। इधर फिर से कौन बनेगा करोड़पति का खेल शुरू हो चुका है जिसमें सदी का महानायक और मीडिया द्वारा घोषित भगवान चौदह प्रश्न पूछ कर आपको सात करोड़ जीतने का अवसर देता है। मगर कभी किसी ने उनसे नहीं पूछा कि आप कैसे धनवान बने हैं। ये तथाकथित भगवान इतना भी नहीं जनता कि वो खुद क्या है , अभिनेता है या झूठे विज्ञापन करने वाला इक चालाक कारोबारी है जिसके लिये पैसा ही खुदा है। या फिर वो छलिया है जो अपनी मधुर वाणी से ठगता है। या जैसा उसने लोनावाला में बीस एकड़ भूमि खरीदने के लिये शपथपत्र दिया था कि वो इक किसान है। और उसको साबित करने के लिये किसी ज़माने में मित्र रहे नेता के सहयोग से उत्तर प्रदेश में जालसाज़ी कर के प्रमाण एकत्र किये थे। मगर इस महानायक कहलाने वाले का एक चेहरा और भी है , कभी ये लिखता है अपने ब्लॉग पर कि उसकी ईश्वर से ईमेल पर बात होती है। जनाब अगर थोड़ी सी मेहरबानी कर सब को भगवान का ईमेल ही दे दें तो सब लोग अपनी समस्या सीधे ईश्वर को लिख कर भेज सकें। क्या हम उसको झूठा कह सकते हैं जिसको लोग भगवान का दर्जा देते हों। हां इस बात की हैरानी ज़रूर है कि इस कलयुगी भगवान की धन हवस बढ़ती ही जा रही है , और धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि जिसके पास सब कुछ हो फिर भी और पाने की चाह हो वो सब से दरिद्र होता है। अब ऐसा मनुष्य किसी को क्या दे सकता है। इक टीवी शो आया था जिसमें सच बोलने पर इनाम दिया जाता था , मगर वो सच बहुत कड़वा होता था। महाकरोड़पति के खेल में एक दिन इस कार्यक्रम पर ऐसे ही सवाल हों और उनका जवाब वही दे जो अब तक बाकी लोगों से सवाल पूछता है। ये सच बताया जाये कि आज तक इस खेल से कितने लोगों को कितना धन मिला है और उस से कितने गुणा इनको मिला है और कितने हज़ार गुणा चैनेल को मिला है। ये भी कि ये पैसा आया किसको उल्लू बना कर है , यूं भी उल्लू बनाने की बात का विज्ञापन करने वाले भी प्रयोजक हैं इनके खेल में। जाने कैसी राह दिखाना चाहते हैं ये लोग , क्या ऐसे ही गरीबी दूर हो सकती है सब की , बेशक इनकी होती है मगर अभी और कितना चाहिये इनको। ये अपनी तरह का ढंग है लोगों से छीनने का एस एम एस का जाल बिछा कर। अंत में किसी शायर के चंद शेर इनके नाम।
  " इस कदर कोई बड़ा हो हमें मंज़ूर नहीं ,
   कोई बन्दों में खुदा हो हमें मंज़ूर नहीं।
   रौशनी छीन के घर घर से चिरागों की अगर ,
  चांद बस्ती में उगा हो हमें मंज़ूर नहीं।
 मुस्कुराते हुए कलियों को मसलते जाना ,
 आपकी एक अदा हो हमें मंज़ूर नहीं। "
( पत्र पत्रिका वाले अगर चाहें तो इसको प्रकाशित कर सकते हैं , मगर पूरा और साभार )

Thursday, 7 August 2014

काठ की हंडिया कब तक चढ़ती रहेगी ( तरकश ) डा लोक सेतिया

इक नायक है देश का दूसरा सदी का महानायक कहलाता है। नायक अच्छे दिन लाने वाला है महानायक सब को करोड़पति बनाना चाहता है। दोनों की जोड़ी खूब है जय-वीरू की जोड़ी की तरह। अब देश में सब कुछ सही हो जायेगा। नायक जो मांगता था उसको वो मिल गया है लोकसभा में पूर्ण बहुमत। महानायक के पास तो पहले से सभी कुछ है , कुछ लोगों ने उसको भगवान तक घोषित कर रखा है। नायक कभी चाय बेचता था , खुद गरीब रहा है , उसको पता है भूख-बेबसी क्या होती है। ये महानायक भी बहुत फिल्मों में गरीबों का हितेषी वाला किरदार बखूबी निभा चुका है। आनंद फिल्म में बाबू-मोशाय इक डॉक्टर है जो जानता है कि देश में गरीबी है भूख है कुपोषण है। ऐसे ही किरदार निभाते निभाते महानायक उस जगह जा पहुंचा है जहां उसको कुछ मिंट का विज्ञापन करने के लिये ही करोड़ों मिलते हैं। पहले भी कई बार वो लोगों को करोड़पति बनने का सपना बेच चुका है। वो बताता है कि एसएमएस करो अपनी तकदीर बदलने के लिये , कुछ आसान से सवालों का जवाब ही तो देना है। पिछली बार उसने दावा किया था बहुत लोगों की तकदीर बदलने का। हर सवाल के बाद पूछता था हॉट सीट पर बैठे व्यक्ति से कि ये रकम उसके लिये क्या मायने रखती है। लगता था गरीबी का उपहास उड़ा रहा हो , दिखलाता था मानो दानवीर है और भीख दे रहा है। प्रतिभागी लोगों ने उनसे कई बातें पूछी हैं केवल यही नहीं पूछा कि इस केबीसी का सच क्या है। इसने किसको कितना अमीर बनाया है और किस किस से कितना लूटा है सपनों का जाल बिछा कर। मगर क्या किया जाये इधर परोपकार ऐसे ही किया जाता है , जितना देते हैं या देने का दावा करते हैं उस से कई गुणा खुद अपनी जेब में आ जाता है। सब से बड़ा कारोबार है अब समाज सेवा भी। अगर इस बार केबीसी में कोई एपीसोड इसको लेकर हो कि अब तक वहां कितने लोगों को करोड़पति बनाया गया है , लोग कितनी राशि जीत कर ले गये हैं और उस से कितने हज़ार गुणा कौन मुनाफा कमा गया है। इक वो भी थे जो कहते थे कि " देनहार कोऊ और है देत रहत दिन रैन , लोग भरम मोपे करें याते नीचे नैन " और इक ये हैं जो लोगों से छीन कर बहुत धन बहुत चालों से , उसमें से नाम मात्र का देकर दानवीर कहलाते हैं। और वो जो अच्छे दिन लाने की बात करते थे अब राजसी जीवन जी रहे हैं , उनका पूरा ध्यान अपना वर्चस्व बनाये रखने पर है।  जनता के पैसे से वो भी खूब मनमानी करने लगे हैं , ये भुला कर कि लोग किस दशा में हैं। लगता है उन्होंने ने भी देश की जनता की समस्यायें भगवान भरोसे छोड़ दी हैं , गरीबों की अब कोई बात नहीं की जाती। वही दलगत राजनीति , वही वोटों का गणित , वही अपनी सत्ता का विस्तार प्रमुख बन गये हैं। सत्ता मिलते ही चाय बेचने वाला जनता का धन उपयोग कर राजसी पूजा में शामिल होकर करोड़ रुपये की चंदन की लकड़ी दान कर आता है बिना सोचे कि उसको इस धन की रखवाली करनी है , ये उसकी विरासत नहीं है जिसको दिल खोल कर लुटा सके। ये कोई धर्म नहीं है। नायक के भाषण में और महानायक की बातों में अच्छी लगने वाली बातें क्या सच में अच्छी हैं या झूठ और छल को किसी आवरण से ढक दिया गया है। जो भी हो संसद में वही जंग जारी है , काठ की तलवारों वाली।