Monday, 22 April 2013

मिल के आये अभी ज़िंदगी से ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 मिल के आये अभी ज़िंदगी से ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

मिल के आये अभी ज़िंदगी से
की मुलाक़ात इक अजनबी से।

मांगते सब ख़ुशी की दुआएं
दूर जब हो गये हर ख़ुशी से।

काश होते सभी लोग ऐसे 
लुत्फ़ लेते वो आवारगी से।

बात हर इक छुपा कर रखो तुम
कह न देना नशे में किसी से।

खूबसूरत जहां  कह रहा था
देखना सब मुझे  दूर ही से।

दर्द कितना,मिले ज़ख्म कितने
मिल गई  दौलतें   दोस्ती से।

क़त्ल कर लें तुझे आज "तनहा"
पूछते थे यही खुद मुझी से।

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