Monday, 1 April 2013

लोग जब मुहब्बत पर ऐतबार कर लेते ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

       लोग जब मुहब्बत पर ऐतबार कर लेते ( ग़ज़ल ) 

                      डॉ लोक सेतिया "तनहा"

लोग जब मुहब्बत पर ऐतबार कर लेते
साथ जीने मरने का तब करार कर लेते।

इश्क में किसी को अपना कभी बना लेते 
इस तरह खिज़ाओं को खुद बहार कर लेते।

नाख़ुदा नहीं होते हर किसी की किस्मत में
हौसला किया होता, आप पार कर लेते।

लौटकर भी आना है ,आपको यहां वापस
आप कह गए होते , इंतज़ार कर लेते।

प्यार के बिना लगती ज़िंदगी नहीं प्यारी
इश्क जब है हो जाता ,जां निसार लेते।

हम भला कहें कैसे ,हम हुए तेरे आशिक 
नाम मजनुओं में कैसे शुमार कर लेते।

एक बार ख़त लिखकर , इक जुर्म किया "तनहा"
गर जवाब मिल जाता , बार बार कर लेते।

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