जुलाई 22, 2026

POST : 2087 लोकनायक जयप्रकाश को गलत आपात्काल को उचित साबित कर दिया { ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया }

लोकनायक जयप्रकाश को गलत आपात्काल को उचित साबित कर दिया  

                          ( आलेख )  डॉ लोक सेतिया 

चलिए आपको 51 साल 24 दिन पीछे लिए चलते हैं , 25 जून 1975 की उस सभा का ये लेखक गवाह ही नहीं वहीं से शुरुआत हुई थी मेरे बौधिक सामाजिक विषयों पर खुद को समर्पित करने की । गंगा जमुना से कितना पानी बहता रहा और कितने शासक बनते बदलते रहे मगर मैं अपनी जगह पर अडिग खड़ा रहा हमेशा । कुछ शब्द और उनका भावार्थ समझना ज़रूरी है , जेपी ने उस दिन सभा में विशेष तौर पर इक बात कही थी जिसे देश की जनता से सत्ताधारी शासकों ने भुला दिया है । उन्होंने सुरक्षाबलों से आग्रह किया था कि क्योंकि उनकी निष्ठा संविधान और देश के कानून की तरफ है किसी राजनेता अथवा सरकार के प्रति नहीं इसलिए अगर कोई भी शासक आपको शांतिपूर्वक प्रदर्शन विरोध करने वाले लोगों पर लाठी गोली चलाने का आदेश दे तो उसे अनुचित असंवैधानिक समझ कर जनता पर हिंसा नहीं करनी चाहिए । अगर वह बात अनुचित थी तो जो लोग उसी आंदोलन में शामिल थे और आज सत्ता पर आसीन हैं उनको आपात्काल घोषणा पर कोई सवाल खड़ा करने या इंदिरा गांधी को दोष देने का अधिकार नहीं है। लेकिन आपात्काल की यातनाओं की दुहाई देने वाले आज 20 जुलाई को उस से कहीं अधिक तानाशाही और दमन का इतिहास रच रहे हैं । सबसे खेदजनक बात मुख्यधारा के मीडिया का एकतरफ़ा और झूठा पक्ष बनाकर विरोध को बदनाम करना है जो साबित करता है कि उनके लिए सरकारी पैसा विज्ञापन और तमाम अन्य सुख सुविधाएं प्राथमिकता हैं जनता की बात उसकी आवाज़ उसके अधिकार नहीं ।  
 

                         ये ज़ब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने  ,

                        लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई । 

                                   । । मुज़फ़्फ़र रज़्मी । । 

 

बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। आज का टेलीविज़न अख़बार शोर मचा रहे है कि वो सभी देशहित में सरकार का पक्ष रख कर महान कार्य कर रहे हैं , अर्थात जनता के विरोध को अनुचित साबित करने को कुतर्क देकर तानाशाही को बढ़ावा देने का अधर्म कर रहे हैं । अगर उनका ये कदम सही है तो 1975 का संपूर्ण क्रांति अंदोलन से अन्ना हज़ारे का लोकपाल नियुक्त करने का आन्दोलन अनुचित था , जिसका समर्थन तब इन्हीं सभी चैनलों ने अख़बारों ने प्रमुखता से किया था ।  दूसरे शब्दों में ये पत्रकार अपने पुराने बड़े बड़े साहसी पत्रकारों को गलत साबित करना चाहते हैं या उनको मूर्ख समझते हैं जो उन्होंने शासक वर्ग से फ़ायदा उठाने का अवसर छोड़ जनहित की बात को उजागर कर अवसर खो दिया बहती गंगा में डुबकी लगाने से वंचित रह गए। जो अख़बार पत्रकार या लेखक या कलाकार टीवी फिल्म निर्माता सामाजिक सरोकार को छोड़ अपने लाभ की खातिर लिखता बोलता है उस को पीत पत्रकारिता कहते हैं । आज इन सभी की हालत ऐसी ही है पीलिया ही नहीं बल्कि कोई कैंसर जैसा रोग उनको लग गया है जो भीतर ही भीतर उनको खोखला कर रहा है। 
 
विसंगति देखिए जो लोग सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को नहीं मानते और अयोध्या में ढांचे को गैरकानूनी ढंग से तोड़ कर अपराधी साबित होने पर सज़ा से बच जाते हैं उनका आंदोलन सही था जिस में सभी मर्यादाओं का उलंघन किया गया और सत्ता की खातिर देश को धर्म के नाम पर विभाजित करने को कितने ही आयोजन करते रहे। लेकिन देश की वास्तविक समस्याओं पर चर्चा तक करना गुनाह कहलाने लगा है । आर्थिक बदहाली से चीन अमेरिका के सामने घुटने टेकना शौर्य कैसे कहला सकता है मगर शासक और पुलिस सुरक्षाबल अपना शौर्य प्रदर्शित करते है जनता पर लाठी आंसू गैस और ताकत का प्रदर्शन कर , उनकी सीमा पर विफलता ढक जाती है क्या ऐसा करने से।  

आखिर में शायर कुलदीप सलिल जी की लाजवाब ग़ज़ल आधुनिक दौर में सार्थक है : 

इस कदर कोई बड़ा हो मुझे  मंज़ूर नहीं 

कोई बन्दों में खुदा हो मुझे मंज़ूर नहीं।

रौशनी छीन के घर घर से चिरागों की अगर 

चाँद बस्ती में उगा हो मुझे मंज़ूर नहीं।

मुस्कुराते हुए कलियों को मसलते जाना 

आपकी एक अदा हो मुझे मंज़ूर नहीं।  

सीख ले दोस्त भी कुछ तो तजुर्बे से कभी 

काम ये सिर्फ मेरा हो मुझे मंज़ूर नहीं।  

खूब तू खूब तेरा शहर ता उम्र मगर 

एक ही आबो हवा हो मुझे मंज़ूर नहीं। 

हूं मैं कुछ आज अगर तो हूं बदौलत उसकी 

मेरे दुश्मन का बुरा हो मुझे मंज़ूर नहीं।   

हो चरागां तेरे घर में मुझे मंज़ूर सलिल 

गुल कहीं और दिया हो मुझे मंज़ूर नहीं।  

 

 
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1 टिप्पणी:

Sanjaytanha ने कहा…

बढ़िया आलेख....सामयिक...सुंदर ग़ज़ल सहित