इक मुसाफ़िर को अभी तक कारवां की तलाश है ( ग़ज़ल )
डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
इक मुसाफ़िर को अभी तक कारवां की तलाश है
ख़्वाब में देखा था जिसको , उस जहां की तलाश है ।
अजनबी लगने लगे जब , दोस्त दुश्मन यहां सभी
इस जहां में अब सभी को , मेहरबां की तलाश है ।
बोल खुद पाते नहीं , कहनी उन्हें एक दास्तां
बेज़ुबानों को यहां पर , हमज़ुबां की तलाश है ।
कुछ मुसाफ़िर थे जिन्हें खुद मंज़िलें ढूंढती रहीं
है अजब तक़दीर अपनी इक मकां की तलाश है ।
मौसमों से मिट गए हैं , काफ़िलों के निशान तक
हर किसी को आज कल इक कारवां की तलाश है ।
पूछती शायद , सड़क की लाश , सब से सवाल है
क़त्ल खुद करके तुम्हें अब किस निशां की तलाश है ।
गुफ़्तगू आवाम से करनी है ' तनहा ' निज़ाम ने
दाद दे हर बात पर , उस बेज़ुबां की तलाश है ।




