Saturday, 6 February 2021

शक़्ल नहीं तस्वीर है आईने में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      शक़्ल नहीं तस्वीर है आईने में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

बड़ा नाम सुना था बाज़ार है सच वाले आईने हैं हर शोरूम दुकान फुटपाथ से चलते फिरते जाने कैसे कैसे। पहली ही दुकान अपनी पहचान वाले की थी उनसे साफ़ शक़्ल देखने वाला दर्पण मांगा तो उन्होंने लकड़ी के फ्रेम में इक तस्वीर सामने कर दी और बोले देख लो ये आप ही हैं। हमने कहा क्या बता रहे हैं आप मुझे जैसा समझते हैं वैसा दिखला रहे हैं मैं कोई नादान बच्चा नहीं किसको ऐसे बहला रहे हैं। हंस कर बोले हम धंधा चला रहे हैं कभी हंसने वाले को रुला रहे हैं कभी रोते बच्चे को खिलौना थमा रहे हैं कुछ भी समझ लो हम पैसा बना रहे हैं। हम बिकते हैं बेचते भी हैं लोग हमारी कीमत बढ़ा रहे हैं हम रामधुन बजा रहे हैं रावण को ऊंचा उठा रहे हैं उसके गुणगान के मतलब सबको समझा रहे हैं। सीता और गीता राम और श्याम दोनों किरदार अकेले निभा रहे हैं दर्शक ताली बजा रहे हैं क्यों आप झल्ला रहे हैं देखो हम जश्न मना रहे हैं झूठ को मंच पर बिठाकर फूलमाला दीपक मां सरस्वती को अर्पित करवा रहे हैं। सुनते हैं लोग बहरे हैं बेशक मिलकर सभी गूंगे मधुर गीत गा रहे हैं। 
 
सुबह से शाम तक बाजार सारा छान मारा मगर मिला नहीं कश्ती को कहीं किनारा। हर किसी ने यही कहा बाबूजी समझो ज़रा इशारा क्या हाल हुआ तुम्हारा क्या हाल है हमारा। फेसबुक व्हाट्सएप्प का बदला है सब नज़ारा जिसे मौत ने बचाया उसे ज़िंदगी ने मारा। हमको तो मिल गया है सरकार का सहारा कागज़ की कश्ती दरिया का वो किनारा सागर का खारा पानी हमको नहीं लगता खारा। शीशे में देखो हमने क्या क्या नहीं उतारा सच झूठ दोनों भाई क्या भलाई क्या बुराई अपना हर किसी से नाता है जब तक काम आता है रिश्ता निभता जाता है। हर खरीदार को हम आईना दिखलाता है शक़्ल जैसी भी हो हम तस्वीर बनाकर फ्रेम में लगाता है। आपको उधर से उजाला इधर से अंधेरा नज़र आएगा मगर हमारी कलाकारी से खुद को सबकी नज़र से खूबसूरत दिखलाएगा। सेल्फ़ी लगाओगे या डीपी बनाओगे सोशल मीडिया पर छाओगे गज़ब ढ़ाओगे। 
 

संक्षेप में समझाया है गागर में सागर भरने की बात है आखिर में आर पी महरिष की ग़ज़ल। 

आईने में देखना अच्छा लगा 
अपना अपना चौखटा अच्छा लगा। 
 
आत्मश्लाघा में खुद अपनी पीठ को 
थपथपाना ठोंकना अच्छा लगा। 
 
आज विश्वामित्र के बहरूप को 
मेनका ने फिर छला अच्छा लगा। 
 
आधुनिक बनने की अंधी दौड़ में 
उनको चस्का जाम का अच्छा लगा। 
 
एक ख़लनायक की कटु मुस्कान पर 
हो गए दर्शक फ़िदा अच्छा लगा। 
 
बाद उत्सव के निमंत्रण पत्र वो 
खूबसूरत सा मिला अच्छा लगा। 
 
हम तो रुकने ही को थे "महरिष" मगर 
उसने रोका रास्ता अच्छा लगा।
 

 

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