Friday, 6 November 2020

उज्जवल भविष्य निर्माण का मार्ग तलाश करना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     उज्जवल भविष्य निर्माण का मार्ग तलाश करना ( आलेख ) 

                                         डॉ लोक सेतिया 

आशावादी ढंग से पिछले समय के अनुभव से सबक लेकर हमें विचार विमर्श करते हुए देश समाज और विश्व को तथा मानवता को ध्यान में रखकर भविष्य में कैसे सही दिशा का चयन और सामाजिक मूल्यों का निर्धारण करना है सिलसिलेवार ढंग से चिंतन करने का समय है। जो हुआ किस ने क्या अच्छा किया बुरा किया की बहस में उलझने से बढ़कर इक शानदार समाज और सभी के लिए उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए ठोस कदम उठाने की ज़रूरत है। जीने को केवल खुद के लिए सुख सुविधाओं की चाहत पर ध्यान देने की भावना को त्यागकर पूरे समाजिक वातावरण को सुंदर बनाने की सोच रखना ज़रूरी है। सभी की भलाई को देखकर आधुनिकता और झूठे आडंबर को छोड़कर सादगी का ढंग और उच्च आदर्श का मानवीय आचरण करना सीखना होगा। हर इक इंसान का जीवन महत्वपूर्ण है अपने रहन सहन में बदलाव कर केवल खुद या परिवार के लिए नहीं बल्कि समाज देश के लिए सोचना समझना होगा। कुछ लोगों का अत्याधिक हासिल करना बड़ी बड़ी महत्वांकांक्षाओं की पूर्णता करने की इच्छा में सीमा से बढ़कर मतलबी स्वार्थी बन जाना अनुचित है। 

देश की सरकार राज्य की सरकारों का स्वास्थ्य शिक्षा रोज़गार और नागरिक के जीने की बुनियादी ज़रूरतों को उनके मौलिक संवैधानिक अधिकार की तरह समझ अपना सबसे पहला कर्तव्य मानकर कार्य और योजना बनाना होगा इसको आज़ादी के सतर साल बाद और कितना इंतज़ार संयम रखने की बात की जा सकती है। खेद है कि शासक वर्ग नेताओं अधिकारीयों नीति बनाने वालों ने इस को लेकर बेहद असंवेदनशीलता दर्शाई है अभी तलक। देश के नागरिक ख़ास और आम या धनवान और गरीब बड़े और छोटे दो हिस्सों में विभाजित कदापि नहीं किये जा सकते हैं। शिक्षा जगत और चिकित्या जगत को भी इनको व्यवसाय नहीं समझ कर वास्तविक उद्देश्य ज्ञान और स्वास्थ्य उपलब्ध करवाने का दायित्व समझ आर्थिक लाभ को बाद में रखना होगा। समाज और सामान्य लोगों को भी शिक्षक और चिकित्सक को आदर और विश्वास पूर्वक स्थान देना सीखना ज़रूरी है। उनको लेकर अनुचित विचार या धारणा रखकर उनसे उच्च मापदंड की अपेक्षा एकतरफा नहीं रखी जा सकती है। 

साहित्य टीवी अख़बार सोशल मीडिया सच का समाज का आईना होने के साथ साथ उचित मार्गदर्शन करने को होते हैं। लगता यही है नाम शोहरत दौलत की चाहत ने इनको भटका दिया है अब इनके पास निडरता पूर्वक सच कहने का साहस बचा नहीं है और अपने लिए मतलब की खातिर झूठ को सच साबित करने लगे हैं। पीत रंग में रंग गई है पत्रकारिता देश की और लेखक सत्ता की रेवड़ियां पाने को चाटुकारिता करने लगे हैं। जिनको उजाला करना था अंधेरों को बढ़ा रहे हैं। धार्मिक राजनैतिक संगठनों संस्थाओं ने अपने संसाधनों का अनुचित उपयोग अपने स्वार्थ सिद्ध करने को करना शुरू कर दिया है जबकि उनका सही उपयोग जनकल्याण और सामजिक उत्थान की खातिर होना चाहिए। देश समाज को पतन की राह ले जाने के अपराधी यही सब हैं। सत्ता ताकत पैसे का पागलपन की हद तक अनुचित उपयोग किया जाने लगा है जो वास्तव में देश की बर्बादी गरीबी और अर्थव्यवस्था की बेहाली का कारण हैं। 

धर्म कोई भी हो उसका मकसद मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे गिरजाघर बनाना नहीं मानवता के कल्याण और दीन दुःखी लोगों की भलाई सहायता होना चाहिए। धर्म इंसान को इंसान से बांटने और विषैले वातावरण बनाने को कभी नहीं होते हैं। अंधविश्वास और आडंबर को बढ़ावा देकर लोगों को दकियानूसी विचारों के जाल में उलझाना धर्म के नाम पर अधर्म ही कहा जा सकता है। हमने कुदरती हवा पानी पेड़ पौधे सभी को सुरक्षित रखने का फ़र्ज़ भुलाकर विश्व और पूरी मानवता को खतरे में ला खड़ा किया है। विकास और अपने जीवन को आरामदायक बनाने को हमने भविष्य में इंसान पशु पक्षी सभी के जीवन को संकट में लाने का पाप किया है। बात दवाओं की हो या कोई भी उत्पाद बनाने बेचने की हमने अपने फायदे के लिए अमृत को भी विषैला बनाने तक का आपराधिक आचरण किया है। अंजाम सामने है हम पल पल मौत के साये में मर मर कर जीने को विवश हो गए हैं। सवाल सभी को अपने अपने हिस्से का जुर्म स्वीकार कर खुद को बदलना है खुद अच्छे उज्ज्वल भविष्य का निर्माण का मार्ग तलाश करना है।

1 comment:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (08-11-2020) को    "अहोई अष्टमी की शुभकामनाएँ!"  (चर्चा अंक- 3879)        पर भी होगी। 
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
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