Saturday, 28 November 2020

जनसेवकों के लिए न्यूनतम समर्थन वेतन तय हो ( बात लाख टके की ) डॉ लोक सेतिया

  जनसेवकों के लिए न्यूनतम समर्थन वेतन तय हो ( बात लाख टके की )

                                            डॉ लोक सेतिया 

सबसे पहले न्यूनतम समर्थन मूल्य का मकसद समझते हैं। किसान को समझाया जाता रहा है कि आपको अनाज पैदा करना है मगर क्योंकि हर किसी को पेट भरना है इसलिए पैदावार की कीमत सरकार तय करेगी जो सरकारी हिसाब से फसल की लागत और खेती करने वालों की महनत मज़दूरी उतनी जितने में महनतकश का गुज़र बसर हो जाये ज़रूरी है। किसान की खेती कोई मुनाफ़े कमाने का कारोबार नहीं है देश की सेवा है। सरहद पर देश की रक्षा करने को भी किसान के बेटे बेटियां काम आते हैं। राजनीती करने वाले झूठे मक्कार लोगों और पढ़ लिखकर कर शासन का अंग बन चुके शिक्षित वर्ग और किसी तरह से धनवान बन गए उच्च वर्ग को जीने को तमाम सुख सुविधाएं और अधिकार छीनने की छूट कानूनी है। किसी भी अन्य कारोबारी पर लागत मूल्य से कितना अधिक मुनाफा लेना उचित है ऐसा नियम कभी नहीं मनवाया जा सकता है। ये सभी देश सेवा देशभक्ति पर भाषण देते हैं देश समाज को देते नहीं कुछ भी अपनी तथाकथित सेवाओं की मुंहमांगी कीमत बढ़ा चढ़ा कर खुद रखने का हक रखते हैं। संसद और संविधान इनके हाथ में बंदर के हाथ तलवार की तरह से खतरनाक हथियार है जिस का उपयोग कर उन्होंने तमाम तौर तरीके अपनाकर रिश्वत को कोई और भला सा नाम दे दिया है। विधायक सांसद की निधि इसकी मिसाल है जिसको शुरू ही राजनितिक स्वार्थ हासिल करने के लिए किया गया था। जनता की सेवा के नाम पर लाखों करोड़ की राशि उनकी मौज मस्ती और शाही रहन सहन पर बर्बाद कर देश की आज़ादी और संविधान के सबको समान अधिकार न्याय देने की अवधारणा को दरकिनार किया गया है। 
 
ये नौकर हैं मगर मालिक पर शासन करते हैं जनता वास्तविक मालिक होकर भिखारी की तरह हाथ पसारे खड़े होने को विवश है। किसी भी राजनैतिक दल ने कभी देश के नागरिक के लिए जीने की बुनियादी ज़रूरतों को अधिकार समझ कर पहले उनको उपलब्ध करवाने की समय सीमा नहीं तय की है। उनके आलिशान दफ्तर मूर्तियां मरने के बाद समाधिस्थल तक ज़रूरी हैं और ये सब पलक झपकते हो जाता है। नेताओं की रैलियां सभाएं और अधिकारी वर्ग की मौज मस्ती देश विदेश सैर सपाटे उनके अधिकार तो हैं बस उनको जनता देश की समस्याओं का समाधान करना है ये फ़र्ज़ बिल्कुल भी महत्वपूर्ण नहीं है। खाने को हलवा पूरी और काम करने को कोई पूछने वाला नहीं कि आपको जो करना था किया क्यों नहीं। किसान समर्थन मूल्य की बात करते हैं जबकि वास्तव में उनको अपनी पैदावार का उचित मूल्य उसी तरह मिलना चाहिए जिस तरह से बाज़ार में अन्य उत्पादों की कीमत समय के साथ बढ़ती है और सरकारी कर्मचारी अधिकारी का वेतन भत्ते बढ़ते हैं।
 
   किसानों को दिल्ली आने से रोकना सत्ता का अनुचित इस्तेमाल कर तमाम तरह से , उनको अपनी बात दिल्ली की बहरी सरकार को सुनाना कोई अनुचित कार्य नहीं है जिसके लिए आंसू गैस और सर्दी में ठंडे पानी की बौछारों से जैसे अमानवीय कदम उठाये जाने चाहिएं थे। देश भर के लोगों का पेट भरने को अनाज पैदा करने वाले अन्नदाता को कोई इस ढंग से अपमानित नहीं कर सकता है। ये तो बेशर्मी की हद है कि सत्ता पर बैठा कोई खुद को जनता का सेवक कहने वाला किसान को मिलने को निर्देश देकर कहे कि अभी जाओ वापस और तीन दिसंबर को आने को बुलावा मिला है तब दिल्ली आना। उनका अधिकार है किसानों के लिए बनाये कानूनों पर आंदोलन करना विरोध जताना। शायद दिल्ली में सत्ता के गलियारों में बसने वालों को देश की वास्तविकता का पता नहीं है कि भारत गांव खेत खलियान में बसता है महानगर के आलिशान भवनों में नहीं और देश की अर्थव्यवस्था से लेकर राजनीति के उतार चढ़ाव और इतिहास बनाने बदलने की बुनियाद वहीं पर है। जिन ऊंचे महलों में बड़े बड़े लोग राजसी शान से रहते हैं उनका निर्माण गांव के ही किसान मज़दूर के खून पसीने से करते रहे हैं। ये महनतकश लोग जिस दिन अपना हिस्सा मांगेंगे सत्ता के शिखर पर बैठे लोगों ही नहीं तमाम धनवान और तथाकथित ख़ास वर्ग वालों के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक जाएगी। 
 
    अब नयी बात सामने आई है शर्त रखी गई है कि पहले जिस जगह सरकारी फरमान है किसान वहां जाकर जैसे पुलिस कहती है उस ढंग से आंदोलन करें तभी उनसे चर्चा होगी। कहा कुछ जाता है इरादा कुछ और होता है ये आपसी सहमति नहीं चालाकी से किसी को अपने बिछाए जाल में फंसाने की साज़िश लगती है। शायद इस देश की भोली भाली जनता के संयम को आज़माने की कोई सीमा बाकी रही नहीं है। विदेशी शासक भी कहते कि जिनको आज़ादी चाहिए उनकी इजाज़त से आंदोलन कर सकते हैं तब क्या आज़ादी के दीवाने मंज़ूर कर लेते और क्या ऐसा होता तो देश कभी आज़ाद होता ही नहीं। बस बहुत सत्ता की चोरी और सीनाज़ोरी हो चुकी है। अब देश की मालिक जनता वंचित लोगों का बहुमत जो तीन चौथाई जनसंख्या है उनको खैरात नहीं अपने अधिकार मांगकर नहीं छीनकर लेने होंगे। और समर्थन मूल्य की तरह देश सेवा को निर्वाचित सांसदों विधायकों और शासन की देखभाल करने वाले सरकारी अमले को वेतन सुविधाएं सिमित करनी होगी। देश के नागरिक देश हैं मुट्ठी भर ख़ास वर्ग देश नहीं हो सकता है।

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