Thursday, 25 June 2020

ज़िंदगी से खिलवाड़ कब तक ( मौत के सौदागर ) डॉ लोक सेतिया

 ज़िंदगी से खिलवाड़ कब तक ( मौत के सौदागर ) डॉ लोक सेतिया 

    शायद अभी भी देश की सरकार राज्यों की सरकारों को समस्या की जड़ तक पहुंचने की ज़रूरत नहीं समझ आएगी। ये शायद किसी भी देश में संभव नहीं होगा कि स्वास्थ्य को लेकर नियम कानून जैसे कड़े होने चाहिएं हैं ही नहीं और जो बने हुए हैं उनको भी सख्ती से लागू किया ही नहीं जाता है। राजनीति और धर्म के बाद सबसे अधिक लूट की छूट शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में ही है। हैरानी हुई किसी ने मेरी इक पोस्ट पर ये तक कहा कि क्योंकि कोई आयुर्वेद की बात कहता है उसका विरोध नहीं करना चाहिए। लोगों की जान से खिलवाड़ कोई भी करे अपराध है वो चाहे किसी भी पैथी के नाम पर किया जाये। वास्तव में यही समय है कि उसको ही नहीं जिसने कोरोना की दवा बनाने के नाम पर उचित अनुचित की परवाह नहीं कर अपने फायदे के लिए ऐसा अनुचित कार्य करने की कोशिश की हर तरह के हथकंडे अपना कर इक घिनौना खेल खेलना चाहा लोगों की ज़िंदगी के साथ बल्कि और भी सभी को भी कोई खिलवाड़ लोगों की ज़िंदगी से करने या मनमाने ढंग से कमाई करने से रोकने का उपाय किया जाये। वास्तव में गली गली मौत के सौदागर बिना किसी डर के जनता को जाने कितने झूठे दावों से ठग रहे हैं। आपको सुबह पार्क में सैर करते कोई पतले मोटे होने की कोई गोरा होने की कोई आपको गंभीर रोगों की उपचार की बात कहकर जाने क्या क्या नहीं बेचते हैं। सरकारी विभाग की जानकारी में तमाम देसी एलोपैथिक या घरेलू नुस्खे बताकर नीम हकीम खूब कमाई करते हैं। एलोपैथिक दवा भी बिना डॉक्टर की सलाह से बिकती हैं या डॉक्टर भी अनावश्यक लिखते हैं अपनी कमाई की खातिर। महंगे टेस्ट भी कमीशन की खातिर और डॉक्टर बड़े अस्पताल को मरीज़ भेजते हैं किसी बिचौलिये दलाल की तरह हिस्सा लेकर। ये जितने बाबा आयुर्वेदिक दवा बेच रहे हैं शायद नहीं कर पाते अगर नियम कानून वास्तव में कड़ाई से लागू किये जाते और ये अनुमति ही नहीं मिलती कि कोई भी किसी एक जगह रोगी को देख कर निदान करने के बाद ही उपचार कर सकता न कि कोई बाबा या डॉक्टर कितनी जगह अपने नाम से दवा बेचने का काम करता। ये अंधेर नगरी चौपट राजा कब तक इसको बंद करना ज़रूरी है क्योंकि इनसे लोग स्वस्थ्य होने की जगह और रोगों के शिकार हो रहे हैं। किसी ने कमेंट किया एलोपैथिक दवा नुकसान देती हैं मैंने उनको बताया कोई भी दवा आपको नुकसान देती है अगर बिना डॉक्टर की राय और हिदायत लेते हैं। ये कोई देसी अंग्रेजी का झगड़ा नहीं है उचित ढंग से सही सलाह से कोई भी दवा चिकित्सक सोच समझ कर देते हैं रोगी की भलाई के लिए। रोग होने पर दवा ज़रूरी है मगर अपनी मर्ज़ी से या दवा बेचने वाले की बात से नहीं। सच कहा जाये तो हमारी स्वस्थ्य सेवा खुद बेहद बीमार है गंभीर चिंताजनक हालत है मगर किसी नेता अधिकारी को परवाह ही नहीं उनको समझ ही नहीं है कि कब कोई दवा दवा होती है और कब वही दवा ज़हर भी हो सकती है। 

    दवा कभी इश्तिहार छपवा कर नहीं दी या बताई जा सकती है और कानून है कि कोई भी किसी रोग का उपचार करने की गारंटी की बात नहीं कह सकता है। मगर ये क्या सरकार और स्वास्थ्य शिक्षा विभाग की आपराधिक गलती नहीं है कि उसने ये कभी समझना ही नहीं चाहा की शिक्षा और स्वास्थ्य हर नागरिक को उचित ढंग से मिलना चाहिए और कोई इनको लेकर धोखाधड़ी लूट नहीं कर सके। मैंने देखा है कितने ऐसे अस्पताल खुले हुए हैं जिन में डॉक्टर का नाम तक नहीं होता है लोग नहीं जानते कौन है जो उनका ईलाज कर रहा है। और ऐसे लोग पर्चे बंटवाते हैं कितने असाध्य रोगों का ईलाज करने के दावे कर

ते हुए। दवा कंपनियां दवा को सामान की बेचती हैं किसी भी ढंग से , इतना सब जो भी जैसे चाहे करते हैं कोई रोकने टोकने वाला नहीं है। कितने तथकथित साधु बाबा उपदेश देने के साथ अपनी द

वा बेचते हैं सभा में हर किसी को कोई भी ईलाज बताकर। सड़क किनारे कोई भी आपको ठग सकता है मगर बात इतनी ही नहीं है यहां तो बड़े बड़े अस्पताल डॉक्टर क्या करना है क्या करते हैं कोई परखने जांचने वाला नहीं है।

  ये भगवान हैं कहते हैं और इनको यकीन है भगवान की तरह ये जो भी कर सकते हैं कोई सवाल नहीं कर सकता है। संक्षेप में कुछ बातें समझते हैं। नर्सिंग होम क्लीनिक में क्या क्या हो कितनी जगह कितने नर्स स्टाफ हो और उनकी शिक्षा अनुभव क्या हो कोई नहीं सोचता समझता ईलाज नहीं खिलवाड़ किया जाता है डॉक्टर नहीं है तब उनकी जगह कोई भी रोगी की जांच और उपचार करता है। बड़े अस्पातल नर्सिंग होम

में कितने बिस्तर का अस्पताल है कितनी जगह हो कितने स्टाफ होना चाहिए और चौबीस घंटे खुले होने का अर्थ कितने डॉक्टर होने चाहिएं देखने लगे तो हालत चिंताजनक है। संभव ही नहीं है सही उपचार जब तक आपका बुनियादी ढांचा ही सही नहीं हो। जैसे हर कारोबार में नियम हैं कितने दाम ले सकते हैं कोई नहीं पूछता अस्पताल डॉक्टर के लिए कोई सीमा तय है कितने पैसे ले सकते हैं। केमिस्ट लैब से हिस्सा तो जैसे उनको ज़रूरी लगता है। मुझे हैरानी हुई किसी धर्मार्थ अस्पताल में डॉक्टर को  वेतन के साथ दवा लैब से कमीशन का खाता अलग बनाया हुआ था अर्थात धर्मार्थ की बात करने वाले भी लूट में शामिल थे।

ये सबसे अराजकता की बात है कि देश में राज्यों में अस्पताल नर्सिग होम को लेकर कोई मापदंड नहीं है कि ये किस स्तर का है और उसके चार्जेस कितने हों। कितने डॉक्टर पीआरओ रखते हैं जो उनके लिए रोगी लाने का उपाय करता है मगर किसी भी नर्सिंग होम डॉक्टर के पास अपने पास दाखिल रोगियों से पूछने वाला कोई मैनेजमेंट का स्टाफ नहीं होता जो उनसे जानकारी ले कि आपको उचित उपचार दवा सुविधा मिल रही है। मनमाने पैसे लेकर भी बदले में उचित सुविधा नहीं उपलब्ध करवाना ये आम बात है आपको जो भी जैसा है चुप चाप झेलना है क्योंकि तब आपको अपनी समस्या का समाधान ज़रूरी लगता है। इंसान रोग होने पर भीड़ में जानवर से खराब हालत में रहने को मज़बूर हैं। नहीं इनको अस्पताल नर्सिंग होम नहीं कोई और नाम देना चाहिए। मगर सरकार अंधी नहीं है उसके पास आम नागरिक की सुरक्षा के लिए अपने ही नियम कानून कड़ाई से पालन करवाने का कर्तव्य है जिसे कोई ध्यान नहीं देता है।

आपको टीवी पर विज्ञापन दिखाई देते हैं बीमा करवाने के मगर बीमा कंपनी कभी समय पर अपना फ़र्ज़ निभाती नहीं है। जब आपको ज़रूरत है बेइमान लोग आपको ही गलत ठहराने की कोशिश करते हैं और कभी भी आसानी से आपको बीमे का लाभ नहीं देते हैं कई बार तो कोई भी बहाना बनाकर आपको परेशान करते हैं और सालों साल आपको अदालत से राहत की लड़ाई लड़नी पड़ती है। सच कहा जाये तो स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली इतनी खतरनाक है कि लगता है जैसे इस देश में इंसान की जान की कोई कीमत ही नहीं है। और किसी भी धंधे में ऐसा मुमकिन नहीं है कि मनमाने मूल्य या दाम या कीमत लेकर भी आपको घटिया किस्म की सेवाएं कोई दे सकता हो। बहुत कुछ नहीं यहां सभी कुछ बदइंतज़ामी है और सरकार राज्य के विभाग अपना काम करना नहीं चाहते हैं। नेताओं को सत्ता की राजनीती और पैसे बनाने की लत लगी है और जो भी उनको रिश्वत चंदा देता है जो मर्ज़ी करने की छूट ले सकता है। कई साल पहले इक स्वस्थ्य मंत्री ने इसको लेकर कानून बनवाने की कोशिश की थी मगर उस कानून को संसद की कमेटी को भेजकर उनको ही स्वस्थ्य मंत्री पद से हटवा दिया गया था क्योंकि तमाम देश के डॉक्टर्स का संगठन ने पैसा इकट्ठा कर ऊपर पहुंचा दिया था। मीडिया को इसकी खबर की ज़रूरत नहीं थी उनको खबर नहीं विज्ञापन की कमाई ज़रूरी लगती है।

आपने कितने जाने माने अभिनेताओं को खिलाडियों को ऐसे विज्ञापन देते देखा है जिन का उन्होंने कभी खुद उपयोग शायद ही किया हो। आपको कीमत देनी है और आपका झूठ सच साबित हो जाता है। आखिर में इक शेर दुष्यंत कुमार का पेश है।

इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं 

आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार। 

अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार 

घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहार।


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