Tuesday, 23 June 2020

मौत के सर यही इल्ज़ाम है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

  मौत के सर यही इल्ज़ाम है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

मौत के सर यही इल्ज़ाम है 
खूबसूरत भी  है बदनाम है। 

इक कहानी हक़ीक़त बन रही 
आज भेजा  मुझे पैग़ाम है। 

मयकदा मय नहीं साक़ी नहीं 
और टूटा हुआ  हर जाम है। 

राह देखी सुबह से शाम तक 
इक यही अब हमारा काम है। 

कल बुलाया मुझे कहने लगे 
देखना है   तमाशा आम है। 

ख़त कई साल पहले था लिखा 
पर पता है  न कोई नाम है। 

अब तो आवाज़ "तनहा" की सुनो 
ढल रही ज़िंदगी की शाम है।

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