Friday, 12 June 2020

काश कोरोना के आंकड़े की तरह कुछ आंकड़े और भी सामने होते ( बात देश की समाज की ) डॉ लोक सेतिया

  काश कोरोना के आंकड़े की तरह कुछ आंकड़े और भी सामने होते 

                            ( बात देश की समाज की ) डॉ लोक सेतिया 

     ये कमाल है हर दिन पल पल हर कोई देश की सरकार राज्य की सरकार कितने अधिकारी कितने विभाग कितने जानकर टीवी चैनल वाले यहां तलक हर कोई बताता है आज कितने लोग पॉजिटिव हैं कितने किस हालत में हैं। कितने ठीक हुए कितने नहीं हुए। ये डरावने घबराने के आशा- निराशा के सभी आंकड़े पल पल मिलते हैं। शायद देश समाज इंसानियत की दशा सुधर का बहुत बदल कर अच्छी हो जाती अगर हम सभी को और खुद सरकार को वास्तविक आंकड़े देश की जनता के सही मालूम होते और सभी को बताने में कोई संकोच नहीं करते , पता चलता भारत महान कितना महान है और क्या है महानता। बस ये आंकड़े भी ठीक इसी तरह देखते और सब को बताये जाते। कभी ये सब आंकड़े सामने आते तो पता चलता कि दुनिया भर में कोरोना ने उतने लोगों की जान नहीं ली है जितनी देश की सरकारों की लापरवाही और समय पर फ़र्ज़ नहीं निभाने अपना वास्तविक कर्तव्य नहीं निभाने से मरते रहे हैं और आज भी मरने को विवश हैं। 

   आज देश में कितने लोग भूख से मर गए। कितने हैं जिनको कोई अधिकार नहीं मिला जिनको जीवन की बुनियादी ज़रूरत को भी ठोकर के सिवा कुछ नहीं मिला। कितने बिना उपचार छोटी सी बिमारी से मर गए उनको ईलाज नहीं मिला गरीब होने से। कोई डॉक्टर उनको कर्तव्य समझ दवा नहीं देना चाहता सबको तगड़ी फीस और ऐशो आराम चाहिएं और सरकार को अपने लिए लूट का अधिकार गरीब देश की जनता को कुछ भी नहीं देकर खुद शानो शौकत से रहने को ताम झाम और खज़ाने की बर्बादी। कितने बच्चे शिक्षा से वंचित रहे कितने युवक पढ़ लिख कर काबिल होने के बावजूद भी बेरोज़गार हैं क्योंकि रिश्वत और पहुंच नहीं है। कितने नेताओं अधिकारियों  ने कितनी लूट जनता से खज़ाने से किस दिन की और कैसे राजनीति का कारोबार करते हुए अरबपति खरबपति बन गए। कितने सरकारी अफसर कर्मचारी अच्छा वेतन और तमाम तरह की सुविधाएं मिलने के बाद भी ईमानदारी से अपने देश समाज के लिए कर्तव्य नहीं निभाते हैं। उनकी मीटिंग्स का मतलब क्या है और उनका आम नागरिक से मिलना क्या फोन पर बात करना भी कितना कठिन है जबकि उनका दावा होता है जब जो चाहे मिलकर शिकायत कर सकता है। सबसे ज़रूरी जनता की भेजी कितनी शिकायत कैसे दफ्तर की फाइल में दबकर खत्म हो जाती हैं और कितनी ऑनलाइन ऐप्प्स पर की शिकायत बिना निदान ठीक हुई घोषित की जाती हैं।

    आप बताते हैं इतने सौ लोग इतने अमीर हैं उनकी अमीरी की दौलत कितने गरीबों से निवाला छीन कर शोषण कर हासिल हुई बताते। बताते किस किस नेता पर अधिकारी पर गरीब देश ने कितना खर्च किया हर दिन उनकी सुविधाओं पर मौज मस्ती पर। ठीक कहा आज़ादी के बाद विदेशी लोगों से बढ़कर आपने लूटा है बेरहम और बेशर्म होकर। बताया जाता आज कौन रोज़ करोड़ रूपये अपने पर खर्च करता हैं इंसानियत को भूलकर जब करोड़ों लोग बदहाल हैं। नहीं इसको भगवान और भाग्य की बात मत कहना ये आपके स्वार्थ में हद से बढ़कर अंधे होने की बात है। कोरोना की तरह देश की हर बात का सच सामने आता तो ये लोग चुल्लू भर पानी में डूब मरते जो किसी शायर की शायरी को रटते हैं समझते नहीं कि जो हुआ वही आप कर रहे हैं और कैसी गंगा निकालने की उम्मीद की जा सकती है। देश की जनता के अधिकारों के क़ातिल इंसाफ की बात करते हैं फैसला अपने को पाक साफ निर्दोष बताने का करते हैं। सही आंकड़े सामने होते इंसाफ के संविधान की भावना के क़त्ल के और तमाम वीवीआईपी लोग मुजरिम बनकर कटघरे में खड़े होकर जवाब देते कितना सभी के हिस्से का उन्हों ने छीनकर जमा किया हुआ है।

      मगर सबसे बड़ा अपराध जिन लोगों का है कोई उनकी बात ही नहीं करता है। टीवी चैनल वाले अख़बार वाले जिनको ये सब सामने लाना था उन्होंने अपना ज़मीर बेच दिया पैसे विज्ञापन और ख़ास होने को कितने अधिकार हासिल कर लूट में सांझेदार बनकर। सरकार कारोबार सबके झूठ को सच साबित करने के साथ उनका ढंग और तरीका खुद को सबसे ऊपर समझने का किसी लठैत से कम नहीं है। कोई उनसे पूछता कितनी कमाई आपको उन इश्तिहारों से हुई जिनका कोई मकसद ही नहीं केवल टीवी अख़बार को खुश कर खामोश रहने की खातिर उनको सरकारी विज्ञापन की बैसाखी चाहिए अन्यथा इक कदम नहीं चल सकते हैं। जिनके विज्ञापन खिलाड़ी और अभिनेता करते हैं क्या पता किया उनका सच क्या है। कब कहां किसी ने उनके दावे को जांचा परखा है कि उनका विज्ञापन कितना सच्चा झूठा है। आज तक का सबसे बड़ा घोटाला यही सरकारी विज्ञापन हैं कोई सच बताएगा कितने साल में कितना धन उनकी झोली में गया है जो बेशक देश के सभी घोटालों की राशि से अधिक होगा। जिन पैसों का उपयोग अस्पताल स्कूलों के बनाने को किया जाना था उनकी बंदरबांट होती रही इन सभी नेताओं अफसरों कर्मचारी वर्ग कारोबारी उद्योगपति लोगों में मीडिया वालों में।

  बड़ी घोषणाएं होती हैं मगर हैरानी हुई आज जानकर कि देश का पहला अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान देश के पास पैसे नहीं थे तब भी चार साल में विदेश से सहायता लेकर बनकर खड़ा हो गया था। उसके बाद किसी भी दल की कहीं की भी सरकार ने उस तरह का संसथान ए आई आई एम एस बनाने का ऐलान किया मगर अभी एक भी पूरा बनकर सामने नहीं आया हज़ारों करोड़ मिलने के बाद भी आधा अधूरा है हर जगह। तीस हज़ार करोड़ की मूर्ति बन जाती है सैंकड़ों करोड़ का पार्टी का भव्य भवन आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित खड़ा हो जाता है मगर अस्पताल नहीं बनते समय पर। कोरोना के आने पर पहला सवाल यही था देश की स्वास्थ्य सेवाओं की दशा बेहद खराब है। खराब क्यों है क्योंकि आपको जो बनाना है उसके लिए पूरी कोशिश की जाती है नागरिक को बुनियादी सुविधा महत्वपूर्ण नहीं है। कितना धन सभी दलों ने चुनाव पर खर्च किया कभी ये भी आंकड़े सामने आते तो पता चलता कोई भी सांसद विधायक निर्धारित राशि में चुनाव नहीं लड़ा अर्थात अवैध है उनका सांसद विधायक बनना ही। लेकिन सभी चोर चोर मौसेरे भाई हैं और जो उनको चंदा देते हैं वो साले जीजा जैसे हैं इक हाथ लेते हैं दूजे हाथ देते हैं और मीडिया किसी बिचौलिया की तरह हैं। ये लोग कोरोना जैसे नहीं उनसे अधिक जानलेवा हैं मगर उनके कारण कितने बेमौत मरे कोई बताता नहीं है। ऊपर वाला भी लगता नहीं इनका हिसाब करेगा क्योंकि अगर ऐसा होता तो इन की हालत अच्छी नहीं हो सकती थी।

1 comment:

Sanjaytanha said...

खरी बात👌👍