Monday, 29 June 2020

दुश्मन से दोस्ती दोस्तों से दुश्मनी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  दुश्मन से दोस्ती दोस्तों से दुश्मनी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

   ये आपकी मर्ज़ी है इसको सियासत से जोड़ सकते हैं या मुहब्बत से और कोई चाहे तो तिजारत से भी। सबसे पहले इक पुराना सबक इक कहावत को भूलना नहीं चाहिए , मूर्ख दोस्त से समझदार दुश्मन अच्छा होता है। सरकार बड़ी अजीब चीज़ है दिखाई नहीं देती जब ढूंढते हैं मगर जब उसको ज़रूरत होती है सामने खड़ी होती है चीन की ऊंची दीवार की तरह। सरकार देश नहीं होती है मगर सरकार समझती है वही देश है जबकि सरकार बदलती रहती है देश वही रहता है। सबसे पहले हमको सरकार की नहीं देश की चिंता होनी चाहिए क्योंकि सरकारें कभी देश की चिंता नहीं करती हैं उनकी चिंता सत्ता और सरकार होने रहने की रहती है। सत्ता पक्ष विपक्ष चोर चोर मौसेरे भाई हैं इनकी लड़ाई इनकी जंग काठ की तलवारों से चुनावी मैदान में गंदी ज़ुबान से जनता को दिखलाने को होती हैं अन्यथा उनको आपस में कोई दुश्मनी कभी नहीं होती है। उनकी ब्यानबाज़ी जनता को बहलाने उल्लू बनाने के काम आती है और इनका पाला बदलना दिल से दिल मिलना शुद्ध तिजारत होती है सांसद विधायक बिकते हैं खरीदे जाते हैं। फर्रूखाबादी खेल है चलता रहता है चलता रहेगा जब तक वैश्या अपना जिस्म बाज़ार में बेचेगी नेता अपनी आत्मा जो ज़िंदा नहीं मर चुकी होती है उस अपनी लाश का सौदा करते रहेंगे। मुहब्बत और जंग में फिर भी शायद कोई सीमा होती है लेकिन ये जो अनीति है राजनीति या विदेश नीति किसी भी देश की सरकार की किसी और देश की सरकार से दोस्ती और दुश्मनी की रणनीति उस में कोई सीमा नहीं होती कोई नियम नहीं कोई मर्यादा नहीं और उसूल तो होते ही नहीं है ये अवसर की राजनीति होती है जो दो तरह की होती है इक सामने इक पर्दे के पीछे। 

    अब दोस्त की दुश्नमी की बात की कथा कहानी सुनाते हैं। ये वही है जिसने कई साल पहले हम भाई भाई हैं कहते हुए भाई की पीठ में खंज़र घौंप दिया था। हमने खंज़र घौंपने वाले को क्षमा कर दिया उसको गले लगाया उसके साथ झूले झूले और जिसकी पीठ में खंज़र घौंपा गया था अभी तक भी उसको दोषी ठहराते रहे हैं। हमने खुद को समझदार माना और विश्वास किया अपनी समझ पर कि वही जिसने पहले कभी किसी से वफ़ा नहीं की हमसे वफ़ाएं निभाएगी। गाइड फ़िल्म का गीत गुनगुना रहे हैं आजकल चाहा क्या क्या मिला बेवफ़ा तेरे प्यार में। दिल है कि मानता नहीं अभी भी साहब को उसको बेवफ़ा कहना मंज़ूर नहीं है कहते हैं न तुम बेवफ़ा हो न हम बेवफ़ा हैं मगर क्या करें अपनी रहें जुदा हैं। साहब उसको दोष नहीं देते कहते हैं नहीं उसने अपनी सीमा नहीं लांघी हमने भी उसको बुरा भला नहीं कहा फिर झगड़ा काहे का है। कितनी जान कुर्बान करेंगे ऐसी आशिक़ी में सांढों की लड़ाई में फसल बर्बाद धूल उड़ाई और खड़े हैं सीना ताने। नवाब लोग मुर्गे लड़वाते थे मज़े लिया करते थे आजकल शासक खेल तमाशे करते हैं कभी किसी को ताजमहल किसी को धार्मिक आरती किसी को शानदार बाग़ की सैर जाने क्या क्या उस तरफ इस तरफ करते रहते हैं। खेल खेल में बच्चों की तरह लड़ना झगड़ना रूठना मनाना चलता है ये सीमा पर तकरार ये रार ये वार पर वार सब उनका मनोरंजन ही है आपको ताली बजानी है उनको सरकार चलानी है वार्ता से बात बनानी है। 

  ये आतंकवाद ये कभी सीमा पर संधि कभी संधि का उलंघन उनके अपने शतरंज के मोहरे हैं चाल है शह मात नहीं होने देते बाज़ी कभी इक तरफ नहीं होने देते। आपको इनको छोड़ अमिताभ बच्चन जी की तरह करोड़पति का खेल खिलवाना चाहिए जो खेलते हैं शायद कभी थोड़ा जीते सकते हैं खिलवाने वाले जीत कर करोड़ नहीं बिशुमार दौलत बनाते रहते हैं। आपको ऐप पर खेल में नाम दर्ज करवाना है यहां उनकी ऐप्पस पर पाबंदी की बात याद आई है। ये इक पर्दा है घूंघट कर लिया उस को देखना नहीं उसको अपना चेहरा नहीं दिखाना है उसको तड़पाना है। यही हमारी जीत है वो आकर गलती मानेगा तो घूंघट उठा देंगे फिर से उनसे मुहब्बत का तिजारत वाला लेन देन का रिश्ता चलने लगेगा। आपको नहीं समझ आता उनका झगड़ा किस बात का है उनकी दोस्ती कैसी है दुश्मनी क्यों है। उन सभी को सभी देश की सरकारों को , देश नहीं क्योंकि देश सरकार नहीं हैं ये पहले बताया है , जिन समस्याओं से लड़ना है कोरोना को हराना है गरीबी भूख और शिक्षा स्वास्थ्य सेवाओं बुनियादी ज़रूरतों जनता की को उपलब्ध करवाना है मगर करते नहीं हैं उन से आपका ध्यान हटवाना है। राजनीति बड़ी बेरहम होती है जब कोई राजा मरता था उसके साथ ही कोई उसके तख़्त पर ताजपोशी करवाता था , यहां मातम और जश्न समोरह इक साथ होते रहे हैं। नेता बदलते हैं तो पिछले सत्ताधारी से कोई सीख नहीं लेते क्योंकि जीतने वाला समझता है अपनी समझ चालाकी और चालों से उसने पिछले को हराया है तो उस से अकलमंद हूं जबकि हारने वाले का अनुभव वास्तव में काम का होता है। मुझे राहत इंदौरी जी की ये ग़ज़ल बेहद पसंद है शुरू से ही। 

                       दोस्ती जब किसी से की जाये , दुश्मनों की भी राय ली जाये।

 

 




Sunday, 28 June 2020

मुश्किल कहना मन की बात ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  मुश्किल कहना मन की बात ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

    होते होते होते प्यार हो गया मगर महबूबा को जाने क्या सूझी जो आशिक़ ने जब भी कोशिश की दिल की बात कहने की अभी नहीं फिर कभी यहां नहीं कहीं और ऐसे नहीं कुछ और ढंग से सोशल मीडिया पर भी नहीं और अकेले अकेले भी नहीं। आखिर इक दिन पूछ लिया इरादा क्या है किसी और से तो नहीं लगा लिया दिल बता दो तू नहीं और सही। इस बात पर माशूक़ा को अपने मन की चाहत बतानी पड़ी कहा मुझसे मन की बात कहनी है तो रेडियो पर निर्धारित समय पर कहना अन्यथा ख़ामोश रहो। मालदार बाप की औलाद को लगा ये कोई बड़ी बात है वादा कर बैठा। जब रेडियो के दफ़्तर जाकर बात की तो मालूम हुआ क्या क्या करना होगा और जैसे कोई हर महीने मन की बात करता है उसका खर्चा आठ करोड़ हर एपिसोड का आता है। मुहब्बत करना बाद में उसका इज़हार करना ही इतना महंगा होगा बेचारे आशिक़ को सपने में भी अंदाज़ा नहीं था। किसी ने बताया छोड़ो सरकारी रेडियो को ऍफ़ ऍम रेडियो से गुज़ारा कर सकते हैं मगर पता चला उनका दायरा उतना बड़ा नहीं है जो आशिक़ के शहर से महबूबा के शहर तक सुनाई से सके। राजनीति ने मन की बात को भी इतना मुश्किल बना दिया है कि आम इंसान अपने मन की बात मन में ही रखने को मज़बूर है। कोई पहचान वाला मिला जिसने समझाया आप कवि होते या ग़ज़ल कविता कहते होते तो कोई अवसर मिल भी सकता था , कविता पढ़ते अपनी महबूबा को सुनवा कर बात बन जाएगी। कविता का शीर्षक रखते  मन की बात। आशिक़ ने गूगल पर ढूंढा और मन की बात कविता मिल ही गई। लिखने वाले को तलाश किया फेसबुक पर मिले तो अपनी समस्या बताकर उनकी कविता अपने नाम से सुनाने की इजाज़त मिल ही गई हाथ जोड़कर। उसके बाद रेडियो पर सौ पापड़ बेले तब जाकर सिफ़ारिश और उपहार देकर कविता पढ़ने का अवसर मिल गया। मगर जैसा होता है जवानी में सभी किसी की कविता ग़ज़ल चुराकर अपनी माशूक़ा को तुम्हारे लिए खुद लिखी है कहकर सुनाते हैं। मुहब्बत और जंग में सब जायज़ समझा जाता है। रेडियो पर किसी अनजाने कवि की कविता को अपनी बताकर पढ़ कर कह दिया मेरे मन की बात जिसे भी पसंद आई हो मुझे कल इंडिया गेट पर मिल कर जवाब दे सकती है। 


मन की बात ( कविता ) डॉ  लोक सेतिया 

देख कर किसी को
बढ़ गई दिल की धड़कन
समा गया कोई
मन की गहराईओं में
किसी की मधुर कल्पनाओं में
खोए  रहे रात दिन
जागते रहे किसी की यादों में
रात - रात भर करते रहे
सपनों में उनसे मुलाकातें।

चाहा कि बना लें उन्हें
साथी उम्र भर के लिए
हर बार रह गया मगर
फासला कुछ क़दमों का
हमारे बीच।

उनकी नज़रें
करती रहीं इंतज़ार 
खामोश सवाल के जवाब का
पर हम साहस न कर सके
प्यार का इज़हार करने का कभी।

समझ नहीं सके वो भी
हमारी नज़रों की भाषा को
और लबों पे ला न पाए
दिल की बात कभी हम।

 ये ऊपर लिखी कविता सुनकर सोचता रहा आशिक़ कल क्या होगा। धड़कन बढ़ गई नींद नहीं आई। 

  कविता पढ़ने पर चेक भी मिला साथ में लेकर जब इंडिया गेट पहुंचे आशिक़ तो जो नहीं होना था हो गया। महबूबा से पहले कई और यही समझकर कि उनके लिए लिखी सुनाई गई है मिलने चली आईं और बात बनने की जगह बिगड़ गई जब वो जिसका इंतज़ार था आई तो अपने आशिक़ को गोपियों से घिरा पाया। मामला उलझ गया है अब कसम खाने और असलियत बताने पर भी भरोसा नहीं हुआ। तब बताया कि ये कविता जिनकी है उनसे मिलकर अपने प्यार की खातिर अनुमति ली है चाहो तो उनसे पता कर सकती हो। लिखने वाले का नंबर लिया सच जानकर आखिर मान भी गई। मन की बात किसी और की लिखी हुई चाहे खुद लिखी हो कहना बहुत मुश्किल है। बहुत कठिन है डगर पनघट की।

 

Thursday, 25 June 2020

एक बाबा मांगते सभी देश ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     एक बाबा मांगते सभी देश ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

उनको उम्मीद थी भरोसा था यकीन था कोरोना की दवा की खोज की खबर का असर होगा ज़रूर। अमेरिका से फोन आया तो धमकी मिलने की तैयारी थी दिल ही दिल में सोचा था इनकार नहीं किया जा सकता फिर भी नाज़ नख़रे दिखाए जा सकते हैं पहले रूठना फिर मान जाना दोस्ती मुहब्बत का मज़ा लिया जाता है। मगर ये क्या उधर से कोरोना की दवा की नहीं मांग की गई मांगा गया कि ये बाबा मुझे दे दो ठाकुर। गब्बर सिंह की तरह से उनको जो चाहिए छीन सकते हैं। समझ नहीं आया पूछा आपको कोरोना की दवा चाहिए तो भिजवाते हैं हमने तो अपने देश में रोक लगा दी है बेचारे गरीब की दवा बिक जाये अच्छा है। अपने क्या हमें उल्लू समझ रखा है हमने किसी दवा की नहीं उस बाबा की मांग की है। बाबा बड़े काम की चीज़ है दवा नहीं कुछ और काम लिए जा सकते हैं आप भिजवा दो। बात बीच में रह गई उधर से चाईना भी यही मांग रहा था उसको भी कोरोना की दवा की नहीं बाबा की ज़रूरत थी। ऐसा क्या महत्वपूर्ण मकसद हो सकता है नहीं समझ पा रहे हैं सरकार जनाब। दोनों को दिलासा दे दिया बाबा से बात कर आपको सूचित करते हैं। 

दिल दिमाग़ में खलबली मची है क्या करना चाहते हैं बाबा को लेकर। तीसरे देश के शासक ने राज़ खोल दिया आखिर ये बताकर कि बाबा उनकी अर्थव्यवस्था से लेकर चुनावी खेल तक जनता को झांसे में रखने से लेकर देशभक्ति और ऊंचे आदर्शों महान बनने तक सभी कुछ का उपाय हैं। करोड़ों लोगों को बिना वास्तविक कुछ भी लाभ हासिल किये ऐसा भरोसा दिलवाना तो राजनेताओं के भी बस की बात नहीं है। सरकार जनाब भी उनका इस्तेमाल यही सब पाने को करते रहे हैं तो अब ये राज़ खुल गया है चर्चा आम हो गया है। बाबा को बताया तो बाबा अपना दाम और बढ़वाकर अमेरिका जाने को उतावले हो जाएंगे उनको पता है खुद उन्हें अमेरिका जाना देश की सबसे बड़े पद की कुर्सी हासिल करने से भी अधिक महत्वपूर्ण लगा था। हम भी किसी से कम नहीं हैं जापान चीन अमेरिका से मेड इन इंडिया लगी मोहर वाली चीज़ खरीदते हैं। झट विचार आया हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चौखा की तरह समस्या का समाधान निकाला जा सकता है। 

कॉलोन बनाने वाले को खुद अपने जैसे और नकली हूबहू आदमी बनाने को कहा हुआ था उसको बुलवाया गया और बाबा की नकल के कॉलोन बनवाने की योजना की बात की। बाबा को किसी बहाने उनकी लैब में भिजवाया गया ताकि उनकी नकल बनाने की तरकीब निकाली जा सके। मगर वैज्ञानिक हैरान हो गए ये देख कर कि जिनकी कॉपी बनानी है वो खुद असली है ही नहीं नकली हैं और नकली की नकल बनाना कॉलोन बनाने में संभव नहीं है। सरकार जनाब को जाकर बताया पहले तलाश करो कास्तविक असली बाबा हैं कहां ये तो उनकी नकल है। नकली की पहचान भारत में नहीं होती है और नकली पर असली का लेबल लगाकर बेचते हैं लेकिन अमेरिका चाईना जापान परखना जानते हैं उनको नकली बाबा भेजा तो मामला बिगड़ सकता है। असली नकली में उलझ गए हैं हम लोग और नकली को असली साबित करने वाले सामान ही नहीं बाबा भी नकली बनाने तक लग गए हैं।

ज़िंदगी से खिलवाड़ कब तक ( मौत के सौदागर ) डॉ लोक सेतिया

 ज़िंदगी से खिलवाड़ कब तक ( मौत के सौदागर ) डॉ लोक सेतिया 

    शायद अभी भी देश की सरकार राज्यों की सरकारों को समस्या की जड़ तक पहुंचने की ज़रूरत नहीं समझ आएगी। ये शायद किसी भी देश में संभव नहीं होगा कि स्वास्थ्य को लेकर नियम कानून जैसे कड़े होने चाहिएं हैं ही नहीं और जो बने हुए हैं उनको भी सख्ती से लागू किया ही नहीं जाता है। राजनीति और धर्म के बाद सबसे अधिक लूट की छूट शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में ही है। हैरानी हुई किसी ने मेरी इक पोस्ट पर ये तक कहा कि क्योंकि कोई आयुर्वेद की बात कहता है उसका विरोध नहीं करना चाहिए। लोगों की जान से खिलवाड़ कोई भी करे अपराध है वो चाहे किसी भी पैथी के नाम पर किया जाये। वास्तव में यही समय है कि उसको ही नहीं जिसने कोरोना की दवा बनाने के नाम पर उचित अनुचित की परवाह नहीं कर अपने फायदे के लिए ऐसा अनुचित कार्य करने की कोशिश की हर तरह के हथकंडे अपना कर इक घिनौना खेल खेलना चाहा लोगों की ज़िंदगी के साथ बल्कि और भी सभी को भी कोई खिलवाड़ लोगों की ज़िंदगी से करने या मनमाने ढंग से कमाई करने से रोकने का उपाय किया जाये। वास्तव में गली गली मौत के सौदागर बिना किसी डर के जनता को जाने कितने झूठे दावों से ठग रहे हैं। आपको सुबह पार्क में सैर करते कोई पतले मोटे होने की कोई गोरा होने की कोई आपको गंभीर रोगों की उपचार की बात कहकर जाने क्या क्या नहीं बेचते हैं। सरकारी विभाग की जानकारी में तमाम देसी एलोपैथिक या घरेलू नुस्खे बताकर नीम हकीम खूब कमाई करते हैं। एलोपैथिक दवा भी बिना डॉक्टर की सलाह से बिकती हैं या डॉक्टर भी अनावश्यक लिखते हैं अपनी कमाई की खातिर। महंगे टेस्ट भी कमीशन की खातिर और डॉक्टर बड़े अस्पताल को मरीज़ भेजते हैं किसी बिचौलिये दलाल की तरह हिस्सा लेकर। ये जितने बाबा आयुर्वेदिक दवा बेच रहे हैं शायद नहीं कर पाते अगर नियम कानून वास्तव में कड़ाई से लागू किये जाते और ये अनुमति ही नहीं मिलती कि कोई भी किसी एक जगह रोगी को देख कर निदान करने के बाद ही उपचार कर सकता न कि कोई बाबा या डॉक्टर कितनी जगह अपने नाम से दवा बेचने का काम करता। ये अंधेर नगरी चौपट राजा कब तक इसको बंद करना ज़रूरी है क्योंकि इनसे लोग स्वस्थ्य होने की जगह और रोगों के शिकार हो रहे हैं। किसी ने कमेंट किया एलोपैथिक दवा नुकसान देती हैं मैंने उनको बताया कोई भी दवा आपको नुकसान देती है अगर बिना डॉक्टर की राय और हिदायत लेते हैं। ये कोई देसी अंग्रेजी का झगड़ा नहीं है उचित ढंग से सही सलाह से कोई भी दवा चिकित्सक सोच समझ कर देते हैं रोगी की भलाई के लिए। रोग होने पर दवा ज़रूरी है मगर अपनी मर्ज़ी से या दवा बेचने वाले की बात से नहीं। सच कहा जाये तो हमारी स्वस्थ्य सेवा खुद बेहद बीमार है गंभीर चिंताजनक हालत है मगर किसी नेता अधिकारी को परवाह ही नहीं उनको समझ ही नहीं है कि कब कोई दवा दवा होती है और कब वही दवा ज़हर भी हो सकती है। 

    दवा कभी इश्तिहार छपवा कर नहीं दी या बताई जा सकती है और कानून है कि कोई भी किसी रोग का उपचार करने की गारंटी की बात नहीं कह सकता है। मगर ये क्या सरकार और स्वास्थ्य शिक्षा विभाग की आपराधिक गलती नहीं है कि उसने ये कभी समझना ही नहीं चाहा की शिक्षा और स्वास्थ्य हर नागरिक को उचित ढंग से मिलना चाहिए और कोई इनको लेकर धोखाधड़ी लूट नहीं कर सके। मैंने देखा है कितने ऐसे अस्पताल खुले हुए हैं जिन में डॉक्टर का नाम तक नहीं होता है लोग नहीं जानते कौन है जो उनका ईलाज कर रहा है। और ऐसे लोग पर्चे बंटवाते हैं कितने असाध्य रोगों का ईलाज करने के दावे कर

ते हुए। दवा कंपनियां दवा को सामान की बेचती हैं किसी भी ढंग से , इतना सब जो भी जैसे चाहे करते हैं कोई रोकने टोकने वाला नहीं है। कितने तथकथित साधु बाबा उपदेश देने के साथ अपनी द

वा बेचते हैं सभा में हर किसी को कोई भी ईलाज बताकर। सड़क किनारे कोई भी आपको ठग सकता है मगर बात इतनी ही नहीं है यहां तो बड़े बड़े अस्पताल डॉक्टर क्या करना है क्या करते हैं कोई परखने जांचने वाला नहीं है।

  ये भगवान हैं कहते हैं और इनको यकीन है भगवान की तरह ये जो भी कर सकते हैं कोई सवाल नहीं कर सकता है। संक्षेप में कुछ बातें समझते हैं। नर्सिंग होम क्लीनिक में क्या क्या हो कितनी जगह कितने नर्स स्टाफ हो और उनकी शिक्षा अनुभव क्या हो कोई नहीं सोचता समझता ईलाज नहीं खिलवाड़ किया जाता है डॉक्टर नहीं है तब उनकी जगह कोई भी रोगी की जांच और उपचार करता है। बड़े अस्पातल नर्सिंग होम

में कितने बिस्तर का अस्पताल है कितनी जगह हो कितने स्टाफ होना चाहिए और चौबीस घंटे खुले होने का अर्थ कितने डॉक्टर होने चाहिएं देखने लगे तो हालत चिंताजनक है। संभव ही नहीं है सही उपचार जब तक आपका बुनियादी ढांचा ही सही नहीं हो। जैसे हर कारोबार में नियम हैं कितने दाम ले सकते हैं कोई नहीं पूछता अस्पताल डॉक्टर के लिए कोई सीमा तय है कितने पैसे ले सकते हैं। केमिस्ट लैब से हिस्सा तो जैसे उनको ज़रूरी लगता है। मुझे हैरानी हुई किसी धर्मार्थ अस्पताल में डॉक्टर को  वेतन के साथ दवा लैब से कमीशन का खाता अलग बनाया हुआ था अर्थात धर्मार्थ की बात करने वाले भी लूट में शामिल थे।

ये सबसे अराजकता की बात है कि देश में राज्यों में अस्पताल नर्सिग होम को लेकर कोई मापदंड नहीं है कि ये किस स्तर का है और उसके चार्जेस कितने हों। कितने डॉक्टर पीआरओ रखते हैं जो उनके लिए रोगी लाने का उपाय करता है मगर किसी भी नर्सिंग होम डॉक्टर के पास अपने पास दाखिल रोगियों से पूछने वाला कोई मैनेजमेंट का स्टाफ नहीं होता जो उनसे जानकारी ले कि आपको उचित उपचार दवा सुविधा मिल रही है। मनमाने पैसे लेकर भी बदले में उचित सुविधा नहीं उपलब्ध करवाना ये आम बात है आपको जो भी जैसा है चुप चाप झेलना है क्योंकि तब आपको अपनी समस्या का समाधान ज़रूरी लगता है। इंसान रोग होने पर भीड़ में जानवर से खराब हालत में रहने को मज़बूर हैं। नहीं इनको अस्पताल नर्सिंग होम नहीं कोई और नाम देना चाहिए। मगर सरकार अंधी नहीं है उसके पास आम नागरिक की सुरक्षा के लिए अपने ही नियम कानून कड़ाई से पालन करवाने का कर्तव्य है जिसे कोई ध्यान नहीं देता है।

आपको टीवी पर विज्ञापन दिखाई देते हैं बीमा करवाने के मगर बीमा कंपनी कभी समय पर अपना फ़र्ज़ निभाती नहीं है। जब आपको ज़रूरत है बेइमान लोग आपको ही गलत ठहराने की कोशिश करते हैं और कभी भी आसानी से आपको बीमे का लाभ नहीं देते हैं कई बार तो कोई भी बहाना बनाकर आपको परेशान करते हैं और सालों साल आपको अदालत से राहत की लड़ाई लड़नी पड़ती है। सच कहा जाये तो स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली इतनी खतरनाक है कि लगता है जैसे इस देश में इंसान की जान की कोई कीमत ही नहीं है। और किसी भी धंधे में ऐसा मुमकिन नहीं है कि मनमाने मूल्य या दाम या कीमत लेकर भी आपको घटिया किस्म की सेवाएं कोई दे सकता हो। बहुत कुछ नहीं यहां सभी कुछ बदइंतज़ामी है और सरकार राज्य के विभाग अपना काम करना नहीं चाहते हैं। नेताओं को सत्ता की राजनीती और पैसे बनाने की लत लगी है और जो भी उनको रिश्वत चंदा देता है जो मर्ज़ी करने की छूट ले सकता है। कई साल पहले इक स्वस्थ्य मंत्री ने इसको लेकर कानून बनवाने की कोशिश की थी मगर उस कानून को संसद की कमेटी को भेजकर उनको ही स्वस्थ्य मंत्री पद से हटवा दिया गया था क्योंकि तमाम देश के डॉक्टर्स का संगठन ने पैसा इकट्ठा कर ऊपर पहुंचा दिया था। मीडिया को इसकी खबर की ज़रूरत नहीं थी उनको खबर नहीं विज्ञापन की कमाई ज़रूरी लगती है।

आपने कितने जाने माने अभिनेताओं को खिलाडियों को ऐसे विज्ञापन देते देखा है जिन का उन्होंने कभी खुद उपयोग शायद ही किया हो। आपको कीमत देनी है और आपका झूठ सच साबित हो जाता है। आखिर में इक शेर दुष्यंत कुमार का पेश है।

इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं 

आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार। 

अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार 

घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहार।


Wednesday, 24 June 2020

जाने कहां खो गए ऐसे लोग ( सफर मुसाफ़िर ) डॉ लोक सेतिया

  जाने कहां खो गए ऐसे लोग ( सफर मुसाफ़िर ) डॉ लोक सेतिया 

   नहीं आज उनका किसी का भी कोई जन्म दिन नहीं है न ही उनकी निजि ज़िंदगी की बात है। मगर ये दिन उनकी याद के बिना पूरा नहीं हो सकता है। आज लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी के बहाने ऐसे कई लोग याद आये हैं। 25 जून 1975 को आपत्काल घोषित हुआ उस से अधिक महत्व इस बात है कि आज़ादी के पहली बार किसी ने अपने देश की अपनी ही चुनी हुई सरकारों के ख़िलाफ़ शांतिपूर्वक अंदोलन करने की राह दिखलाई थी और दूर से तमाशा देख कर नहीं खुद इक ज्वाला में कूदकर उस आग को जलाया था जो आज भी हमारे सीनों में जलती है दुष्यंत कुमार के शब्दों में। मुझे अफ़सोस होता है जब लोग गांधी नेहरू भगत सिंह लक्ष्मी बाई जैसे कितने महान लोगों की बात करते हैं मगर जेपी कौन थे उन जैसे कितने लोग जो हमेशा अपने आदर्शों विचारों की कठिन डगर पर बिना किसी स्वार्थ चलते रहे जीत हार की चिंता नहीं की न ही कौन साथ चलता है कौन छोड़ जाता है इसकी परवाह की उनको कुछ भी पता नहीं होता है। हां उनको अमिताभ बच्चन की ज़िंदगी का सब मालूम होता है ये विडंबना है कि 11 अक्टूबर को लोग असली जन नायक की नहीं फ़िल्मी तथाकथित सदी के घोषित महानायक की बात करते हैं। ऐसे लोग बातें भली भली करते हैं मकसद पैसा शोहरत हासिल करना होता है। नकली नायक नकली बाबा नकली नेता देशसेवक होने का दावा भी झूठा वास्तविक चाहत लालच लोभी सत्ता धन और कारोबार या ऐसी राजनीति जिस का कोई नैतिक आदर्श से मतलब नहीं यही लोग हर तरफ दिखाई देते हैं और महान कहलाते हैं। जाने कहां खो गए ऐसे लोग जो अपना घर जलाकर रौशनी करते थे। जाँनिसार अख्तर के शब्दों में।

                      जल गया अपना नशेमन तो कोई बात नहीं 

                      देखना ये है कि अब आग किधर लगती है। 

                       सारी दुनिया में गरीबों का लहू बहता है 

                       हर ज़मीं मुझको मेरे खून से तर लगती है। 

Rekhta  रेख़्ता में मुझे तलाश करने पर जाँनिसार अख़्तर के ये अल्फ़ाज़ नहीं मिले। आपको जावेद अख़्तर को लेकर मालूम है उनके वालिद क्योंकि शोहरत और सफ़लता की बुलंदी पर नहीं थे लोग नहीं जानते हैं। 
कुछ ऐसा ही मजाज़ लखनवी जी को लेकर है। असरार उल हक़ मजाज़ , महिलाओं के लिए उनसे अच्छा पैग़ाम किसी ने दिया हो मुझे नहीं दिखाई दिया मीर ग़ालिब से आज तक। दो शेर उनकी नज़्म से भी पढ़ते हैं। 

                             तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन 

                       तू इस आंचल को इक परचम बना लेती तो अच्छा था। 

                           तेरा ये ज़र्द रुख ये खुश्क लब ये वहम ये वहशत 

                           तू अपने सर से ये बदल हटा लेती तो अच्छा था। 

आपको तो उन सत्येंद्र दुबे का भी नाम याद नहीं जो सच की खातिर क़त्ल कर दिया गए। ये 2003 की बात है 27 नवंबर को 30 साल की आयु में अपने जन्म दिन को ही। कारण उन्होंने इक पत्र लिखा था अटल बिहारी वाजपेयी जो को पीएमओ से गोपनीय खत पहुंचा भ्रष्टाचार करने वालों तक जिन्होंने उनको क़त्ल कर अपना रास्ता साफ कर दिया। राष्ट्रीय राजमार्ग योजना की बात है जिन बड़े खुली सड़कों पर आज भी आप शान से चलते हैं कभी सोचा किसी ईमानदार आईएएस अधिकारी का खून बहा होगा उन्हीं पर। 

   कोई यकीन करेगा ऐसे लोग जो उसूलों की राह पर बिना डरे बिना विचलित हुए चलते रहे जबकि उनको खुद कोई पद कोई तमगा कोई भी सत्ता का अधिकार नहीं चाहिए था। जयप्रकाश नारायण जी को कितने बड़े बड़े पद प्रस्ताव सामने रखे गए मगर उनको कोई पद नहीं चाहिए था। उनको देश की गरीबों की शोषण की सत्ता के अनुचित आचरण के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद करनी थी। जो सोये हुए हैं उनको जगाना था मगर क्या हम जागे हैं या फिर किसी नशे की गहरी नींद में बेसुध हैं। आज भी बहुत लोग दावा करते हैं जेपी की संपूर्ण क्रांति की सोच को कायम रखने की मगर अधिकांश का मकसद और होता है जैसे उनके आंदोलन में जो लोग शामिल थे उनकी वास्तविकता सामने आई तो बेहद निराशा हुई उनको सभी को। कितने नाम हैं मत पूछो आपको विश्वास नहीं होगा कि क्या ये वही लोग हैं जो एमर्जेन्सी में डरते छिपते थे आज शासक बनकर तानशाही ढंग से आचरण करते हैं। बड़े नज़दीक से देखा जाना समझा है उनको मैंने अब शायद उनको मेरी पहचान भी याद नहीं होगी कभी मेरे पास खुद चल कर आये थे सहायता ली थी छिपने को और कई तरह से।

आज जयप्रकाश नारायण सत्येंद्र दुबे और ऐसे सच्चे देश समाज के शुभचिंतक कहीं नहीं नज़र आते हैं जबकि आज उनकी ज़रूरत पहले से अधिक है। इक बात इक नेता ने कही थी , आसान है किसी भी नेता या महान व्यक्ति की छवि को धूमल करना मगर क्या आप ऐसा एक भी व्यक्ति बना सकते हैं सोचना ज़रूर।

Tuesday, 23 June 2020

मौत के सर यही इल्ज़ाम है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

  मौत के सर यही इल्ज़ाम है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

मौत के सर यही इल्ज़ाम है 
खूबसूरत भी  है बदनाम है। 

इक कहानी हक़ीक़त बन रही 
आज भेजा  मुझे पैग़ाम है। 

मयकदा मय नहीं साक़ी नहीं 
और टूटा हुआ  हर जाम है। 

राह देखी सुबह से शाम तक 
इक यही अब हमारा काम है। 

कल बुलाया मुझे कहने लगे 
देखना है   तमाशा आम है। 

ख़त कई साल पहले था लिखा 
पर पता है  न कोई नाम है। 

अब तो आवाज़ "तनहा" की सुनो 
ढल रही ज़िंदगी की शाम है।

जनाब सच सच बोलो नहीं कुछ भी छिपाना है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      जनाब सच सच बोलो नहीं कुछ भी छिपाना है ( तरकश ) 

                                          डॉ लोक सेतिया 

    सियासत की आदत होती है बताते कम हैं छिपाते ज़्यादा हैं। मगर ये क्या सभी ऐसा करने लगे हैं। टीवी चैनल अख़बार मीडिया बताते नहीं समझाने की कोशिश करते हैं कि उनका झूठ झूठ होकर भी झूठ नहीं है उनका बाज़ार ही झूठ का है जिस में सच का कोई काम ही नहीं है। लेकिन अदालत को क्या हुआ है आप को देश के कानून की इंसाफ की बात कहनी है आपने इक दिन भगवान को अपनी ढाल बना लिया और घोषणा कर दी हमने अनुमति दे दी तो भगवान भी माफ़ नहीं करेगा। भगवान से गवाही की बात कहां थी बताओ किस भगवान ने आपको कैसे बताया कि उनकी माफ़ी कब किसे मिलेगी किसे नहीं मिलेगी। भगवान अब आपको माफ़ी दे देगा जब आपने अपनी कही बात बदल कर अनुमति दे दी है। भगवान नहीं हुआ आपके झूठे गवाह हो गए जो हर मुकदमे में घटना के चश्मदीन गवाह होते हैं। भगवान और आस्था का मज़ाक बना दिया है आपको कोई धर्म की मंदिर मस्जिद की राजनीति करनी है आपको देश की कानून व्यवस्था संविधान की रक्षा करनी है मगर आप तो लगता है सत्ता की भाषा पढ़ने सीखने बोलने लगे हैं। देश में बहुत कुछ था भगवान भरोसे अब न्याय व्यवस्था भी भगवान के भरोसे होगी क्या। पता नहीं ऊपर वाला कब इंसाफ करेगा लोग तो थक गए हैं विनती करते करते न्याय नहीं मिलता झूठी तसल्ली भी कोई नहीं देता बस खुद ही दिल को बहलाते हैं वो है सब देख रहा है। देखती तो सरकार भी है अदालत पुलिस भी मगर जो करना है करती नहीं अब भगवान को जाने कब चिंता होगी दुनिया को सही करने को भलाई का साथ और बुराई का अंत करने को अपना पलड़ा इंसाफ के तराज़ू का सही रखने की। कोई धर्म के नाम पर डंडी नहीं मार सके ऐसा कब होगा। 

       दादा जी को मरे हुए भी पचास साल हो गए हैं। उन्होंने जीवन भर ईमानदारी और मेहनत से बहुत कुछ खड़ा किया था। उस ज़माने में रिश्तों की अहमियत होती थी और दादा जी की आदत थी भलाई करने की जो भी सहायता मांगता देते थे मगर जब उनकी तबीयत बिगड़ी कुछ रिश्तेदार समझे उनका बचना मुश्किल है और वो जो भी उनके हाथ लगा ले कर चंपत हो गए। मगर दादा जी बच गए मगर उनकी आदत थी माफ़ करने की खुद ही अपने बेटों को आदेश दिया उनसे कोई झगड़ा नहीं करना। कहावत सुनाते थे दो पैसे की हंडिया गई कुत्ते की जात  पहचानी गई। ऐसे कुत्तों को घर गली में दोबारा नहीं घुसने देने की नसीहत दे गए थे। कुत्तों से सावधान रहने का सबक समझा गए थे ये भी कि कुत्तों की वफ़ादारी बदल जाती है जब चोर उसको खाने को हड्डी डालते हैं। इधर सत्तधारी नेताओं ने मीडिया को पालना शुरू कर दिया है जो सत्ता के सामने दुम हिलाते तलवे चाटते हैं और विरोधी पर भौंकते हैं। ये विदेशी नसल के कुत्ते लगते हैं और देसी भाषा में भौंकते हैं। जाने कितने लोग देश का धन क़र्ज़ लेकर भाग गए विदेश और हम देखते रहे कुछ नहीं कर सके। पहली बार कोई अमीर उद्योगपति कंगाल होने की बात स्वीकार कर पड़ोसी देश के बैंक को पैसा लौटने से इनकार कर रहा है तब लोग उसको भरत रत्न देने की बात करते हैं उनके लिए ये भी गैरव की बात है कि जिस दुश्मन से देश की सरकार कितनी योजनाओं में साथ रखती है उसे कमाने देती है और ठगी जाती है दोस्ती भाईचारे के जाल में मगर कुछ समझ नहीं पाती  क्या करे आगे कुंवां पीछे खाई वाली दशा है , कोई सरकार का खास अमीर उसको चपत लगाने का काम कर गया है। अब क़र्ज़ नहीं चुकाने वालों को भी महान समझने लगे हैं लोग हद है कुछ बचा है समाज की सोच के नीचे गिरने में।  

     आपको ये बताना ज़रूरी था क्योंकि कुछ लोग जो आज सत्ता में हैं पचास साल पहले के शासक को हर बात का दोष देकर समझते हैं बड़ी अच्छी बात करते हैं। जिस बुनियाद पर खड़े हैं ये उनकी ही खड़ी की हुई है मुमकिन है जिनका गुणगान करते हैं ये लोग उन्होंने इस बुनियाद को उखाड़ने और देश की ऊंची ईमारत को बर्बाद करने को तमाम कोशिशें की हों। और जिनको ऐसे लोग महान मानते हैं उनकी किसी बात का कोई भरोसा ही नहीं है उनके ब्यान बदलते भी हैं तो भी नहीं सोचते कि इनका सच क्या है। सच बताते नहीं छिपाते हैं और झूठ को सच से बड़ा साबित करते हैं तब भी ये लोग देश नहीं दल और नेता की हद से बढ़कर चाटुकारिता करते हुए अपनी देशभक्ति को ही शर्मसार करते हैं। उनको देश की बर्बादी की चिंता नहीं है कोई बर्बादी की चर्चा करता है ये उनको अच्छा नहीं लगता है। सावन के अंधे हैं उनको हर तरफ हरियाली दिखाई देती है। इतिहास से सबक लेते तो गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले से प्यार की पींग में झूला झूलने की गलती नहीं करते जो किसी का वफ़ादार नहीं उस की वफ़ा की उम्मीद वही करते हैं जिनको वफ़ा का अर्थ नहीं मालूम होता है। आजकल बड़े बड़े पद पर लोग शपथ संविधान की खाकर भी वफ़ादारी किसी नेता या दल या कोई संस्था किसी संगठन के लिए रखते हैं। पुलिस अधिकारी आतंकवादी लोगों को पैसे लेकर उधर से इधर पहुंचाने का काम करते पकड़ा जाता है मगर पुलिस तीन महीने बाद भी अदालत में केस दर्ज नहीं करवाती और उसको ज़मानत मिल जाती है।

    जनाब बताते हैं कोरोना से दुनिया के लोग योग से फायदा उठा रहे हैं। कोई आधार नहीं किसी ने कोई दावा साबित नहीं किया बस यारी है निभानी है योग से किसी को फायदा हुआ है तो उसी को जिसने योग को बेचा है बाज़ार लगाकर मालामाल हो गया है। योग करना नहीं आपको योग को बेचना सीखना होगा या फिर देशभक्ति को भी दलगत राजनीति का जुमला जिस का शोर करना है देश की खातिर करना कुछ भी नहीं। सच से नज़र छिपाते हैं झूठ को गले लगाते हैं अच्छे दिन की बात नहीं करते रोज़ तमाशे दिखलाते हैं। भगवान इनको माफ़ करना ये नहीं जानते ये क्या कर रहे हैं कहना चाहते हैं मगर सवाल फिर देश की अदालत का सामने है क्योंकि वही तय करती है भगवान माफ़ नहीं करेगा और बाद में भगवान को भूल जाती है आदेश जारी कर देती है। भगवान कोई पुनर्विचार याचिका दायर नहीं कर सकते उनका अधिवक्ता कोई नहीं है।  

Saturday, 20 June 2020

बौछार सावन की लोग कागज़ के ( अजब-ग़ज़ब ) डॉ लोक सेतिया

 बौछार सावन की लोग कागज़ के ( अजब-ग़ज़ब ) डॉ लोक सेतिया 

निकले थे ज़िंदगी की तलाश में आ पहुंचे हैं मौत के करीब। धन दौलत महल चौबारे रौशनियां और शोर कहकहों का अब लगता है ये सभी कागज़ के फूल जैसे हैं बारिश की इक बौछार इनका वजूद मिटा सकती है। खुश रहने को दिल को क्या क्या झूठा तसल्ली देते रहे क्या क्या नहीं है पास क्या क्या नहीं मिलता है दुनिया के बाज़ार में खरीदार हो बिकता है इंसान भी ईमान भी। तराशा है अपने हाथ से अपना भगवान भी और खुद ही अपने भीतर छुपाए हुए हैं कोई शैतान भी। बदन समझ बैठे जिसको लिबास है जैसे किसी मिट्टी की दीवार पर सीमेंट का पलस्तर किया हुआ देखने को मज़बूत मगर खोखलापन बेताब बाहर निकलने को। अपने को तंदुरस्त रखने को क्या क्या नहीं किया चिंता मिटी नहीं बीमा भी करवा कर भी , क्या ग़ज़ब की सलाह देते हैं महंगा नहीं है अब तो करवा लो आप मर गए तो क्या होगा आपके अपनों का। आज की छोड़ अनदेखे कल की व्यर्थ की चिंता जैसे इंसान हो नहीं हो पैसा होना चाहिए आपके परिवार को बच्चों को आपकी नहीं पैसों की ज़रूरत होगी ज़िंदा हैं तो जैसे भी जितना भी जमा करते रहो और मर जाना मगर छोड़ जाना खूब जीने का सामान किस किस के लिए। कोई नहीं समझाता अपने बच्चों को परिवार को ये भी सिखाना चाहिए कि हालात बदलते रहते हैं हौसला रखना चाहिए और ज़िंदगी की मुश्किलों से घबराना नहीं उनसे टकराना चाहिए। 

नतीजा अभी भी नहीं समझे हैं। पैसा है आधुनिक साज़ो-सामान है घर कार सुख सुविधा और सेहत बनाने को सैर खाना पीना योग और क्या क्या टॉनिक और जिम जाना मौज मस्ती ठहाके लगाना इसको सभी कुछ मान लिया है। आत्मा मन क्या है कुछ भी नहीं बेकार की चीज़ें हैं उनको कूड़ेदान में फेंक दिया जाने कब अब याद भी नहीं है। लिबास को महत्व दिया वास्तविक इंसान को मन विचार को जाना नहीं समझा नहीं देखा नहीं। आपको सारी ताकत शोहरत किसी तिनके की तरह हवा चलते ही बिखर जाती है नज़र नहीं आता अपना निशां तक दूर दूर तक। चमकीले रंग बिरंगे पैकिंग में गत्ते के डिब्बे जैसी हालत है हमारी दिखाई देते हैं सुंदर बाहर से अंदर कितना मैल भरा हुआ है खोलते हैं कोई उपहार तो बेकार कितना फैंकते हैं कूड़े में। अपने भीतर से भी वास्तविक वस्तु मन आत्मा को रख बाकी गंदगी को निकालते और फैंकते किसी कूड़ेदान में। अस्पताल दवाओं का भंडार और डॉक्टर जीवन रक्षक उपकरण सभी हैं मगर मौत कब कैसे आती है कुछ भी काम नहीं आता और मौत के नाम से घबराते हैं भयभीत हैं क्योंकि अंदर से खोखले हैं अन्यथा समझते कि ज़िंदा रहना क्या है ध्यान देते मौत से डर कर बार बार नहीं मरते। अपने लिए जीना ज़िंदगी नहीं होता है ज़िंदगी वही है जो औरों की खातिर जी जाये किसी के काम आये किसी को ख़ुशी देने किसी का दर्द बांटने का नाम है वास्तविक जीना सार्थक ढंग से। झूठ का तिलक लगाकर लोभ अहंकार को हथियार बनाकर खुद अपने आप पर मोहित होना यही सबसे बड़ा रोग है जो हमने पाला हुआ है। अपने मन की आत्मा की खिड़कियों को बंद रखते हैं जैसे बारिश की बौछार से अपने कमरे की सजावट को बचाने को घुटन में रहना विवशता है।

Sunday, 14 June 2020

ख़ुदकुशी पर गंभीर चिंतन ( विचार-विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

   ख़ुदकुशी पर गंभीर चिंतन ( विचार-विमर्श ) डॉ लोक सेतिया  

क्या आप भी कहोगे कायर लोग ख़ुदकुशी करते हैं क्या आप हौंसला रखते हैं जान देना मेरी जान आसान नहीं है। दो घटनाओं की बात करते हैं दोनों वास्तविक हैं। किसी देश में इक मनोचिकिस्तक ने ये इश्तिहार छपवा रखा था कि जिस किसी को भी ख़ुदकुशी करनी हो इक बार पहले आकर मुझसे अवश्य मिले। और उसके पास रोज़ कितने लोग निराश होकर आते और वो उनमें अपनी बातों से आशा का संचार कर उनको ख़ुदकुशी करने से रोकने को सफल हो जाता था। मगर इक दिन कोई आया जिसकी दर्द भरी बात सुनकर खुद मनोचिक्त्सक ही हार मान उसको कह बैठा क्षमा करें मुझे नहीं समझ आ रहा कैसे और क्यों आपको जीने को समझाऊं। अर्थात उसको ख़ुदकुशी से रोकने का कोई उपाय नहीं था उसके पास। जब उनसे मिलकर बाहर निकला तो उस डॉक्टर की स्वागत कक्ष की सहायिका ने पूछा आप क्या सोच रहे हैं। उस ने जवाब दिया अब तो मुझे ख़ुदकुशी करनी ही है जब उन्होंने ही मुझे जीने का कोई मकसद नहीं बतलाया जो सभी को मरने से रोकते हैं। उस महिला ने कहा क्या आप ख़ुदकुशी करने जाने से पहले मेरे साथ एक कप कॉफी पीने चल सकते हैं। और उसके बाद उस डॉक्टर की सहयोगी ने उस से दोस्ती कर ली और कहा कितनी अजीब बात है मुझे ज़िंदगी में पहली बार कोई अच्छा सच्चा दोस्त मिला है मगर आज ही उसको ख़ुदकुशी भी करनी है। और शायद जीवन भर मुझे ऐसा दोस्त मिलेगा भी नहीं। तब उसने कहा कि मुझे जब आप जैसी दोस्त मिल गई है तो आपके लिए मुझे ज़िंदा रहना ही होगा ख़ुदकुशी करने का कारण ही यही था कोई मुझे समझने वाला दोस्त नहीं मिला था। आपकी जानकारी के लिए उस डॉक्टर ने अपने उस काम को उसी महिला के नाम समर्पित कर दिया था। संजीवनी नाम से भारत में उसकी शाखा है दिल्ली में जिस का सहयोगी मैं भी रहा हूं कुछ समय तक दिल्ली में रहते हुए।     

  अब जो सच्ची घटना आपको बताने जा रहा हूं सोचते ही बदन में कंपकपी होने लगती है। बहुत साल पहले अख़बार में खबर पढ़ी इक पति-पत्नी ने साथ साथ ख़ुदकुशी कर ली। चौंकाने की बात थी दोनों डॉक्टर थे और ख़ुदकुशी करने का कारण आर्थिक दुर्दशा इतनी खराब थी कि उनके घर में अनाज का इक दाना नहीं था कोई सामान बचा नहीं था बेचने को। अस्पताल और रहने को घर दोनों किराये के थे और जीवन यापन को आमदनी नहीं थी। जाने क्या सोचकर मैंने उस शहर में अपने इक साथी डॉक्टर को फोन किया और पूछा था क्या आपको पता है ऐसा क्यों हुआ। उन्होंने बताया कि डॉक्टर इक अमीर बाप का इकलौता बेटा था मगर उसने पिता की मर्ज़ी के खिलाफ डॉक्टर लड़की से शादी कर ली जिसे प्यार करता था। और पिता ने उसको कुछ भी देने से साफ इनकार कर दिया था। ख़ुदकुशी से पहले अपने घर गया था बताया था उसे अपनी नहीं अपनी पत्नी की जान की खातिर आपसे मदद चाहिए अपनी जगह छोटी सी बनाने को ताकि किराये से निजात मिल जाये तो थोड़ी आमदनी में भी दोनों ज़िंदा रह लेंगें वर्ना ख़ुदकुशी की नौबत आ गई है। मगर पिता से निराश होकर उसने अपनी पत्नी के साथ जीने मरने की कसम निभाई थी। जी नहीं सकते तो मर तो सकते हैं। मुझे उस घटना पर लिखी अपनी ग़ज़ल बहुत पसंद है शायद आपको भी अच्छी लगे। 

                                     ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ख़ुदकुशी आज कर गया कोई
ज़िंदगी तुझ से डर गया कोई।

तेज़ झोंकों में रेत के घर सा
ग़म का मारा बिखर गया कोई।

न मिला कोई दर तो मज़बूरन
मौत के द्वार पर गया कोई।

खूब उजाड़ा ज़माने भर ने मगर
फिर से खुद ही संवर गया कोई।

ये ज़माना बड़ा ही ज़ालिम है
उसपे इल्ज़ाम धर गया कोई।

और गहराई शाम ए तन्हाई
मुझको तनहा यूँ कर गया कोई।

है कोई अपनी कब्र खुद ही "लोक"
जीते जी कब से मर गया कोई।  


Friday, 12 June 2020

ज़िंदगी से मिलो मर जाने से पहले ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

   ज़िंदगी से मिलो मर जाने से पहले ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

दोस्त मुझे अपना बनाने से पहले  
मुझे जान लेना भूल जाने से पहले 

ये जीने का अंदाज़ सीखो मुझसे 
मर जाना नहीं मौत आने से पहले। 

कभी आ भी आओ साथ मिलकर 
कदम दो कदम चलें हम दोनों भी 

गले से लगा लो बताओ सुनो भी 
हाल ए दिल छोड़ जाने से पहले। 

दुनिया अजब है हैं दस्तूर निराले 
हैं लिबास सफेद और दिल काले 

चलों अश्कों की बारिश में भीगें 
मिल के दोनों मुस्कुराने से पहले। 

शिकवे गिले यारो मुझ से कर लो 
जितने भी अरमान बाकी कहो तुम 

छुपाके दिल में शिकायत न रखना 
मेरी अर्थी को फिर उठाने से पहले। 

कुछ मीठी कुछ कड़वी कुछ बातें 
हंसती रुलाती कई यादें करना याद 

मेरे मजार पर शमां जलाकर मुझपे 
फूलों की इक चादर चढ़ाने से पहले। 

यही वक़्त है दो चार घड़ी हमारा 
सुनाओ कहानी तुम अपनी ज़ुबानी 

कोई और किस्सा नई बात कोई 
कहो उनके भूल जाने से पहले।

मुहब्बत ईबादत प्यार दोस्ती है 
इसी को कहते हैं जी रहे हैं हम 

मिलके जियो जीने के लिए अब तो 
मिलो ज़िंदगी से मर जाने से पहले।




काश कोरोना के आंकड़े की तरह कुछ आंकड़े और भी सामने होते ( बात देश की समाज की ) डॉ लोक सेतिया

  काश कोरोना के आंकड़े की तरह कुछ आंकड़े और भी सामने होते 

                            ( बात देश की समाज की ) डॉ लोक सेतिया 

     ये कमाल है हर दिन पल पल हर कोई देश की सरकार राज्य की सरकार कितने अधिकारी कितने विभाग कितने जानकर टीवी चैनल वाले यहां तलक हर कोई बताता है आज कितने लोग पॉजिटिव हैं कितने किस हालत में हैं। कितने ठीक हुए कितने नहीं हुए। ये डरावने घबराने के आशा- निराशा के सभी आंकड़े पल पल मिलते हैं। शायद देश समाज इंसानियत की दशा सुधर का बहुत बदल कर अच्छी हो जाती अगर हम सभी को और खुद सरकार को वास्तविक आंकड़े देश की जनता के सही मालूम होते और सभी को बताने में कोई संकोच नहीं करते , पता चलता भारत महान कितना महान है और क्या है महानता। बस ये आंकड़े भी ठीक इसी तरह देखते और सब को बताये जाते। कभी ये सब आंकड़े सामने आते तो पता चलता कि दुनिया भर में कोरोना ने उतने लोगों की जान नहीं ली है जितनी देश की सरकारों की लापरवाही और समय पर फ़र्ज़ नहीं निभाने अपना वास्तविक कर्तव्य नहीं निभाने से मरते रहे हैं और आज भी मरने को विवश हैं। 

   आज देश में कितने लोग भूख से मर गए। कितने हैं जिनको कोई अधिकार नहीं मिला जिनको जीवन की बुनियादी ज़रूरत को भी ठोकर के सिवा कुछ नहीं मिला। कितने बिना उपचार छोटी सी बिमारी से मर गए उनको ईलाज नहीं मिला गरीब होने से। कोई डॉक्टर उनको कर्तव्य समझ दवा नहीं देना चाहता सबको तगड़ी फीस और ऐशो आराम चाहिएं और सरकार को अपने लिए लूट का अधिकार गरीब देश की जनता को कुछ भी नहीं देकर खुद शानो शौकत से रहने को ताम झाम और खज़ाने की बर्बादी। कितने बच्चे शिक्षा से वंचित रहे कितने युवक पढ़ लिख कर काबिल होने के बावजूद भी बेरोज़गार हैं क्योंकि रिश्वत और पहुंच नहीं है। कितने नेताओं अधिकारियों  ने कितनी लूट जनता से खज़ाने से किस दिन की और कैसे राजनीति का कारोबार करते हुए अरबपति खरबपति बन गए। कितने सरकारी अफसर कर्मचारी अच्छा वेतन और तमाम तरह की सुविधाएं मिलने के बाद भी ईमानदारी से अपने देश समाज के लिए कर्तव्य नहीं निभाते हैं। उनकी मीटिंग्स का मतलब क्या है और उनका आम नागरिक से मिलना क्या फोन पर बात करना भी कितना कठिन है जबकि उनका दावा होता है जब जो चाहे मिलकर शिकायत कर सकता है। सबसे ज़रूरी जनता की भेजी कितनी शिकायत कैसे दफ्तर की फाइल में दबकर खत्म हो जाती हैं और कितनी ऑनलाइन ऐप्प्स पर की शिकायत बिना निदान ठीक हुई घोषित की जाती हैं।

    आप बताते हैं इतने सौ लोग इतने अमीर हैं उनकी अमीरी की दौलत कितने गरीबों से निवाला छीन कर शोषण कर हासिल हुई बताते। बताते किस किस नेता पर अधिकारी पर गरीब देश ने कितना खर्च किया हर दिन उनकी सुविधाओं पर मौज मस्ती पर। ठीक कहा आज़ादी के बाद विदेशी लोगों से बढ़कर आपने लूटा है बेरहम और बेशर्म होकर। बताया जाता आज कौन रोज़ करोड़ रूपये अपने पर खर्च करता हैं इंसानियत को भूलकर जब करोड़ों लोग बदहाल हैं। नहीं इसको भगवान और भाग्य की बात मत कहना ये आपके स्वार्थ में हद से बढ़कर अंधे होने की बात है। कोरोना की तरह देश की हर बात का सच सामने आता तो ये लोग चुल्लू भर पानी में डूब मरते जो किसी शायर की शायरी को रटते हैं समझते नहीं कि जो हुआ वही आप कर रहे हैं और कैसी गंगा निकालने की उम्मीद की जा सकती है। देश की जनता के अधिकारों के क़ातिल इंसाफ की बात करते हैं फैसला अपने को पाक साफ निर्दोष बताने का करते हैं। सही आंकड़े सामने होते इंसाफ के संविधान की भावना के क़त्ल के और तमाम वीवीआईपी लोग मुजरिम बनकर कटघरे में खड़े होकर जवाब देते कितना सभी के हिस्से का उन्हों ने छीनकर जमा किया हुआ है।

      मगर सबसे बड़ा अपराध जिन लोगों का है कोई उनकी बात ही नहीं करता है। टीवी चैनल वाले अख़बार वाले जिनको ये सब सामने लाना था उन्होंने अपना ज़मीर बेच दिया पैसे विज्ञापन और ख़ास होने को कितने अधिकार हासिल कर लूट में सांझेदार बनकर। सरकार कारोबार सबके झूठ को सच साबित करने के साथ उनका ढंग और तरीका खुद को सबसे ऊपर समझने का किसी लठैत से कम नहीं है। कोई उनसे पूछता कितनी कमाई आपको उन इश्तिहारों से हुई जिनका कोई मकसद ही नहीं केवल टीवी अख़बार को खुश कर खामोश रहने की खातिर उनको सरकारी विज्ञापन की बैसाखी चाहिए अन्यथा इक कदम नहीं चल सकते हैं। जिनके विज्ञापन खिलाड़ी और अभिनेता करते हैं क्या पता किया उनका सच क्या है। कब कहां किसी ने उनके दावे को जांचा परखा है कि उनका विज्ञापन कितना सच्चा झूठा है। आज तक का सबसे बड़ा घोटाला यही सरकारी विज्ञापन हैं कोई सच बताएगा कितने साल में कितना धन उनकी झोली में गया है जो बेशक देश के सभी घोटालों की राशि से अधिक होगा। जिन पैसों का उपयोग अस्पताल स्कूलों के बनाने को किया जाना था उनकी बंदरबांट होती रही इन सभी नेताओं अफसरों कर्मचारी वर्ग कारोबारी उद्योगपति लोगों में मीडिया वालों में।

  बड़ी घोषणाएं होती हैं मगर हैरानी हुई आज जानकर कि देश का पहला अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान देश के पास पैसे नहीं थे तब भी चार साल में विदेश से सहायता लेकर बनकर खड़ा हो गया था। उसके बाद किसी भी दल की कहीं की भी सरकार ने उस तरह का संसथान ए आई आई एम एस बनाने का ऐलान किया मगर अभी एक भी पूरा बनकर सामने नहीं आया हज़ारों करोड़ मिलने के बाद भी आधा अधूरा है हर जगह। तीस हज़ार करोड़ की मूर्ति बन जाती है सैंकड़ों करोड़ का पार्टी का भव्य भवन आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित खड़ा हो जाता है मगर अस्पताल नहीं बनते समय पर। कोरोना के आने पर पहला सवाल यही था देश की स्वास्थ्य सेवाओं की दशा बेहद खराब है। खराब क्यों है क्योंकि आपको जो बनाना है उसके लिए पूरी कोशिश की जाती है नागरिक को बुनियादी सुविधा महत्वपूर्ण नहीं है। कितना धन सभी दलों ने चुनाव पर खर्च किया कभी ये भी आंकड़े सामने आते तो पता चलता कोई भी सांसद विधायक निर्धारित राशि में चुनाव नहीं लड़ा अर्थात अवैध है उनका सांसद विधायक बनना ही। लेकिन सभी चोर चोर मौसेरे भाई हैं और जो उनको चंदा देते हैं वो साले जीजा जैसे हैं इक हाथ लेते हैं दूजे हाथ देते हैं और मीडिया किसी बिचौलिया की तरह हैं। ये लोग कोरोना जैसे नहीं उनसे अधिक जानलेवा हैं मगर उनके कारण कितने बेमौत मरे कोई बताता नहीं है। ऊपर वाला भी लगता नहीं इनका हिसाब करेगा क्योंकि अगर ऐसा होता तो इन की हालत अच्छी नहीं हो सकती थी।

Monday, 8 June 2020

वार्तालाप भगवान का ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    वार्तालाप भगवान का ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

उठो अब तो जागो आपको काम पर जाना है बहुत दिन घर पर आराम कर लिया मुझे भी कितना परेशान किया चलो कोई बात नहीं। बाहर आपके कर्मचारी संदेश लेकर आये हैं सरकार ने भगवान को भी अपने काम पर लौटने की छूट दे दी है मगर कुछ नियम हैं पालन करना है। ये किट मंगवाई है आपको खुद अपनी भी सुरक्षा करनी है तो इसको पहन लेना। तभी वही आवज़ सुनाई दी जो कभी कभी भगवान को भी सवाल पूछ कर खामोश कर देती है। भगवान जी जाने से पहले दुनिया का बदला हाल रंग ढंग समझते जाओ। मैंने इक स्मार्ट फोन मंगवाया है पास रखना बड़े काम की चीज़ है सब कुछ है उस छोटे से उपकरण में खबर से देश दुनिया की जानकारी और सहायता को कितनी ऐप्प भी हैं। खबर पढ़ना कोई महिला कितने स्कूलों में इक साथ पढ़ाती रही वेतन पाती रही साल भर एक करोड़ से अधिक अब मुसीबत में है शिकयत दर्ज है और मुकदमा चलेगा। आयकर वाले भी तैयार हैं पूछताछ करने को अवसर मिलते ही समझना चाहते हैं और ऐसी कितनी महिलाएं हैं कितने पुरुष भी होंगे जो एक साथ कई जगह काम करते हैं। भगवान हैरान होकर बोले भला मुझे इस से क्या लेना देना जो जैसा करता है उसको उसका नतीजा मिलता है। आप भी कितने भोले हैं आज आपको जाना है तो पहले सोच कर बताओ किस जगह जाओगे। मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे ये किसी धार्मिक स्थल या कोई गुरूजी का डेरा उपदेश और संदेश समझाने वाला। कानून सब पर इक बराबर लागू है आपको जैसे कोरोना को लेकर बने नियम समझने हैं उसी तरह बाकी कानून भी जानना ज़रूरी है। भारत देश में जो इक बार कानून के शिकंजे में फंस गया खुद आप भी उसको नहीं बचा सकते और मत भूलना कि वकील क्या होते हैं भगवान हो चाहे शैतान उनके आगे किसी की नहीं चलती है। पानी भरते हैं बड़े बड़े उनके सामने। 

  भगवान भूल जाओ कि आप भगवान हैं और हर समय हर जगह होते हैं हो सकते हैं आप हैं तो सब मुमकिन है ये डायलॉग भी किसी और के नाम हो गया आपको खबर नहीं हुई। बस वही हर जगह हर देश हर शहर इक साथ हो सकता है वर्चुअल रैली कर के। आपके पास ये सुविधा उपलब्ध नहीं है। आप कितनी जगह हैं और उन सभी धार्मिक स्थलों से आपकी आमदनी और जमापूंजी कितनी है आपको हिसाब बताना होगा और साबित करना होगा कैसे इतनी जगह इक साथ रहकर कल्याण राशि का उपयोग किया। कितना धन सोना चांदी हीरे जवाहारात आपने कितनी तिजोरियों में रखे हैं किसलिए। आपने आने वाले भक्तों से लिया कितना और उनको मिला क्या है आपसे। आपको धरती की आधुनिक कथा मालूम नहीं है कोई है लोग जिसके भक्त होने की चर्चा करते हैं उस के भक्त आपके भक्तों से बढ़कर आस्था रखते हैं। आपने कभी इश्तिहार छपवाया क्या क्या किया दुनिया को क्या क्या दिया है आप हैं भी या नहीं हैं इक कल्पना हैं ये भी लोग विचार करते हैं। मगर उसके बारे कुछ भी किया दिखाई नहीं देता तब भी लोग मानते हैं उसने बहुत किया है और उसके होने का सबूत गली गली टीवी अख़बार सोशल मीडिया हर जगह उसकी चर्चा उसका नाम फोटो और इश्तिहार हैं। आपने सभी की मन की बात मनोकामना समझी जानी है कभी खुद अपनी मन की बात नहीं शेयर की भक्तों से। उसने मन की बात करते करते अब चिट्ठी लिखनी भी शुरू कर दी है। भगवान आपके अमृत और भोग लगे मिष्ठान का असर नहीं रहता लेकिन उसने चाय पर चर्चा करवाई थी छह साल बाद भी उसकी चाय का असर किसी नशे की तरह बाकी है।

 आपके पास जो भी धन आया उसके बारे में आपसे पूछताछ हो सकती है कहीं किसी आतंकी संगठन या किसी नशे के कारोबारी ने आपको खुश करने को चढ़ावा तो नहीं चढ़ाया है। भगवान को भगवान याद आने लगे ये भूलकर कि भगवान तो खुद वही हैं। बस खामोश अचानक भगवान जी की पत्नी ने ज़ोर से बुलंद आवाज़ में कहा। ख़ामोशी छा गई अब पत्नी के सामने भगवान भी क्या मज़ाल कुछ बोलते और ये आवाज़ भी जिस की उसको पता है चुप रहना ही ठीक है। पत्नी जी बोली पति परमेश्वर जी आपको कहीं भी नहीं जाना है घर पर रहो ये बेकार के झंझट लफड़े झगड़े जिनके हैं उन्हीं को मुबारिक। और अच्छे पति की तरह भगवान अपने आसन पर विराजमान हो गए हैं। मंदिर मस्जिद खुलें या बंद रहें उनको कहीं भी नहीं जाना है , ये वास्तविकता भगवान भी और दुनिया भी समझ गई है कि उनके होने नहीं होने से कोई फर्क किसी को नहीं पड़ता हैं क्योंकि भगवान कोई सरकार नहीं हैं जो नियम कानून का पालन नहीं करने पर किसी को सख़्त सज़ा की धमकी दे सकती है।

स्वर्ग में सेवक नहीं नर्क में शासक ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  स्वर्ग में सेवक नहीं नर्क में शासक ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

     क्या ख़्वाब था कोरोना को अवसर समझने की बात करते करते गहरी नींद आई तो कोरोना सपने में खुद दर्शन देने चले आये। राजन कोरोना ने संबोधित किया , आपने कमाल ही कर दिया है मेरी शान को आपने खुद अपनी शान की तरह से ही ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। मुझे खुश किया है जो भी वरदान चाहो मांग सकते हो आपको अवश्य मिलेगा। नेता जी ने विश्व में परचम लहरा लिया था अब लगा स्वर्ग नर्क पर भी उनका आधिपत्य स्थापित हो जाये तो कितना अच्छा हो। कोरोना ने कहा आपको किसी एक का चुनाव करना पड़ेगा स्वर्ग में आपको सेवक बनकर रहना मंज़ूर है अथवा नर्क में शासक बनकर रहना चाहते हैं। नेता जी उलझन में पड़ गये सेवक होने से कब की तौबा कर चुके हैं मगर नर्क के शासन में जाने क्या होगा। कोरोना उनकी मन की बात जान गया और कहने लगा राजन स्वर्ग में आपको केवल सच बोलना होगा और इक झूठ पकड़ा गया तो सेवक भी नहीं रहोगे मगर नर्क में हज़ार झूठ भी आपको माफ़ हैं वैसे भी नर्क में आपको चाहने वाले तमाम लोग मिलेंगे कुछ जानते हैं कुछ जानने को उत्सुक हैं। तभी कोई आवाज़ हुई जैसे बिजली गिरी कहीं और नींद खुल गई। लेकिन नेता जी को स्वर्ग नर्क के शासन का आईडिया जंच गया और सुबह होते ही उन्होंने यही घोषणा कर दी अंतरिक्ष के मिशन की तरह चांद और मंगल अभियान जैसा मिशन 2020 स्वर्ग नर्क की खोज को लेकर भेजना तय है।
     
     नामुमकिन कुछ भी नहीं है चुनावी सभा में भाषण देते हुए नेता जी ने सब देशवासियों को इक नया मिशन 2020 का ऐलान किया है। आपको स्वर्ग नर्क को देखना है बताओ किस किस को देखना है मरने के बाद कहां जाना चाहिए सभी को मालूम होना चाहिए , बताओ होना चाहिए। चांद मंगल सबको पता है मगर स्वर्ग नर्क कोई नहीं जानता कहां हैं। हमारे साईंसदान और पंडित ज्योतिष जानकर मिलकर इस की खोज कर रहे हैं। आपको नहीं मालूम इसका कितना महत्व है हम जो भी खोज करते हैं उसका पेटंट अपने नाम करवा सकते हैं और उसके बाद उसका उपयोग पर्यटन से लेकर वहां जाने की आवास की व्यवस्था करने से होने वाली आमदनी देश का नाम ऊंचा करने और विकास को बढ़ावा देने पर खर्च की जा सकती है। जो कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी हमने उसे कर दिखाने का संकल्प लिया है। बजट की क़र्ज़ की व्यवस्था की बात मत करना जब अर्थव्यवस्था डूबने लगती है तो कोई ऐसा ही बड़ा कदम उठाना पड़ता है। जुआ खेलना अच्छा है खराब है कुछ भी है ये बाज़ी शतरंज की नहीं है मोहरे मात खा सकते हैं मगर जब कोई शकुनि मामा पासे फैंकता है तब वही होता है जो उसकी मर्ज़ी होती है। ये भी जुआ ही है मगर इस में मिशन की सफलता से हमारा देश विश्व गुरु ही नहीं महाशक्ति बन सकता है। अभी मेरे साथ महापंडित जी हैं जो आपको विस्तार से स्वर्ग नर्क की बात समझाएंगे।

        महापंडित जी ने बताना शुरू किया , स्वर्ग वही है जो आपके सामने इस धरती पर आपको नज़र आता है जिस में नेता जी जैसे लोग रहते हैं धनवान लोग उद्योगपति बड़े बड़े धंधे वाले कर्म कुछ भी नहीं करते हैं फल सभी उनकी झोली में होते हैं। नर्क भी आपको मालूम है देश की जनता ऐसे मतलबी लोगों पर भरोसा करती है और हमेशा नर्कीय जीवन जीने को विवश है। स्वर्ग नर्क मिलता है अच्छे बुरे कर्म से समझाया गया है मगर देखने को कुछ और मिलता है। स्वर्ग नर्क की खोज करना ही काफी नहीं होगा वहां का शासन भी अपने हाथ में होगा तभी बात बनेगी और नेता जी का आकाश से ऊंचा ख्वाब है स्वर्ग नर्क दोनों ही जगह अपनी सरकार स्थापित करना। अर्थात ऊपर जो भी दुनिया है वहां भी चुनाव करवाने और अपनी सरकार बनवाने की योजना है। अगर ये असंभव संभव हो गया तो नेता जी आपको अपनी इच्छा से जहां चाहोगे वहीं भेजने का वादा करेंगे अगर आपने उनको वोट देकर यहां राज्य में जितवाया और सरकार बनवाई तो आपको सीधे स्वर्ग भेजने का उपाय सोचा हुआ है। नेता जी की योजना है नर्क के शासक खुद बनकर स्वर्ग में अपने खास भरोसे के व्यक्ति को पदभार संभलवा दोनों हाथ में लड्डू रखने हैं।

      ये नेता जी का ही असर है जो लोग उनकी हर बात पर वाह वाह कहते हैं। सोचते तक नहीं कि चाहे स्वर्ग हो या नर्क हो मिलेगा तो मरने के बाद ही। ज़िंदा रहते कोई स्वर्ग नहीं जा सकता और नर्क भी मौत के आने के बाद ही मिलेगा। हां अच्छी बात है नेता जी सभी को मर्ज़ी जानकर भेजा करेंगे मगर कोई कभी उनका विरोध करेगा या आलोचना तब उसके लिए मर कर भी कहीं भी जगह नहीं होगी। उनको स्वर्ग नर्क दोनों के दरवाज़े बंद मिलेंगे। नेता जी को लगता है कोरोना को अवसर से भी बढ़कर अपने लिए उपलब्धि साबित किया जा सकता है।

Sunday, 7 June 2020

काश ऐसे में तो सच बोलते ( खरी-खरी ) डॉ लोक सेतिया

    काश ऐसे में तो सच बोलते ( खरी-खरी ) डॉ लोक सेतिया 

  सुनते थे जब मौत सामने दिखाई देती है तो बड़े से बड़ा गुनहगार भी तौबा करता है। मगर अब देख रहे हैं कि कोरोना का भी मतलबी और स्वार्थी लोगों पर कोई असर नहीं हुआ है। कोई इसको अपना कारोबार बढ़ाने का मौका समझ रहा है तो कोई जानते हुए भी कि उसकी बात सरा सर गलत है कोरोना के ईलाज या कोई उपाय या कोई ज्योतिष की भविष्यवाणी करता है। लगता है उनको मौत से डर लगता भी होगा तब भी भगवान से तो कोई डर लगता नहीं है तभी चाहते हैं जब तक कोरोना उन तक नहीं पहुंचता जो भी हासिल किया जा सकता है कोरोना का भी कारोबार कर किया जा सकता है।

  उधर सत्ता का खेल खेलने वाले जैसे कोरोना से कोई गुप शुप समझौता हो गया है ऐसा दिलखा रहे हैं कि मौत आनी जानी चीज़ है मोक्ष की चाह समझ कुर्सी पाने का जतन करते रहना चाहिए। भगवान के किवाड़ भी खुल गये हैं सरकार की मर्ज़ी है अब किसी भगवान की कोई मर्ज़ी नहीं चलती मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे गिरजाघर सभी को आने वालों के कोरोना से बचाव के ढंग अपनाने ज़रूरी हैं। अर्थात भगवान के घर भी भगवान भरोसे कुछ नहीं है। चढ़ावा चढ़ाना है इस पर कोई रोक नहीं बाकी सब नियम अनुसार होना नहीं होना तय है। तो ये भी गलत साबित हुआ कि कोरोना ने लोगों को बदल दिया है अच्छाई सच्चाई की राह चलने को विवश कर दिया है। हम लोग इतने बिगड़ चुके हैं कि अब बदल नहीं सकते सुधर नहीं सकते अब तो भगवान भी जान गया होगा ये इंसान अब मेरे बस में नहीं रहे हैं। भगवान नहीं जानता अब उसका भविष्य क्या है शायद सभी का भाग्य लिखते लिखते खुद अपना भाग्य लिखना रह ही गया है। ओ दुनिया के रखवाले सुन दर्द भरे मेरे नाले , आस निराश के दो रंगों में दुनिया तूने सजाई , नैया संग तूफ़ान बनाया मिलन के साथ जुदाई। जा देख लिया हरजाई ,लुट गई मेरी आस की नगरी अब तो नीर बहा ले। आग बनी सावन की बरखा फूल बने अंगारे , नागिन बन गई रात सुहानी पत्थर बन गए तारे। सब टूट गए है सहारे , ओ दुनिया के रखवाले। कोरोना क्या आया अब ये फ़िल्मी गीत भजन लगता है झूठी तसल्ली दिलाने को लिखे गाये गए थे। ये सच में किसी के काम आये भी या नहीं कोई नहीं जानता है।

   जीवन भर प्यार का अमृत कलश हमारे करीब रहा और हमने इक बूंद भी पीना चाहा न कभी। हम भागते रहे दौलत और चमक-दमक के विष के पीछे और हमारे अहंकार और शोहरत के मद ने भर दिया हमारे अंदर नफरतों का अथाह सागर । नफरतों को पाला हमने बड़े जतन से और समझते रहे कि पा लिया है हमने जीने का सामान । और इक दिन हमारे भीतर की नफ़रत के ज़हर ने खोखला कर दिया हमारे तन मन को और हम रह गए एक बेजान इंसान बन कर जिस में कुछ भी नहीं था अपने लिए । अंत में जब सारी पूंजी अपनेपन और प्यार की खो गई तब जाना कि जो था पास हमने उसकी कीमत नहीं समझती थी वही तो था अमृत कलश जिस की इक इक बूंद में था वास्तविक जीवन । यही है रहस्य कस्तूरी मृग की तरह से हमने अपने भीतर के अमृत कलश को छोड़कर दुनिया भर में ढूंढते रहे अपनी पहचान । जो था वो बेकार समझते रहे जीवन भर स्वर्ण मृग की तलाश में छानते रहे इस दुनिया का रेगिस्तान । प्यास बुझी नहीं समंदर पी लिया हमने फिर भी नफ़रत का और मुहब्बत का जाम तोड़ डाला हमेशा ही अपने हाथों से ।

  हम देखते हैं समझते नहीं हैं कितनी बड़ी हैरानी की बात है जो कोई भजन कीर्तन सुनाने का काम करते हैं खुद उनको नहीं ध्यान होता कि जो सुना रहे खुद उसका उल्टा कर भी रहे हो। सुनने वाले भी ध्यान कहीं और होता है क्या समझते इस का हासिल क्या है। सच को सच कहना ओखली में सर देना है कितनी बार कोई तोता रटंत करते रहेंगे जब अर्थ नहीं समझते विचार नहीं करते। धर्म भगवान भजन कीर्तन सब को बस दिखावे को आडंबर बना दिया है। इंसान इंसानियत और सभी को आदर देना नहीं सीखा ये कैसा उपदेश है कैसा गुरु बना लिया है। झूठ क्या है सच कहां है अब इसकी चिंता कौन करता है ज़िंदगी का कोई भरोसा नहीं कब तक भगवान को दुनिया को खुद को छलते रहेंगे। कल किसी ने लिखा था , अपनों को लूटो और जम कर जितना चाहो लूट लो मगर इतना ध्यान रखना कि उस हद तक मत जाना कि कभी आप गिर पड़ो तो अपनों को उठाने को हाथ बढ़ाने में भी संकोच हो या सबको लगे ये भी आपकी कोई चाल है साज़िश है। ज़िंदगी भर जिनको भला बुरा कहते रहे उनके बाद उनकी याद में आंसू बहाना उनका अपमान होगा। अभी भी जो अपने हैं उनको प्यार आदर से अपनाओ यही वास्तविक मानव धर्म है। अगर मुमकिन हो तो किसी से कुछ ले जाने से बेहतर है किसी को कुछ देकर जाना दुनिया से और कुछ भी नहीं दे सकते फिर भी प्यार और आदर देने में तो आपको कोई नुकसान नहीं होता है। संत  कबीर जी कह गए हैं :-

चार वेद षट शास्त्र में,,
बात मिली है दोय,,

दुःख दीने दुःख होत है,,
सुख दीने सुख होय,,

कबीर मन तो एक है,,
भावै तहां लगाय,,

भावै हरी की भक्ति कर,,
भावै विषय कमाय।




Saturday, 6 June 2020

हालत खराब अर्थव्यवस्था की ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    हालत खराब अर्थव्यवस्था की ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

" ये क्या हालत बना रखी है अपनी , कुछ लेती क्यों नहीं। " अर्थव्यवस्था को देखते ही मैंने कह दिया। क्या आपको मज़ाक लगता है जो खांसी-ज़ुकाम की दवा का इश्तिहार पढ़ कर मेरे जले पर नमक छिड़क रहे हो। कुछ बुरा लगा उसको , मैंने कहा नहीं माफ़ करना ये डायलॉग अचानक मुंह से निकल गया। मगर मुझे दिल से सहानुभूति  है आपकी अधमरी हालत देखी नहीं जाती। उसने कहा आप तो लेखक लोग महिलाओं की गरीबों की हर किसी की दर्द भरी दास्तां सुनाते हो कभी मेरी भी व्यथा कथा सुन कर समझोगे। उसके बाद मेरे हां कहने पर उसने रो रो कर अपनी कथा ब्यान की जो मैं उसी के शब्दों में आपको बताता हूं। 

आमदनी अठन्नी खर्चा रुपया। देश की आमदनी से बढ़कर सरकार के खुद अपने खर्चे रहे हैं जो भी सत्ता में आया उसी ने मुझे अपनी ऐशो आराम की मनमौजी की चाहत को पूरा करने में खूब जमकर उपयोग किया। किसी बेबस अबला की तरह खामोश रहना मेरी मज़बूरी बन गया। मगर जैसे भी कभी कुछ बिमार कभी कुछ काम चलाऊ हालत रहती थी। मगर छह साल पहले किसी ने आकर मुझे कहा तुझे अभी तक सभी ने लूटा है मगर मैं किसी चौकीदार की तरह तेरी रखवाली करूंगा तुझे बिकने नहीं दूंगा और मुझे शासक नहीं सेवक बनकर सबका विकास करना है सबका साथ पाना है। बस तुम खुद को मेरे हवाले कर दो बस मेरी सिर्फ मेरी बनकर मुझ पर अटूट विश्वास रखना। उसके बाद उसने क्या क्या किया और क्या क्या नहीं किया कहना आसान नहीं है। किसी नीम हकीम की तरह ऐसा ईलाज करता गया कि मेरी दशा और बिगड़ती गई। उस से पहले किसी ने बहुत समझदारी से मुझे चलने फिरने के लायक बनाया था और इसने तो मेरा जिस्म ही छलनी छलनी कर दिया। अपने से पिछले सत्ताधारी लोगों को चोर घोषित करने वाला खुद डाका डालने लगा और चौकीदार के फ़र्ज़ को भूलकर डाका डालने वाले अपने लोगों को अवसर देता रहा और उनको भागने बचाने में साथ देकर उनका विकास करता रहा। अब अपना दोष कोरोना के सर मढ़ना चाहता है जबकि खुद उसकी नासमझी मनमानी और महत्वांकांक्षाओं की पूर्ति करने से मुझे बाणों की इस शैया पर अंतिम सांसे गिनने को छोड़ दिया है। लेखक आपको वो पुरानी कहानी याद है तो मुझे सुनाओ , उसी तरह जैसे लोग किसी को आखिरी समय में गीता का कोई अध्याय पढ़कर सुनाया करते हैं उसकी आत्मिक शांति की खातिर। सोचते सोचते याद आई तो है कुछ भूली हुई कुछ याद है। 

    किसी महाजन का कारोबार था कुछ खरीदना कुछ बेचना कुछ कहीं से उधार लेना और आगे किसी को ब्याज पर क़र्ज़ देना। ऐसे में नौकर चाकर रखना और देखभाल को चौकीदार अपने लिए सेवक रखना ज़रूरी था। कोई ईमानदार कोई हेराफेरी करने वाला कोई कामचोर मिलता था कभी आमदनी अच्छी कभी थोड़ी होती रहती थी मगर कारोबार फैलता गया और फल फूल रहा था। शायद पत्नी का भाई था या किसी और के कहने पर विश्वास कर इक मैनेजर रख लिया। मैनेजर ने कहा आपको चिंता की ज़रूरत नहीं मुझे सब को संभालना ठीक से आता है मुझ पर भरोसा रखो और आपको घर बैठ आराम करना चाहिए। उस मैनेजर ने अपने लिए आलीशान दफ्तर बनवा लिया विदेशी सैर सपाटे कारोबार को बढ़ाने के नाम पर अपने रिश्ते बनाने लगा भविष्य को सब अपना अधिकार स्थापित करने का सपना लेकर। बिना जाने समझे बही-खाता देखे जैसे जितना भी था अपने आप पर खर्च करता रहा और कारोबार में जो जो भी पहले जमा किया हुआ था धन दौलत और जायदाद उद्योग शेयर या फिक्स डिपॉज़िट सब ही बर्बाद कर डाले। बात दिवालिया होने तक पहुंच गई मगर मैनेजर को अपनी चालाकी और काबलियत पर गर्व था। उसका मत था सब को मिटाने के बाद भी फिर से नया निर्माण किया जा सकता है। महाजन की साख थी मैनेजर को जितना चाहे क़र्ज़ मिल जाता था लेकिन महाजन जो क़र्ज़ लेता था उसे अपने ऐशो- आराम पर कभी खर्च नहीं करता था बल्कि उस पैसे को आगे अधिक ब्याज पर देकर आमदनी का तरीका बनाया हुआ था। किसी साधु ने उसको इक दिन कहा था ऐसी कमाई कोई और खा जाएगा तुम्हारे काम नहीं आएगी। ये कुछ दिन का खेल तमाशा हैं खेल लो मगर अंजाम क्या होगा सामने आएगा। 

      मैनेजर ने पिछले सभी नौकर चाकर धीरे धीरे बदल कर अपने सगे संबंधी खास अपने लिए निष्ठा रखने वाले लोग रख लिए। उनकी समझ काबलियत नहीं उनके साथ अपना नाता देख कर। और उनको भी कुछ भी करने की छूट नहीं थी जैसा आदेश मिलता उनको पालन करना होता। पहले सस्ता खरीद कर मुनाफ़ा लेकर जो बिकता था अब महंगा खरीद सस्ता बेचने का घाटे का धंधा होने लगा। मकसद मैनेजर साहब जिनको खुश करना चाहते उनको अपना घर बर्बाद कर भी मालामाल करना बन गया। मैनेजर के साथ संगी साथी भी जिस जिस शहर में कारोबार की देखभाल करते थे उस में घपले घोटाले करने लगे मालिक बनकर और जो असली महाजन थे उनको झूठ बताया जाता रहा कि देश क्या विदेश तक धंधा खूब चल रहा है। ऐसे में कब कारोबार चौपट हो गया और हालत खराब होने पर सब बिकने के बाद भी बात संभल नहीं सकी तो जालसाज़ी या छल कपट से असली मालिक को ही बाहर कर दिया गया। उसको पागल और खुद को कारोबार का संरक्षक साबित कर दिया झूठे दस्तावेज़ बनवा कर। महाजन ने समझ लिया ये कोई और युग आने का संदेश है क्योंकि चार युग में ऐसा होने का कोई वर्णन नहीं मिलता है। तब उसको नहीं पता था कि वो युग कौन सा होगा और उसकी कहानी भी अलग थी। अब समझ सकते हैं कि जिस की कल्पना की थी वो शायद यही पांचवां युग है जिसको कोरोना काल कह सकते हैं।

  पहले नौकर हेराफ़ेरी करते थे तो भी आमदनी कम हो जाती थी जब खुद मालिक चोरी करता है तो असल भी बचता नहीं है ये कारोबार का नियम है कि जब हिस्सेदार खुद हिस्सा हड़पने लगते हैं तब कारोबार चौपट होना ही है। मैनेजर ने मालिक से महाजन से धोखा किया उसके खास लोगों ने मैनेजर से धोखाधड़ी की और इक दिन मैनेजर की जालसाज़ी पकड़ी गई और उसका सब किया धरा बेकार गया। महाजन को बर्बाद करने के बाद भी मैनेजर को कुछ दिन की मौज मस्ती के बाद जो अंजाम हुआ कभी नहीं सोचा था। मैनेजर को इक दिन मेज़ की दारज से इक चिट्ठी मिली जिस पर लिखा हुआ था मुझे किसी ने सही राह समझाई थी , कि अपने आराम और शानदार जीवन को अपनी ईमानदारी की कमाई से खर्च करना चाहिए क्योंकि तब उस पैसे की वास्तविक कीमत समझ आती है। किसी और की दौलत से ठाठ करना दान धर्म करना कभी भी आपको वास्तविक सुःख शांति नहीं दे सकता है। तुमने मुझे लूटा कोई तुमसे भी छीन लेगा सभी किसी दिन।

 अर्थव्यवस्था ने इतनी कहानी सुनते ही मुझे चुप रहने को कह दिया। शायद अभी कहानी का शेष भाग किसी और दिन सुनना चाहती है या कोई और लेखक तलाश करना चाहती है जो लिखे तो हर कोई पढ़ सके जान सके। मुझे कौन पहचानता है पढ़ता है अर्थव्यवस्था को पता है। मगर जब देश की अर्थव्यवस्था चलाने वाले अर्थशास्त्र का कुछ नहीं जानते तब भला नाम वाला बड़ा साहित्यकार अर्थव्यवस्था की दर्द भरी दास्तान क्यों लिखेगा। ऐसे लोगों की अर्थव्यवस्था की हालत अच्छी है और उनको सब हासिल है। ये खबर भी कोई नहीं बताता जबकि उनको खबर है यही असली खबर है जो सबको बतानी चाहिए। मगर उनका रिश्ता मैनेजर और उसके बंधुओं जैसा ही है। अर्थव्यवस्था की कहानी सेवक बनकर मालिक होने का अधिकार हासिल करने की अनीति की कथा है सार की बात यही है। 


Thursday, 4 June 2020

सावधान ये पोस्ट मत पढ़ना परेशान हो जाओगे ( विचार - विमर्श , चिंतन - मनन ) डॉ लोक सेतिया

    सावधान ये पोस्ट मत पढ़ना परेशान हो जाओगे 

                       ( विचार - विमर्श , चिंतन - मनन ) डॉ लोक सेतिया 

   आज इक पोस्ट पर सवाल किया गया था एलोपैथिक दवाओं के साइड इफेक्ट्स क्यों होते हैं। जाने क्यों मुझे लगा इस को सोच समझ कर विस्तार से समझना समझाना चाहिए। ये समझ केवल मेरे डॉक्टर होने और एलोपैथिक एवं आयुर्वेदिक दोनों ही तरह की शिक्षा और ईलाज के 45 साल के अनुभव से ही नहीं आई है बल्कि मेरे सामाजिक सरोकार को लेकर जागरूक रहने और जागरूकता फैलाने से दोनों के साथ होने से हो सकी है।
     हम तलवार चाकू छुरी पिस्टल बंदूक को अपनी सुरक्षा अपने कार्य में उचित उपयोग भी कर सकते हैं और इन को किसी को या खुद को नुकसान पहुंचाने को भी इस्तेमाल कर सकते हैं। आपने जानकर किया या बिना जाने किया मगर गलत ढंग से इस्तेमाल किया तो अंजाम वही होगा। ठीक इसी तरह आपने खुद लापरवाही की या किसी डॉक्टर ने बिना सोचे समझे आपको सलाह दे दी जो ज़रूरी हर्गिज़ नहीं थी बात एक ही है। लेकिन डॉक्टर भी आपको दवा लिखते हैं अपनी समझ और राय के अनुसार जो हमेशा सही नहीं भी हो सकती है। अब आपको लगेगा ये तो मैंने उलझन खड़ी कर दी अपनी मर्ज़ी से नहीं और डॉक्टर की सलाह से भी नहीं तो फिर किस तरह निर्णय करें। आपको बाज़ार से अपने लिए जो भी खरीदना होता है आपकी ज़रूरत को पहले देखते हैं फिर अपना आंकलन करते हैं कौन किस कसौटी पर खरा है वस्तु भी अच्छी और मूल्य भी उचित हो , ये आपको जीवन के अनुभव समझाते हैं। मगर अपने स्वास्थ्य को लेकर आपने कभी गहराई से विचार किया समझा कौन डॉक्टर आपको उचित सलाह देता है आपको कब किस समस्या को लेकर किस पैथी की दवा लेनी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण ये है कि आप अपने स्वास्थ्य और जीवन का कितना महत्व समझते हैं।  मैंने कितनी बार अपनी जान पहचान के लोगों को दोस्तों रिश्तेदारों को कहा है कि आप उपचार जिस किसी से चाहे करवा लेना मगर कभी भी कोई सेहत संबंधी परेशानी हो मुझे बताना आपको उचित सलाह देकर मुझे ख़ुशी होगी , फिर भी बहुत बार लोग बाद में बताते हैं या जब देर हो गई तब सलाह लेते हैं। वास्तव में अधिकांश लोग सोचते हैं उनको जानकारी है जो वही बहुत है मगर उनकी जानकारी होती है शहर में कौन सा डॉक्टर या अस्पताल अच्छा समझा जाता है जबकि उनकी तब की समस्या के लिए मुमकिन है वो सही नहीं हो और कोई बेहतर विकल्प हो।

     हमारा देश की सरकार का तौर तरीका स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर कभी भी तार्किक और वास्तविक मकसद को समझ कर उचित होता नहीं है। बल्कि अब तो सरकार इस को लेकर उदासीन और हद से अधिक बेपरवाह हो गई है। अभी कोरोना की समस्या को लेकर भी उसकी जानकारी समझ और निर्णय आधी अधूरी ही नज़र आई है। ये विडंबना है कि आधुनिक समय में स्वस्थ्य सेवाओं को लेकर कोई साफ नियम और कानून अमल में नहीं लाये जाते हैं। जिस तरह की कड़ी व्यवस्था नागरिक की जान की सुरक्षा को जानकर होनी चाहिए है नहीं और राज्य की सरकारें कुछ लोगों के दबाव में सालों से बने नियम कानून भी लागू नहीं करती हैं। ऐसे में आम नागरिक को नहीं मालूम सही क्या है गलत क्या है। कारण ये है कि हमारी विधायिका संसद विधानसभा इसको लेकर संवेदनशील नहीं है और कई राजनेताओं के स्वार्थ जुड़े हुए हैं जो निजि शिक्षा संस्थान और नर्सिंग होम या मेडिकल कॉलेज का कारोबार करते हैं। जब इसके साथ सरकारी अधिकारी और विभाग भी शामिल हो जाते हैं तब मिल बांटकर खाने की आदत से शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे विषय भी महत्वहीन समझे जाते हैं। इसका मुख्य कारण राजनेताओं अधिकारी वर्ग और धनवान लोगों को ये सब आसानी से उपलब्ध होना है। उनको इस बात की कल्पना तक नहीं है कि उनके अपना कर्तव्य नहीं निभाने से जाने कितने लोग ऐसी व्यवस्था का शिकार होकर बदहाल और मौत आने से पहले मौत के शिकार हो जाते हैं समय पर उपचार नहीं मिलने या पैसे नहीं होने से।

     कुछ समय पहले इक सर्वेक्षण में चौंकने वाली बात सामने आई थी। जो बड़े बड़े पांचतारा नर्सिंग होम अस्पताल लाखों रूपये का बिल लेते हैं हज़ारों रूपये डॉक्टर की फीस होती है उनकी लिखी पर्ची पर हज़ारों रूपये जांच पर खर्च करवाने के बाद भी निदान नहीं लिखा हुआ था साफ साफ , अधिकतर में रोग के नाम से पहले सवालिया निशान  ? लगा हुआ था जिस का अर्थ होता है ये संभावित है पक्का नहीं। सर्वेक्षण करने वाले अंदाज़ा नहीं लगा सकते कि जब बड़े बड़े अस्पताल की ये हालत है तो नीचे क्या नहीं होता होगा। आपने देखा मीडिया टीवी चैनल पर कोई अंकुश नहीं अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर विशेषाधिकार की तलवार लेकर सच के रखवाले सच को ही क़त्ल कर रहे हैं। बिकना नहीं है ये नागरिक के अधिकारों का हनन करने की सुपारी लेने जैसा अपराध है। जनता की समंस्याओं को छिपाना सत्ता और धनवान लोगों की महिमा का गुणगान करना पैसे विज्ञापन के लालच में जिसे रिश्वत कहना उपयुक्त होगा। यही सरकार ने शिक्षा स्वास्थ्य सेवाओं को लूट का माध्यम बनाने वालों पर कोई निगरानी नहीं रखने का काम किया है। सही मायने में सांसदों- विधायकों सभी दलों को सत्ता का खेल और बहुमत का गणित छोड़ कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं लगता है। सत्ता ही ध्येय भी है और ईमान भी और राजनीति का मकसद भी , देश जनता की कोई कल्याण की बात ही नहीं है।

आपने शोर सुना होगा आयुर्वेद और योग को लेकर , इस में खुली अंधेरगर्दी है पैसा बनाने को जिनका आयुर्वेद से कोई सरोकार नहीं कोई रोग की उपचार की समझ नहीं बाज़ार लगाए कारोबार कर रहे हैं। मगर आपको बिमारी की दवा नहीं गोरेपन की मोटापे की सुंदरता की कब्ज़ की अन्य तमाम ऐसी बातों को लेकर जिन के लिए किसी क्वॉलिफिएड डॉक्टर की राय नहीं इश्तिहार से उनका उत्पाद खरीदना है क्योंकि आपको फ़िल्मी सितारे खिलाड़ी विज्ञापन देते दिखाई देते हैं आपको उनका झूठ सच लगता है। यकीन करें वो लोग खुद कभी इन का उपयोग नहीं करते आपकी जान आपका पैसा उनकी आमदनी का ज़रिया है। कुछ इसी तरह हम ने ज़िंदगी में आने वाली समस्याओं और हालात और सामन्य जीवन की ज़रूरतों को लेकर कभी कोई समझ कोई सोच विकसित नहीं की है तभी कदम कदम पर हम बेबस होकर किसी न किसी के जाल में किसी के चंगुल में फंसे होते हैं। किताबी शिक्षा के साथ हमको वास्तविक जीवन की बातों समस्याओं और तौर तरीकों को भी जानना चाहिए।

Wednesday, 3 June 2020

रौशनी नज़र मंज़र उजाला और तलाश में भटकते हम लोग ( चिंतन मनन विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

   रौशनी नज़र मंज़र उजाला और तलाश में भटकते हम लोग 

                               ( चिंतन मनन विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

  आज शुरुआत करते हैं इंसान के इंसान को समझने से और चर्चा करेंगे भगवान तक को समझने पाने की तलाश की। देखते हैं कोई बैठा समझा रहा था कोरोना से कैसे बचते हैं क्या लापरवाही नहीं करनी चाहिए , शायद उसको मालूम भी नहीं था जो नहीं करना बतला रहा था खुद वही कर भी रहा था। साथ इक बात कही भारत देश की कमियां बुराईयां और विदेश की बढ़ाई की बात। जो अपने देश अपने पिता माता अपने भाई बहन अपने गुरु अपने दोस्तों की बुराई करता है मुझे वो कभी अच्छा नहीं लगता है। देश और समाज हमसे बनता है और उसको अच्छा बनाना हमारा ही कर्तव्य है मगर देश की बुराई करने से देश को अच्छा नहीं बनाया जा सकता है। आपको खुद अच्छा बनकर अच्छाई को बढ़ावा देना होगा जो लोग करते नहीं सुधार उनको आलोचना का भी हक नहीं होना चाहिए। मुझे भी दोस्तों से अपनों से शिकायत हो सकती है मगर वो खराब नहीं लगते क्योंकि मुझे उनसे बहुत कुछ मिला है कभी न कभी , और कभी कोई अनबन या मतभेद भी रहे तो वो जीवन का अंग हैं। हर इंसान अपनी तरह का है हर कोई अपने अनुसार आचरण करता है और जब कोई किसी से अनुचित भी करता है तब भी कोई और उसको नहीं समझा सकता कभी खुद अपनी गलती उसकी आत्मा उसका ज़मीर समझाता है। आपको किसी और को नहीं खुद अपने आप को समझना है तभी आप भगवान को भी समझ सकते हैं। जब तक आपको किसी बात की सही परख ही नहीं आपको उसकी तलाश से मिलेगा कैसे। मन को समझना सबसे कठिन है मन चंचल है आपको भटकाता है मन जानता है सच क्या है आपकी सोच आपका दिमाग झूठ को सच साबित करता है। मन मन करते हैं मन क्या है और आपकी सोच कैसी है यही नहीं जानते , मन से कुछ नहीं छिपा आपने दुनिया से क्या क्या नहीं छिपाया हुआ खुद भी चाहते हैं भूल जाना भूलने से आपकी कास्तविक्ता बदलती नहीं है। 

आप मंदिर मस्जिद जाते हैं वो भगवान नहीं वहां कोई भगवान नहीं है भगवान अर्थात धर्म अर्थात मानवता अर्थात सच्चाई की राह। आपको ये उस का मार्ग समझा सकते हैं आपको चलना खुद उस मार्ग पर है। भगवान का नाम जपने से भगवान कभी नहीं मिलते हैं भगवान क्या है समझने से मिलेंगे। नीरज जी की बात ठीक है " उस से मिलना नामुमकिन है , जब तक खुद पर ध्यान रहेगा "। आपने रौशनी को देखा है रौशनी आपको अंधकार से निकालने का नाम है जब हर तरफ चकाचौंध हो आपको कुछ भी दिखाई नहीं देता है।
धर्म के नाम पर आपको गुमराह किया गया है भगवान किसी चकाचौंध रौशनी की तरह हैं आपकी आंखें चुंधिया जाती ऐसा हैं। यही समझाया गया तस्वीरों से फिल्मों से और कथा कहानियों से। भगवान सत्य की रौशनी है जो आपके विचारों की धुंध को मिटाकर साफ करती है उचित अनुचित को समझने को विवेक देकर। मगर जो आपको आपका भविष्य बताते हैं खुद अपना भविष्य नहीं समझ सके और इक ज्योतिष दुनिया को उपाय बताते रहे खुद कोरोना से चल बसे बिना जाने बिना उपाय। आपको इक छोटी सी बात समझनी है आप घटों बात कर सकते हैं आपस में किसी से भी मगर अगर आपको सच बोलना हो और रत्ती भर भी झूठ नहीं बोलना हो आपके लिए कुछ क्षण भी बात करना आसान नहीं है। मुझे हैरानी होती है जब कोई किसी से किसी और को लेकर चर्चा करता है सौ क्या हज़ार खामियां जानता है मगर उसी से मिलते बात करते उसकी महिमा का बखान करता है। इतना ही नहीं जिसको किसी और की बुराई करते हैं बाद में उसी की भी बुराई को लेकर सोचते हैं। अब आपको बेकार की चर्चा में उलझाना नहीं है सौ टके की एक बात समझनी समझानी है। 

   हम सभी में अच्छाई भी कमी भी रहती है मगर समस्या ये है कि हम सच झूठ के आधार पर नहीं बल्कि अपने मतलब के आधार पर निर्णय करते हैं अच्छा या बुरा क्या है। वास्तव में इंसान का मन इक आईना है और आईने में आपको वही दिखाई देता है जो आपके भीतर मन में है। जब आप बुराई की तलाश करते हैं आपको दुनिया बेहद खराब नज़र आती है जब आप अपनी सोच को बदल कर भलाई को खोजोगे तब आपको हर किसी में कोई अच्छाई भलाई दिखाई देगी। जिस दिन हमने औरों की कमियां ढूंढना छोड़ खुद अपनी कमियां देखना उनको समझना उनको दूर करना सीख लिया इंसान भी बन जाएंगे और भगवान को भी पा लेंगे। हर कोई दूसरों की गलतियां देख सकता है जैसे दूसरों के चेहरे लिबास हर भाव को मगर खुद को कोई नहीं देख सकता है दर्पण कहते हैं सच दिखलाता है मगर हम हैं कि आईने में अपनी सूरत अच्छी लगती है और कभी कोई दाग़ दिखाई देता है तो दोष आईने को देते हैं। ये बात कुछ अजीब लग सकती हम अपनी बाहरी सुंदरता का बहुत ध्यान रखते हैं अपने भीतर मन में कितनी मैल भरे बैठे रहते हैं जबकि कपड़ों की सज धज की खूबसूरती रहती नहीं है कुछ देर में असलियत खुल जाती है। जिनके मन व्यवहार सच्चाई ईमानदारी से वास्तविक मायने में खूबसूरत होते हैं उनकी सुंदरता कभी कम नहीं होती है।  बनाव शृंगार से नहीं प्यार से हर किसी को इंसान समझ कर भेदभाव मिटा अपनाने से आप बिना किसी कोशिश सबका दिल जीत लेते हैं। भगवान मिलना यही है। 

Monday, 1 June 2020

बड़ी लाचार ऐप्स की सरकार ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   बड़ी लाचार ऐप्स की सरकार ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

अगर सॉफ्टवेयर मशीन से बात बनती तो सांसद विधायक आईएएस आईपीएस अधिकारी किसी की भी कोई ज़रूरत नहीं होती। हर समस्या का डेटा सॉफ्टवेयर में अपलोड करते और समाधान हो जाता। मगर ऐसा मुमकिन नहीं है जिनको लगता है कि इक इंसान है तो सब मुमकिन है उनको शायद ध्यान हो करने को भगवान भी सब कुछ कर सकता है मगर होता नहीं सब। हमने भगवान भरोसे देश को चलने दिया तभी देश अभी भी आडंबर अंधविश्वास और गुलामी की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया है। लेकिन लगता है किसी को विश्वास है कुछ भी खुद करने की ज़रूरत नहीं है हर दिन कोई नई ऐप्प बना देते हैं। आपको कुछ भी चाहिए ऐप्प है अगर यही है तो आपकी ज़रूरत क्या है ऐप्प बनाने वाले लोग बहुत हैं उनको ही सत्ता सौंप देते हम लोग। बेबस और लाचार भगवान पर छोड़ते हैं साहसी लोग खुद करने में विश्वास रखते हैं। खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले , खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है। अल्लामा इक़बाल जी का शेर है। आत्मनिर्भरता स्मार्ट फोन ट्विटर सोशल मीडिया से नहीं हासिल की जा सकती है भले किसी की सरकार इन्हीं के सहारे बन गई हो काठ की हांडी कितनी बार चढ़ेगी आखिर समझ गए लोग जो कुछ नहीं करना जानते हैं उनको औरों का किया सब बर्बाद करना ही आता है। इंसान को निठल्ला बना दिया है ऐसी चीज़ों ने जिनका भरोसा नहीं किस पल धोखा दे जाएं कोई वायरस आकर सब चौपट कर दे। कोरोना वायरस ने दुनिया की सरकारों को सबक सिखलाया है आपके पास बचने का कोई एंटी वायरस नहीं है। अब लोग चाईना की ऐप्स को अनइंस्टाल करने की ऐप्प पर भरोसा करने लगे हैं। 

     अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे , मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे। ज़ौक़।

बात बहुत पुरानी है तब धर्म भगवान को लेकर खुलकर बात करना आसान नहीं होता था। मगर हमारे गांव के इक बड़े ज़मीदार ऐसी बातें कह देते थे। इक बार कोई इक पंडित को साथ लेकर उनके घर आया और बताया कि ये शहर से बाहर बने इक मंदिर के पुजारी हैं इनका गुज़र नहीं चलता है क्योंकि उस मंदिर में कभी कभी ही कोई आता है चढ़ावा नहीं चढ़ता जिस से पंडित जी का परिवार बसर कर सके। उनको उम्मीद थी कि ज़मीदार साहब कुछ सौ पचास महीना देने की बात कहेंगे मगर उनको जवाब मिला आप उस मंदिर को बंद ही कर दो जिस में कोई आता जाता नहीं। खैर उनकी अपनी सोच या मत की बात थी। ओ देने वाले तू ने तो कोई कमी न की , अब किसको क्या मिला ये मुकदर की बात है । लेकिन हमने जाने कितने आधुनिक भगवान खुद बना लिए हैं जिनसे कुछ भी हासिल नहीं होता है जो आपको किसी पत्थर की मूरत की तरह आशिर्वाद देते नज़र आते हैं उनकी ऐप्स से कुछ भी संभव नहीं हो सकता है स्वच्छ भारत से लेकर आरोग्य-सेतु ऐप्प तक इक झूठी तसल्ली के सिवा कुछ भी नहीं है। जाने कब तक हमको सरकारें नेता अधिकारी ऐसे ही झुनझने पकड़ा कर बहलाने में सफल होते रहेंगे। सरकार की साइट्स पर कितनों को क्या क्या भेजा बता सकते हैं मगर वास्तव में किस किस को क्या मिला कोई नहीं जानता है। कितनी हसीन आज सितारों की रात है , इक चांद आस्मां पे है इक मेरे साथ है। आपके साथ नहीं आपके हाथ इक स्मार्ट फोन है जिस में चांदनी नहीं है चंदा की तस्वीर है आपको उन ऐप्स से दिल बहलाना है। सच समझना है तो इन ऐप्स के चंगुल से निकलो और वास्तविकता को समझो।

अकबर बीरबल की इक कहानी है। इक रात को इक सीधे साधे शरीफ इंसान को , भोली भाली जनता की तरह , सपने में इक सेठ जी ने ढेर सा धन उधार दे दिया। सुबह हुई उसको लगा शायद ख्वाब सच होगा और उसने सेठ जी को जाकर बताया मुझे बड़ी ज़रूरत है रात सपने में देखा आपने मुझे बहुत धन दिया है उधार। सेठ बड़ा चालाक था उसने उधार देने की जगह बल्कि उस को जो सपने में लिया वो लौटने को कहा। और बात बढ़ते बढ़ते राजा के दरबार तक जा पहुंची , सेठ ने कहा इसने मुझसे खुद कहा सपने में मुझसे उधार लिया अब वापस नहीं लौटा रहा। अकबर ने ये उलझन सुलझाने को बीरबल को कहा , बीरबल ने सेठ को बुलाया और पूछा सपने में आपसे उधार लिए आपने मान लिया क्या आपकी तिजोरी से घटे थे नहीं गिनती की। फिर भी आपको सपने में कोई वापस कर जाये तो आप उसका दिया धन जमा कर लोगे ऐसे तो कोई भी आपको बताएगा उसने आपको सपने में पैसे दिए आपको मंज़ूर है। फिर भी उसने खुद आपको कहा है तो उसी तरह लौटाएगा भी मगर यहां और आपको लिख कर देना होगा मिल गए। बीरबल ने उस इंसान को पैसों से भरी थैली लाकर दरबार में रखने को कहा , फिर उस थैली को इक आईने के सामने रखा और कहा देखो आईने में जो थैली है आप उसे उठा लो आपके हैं वो पैसे लौटा रहा है ये। भला आईने में जो दिखाई देता है उसे कोई कैसे ले सकता है सेठ बोला। बीरबल बोले फिर सपने में जो मिला आपने कैसे मान लिया दिया था।  ये सरकार भी ऐसे ही आपको देश को सपने दिखालाती है और कहती है कितने खूबसूरत ख्वाब हैं अब खुश हो जाओ। अच्छे दिन वाले सपने चलते चलते बीस लाख करोड़ वाले सुनहरे ख्वाब तक पहुंच गए हैं। ताली बजाओ थाली बजाओ और साल दर साल जश्न मनाओ अपने को मूर्ख बनने का अन्यथा अपनी सरकारी ऐप्स को हटा दो ये झूठे आईने हैं टीवी चैनल की तरह खबर नहीं बताते जो हुआ नहीं उसको खबर बनाते हैं।