Friday, 15 November 2019

सर्वोच्च न्यायालय के गांव की पंचायत की तरह का फैसला - ( मत-अभिमत ) डॉ लोक सेतिया

     सर्वोच्च न्यायालय के गांव की पंचायत की तरह का फैसला 

               - ( मत-अभिमत ) डॉ लोक सेतिया 

खामोश रहना उचित नहीं होता है मगर कभी अत्याधिक शोर से भी बचना चाहिए। तभी इस संवेदनशील विषय पर कुछ समय विचार करने के बाद अपना मत रखने जा रहा हूं। आस्तिक हूं मगर धर्म को लेकर कभी भी कट्रता को स्वीकार नहीं किया है। मुझे मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे इक समान लगते हैं और मेरा अभिमत है कि धार्मिक आस्था व्यक्ति का निजि विषय है और सरकार कानून अदालत को निरपेक्ष होकर कार्य करना चाहिए। 

     ये उचित परंपरा नहीं हो सकती कि बिना नियम कानून और तर्क के बहुमत की राय को स्वीकार कर लिया जाये। संविधान सबको बराबर की आज़ादी देता है इसलिए बिना सोचे समझे किसी की बात को विरोधी समझ कोई अनुचित आरोप नहीं लगा देना चाहिए। मगर ऐसा लगता है अब कुछ लोग यही करते हैं और उचित बात कहने पर देशभक्ति पर सवाल खड़े करने लगते हैं। 

  इक आई एस अधिकारी ने अपना पद छोड़ दिया सरकारी निर्णय को अनुचित समझते हुए। उनका भाषण उनकी बात सुनने लायक हैं। 


   इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय के अयोध्या विवाद पर निर्णय पर इक रिटायर न्यायधीश ने विचार व्यक्त किये हैं जो सोचने को विवश करते हैं। उनकी कही बातों को समझने की कोशिश करते हैं। कुछ बातें हैं जिन पर विचार करते हुए अपनी आस्था विश्वास और चाहत को किनारे रख कर देश के संविधान की भावना को समझना ज़रूरी है। 

      अदालत एक तरफ कहती है उसको आस्था को लेकर कोई निर्णय नहीं करना और विवाद कानूनी मालिकाना अधिकार का है। फिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ए एस आई का जांच करना आधार बनाना इस को लेकर कि सैंकड़ों साल पहले उस जगह क्या था क्या होता था निर्णय को प्रभावित कैसे कर सकता है। देश की आज़ादी के बाद संविधान लागू किया गया और देश की अदालत और कानून को उसके बाद उसके अनुसार विचार करना उचित होता क्योंकि इस तरह से देश भर में कितनी इमारतें भवन निर्मित हुए कितने शासकों के शासनकाल में। केवल इस बात को सोचकर कि बहुमत की अवधारणा और राय किस पक्ष में होगी निष्पक्ष होकर निर्णय नहीं किया जा सकता है। पहले भी सत्ताधारी शासक नेताओं द्वारा अपनी पसंद के लोगों को नियुक्त कर अपनी मर्ज़ी के सुविधाजनक निर्णय करवाए जाते रहे हैं। 

 इतिहास की आंखों ने वो मंज़र भी देखे हैं 

लम्हों ने खता की थी और सदियों ने सज़ा पाई।


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