Friday, 5 July 2019

शायरी वैश्या के कोठे से संसद तलक ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  शायरी वैश्या के कोठे से संसद तलक ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

   जिनको महफ़िल के आदाब नहीं मालूम उनसे गुफ़्तगू करना फज़ूल होता है। मैंने पिछले कई सालों से टीवी पर खबरें और बहस देखना छोड़ दिया है अख़बार भी कभी चार छह मंगवाता था दिन भर पढ़ता रहता अब एक ही मंगवाता हूं सरसरी नज़र डालता हूं पढ़ने की ज़रूरत नहीं होती सब वही पहले सा होता है। कल आधा बाकी बजट संसद में पेश किया गया नहीं देखा नहीं सुना बिना पढ़े ही इक रचना लिखी खबर का शीर्षक देख कर ही। ये मशहूर होना है कि बदनाम होना कहा जाये जो इधर ग़ज़ल शायरी जिसे बड़ी मुश्किल से वैश्या के कोठे से उतार कर दुष्यंत कुमार जैसे शायरों ने इंसान और इंसानियत के आम ज़िंदगी के सरोकार से जोड़ा था वापस बेदिल बेअदब राजनेताओं की मंडी में लाई गई है बिना उसकी मर्ज़ी के। हर दिन कोई नेता किसी शायर के शेर का क़त्ल करता है किसी ग़ज़ल की आबरू तार तार करता है। कल संसद में क्या हुआ होगा आपको कोई ज़हमत नहीं उठानी पड़ेगी बस शायर राजेश रेड्डी की शायरी के इस वीडियो को समझना होगा केवल सुनने की बात नहीं है। बड़े आसान शब्दों में सीधी सच्ची खरी बात कहते हैं , सुनिए उसके बाद चर्चा करते हैं। 


पहली ही ग़ज़ल समझाती है। 
चलेगा चार दिन सिक्का तुम्हारा , फिर उसके बाद क्या होगा तुम्हारा। 
बड़े होकर है जीना जाहिलों में , धरा रह जाएगा बस्ता तुम्हारा। 

हो सकता है जो अदबी उसूलों से वाक़िफ़ नहीं इसको भी कहें कि शोहरत की बात है बदनाम होकर भी नाम होने की चाहत रखने वाले लोग और होते हैं। दुनिया के बाज़ार से अलग रहने वाले राजेश रेड्डी जैसे वास्तविक शायरी कहने वाले शायर तो साफ कहते हैं। 

ये कब चाहा कि मैं मशहूर हो जाऊं , बस अपने आप को मंज़ूर हो जाऊं। 
मेरे अंदर से गर दुनिया निकल जाये , मैं अपने आप में भरपूर हो जाऊं। 
न बोलूं सच तो कैसा आईना मैं , जो बोलूं सच चकनाचूर हो जाऊं।

उनकी हर ग़ज़ल का शेर आज भी आपको हक़ीक़त लगेगा समझोगे अगर। 

अब क्या बताएं टूटे हैं कितने कहां से हम , खुद को समेटते हैं यहां से वहां से हम। 
क्या जाने किस जहां में मिलेगा हमें सुकून , नाराज़ हैं ज़मीं से खफ़ा आस्मां से हम।
मिलते नहीं हैं अपनी कहानी में हम कहीं , गायब हुए हैं जब से तेरी दास्तां से हम। 
अब तो सराब ही से बुझाने लगे हैं प्यास , लेने लगे हैं काम यकीं का गुमां से हम। 
क्या जाने किस निशाने पे जाकर लगेंगे कब , छोड़े तो जा चुके हैं किसी की कमां से हम। 
ग़म बिक रहे थे मेले में खुशियों के नाम पर , मायूस होके लौटे हैं हर इक दुकां से हम। 

( सराब कहते हैं रेगिस्तान की चमकती हुई रेत को मृगतृष्णा जो पानी लगती है होता नहीं पानी )

शायरी लाजवाब हुनर है ग़ालिब को गुरुर था बादशाह का तख़्तो ताज़ छिन्न सकता है उनसे उनका हुनर कोई नहीं छीन सकता है। मगर ये राजनेता और दुनिया के ऐसे तमाम लोग जिनको दर्द से कोई एहसास ही नहीं बड़े बेदर्द होकर देश की जनता से ज़ालिमाना ढंग से पेश आते हैं उनके मुंह से ऐसी ग़ज़ल का शेर और शायरी सुनकर लगता है जैसे कदाचार करता है किसी नाज़ुक बेबस अबला के साथ। ग़ज़ल की नाज़ुकी उसकी पहचान है इधर जो शायर मंच पर ग़ज़ल को कहते नहीं पढ़ते हैं चिल्ला कर शोर करने की तरह उनका भी जुर्म कम नहीं है। बाज़ारू बिकने की चीज़ नहीं है ग़ज़ल , कहां दर्दे दिल की बात कहां नाम पैसा शोहरत और आयोजक की बढ़ाई करने की सलीका जो किसी ज़माने में दरबारी कवि अपनाते थे ख़िताब और मांहवार पेंशन पाने को। अब तो सोशल मीडिया पर इश्क़मिजाज़ी और ख़ुदपरस्ती के लिए अच्छे शेरों को तोड़ मरोड़ कर कचरा करने का गुनाह लोग करने लगे हैं। अगर उनको ये शायरी से मुहब्बत लगता है तो फिर ये प्यार भी वहशीपन वाला है ज़बरदस्ती से किसी को अपना बनाने की नाकाम कोशिश करना गुनाह है। 

मनवीय संवेदनाओं को महसूस करने को दर्द को भावनाओं को व्यक्त करने को लिखे कलाम को ऐसे लोग बोलते हैं जिनकी संवेदनाएं ही मर चुकी होती हैं इस से अधिक विडंबना की बात भला क्या होगी। आपको अगर यही अच्छा लगता है तो नकली की वाह वाह करना छोड़ इन झूठे दोगले लोगों के किसी के चुराए शेर को सुनकर तालियां बजाने से बेहतर है अच्छी शायरी की किताब लेकर पढ़ना या उनकी वीडियो ऑडियो संगीत को सुनिए। बनावटी माल नकली सामान बाज़ार में बाक़ी कोई कम था जो शेरो शायरी को भी ले आये हैं। संसद पहुंच कर ग़ज़ल को लगता होगा फिर वापस वैश्या के कोठे पहुंच गई हूं। 

याद आया कहावत भी है वैश्यावृति और राजनीति दुनिया के दो सबसे पुराने पेशे हैं और दोनों में बहुत समानता भी है। वैश्या की मुहब्बत हर किसी को मिलती है पैसे से उसी तरह से राजनेताओं का प्यार भी जनता से देश से मतलब पाने को ही होता है। चलते चलते।

No comments: